भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
दुसरा भाग : किस प्रकार शाब्दिक समानता तात्विक भेद को छिपाये रखती है ?
विभाग -१ पुनर्जन्म
१. प्रास्ताविक
१. यह प्रश्न प्रायः पूछा जाता है कि मरने के बाद क्या होता है?
२. बुद्ध के समकालीन आचार्यो के दो भिन्न तरह के मत थे । एक वर्ग 'आत्मवादी' या 'शाश्वतवादी' कहलाता था, दूसरा कहलाता था 'उच्छेदवादी' ।

३. जो ‘शाश्वतवादी' था, उसका कहना था कि 'आत्मा' का मरण होता ही नहीं, इसलिये जीवन शाश्वत है । पुनर्जन्म द्वारा इसका नवीकरण होता रहता है ।
४. उच्छेदवादियो का मत इस एक शब्द 'उच्छेदवाद' से ही स्पष्ट हो जाता था । 'उच्छेदवाद का मतलब है हर वस्तु का सर्म विनाश । मृत्यु के बाद कुछ भी शेष नहीं ।
५. भगवान बुद्ध ‘शाश्वतवादी नहीं थे, क्योकि इसका मतलब था कि एक पृथक नित्य 'आत्मा' में विश्वास करना, जिसके वे विरोधी थे
६. तो क्या तथागत उच्छेदवादी थे? जब वे 'आत्मा' का अस्तित्व स्वीकार नहीं करते थे, तो स्वाभाविक तौर पर उन्हें 'उच्छेदवादी' मानने की प्रवृत्ति हो सकती है ।
७. लेकिन अलगद्दपम सुत्तन्त में भगवान् बुद्ध ने शिकायत की है कि वे 'उच्छेदवादी' नहीं हैं, किन्तु उन्हें 'उच्छेदवादी' समझा जाता है ।
८. उन्होंने कहा है --“यद्यपि मैं इस मत को प्रस्थापित करता हूँ, और इसी की देशना करता हूँ, तो भी कुछ श्रमण-ब्राह्मण भूल से, गलती से मुझ पर झूठा इलजाम लगाते हैं जो कि वास्तविकता के विराद्ध है कि मैं उच्छेदवाद कि देशना करता हूं कि मैं आदमियों के टुकड़े-टुकड़े हो जाने की, नाश की संपुर्ण विनाश कि देशना करता हूं ।
९. “यह ऐसा मत है जो कि मेरा मत नहीं है, जिस मत का मैं “ समर्थन नहीं करता, जो कि भूल से गलती से और झूठी तौर पर ऐसे भले लोगों द्वारा मेरे सिर मढा जाता है जो मुझे उच्छेदवादी” बनाना चाहते हैं” ।
१०. यदि यह कथन यथार्थ है और ऐसे लोगों द्वारा जो बौद्धधम्म को ब्राह्मणी रंग मे रंग देना चाहते थे, प्रक्षिप्त नहीं है, तो इस कथन से मन में एक गम्भीर दुविधा पैदा हो जाती है ।
११. यह कैसे हो सकता है कि भगवान् बुद्ध 'आत्मा को भी नहीं माने और तब भी कहें कि मैं 'उच्छेदवादी' नहीं हूँ?
१२. इससे प्रश्न पैदा होता है कि क्या भगवान 'पुनर्जन्म मानते थे ?
२. पुनर्जन्म किस (चीज) का ?
१. क्या भगवान् बुद्ध पुनर्जन्म मानते थे?
२. उत्तर "हां" में है।
३. यह अच्छा है कि इस प्रश्न को दो हिस्सों में बाँट लिया जाय : १) किस चीज का जन्म? और २) किस व्यक्ति का जन्म?
४. यह अच्छा है कि इन दोनो प्रश्नों को एक एक करके लिया जाय ।
५. पहले हम पहले प्रश्न को हीं लें, पुनर्जन्म किस चीज का ?
