भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
३ क्या भगवान बुद्ध यह मानते थे कि पूर्व कर्मों का भविष्य - जन्मों पर प्रभाव पड़ता है?
(२)
१. इस तरह से भगवान् बुद्ध का पूर्व कर्म का सिद्धान्त विज्ञान से बेमेल नहीं हैं ।
२. भगवान बुद्ध पूर्व-जन्मों के कर्मों के संसरण में विश्वास नहीं करते थे ।
३. जब वे वह मानते थे कि जन्म माता-पिता से प्रदत्त होता है और बालक में जो कुछ भी गुण-दोष होते हैं वह वंशानुगत क्रम से माता-पिता के माध्यम से ही प्राप्त होते हैं, तो वे कर्मों के संसरण में विश्वास ही कैसे कर सकते थे ?
४. तर्क के अतिरिक्त इस बात का सीधा प्रमाण भी उस सूक्त में, विद्यमान है जो 'चूळ- दुक्ख-खन्ध- सूक्त' कहलाता है और जिसमें भगवान् बुद्ध तथा जैनों की बातचीत का वर्णन हैं।
५. इस संवाद में भगवान् बुद्ध ने कहा है :- "निगण्ठो! तुम्हारा यही कहना है न कि हमें यह शिक्षा अच्छी लगती है और कि हम इसे मानते हैं कि हमने पूर्व जन्म में जो पाप कर्म किया है, उसे हम इन कठोर तपस्याओ द्वारा समाप्त करते है, शरीर, वाणी और मन का वर्तमान संयम पूर्व-जन्म के पाप कर्मों को समाप्त कर देगा । इस प्रकार तपस्या द्वारा अपने पुराने सभी पाप कर्म को समाप्त कर देने से और नये पाप-कर्म न करने से भविष्य स्वच्छ हो जाता है, भविष्य के स्वच्छ हो जाने के साथ पूर्व भी साफ हो जाता है, पूर्व के साफ हो जाने के साथ दुःख नहीं रहता; दुःख न रहने से दुःखद वेदना नहीं रहती और जब दुःखद वेदनाओं के एकदम न रहने से समस्त दुःख का ही क्षय हो जाता है?"
६. उन निगण्ठों के 'हा' करने पर मैने कहा कि “क्या तुम जानते हो कि इससे पूर्व तुम्हारा पूर्व- जन्म था, और यह जानते हो ऐसा नहीं था कि तुम्हारा पूर्व जन्म न हो?”
७. "नहीं जानते ।"
८. “क्या तुम जानते हो कि अपने पूर्व जन्म में तुम निश्चयात्मक रूप से सदोष थे; तुम यह जानते हो कि तुम निर्दोष नहीं थे?"
९. "नही!"
१०. “क्या तुम जानते हो कि उस पूर्व जन्म में तुमने अमुक पाप-कर्म किया था वा नहीं किया था?”
११. "नही !
१२. अब भगवान् बुद्ध यह भी जोर देकर कहते हैं कि एक आदमी की स्थिति उसके वंशपरम्परागत आगत गुणों पर उतनी निर्भय नही करतीं, जितनी उसकी परिस्थिति पर निर्भर करती है ।”
१३. भगवान् बुद्ध ने देवदह-सुत्त- ५ में कहा है :- "कुछ श्रमण-ब्राह्मणो का मत है कि जो कुछ भी आदमी भुगतता है, यह सब उसके पूर्व जन्मों के कर्मो का परिणाम है -- चाहे सुख हो चाहे, दुःख हो, चाहे असुख अदुख हो । इसलिये (उनका कहना है) कि पूर्व-कर्मो की निर्जरा द्वारा और नये अशुभ कर्मों से विरत रहने से पाप कर्मो का क्षय हो जाता है । जब पाप कर्मों का क्षय हो जाता है तो दुःख का क्षय हो जाता है । जब दुःख का क्षय हो जाता है । (दुःखद ) वेदनाओं का क्षय हो जाता है, और जब वेदनाओं का क्षय हो जायेगा तो तमाम दुःख का समूल उच्छेद हो जायेगा ।" यह निगण्ठो (जैनो) का मत है ।
१४. “यदि प्राणियों के (पूर्व ) जन्म की परिस्थिति उनके दुःख-सुख भोगने का कारण है तब भी निगण्ठ गर्हा के भाजन है, यदि परिस्थिति कारण नहीं है तब भी वे गर्हा के भाजन हैं।"
१५. भगवान् बुद्ध के ये वचन प्रस्तुत विषय मे सम्बन्धित है । यदि भगवान् बुद्ध पूर्व-कर्म में विश्वास रखते तो वे यहा इस समय पूर्व-कर्म के बारे मे सन्देह क्यो प्रकाशित करते? और यदि भगवान् बुद्ध यह मानते कि सुख-दुःख पूर्व-जन्म का परिणाम है तो वे यह क्यों कहते कि वर्तमान जीवन का सुख - दुःख परिस्थिति का परिणाम होता है ।
१६. पूर्व-कर्म (सुख-दुःख का कारण होते हैं) का सिद्धान्त शुद्ध ब्राह्मणी सिद्धान्त है । पूर्व कर्म का वर्तमान जीवन पर प्रभाव पड़े -- इसका ब्राह्मणी ‘आत्मा' के सिद्धान्त से पूर्णतया मेल बैठता है, क्योंकि वे मानते है कि 'कर्म' का 'आत्मा' प्रभाव पड़ता है । लेकि बुद्ध-धम्म के ‘अनात्मवाद' से इसका किसी भी तरह मेल नहीं बैठ सकता ।
१७. लगता है कि यह सारा का सारा ( बाद के) बौद्धधम्म में प्रक्षिप्त कर दिया गया है -- या तो किसी ऐसे द्वारा जो बौद्धधम्म को हिन्दु धर्म सदृश ही बनाना चाहता था, या किसी ऐसे द्वारा जो यथार्थ बुद्ध धम्म से अपरिचित था ।
१८. यह एक कारण है जिससे यह मानना चाहिये कि बुद्ध ने कभी इस सिद्धान्त की देशना नहीं की होगी ।
१९. एक दुसरा और अधिक सामान्य कारण भी है जिससे यह मानना चाहिये कि भगवान् बुद्ध कभी इस सिद्धान्त की देशना नहीं कर सकते थे ।
२०. भावी-जन्म के संचालक के रूप में पूर्व-जन्म को स्वीकार करने के हिन्दु सिद्धान्त का आधार अन्यायपूर्ण है । इस प्रकार के सिद्धान्त का अविष्कार करने का आखिर क्या प्रयोजन हो सकता था?
२१. इसका एक ही उद्देश्य हो सकता है कि राज्य अथवा समाज को गरीबों और दरिद्रो की दुरवस्था की जिम्मेदारी से सर्वथा मुक्त कर दिया जाय ।
२२. अन्यथा इस प्रकार के अत्याचारपूर्ण तथा बेहूदा सिद्धान्त का कभी अविष्कार न होता ।
२३. यह कल्पना कर सकना असम्भव है कि महाकारूणिक बुद्ध ने कभी इस प्रकार के सिद्धान्त का समर्थन किया हो ।