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भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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16 जून 2023
Book
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विभाग २ - कर्म

१. क्या 'बुद्ध' का 'कर्म' का सिद्धान्त ब्राह्मणी 'कर्म' के सिद्धान्त के समान ही है ?

१. बुद्धधम्म का कोई भी दूसरा ऐसा सिद्धान्त नही है जिसने इतनी 'गलत फहमी पैदा की हो, जितनी इस 'कर्म' के सिद्धान्त ने । २. बुद्ध धम्म में 'कर्म' का क्या स्थान है और क्या वास्तविक महत्व है ?

३. अज्ञ हिन्दू बेसमझी के ही कारण केवल शब्दों की समानता की और देखकर कहते हैं कि ब्राह्मणवाद वा हिन्दु धर्म तथा बौद्धधम्म एक ही हैं।

Is the principle of Karma of Buddha the same as the principle of Karma of Brahman Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

४. ब्राह्मणो का पढ़ा-लिखा और कट्टर वर्ग भी यही कहता है । वह अज्ञ जनता को गलत रास्ते पर ले चलने के लिये जान बुझकर कहता हैं ।

५. पढ़े-लिखे ब्राह्मण भली प्रकार जानते हैं कि बुद्ध का 'कर्म' का सिद्धान्त ब्राह्मणी 'कर्म' के सिद्धान्त से सर्वथा भिन्न है । लेकिन तब भी वे यही कहे जाते हैं कि बुद्ध धम्म वही है जो ब्राह्मणवाद या हिन्दु-धम्म है ।

६. शब्दों की समानता के कारण उनको अपना झूठा तथा दुष्ट प्रचार करने में आसानी हो जाती है ।

७. इसलिये यह अत्यन्त आवश्यक है कि स्थिति की पूर्ण परीक्षा की जाय ।

८. भगवान् बुद्ध का 'कर्म' का सिद्धान्त - शाब्दिक समानता कितनी ही हो अपने अर्थ में ब्राह्मणी 'कर्म' के सिद्धान्त के समान हो ही नहीं सकता ।

९. दोनों की मूल स्थापनायें एक दूसरे से परस्पर इतनी अधिक भिन्न है कि परिणाम एक हो ही नहीं सकता । दोनों के दो भिन्न परिणाम होने ही चाहिये ।

१०. सुविधा के लिये हिंदु 'कर्म' की मान्यताओं को क्रमशः इस प्रकार गिना जा सकता है :-

११. हिन्दु 'कर्म' का सिद्धान्त 'आत्मा' की मान्यता पर निर्भर करता है । बौद्ध नहीं । क्योंकि बौद्ध धम्म में तो 'आत्मा' है ही नहीं ।

१२. ब्राह्मणी 'कर्म' का सिद्धान्त वंशानुगत है ।

१३. यह एक जन्म से दूसरे जन्म तक चलता रहता है । यह इसलिये क्योंकि 'आत्मा' का संसरण होता है ।

१४. 'कर्म' के बौद्ध-सिद्धान्त के बारे में यह भी बात सत्य नहीं है । यह भी इसीलिये कि बौद्ध धम्म में 'आत्मा' नहीं है ।

१५. 'कर्म' का हिन्दु-सिद्धान्त शरीर से पृथक एक 'आत्मा' पर आधारित है । शरीर मरता है, तो 'आत्मा' उसके साथ नहीं मरता ।'आत्मा' फुरे से उड़ जाता है ।

१६. 'कर्म' के बौद्ध-सिद्धान्त के बारे में यह बात भी सच नहीं हैं ।

१७. 'कर्म' के हिन्दु-सिद्धान्त के अनुसार जब आदमी कोई कर्म करता है तो उसके 'कर्म' के दो परिणाम होते हैं । एक तो उस ‘कर्म' से वह करने वाला प्रभावित होता है, दूसरे उस 'कर्म' का उसके 'आत्मा' पर प्रभाव पड़ता है ।

१८. वह जो भी 'कर्म' करता है, उसके 'आत्मा' पर उसका प्रभाव पड़ता ही है ।

१९. जब आदमी मरता है, और जब 'आत्मा' उसका शरीर छोड़ कर निकल भागती है (या निकल भागता है ) तो 'आत्मा' उन संस्कारों से संस्कृत रहता है, ।

२०. यह संस्कार ही है जो उसके भावी जन्म और स्थिति का निर्णय करते हैं ।

२१. हिन्दु ‘आत्मवाद' का बौद्ध 'अनात्मवाद' से कुछ भी मेल नहीं ।

२२. इन कारणों से ‘'कर्म' का बौद्ध - सिद्धान्त और 'कर्म' का हिन्दु- सिद्धान्त न एक है और न एक हो सकता है ।

२३. इसलिये 'कर्म' के बौद्ध-सिद्धान्त और 'कर्म के ब्राह्मणी - सिद्धान्त को एक ही बताना महज मूर्खता है ।

२४. अधिक से अधिक यही कहा जा सकता है कि इस शाब्दिक माया जाल से सावधान रहना चाहिये ।

 

२. क्या भगवान बुद्ध यह मानते थे कि पूर्व-कर्म का भविष्य जन्म पर प्रभाव पड़ता है ?

