भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
६. केवल सदाचार भी पर्याप्त नहीं है. यह पवित्र और व्यापक होना चाहिये
१. कोई भी चीज या बात कब पवित्र बनती है ? क्यों पवित्र बनती है ?
२. हर मानव-समाज में - चाहे वह आदिम अवस्था में हो और चाहे वह उन्नत अवस्था में हो -- कुछ चीजें या विश्वास ऐसे होते है जो 'पवित्र' माने जाते हैं और कुछ चीजें या विश्वास ऐसे होते है जो 'पवित्र नहीं माने जाते ।
३. जब कोई चीज या विश्वास 'पवित्रता' की सीमा में प्रवेश कर गया, इसका मतलब है कि उसके विरूद्ध आचरण नहीं किया जा सकता । ठीक बात तो यह है कि उसे स्पर्श ही नहीं किया जा सकता। ऐसा करना सर्वथा निषिद्ध हो जाता है ।

४. इससे भिन्न जो चीज या बात "पवित्र" नहीं मानी जाती, उसके विरुद्ध आचरण किया जा सकता है, अर्थात आदमी बिना किसी भय के अथवा आत्म-प्रताड़ना के उस विषय मे जैसा चाहे कर सकता है ।
५. 'पवित्र का मतलब है 'धाम्मिकता' लिये हुए । इस प्रकार की चीज या बात के विरूद्ध जाने का मतलब है 'मजहब' की मर्यादा का उल्लंघन करना ।
६. किसी भी चीज को 'पवित्र' क्यो बनाया जाता है? अपने प्रश्न को विषय के भीतर रखने के लिये, पूछा जा सकता है कि नैतिकता को 'पवित्र' क्यों बनाया गया?
७. नैतिकता के पवित्र बनाये जाने में, लगता है कि तीन बातो का प्रभाव पड़ा है ।
८. पहली बात तो यह है कि जो श्रेष्ठ है, सामाजिक हित की दृष्टि से उसे सुरक्षित रहना चाहिये ।
९. इस प्रश्न की पृष्ठभूमी का सम्बन्ध है उस बात से जिसे हम 'जीवन-संघर्ष' और उसमे 'योग्यतम' का जीवित बने रहना कहते हैं
१०. यह प्रश्न 'विकास-वाद के सिद्धान्त' से सम्बन्धित है । सब कोई जानता है कि मानव समाज में जो विकास हुआ है वह 'जीवन- संघर्ष के कारण हुआ है, क्योंकि आरम्भिक युग में भोजन सामग्री बड़ी सीमित मात्रा मेँ प्राप्त थी ।
११. भयानक संघर्ष रहा है । प्रकृति के पंजे और दाँत रक्त-रंजित रहे हैं ।
१२. ऐसे 'जीवन-संघर्ष' में जो भयानक और रक्त-रंजित होता हे केवल 'योग्यतम' ही बचा रहता है ।
१३. समाज की मूल अवस्था ऐसी ही रही है।
१४. बहुत प्राचीन काल में किसी न किसी ने यह प्रश्न अवश्य उठाया होगा कि क्या योग्यतम ( सबसे अधिक शक्ति सम्पन्न) ही श्रेष्ठतम भी माना जाना चाहिये ? क्या जो निर्बलतम है, उसे भी संरक्षण देकर यदि बचाया जाय तो क्या यह आगे चलकर समाज के हित की दृष्टि से अच्छा सिद्ध न होगा ?
१५. लगता है कि उस समय के समाज की जो स्थिति थी, उस समय उसने एक स्वीकारात्मक उत्तर अवश्य दिया होगा ।
१६. तब प्रश्न पैदा होता है कि कमजोरों के सरक्षण का क्या उपाय है?
१७. जो योग्यतम (सबसे अधिक शक्तिशाली) हो उस पर कुछ प्रतिबन्ध लगाने से कम और किसी भी तरह काम चल ही सकता था ।
१८. इसी स्थिति में नैतिकता का मूल और आवश्यकता छिपी हुई है ।
१९. इस नैतिकता के लिये 'पवित्र' बनाया जाना आवश्यक था, क्योकि पहले पहले ये पाबन्दियाँ (= प्रतिबन्ध) योग्यतम (= सर्वाधिक शक्तिशाली) व्यक्तियों पर ही लगायी गई थीं ।
२०. इसके बड़े गम्भीर परिणाम हो सकते थे ।
२१. पहला प्रश्न तो यही पैदा होता है कि नैतिकता जब सामाजिक रूप ग्रहण करती है 'तब कहीं यह असामाजिक (= सामाजिक हितों की विरोधिनी) तो नहीं हो जाती है ?
