भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
४. मजहब (धर्म) और नैतिकता
१. 'मजहब' या 'रिलीजन में नैतिकता का स्थान क्या है?
२. सच्ची बात तो यही है कि नैतिकता का 'मजहब' या 'रिलीजन' में कोई स्थान ही नहीं ।

३. ‘मजहब' (धर्म) या रिलीजन के अन्तर्गत आते है 'ईश्वर', 'आत्मा', 'प्रार्थनायें', 'पूजा', 'कर्म-काण्ड', 'रीति-रिवाज', ‘यज्ञ', 'बलि- कर्म ।
४. नैतिकता का सम्बन्ध वहीं आता है जहाँ एक आदमी का सम्बन्ध दूसरे से आरम्भ होता है ।
५. 'मजहब' या रिलीजन' में तो ' नैतिकता बाहर से आने वाले हवा के एक झोंके की तरह हैं, ताकि व्यवस्था और शान्ति की स्थापना में उपयोगी सिद्ध हो ।
६. 'मजहब' या 'रिलीजन एक त्रिकोण है ।
७. अपने पड़ोसी के साथ अच्छा व्यवहार करो क्योंकि तुम दोनों एक ही पिता-परमात्मा के पुत्र हो ।
८. यही 'मजहब' या 'रिलीजन' का तर्क है।
९. प्रत्येक ‘मजहब' या ‘रिलीजन' नैतिकता का उपदेश देता है, किन्तु नैतिकता 'मजहब' या 'रिलीजन' का मूलाधार नहीं हैं ।
१०. यह एक रेल के उस डिबे की तरह है जो यूं ही साथ जोड़ दिया गया है । यह यथावसर साथ जोड़ भी दिया जाता है, और पृथ भी कर दिया जाता हैं ।
११. इसलिये 'मजहब' या 'रिलीजन' की क्रिया परिपाटी में नैतिकता का स्थान आकस्मिक है और कभी कभी उसका भी प्रयोजन रहता है।
१२. इसीलीये 'मजहब' या रिलीजन में नैतिकता प्रभावोत्पादक नहीं हैं ।
५. धम्म और नैतिकता
१. धम्म में नैतिकता का स्थान क्या है ?
२. सीधा सरल उत्तर है कि नैतिकता ही धम्म है और धम्म ही नैतिकता है ।
३. दूसरे शब्दों में यद्यपि धम्म में 'ईश्वर' के लिये कहीं कुछ स्थान नहीं है तो भी धम्म में 'नैतिकता' का वही स्थान है जो 'मजहब' या 'रिलीजन' में 'ईश्वर' का ।
४. धम्म में प्रार्थनाओं के लिये, तीर्थ-यात्राओं के लिये, कर्मकाण्डों के लिये, रिति-रिवाजों के लिये तथा बलि-कर्मों के लिये कोई जगह नहीं ।
५. नैतिकता ही धम्म का सार है । नैतिकता नहीं, तो धम्म भी नहीं ।
६. धम्म में जो नैतिकता है उसका सीधा मूल स्त्रोत आदमी को आदमी से मैत्री करने की जो आवश्यकता है, वही हैं ।
७. इसमें ईश्वर की मंजुरी की आवश्यकता नहीं । ईश्वर को प्रसन्न करने के लिये आदमी को नैतिक बनने की आवश्यकता नहीं । अपने भले के लिये ही आदमी के लिये यह आवश्यक है कि वह आदमी से मैत्री करे ।