१. भगवान् बुद्ध ने 'कर्म' के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया था । सर्वप्रथम उन्होंने ही कहा था : “जैसा बोओगे, वैसा काटोगे ।”

२. उन्होंने 'कर्म' के सिद्धान्त पर इतना अधिक जोर दिया है कि उनका कहना था कि यदि 'कर्म' के सिद्धान्त को दृढ़ता पूर्वक न माना जाय तो नैतिक-अनुशासन निभ ही नही सकता ।

३. बुद्ध के 'कर्म' के सिद्धान्त का सम्बन्ध मात्र 'कर्म' से था और वह भी वर्तमान जन्म के 'कर्म' से ।

४. तो 'कर्म' का एक वृद्धि-प्राप्त सिद्धान्त भी है । इसके अनुसार 'कर्म' का मतलब है पूर्वजन्म का 'कर्म' अथवा पूर्व जन्मों के 'कर्म' ।

५. यदि आदमी का जन्म गरीब परिवार में हुआ है तो यह उसके पूर्वजन्म के बुरे कर्म का परिणाम है । यदि एक आदमी धनी घर में पैदा हुआ है तो यह उसके पूर्वजन्म के अच्छे कर्मों का परिणाम है ।

६. यदि किसी में कोई जन्म-जात दोष है तो इसका कारण उसके पूर्वजन्म का बुरा कर्म हैं ।

७. यह एक बड़ा ही खतरनाक सिद्धान्त है । क्योकि यदि 'कर्म' की यह व्याख्या स्वीकार कर ली जाय तो मानव प्रयास के लिये कहीं कुछ गुंजायश नहीं रह जाती । पूर्वजन्म के कर्म से ही सभी कुछ पूर्व- निश्रित रहता है ।

८. यह वृद्धि प्राप्त सिद्धान्त भी बहुधा भगवान् बुद्ध के सिर मढ दिया गया है ।

९. क्या भगवान् बुद्ध ऐसे सिद्धान्त को मानते थे?

१०. इस वृद्धि-प्राप्त सिद्धान्त की भली प्रकार परीक्षा करने के लिये, जिसे भाषा में इसका प्रायः उल्लेख किया जाता है, उसमें थोड़ा परिवर्तन कर देना होगा ।

११. यह कहने की बजाय कि पूर्वजन्म के 'कर्म' का संसरण होता है, हम यह कहें कि पूर्वजन्म का 'कर्म' वंश-परम्परा से प्राप्त है ।

१२. इस भाषा के परिवर्तन से हम 'वंशपरम्परा' के कानून के अनुसार इसकी परीक्षा कर सकते हैं । ऐसा करने से न इसके कानूनी अर्थ में ही कोई अन्तर आता है और न वास्तविक अर्थ में ।

१३. इस भाषा के परिवर्तन से दो ऐसे प्रश्न है जो आसानी से पूछे जा सकते है और जो कदाचित् अन्यथा न पूछे जा सकते और जिनका बिना उत्तर दिये बात स्पष्ट नहीं होती ।

१४. पहला प्रश्न यह है कि पूर्वजन्म का कर्म वंशानुगत क्रम से कैसे प्राप्त होता है? उसकी क्या विधि है ?

१५. दूसरा प्रश्न है कि वंशानुगत क्रम के हिसाब से पूर्व जन्म के उस कर्म की अपनी स्थिति क्या है? क्या यह वंशानुगत क्रम से प्राप्त कोई 'गुण है, अथवा स्वयं अर्जित किया हुआ कोई 'गुण है?

१६. वंशानुगत क्रम के हिसाब से हमें अपने माता-पिता से क्या प्राप्त होता है?

१७. विज्ञान के अनुसार सोचें तो नये प्राणी का आरम्भ उस समय से होता है जब वीर्य और रज का संयोग होता है । प्राणी की उत्पत्ति तभी होती है जब वीर्य-कण रज-कण में प्रवेश करता है ।

१८. हर मानव का आरंभ तभी होता है जब दो जीवित कण मिलकर एक होते हैं -- माता का रज - कण और पिता का वीर्य-कण । १९. इस विषय की चर्चा करने के लिये जो यक्ष, भगवान् बुद्ध के पास आया था, उसे भगवान् बुद्ध ने कहा था कि आदमी की उत्पत्ति माता-पिता पर निर्भर करती हैं ।

२०. उस समय भगवान् बुद्ध राजगृह में इंद्रकूट पर्वत पर ठहरे हुए थे ।

२१. तब एक यक्ष, भगवान बुद्ध के पास आया और उसने उन्हें इस प्रकार सम्बोधित किया :-“आपका कहना है कि केवल 'रूप' जीव नहीं हैं, तो जीव सशरीर कैसे होता है ? जीव को यह हड़डियों और आंतों का ढेर कैसे प्राप्त होता है? माता के गर्भ में जीव किस प्रकार लटकता रहता है?"