६. प्रायः हमेशा इस प्रश्न की उपेक्षा की जाती है । यह दोनों प्रश्नों को एक बना देने का ही परिणाम है कि पुनर्जन्म की बात को लेकर इतनी गड़बड़ी है।
७. भगवान् बुद्ध के अनुसार चार भौतिक पदार्थ है, चार महाभूत हैं जिनसे शरीर बना है --१) पृथ्वी, (२) जल, (३) अग्नि, ४) वायु ।
८. प्रश्न है कि जब शरीर का मरण होता है तो इन चारों महाभूतों का क्या होता है? क्या वे भी शरीर के साथ मर जाते है ? कुछ लोगों का कहना है कि वे भी मर जाते है ।
९. भगवान् बुद्ध ने कहा कि "नहीं" । आकाश में जो समान भौतिक पदार्थ सामुहिक रूप से विद्यमान हैं, वे उनमें मिल जाते है । १०. इस विद्यमान (= तैरती हुई) राशि में से जब इन चारो महाभूतों का पुनर्मिलन होता है, तो पुनर्जन्म होता है ।
११. भगवान् बुद्ध का पुनर्जन्म से यही अभिप्राय था ।
१२. इन भौतिक पदार्थों के लिये यही आवश्यक नहीं है कि वे उसी शरीर के हों जिसका मरण हो चुका है, वे नाना 'मृत शरीरों के भौतिक अंश हो सकते हैं ।
१३. यही बात ध्यान देने की है कि शरीर का मरण होता है लेकिन भौतिक पदार्थ बने रहते हैं ।
१४. भगवान् बुद्ध इसी प्रकार के पुनर्जन्म को मानते थे ।
१५. सारिपुत्र ने महाकोट्ठित के साथ जो बातचीत की उसमें इस विषय पर बहुत प्रकाश पड़ा है ।
१६ लिखा है कि एक समय जब भगवान् बुद्ध श्रावस्ती में अनाथपिण्डक के जेतवनाराम में गये थे, तो महाकोट्ठित ध्यान कर चुकने पर सारिपुत्र के पास गये और उनसे कुछ ऐसे प्रश्नों को स्पष्ट कर देने की प्रार्थना की जो उन्हें हैरान कर रहे थे ।
१७. उन प्रश्नों में एक यह था :-
१८. “प्रथम-ध्यान की प्राप्ति होने पर कितने संयोजनों का प्रहाण होता है और प्रथम ध्यान में कौन-कौन से अंग शेष रहते हैं?"
१९. सारिपुत्र का उत्तर था -“दोनों के पाँच पाँच । कामछन्द, व्यापाद, थीनमिद्ध (? आलस्य), उद्धच्च-कौकृय तथा विचिकित्सा का प्रहाण हो जाता है ।वितर्क, विचार, प्रीति, सुख तथा एकाग्रता शेष रहते हैं ।”
२०. महाकोट्ठित --“चक्षु, श्रोत, घ्राण, जिह और स्पर्श -- इन पांचों इन्द्रियों को लें । प्रत्येक का विषय पृथक् है, क्षेत्र पृथक् है; प्रत्येक एक दूसरी इन्द्रिय से पृथक् पृथक् है और स्पष्ट रूप से पृथक् है । इनका अन्तीम आधार क्या है ? कौन है जो पांचों इन्द्रियों के विषयों और क्षेत्रों का उपभोग करता है ?"
२१. सारिपुत्र -"मन ।”
२२. महाकोट्ठित -“ये पांचों इन्द्रियाँ किस पर निर्भर करती है ?"
२३ सारिपुत्र -“चेतना (न् जीवित इन्द्रिय) पर ।
२४. महाकोट्ठित - चेतना किस पर निर्भर करती है ?”
२५. सारिपुत्र –“उष्णता पर ।”
२६. महाकोट्ठित -“उष्णता किस पर निर्भर करती है?"
२७. सारिपुत्र - " चेतना पर ।"
२८. महाकोट्ठित -“आप कहते हैं कि चेतना उष्णता पर निर्भर करती है और उष्णता चेतना पर निर्भर करती है । इसका ठीक-ठीक क्या अर्थ समझा जाय?”
२९. सारिपुत्र "एक उदाहरण द्वारा समझाता हैं। जैसे प्रदीप के प्रकाश से प्रदीप की लौ प्रकट होती है और प्रदीप की लौ से प्रदीप का प्रकाश प्रकट होता है, उसी प्रकार चेतना उष्णता पर निर्भर करती है, और उष्णता चेतना पर निर्भर करती है ।"
३०. महाकोट्ठिति -“ऐसी कितनी चीजें हैं जिनसे मुक्त होने पर ही शरीर मरा हुआ समझा जाकर सूखे काठ की तरह फेक दिया जाता है ?"