२२. ऐसा नहीं है कि चोरों में अपनी कुछ 'नैतिकता' ही न हो । व्यापारियों में भी नैतिकता होती ही है । एक जातिवालों में भीतरी नेतिकता रहती ही है और डाकुओं के झुण्ड में भी अपनी भीतरी नैतिकता रहती ही है ।
२३. लेकिन यह नैतिकता पार्थक्य की भावना लिये हुए है, इस नैतिकता में दूसरों के बहिष्कार की भावना निहित है । यह नैतिकता द- विशेष के स्वार्थो का संरक्षण करने के लिये है । इसलिये यह नैतिकता समाज-हित-विरोधिनी है ।
२४. यह इस प्रकार की नैतिकता की पार्थक्य और अपने में ही सीमित रहने की भावना ही है जिससे इसकी समाज--हित-विरोधिनी प्रवृत्ति को क्रियाशील होने का अवसर मिलता है ।
२५. यही बात उस समय लागु होती है जब कोई भी एक दल अपने स्वार्थो की रक्षा करने के लिये नैतिकता का आश्रय लेता है ।
२६. समाज की इस दल-बन्दी का असर बडी दूर तक पहुचता है ।
२७. यदि समाज में इस प्राकर के अ-सामाजिक दल बने रहेगे, तो समाज हमेशा असंगठित रहेगा और टुकड़े-टुकड़े रहेगा ।
२८. एक असंगठित और टुकडे-टुकड़े समाज का सबसे बड़ा खतरा यही है कि यह कई तरह के जीवन-मापों और आदर्शो को जन्म दे देता है ।
२९. जब तक लोगों के जीवन के माप दण्ड समान न हो, और जब तक लोगों के जीवन- आदर्श समान न हों तब तक समाज परस्पर मिल-जुलकर रहने वाला समाज बन ही नहीं सकता ।
३०. जब इतने तरह के जीवन के मापदण्ड रहेंगे और इतनी तरह के जीवन आदर्श रहेंगे तो व्यक्ति के लिये मन का अविरोधी भाव बनाये रखना असम्भव है ।
३१. बुद्धिपूर्वक विचार करने से किसी की जनसंख्या आदि की दृष्टि से जो और जितना जिसका अधिकार होना चाहिये वह न होकर यदि किसी समाज के एक हिस्से की किसी दूसरे हिस्से पर अनुचित प्रधानता बनी रहेगी तो इसका अवश्यम्भावी परिणाम परस्पर का कलह होगा ।
३२. कलह को रोकने का एक ही उपाय है कि सभी के लिये नैतिकता के समान नियम हो, और सभी उन्हें पवित्र मानें ।
३३. एक तीसरा कारण भी है जिसके कारण नैतिकता पवित्र मानी जानी चाहिये और इसको सर्वमान्य होना चाहिये; व्यक्ति की उन्नति के संरक्षण के हित में ।
३४. जहाँ 'जीवन-संघर्ष' है अथवा जहाँ वर्ग विशेष का शासन है, वहाँ व्यक्ति का हित सुरक्षित नहीं है ।
३५. दलबन्दी व्यक्ति को चित्त की वह अविरोधी भावना प्राप्त करने ही नहीं देती जो तभी सम्भव है जब समाज में समान 'जीवन- माप' हों और समान 'जीवन - आदर्श हों । व्यक्ति के विचार बहक जाते हैं और वह एकता देख ही नही सकता ।
३६. दूसरे, दलबन्दी में पक्षपात रहता है और न्याय की आशा नहीं रहती ।
३७. दलबन्दी से वर्ग जडीभूत हो जाते हैं मालिक हमेशा मालिक बने रहते हैं, गुलाम हमेशा गुलाम बने रहते हैं । मालिक हमेशा मालिक बने रहते हैं, मजदूर हमेशा मजदूर बने रहते हैं । विशिष्ट अधिकारी हमेशा विशिष्ट अधिकारी ही रहते हैं और गुलाम ह गुलाम ही रहते हैं ।
३८. इसका मतलब हैं कि कुछ लोगों के लिये तो स्वतन्त्रता हो सकती है, किन्तु सभी के लिये नहीं । इसका मतलब हुआ कि चन्द लोगों के लिये समानता हो सकती है, किन्तु अधिकांश के लिए नहीं हो सकती ।
३९. इसका इलाज क्या है? एक ही इलाज है कि भ्रातृ-भावना को सर्वमान्य और प्रभावशाली बनाया जाय ।
४० भ्रातृ-भाव क्या है? आदमी हर आदमी को अपना भाई समझे यही नैतिकता है ।
४१. इसीलीये भगवान् बुद्ध ने कहा कि धम्म नैतिकता है और जिस प्रकार धम्म पवित्र है, उसी प्रकार नैतिकता भी पवित्र है ।