२२. इसका तथागत ने उत्तर दिया सर्वप्रथम कलल होता है तब अर्बुद होता है, तब पेशी होती है, तब घन होता है, और घन में ही बाल और नाखून आदि उत्पत्र होते है और माँ जो कुछ भी खाना-पीना खाती है, उससे बालक मां के गर्भ में बढ़ता है ।

२३. हिन्दु सिद्धान्त इससे सर्वथा भिन्त्र है ।

२४. इसका कहना है कि शरीर तो वंशानुगत अथवा माता-पिता से प्राप्त है । किन्तु 'आत्मा' नहीं । यह शरीर में बाहर से प्रवेश करती है या करता है । कहाँ से? -- यह बात इस सिद्धान्त में स्पष्ट नहीं की गई है ।

२५. दूसरा प्रश्न है कि पूर्वजन्म के उस कर्म की अपनी स्थिति क्या है? क्या यह वंशानुगत क्रम से प्राप्त कोई 'गुण' है अथवा स्वय अर्जित किया हुआ कोई 'गुण' है ?

२६. जब तक इस प्रश्न का उत्तर न मिले तब तक वंशानुक्रम के वैज्ञानिक सिद्धान्त के अनुसार इसका परीक्षण नहीं हो सकता ।

२७. लेकिन यदि मान भी लिया जाय कि इस प्रश्न का इधर उधर कुछ भी उत्तर सम्भव है, तो भी हम विज्ञान की सहायता से यह कैसे निर्णय कर सकते है कि यह सिद्धान्त कुछ बुद्धिसंगत हे अथवा एकदम मूर्खतापूर्ण ?

२८. विज्ञान के अनुसार बालक वंश-परम्परा से अपने माता-पिता के गुण प्राप्त करता है ।

२९. 'कर्म' के हिन्दु सिद्धान्त के अनुसार अपने माता-पिता से शरीर के अतिरिक्त और कुछ नहीं प्राप्त करता । 'कर्म' के हिन्दु सिद्धान्त के अनुसार बालक का पूर्व-कर्म उसका अपना किया हुआ 'कर्म' है, और वह उसे अपने द्वारा ही, अपने लिये ही स्वंय प्राप्त करता हैं ।

३०. माता-पिता बालक को कुछ नही देते । बालक ही सब कुछ साथ लेकर आता हैं ।

३१. इस तरह का सिद्धान्त बेहूदगी से कम कुछ नहीं है ।

३२. जैसे ऊपर दिखाया गया है, भगवान बुद्ध इस प्रकार की बेहूदगी में विश्वास नहीं करते थे । (इसकी चर्चा चलने पर कि क्या आदमी अपने भले-बुरे कर्मों के परिणाम से मुक्त हो जाता है, स्थविर नागसेन ने राजा मिलिन्द को उत्तर दिया था :-

३३. “यदि पुनरुत्पत्ति न हो तो वह अपने कर्मों के फल से मुक्त हो जाता है, यदि हो, तो नहीं।”

३४. राजा मिलिन्द ने कहा- "मुझे एक उदाहरण दें ।”

३५. “राजन! उदाहरण के लिये एक आदमी किसी के आम चुराये, तो क्या चोर दण्ड का अधिकारी होगा?

३६ "हां!”

३७. "लेकिन जो आम (के बीज ) उसने जमीन में बोये थे, वे तो उसने चुराये नही, तब उसे दण्ड क्यों मिले?”

३८. “क्योंकि जो उसने चुराये वे उन्हीं में से उत्पन्न हुए थे, जो जमीन में बोये गये थे।”

३९. “ठिक इसी प्रकार यह नाम रूप कर्म करता है -- भले या बुरे -- और उस कर्म से दूसरा नाम-रूप जन्म ग्रहण करता है । इसीलीये वह अपने कर्म के फल से मुक्त नहीं होता ।

४०. "नागसेन ! बहुत अच्छा ।"

४१. तब फिर राजा मिलिन्दने पूछा -- "नागसेन! जब एक नाम रूप से कार्य किये जाते हैं तो उन कार्यो का क्या होता है ?"

४२. "राजन् ! वे कर्म की छाया की तरह पीछा करते रहेंगे ।"

४३. "क्या कोई उन कर्मों के बारे में बता सकता है कि ये कर्म यहां है अथवा वहां है?"

४४. "नहीं!"

४५. "मुझे एक उपमा दें।"

४६. "तो हे राजन! क्या कोई किसी वृक्ष के उन फलों को दिखा सकता है और यह बता सकता है कि:-

४७. "ये यहां है अथवा वहाँ है?"

४८. "निश्चय से नहीं ।"

४९. “इसी प्रकार राजन्! जब तक जीवन स्रोत का उच्छेद नहीं होता तब तक कृत-कर्मो को बता सकना असम्भव है ।”

५०. "नागसेन ! बहुत अच्छा ।"