३१. सारिपुत्र -"जीवित इन्द्रिय, उष्णता और विज्ञान ।"
३२. महाकोट्ठित-- मृत देह में और उस ध्यानी भिखु में जिसने संज्ञा और वेदना का निरोध कर रखा है, क्या अन्तर है?"
३३. सारिपुत्र -- “मृत देह में न केवल शरीर, वाणी और मन की क्रिया शान्त हो जाती है, बल्कि चेतना (= जीवित- इन्द्रिय) भी नहीं रहती, उष्णता भी नहीं रहती तथा इन्द्रियों का भी मूलोच्छेद हो जाता है, जबकि ध्यानी भिक्षु की चेतना बनी रहती है, उष्णता ब रहती हैं तथा इन्द्रियां भी बनी रहती है; ही श्वास-प्रश्वास बंद हो जाता है, इन्द्रियों की वितर्क-विचार, संज्ञा आणि क्रियाएँ शान्त हो जाती है।"
३४. सम्भवतः यह मृत्यु या उच्छेद की सर्वाधिक श्रेष्ठ तथा सर्वाधिक संपुर्ण व्याख्या है ।
३५. इस संवाद में केवल एक कड़ी की कमी है । महाकोट्ठित को चाहिये था कि वह सारिपुत्र से यह भी पूछते कि 'उष्णता से क्या मतलब है?
३६. सारिपुत्र ने क्या उत्तर दिया होता, इसकी कल्पना आसान नहीं लेकिन इसमें भी कोई सन्देह नहीं कि 'उष्णता का मतलब है 'शक्ति' ।
३७. इस तरह से यदि उत्तर को थोड़ा अधिक स्पष्ट कर दिया जाय तो इस प्रश्न का कि मरने पर क्या होता है, यही उत्तर हो सकता है कि शरीर शक्ति उत्पत्र करना बन्द कर देता है ।
३८. लेकिन, यह तो केवल उत्तर का एक हिस्सा ही है । क्योंकि मृत्यु का एक मतलब यह भी है कि शरीर में से जो शक्ति निकल कर गई है, वह उस सारे शक्ति समूह के साथ मिलकर एक हो गई जो विश्व में सचार कर रहा है ।
३९. इसलिये मृत्यु के दो अर्थ हैं । एक और तो इस का अर्थ है कि नई शक्ति की उत्पत्ति रूक जाना, दूसरी ओर इसका अर्थ है विश्व में जो शक्ति-पुंज संचरण कर रहा है उसमें कुछ वृद्धि हो जाना ।
४०. सम्भवतः मृत्यु के इन दोनों बुद्ध ने पहलुओ के ही कारण भगवान् कहा कि वे 'उच्छेदवादी नहीं थे । जहाँ तक 'आत्मा' की बात है, वे उच्छेदवादी थे ।किन्तु जहाँ (नाम ) रूप की बात है वे उच्छेदवादी नहीं थे ।
४१. इस व्याख्या को स्वीकार कर लेने पर यह समझना कठिन नहीं है कि भगवान बुद्ध ने ऐसा क्यों कहा कि वे 'उच्छेदवादी' नहीं है । वे (नाम-) रूप की पुनरात्पत्ति में विश्वास रखते थे, 'आत्मा' के पुनर्जन्म में नहीं ।
४२. इस प्रकार व्याख्यत होने पर भगवान् बुद्ध का मत वर्तमान विज्ञान के सर्वथा अनुकूल है ।
४३. केवल इसी अर्थ में कहा जा सकता है कि भगवान् बुद्ध पुनर्जन्म में विश्वास रखते थे ।
४४. शक्ति कभी 'शुन्य' में परिणित नहीं होती । विज्ञान का यह पक्का सिद्धान्त है । यदि 'मृत्यु' का यह अर्थ किया जाय कि मृत्यु अनन्तर कुछ नहीं रहता, तो यह बात विज्ञान के विराद्ध होगी । क्योंकि इसका मतलब यह होगा कि सामुहिक रुप से शक्ति में सातत्य नही हैं।
४५. यही एक ऐसा तरीका है जिससे पुनर्जन्म समबन्धी दुविधा का अंत हो सकता है ।