भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
३. मजहब (धर्म) का उद्देश्य और धम्म का उद्देश्य
१. 'मजहब' या 'रिलीजन का उद्देश्य क्या है? धम्म का उद्देश्य क्या है? क्या वे दोनो एक ही समान है और एक ही हैं? अथवा वे दोनों दो हैं और भिन्न-भिन्न हैं?
२. इन प्रश्नों का उत्तर दो सूक्तों में है, एक जिसमें भगवान् बुद्ध और सुनक्कत्त की बातचीत का उल्लेख है - और दूसरा जिसमें भगवान् बुद्ध और पोट्ठपाद ब्राह्मण की बातचीत का वर्णन है ।

३. तथागत एक बार मल्लों के नगर अनुपिय में विहार कर रहे थे ।
४. उस समय पूर्वाह में तथागत ने चीवर पहना तथा पात्र और चीवर ग्रहण किया और अनुपिय नगर में भिक्षाटन के लिये निकले ।
५. रास्ते में उन्हें लगा कि कदाचित भिक्षाटन के लिये अभी थोड़ी देर रूकना चाहिये । इसलिये वह भग्गव परिव्राजक के आश्रम पर चले गये ।
६. उन्हे आता देखकर भग्गव परिव्राजक उठ खड़ा हुआ, अभिवादन किया और बोला- --" आप कृपया आसन ग्रहण करे । आपके लिये आसन सज्जित है । "
७. तब तथागत वहां विराजमान हुए। भग्गव परिव्राजक भी एक नीचा आसन लेकर पास ही बैठ गया । इस प्रकार बैठकर भग्गव परिव्राजक ने भगवान् बुद्ध को कहा ।
८. "कुछ दिन हुए, काफी दिन हुए, हे श्रमण गौतम! सुनक्खत लिच्छवी मेरे पास आया था । कहता था कि अब मैंने श्रमण गौतम शिष्यत्व त्याग दिया है। क्या जैसा उसने कहा, वैसा ठीक है?"
९. “भग्गव ! यह ऐसा ही है जैसा सुनक्कत लिच्छवी ने कहा ।"
१०. इसके आगे तथागत बोले -- "कुछ दिन हुए, काफी दिन हुए, सुनक्खत्त लिच्छवी मेरे पास आया था और कहने लगा –'अब मैं तथागत के शिष्यत्व का त्याग करता हूँ । अब मैं तथागत का शिष्य नहीं रहूँगा ।' जब उसने मुझे यह कहा, तब मैंने उससे पूछा! --“सुनक्खत्त! क्या मैंने तुझे कभी कहा था कि सुनक्खत! तू आ और मेरा शिष्य बनकर मेरे पास रह?”
११. “भगवान ! नहीं, ऐसा आपने कभी नहीं कहा । "
१२. “अथवा तू ने ही मुझे कभी कहा था कि में तथागत को अपना गुरु स्वीकार करता हूँ ।"
१३. “ भगवान ! नहीं । ऐसा मैंने कभी नहीं कहा । "
१४. “तब मैने उससे पूछा” जब न मैंने ही तुझे कहा और न तूने ही मुझे कहा तो क्या मैं हूँ और क्या तू है, जो तू त्यागने की कर रहा है? मूर्ख कहीं के, क्या इसमें तेरा अपना ही दोष नही है ?"
१५. सुनक्खत्त बोला “लेकिन भगवान्! आप मुझे सामान्य मनुष्यों को शक्ति से परे कोई प्रातिहार्य (=चमत्कार) नही दिखाते ।”
१६. “सुनक्खत्त! क्या मैंने कभी आकर तुझे कहा था कि सुनक्खत तू मेरा शिष्य बन जा, मैं तुझे सामान्य मनुष्यों की शक्ति से परे कोई प्रातिहार्य दिखाऊंगा?”
१७. “भगवान! ऐसा आपने कभी नहीं कहा । "
१८. “अथवा सुनक्कत! तू ने ही का मुझे कभी कहा था कि मै भगवान् का 'शिष्यत्व' स्वीकार करता हूँ, क्योकि भगवान् मुझे सामान्य आदमियों की शक्ति से परे कोई 'प्रातिहार्य' दिखायेंगे?”
१९. भगवान ! नहीं । मैंने ऐसा नहीं कहा था । "
२०. “जब न मैने तुझे कहा और न तूने मुझे कहा तो क्या मै हू और क्या तू है, जो तू त्यागने की बात कर रहा है? सुनक्खत! तू क्या सोचता है, चाहे सामान्य मनुष्यों की शक्ति से परे चमत्कार दिखाये जायें और चाहे न दिखाये जाये, क्या मेरे धम्म का यह उद्देश्य नहीं है कि जो मेरे धम्म के अनुसार आचरण करेगा वह अपने दुःख का नाश कर सकेगा?"
२१. “भगवान! चाहे प्रातिहार्य दिखाई जाये और चाहे न दिखाई जाये निश्चय से तथागत की धम्म- देशना का यही उद्देश्य है कि जो कोई भी तथागत के धम्म के अनुसार आचरण करेगा वह अपने दुःख का नाश कर सकेगा ।"
२२. “सुनक्खत! जब धम्म के उद्देश्य की दृष्टि से इसका कोई महत्व ही नहीं कि कोई प्रतिहार्य दिखाई जाय अथवा न दिखाई जाय, तो तेरे लिये ही प्रातिहार्य-प्रदर्शन का क्या मूल्य है ? हे मूर्ख! अब तू देख कि इसमें तेरा अपना ही कितना कसूर है।”
२३. “लेकिन भगवान्! आप मुझे सृष्टि के आरम्भ का भी पता नही देते?”
२४. “अच्छा तो सुनक्खत! मैंने तुझे कब कहा था कि आ सुनक्खत्त, तू मेरा शिष्य बन जा, मैं तुझे सृष्टि के आरम्भ का पता बताऊंगा ।"
२५. “भवगान । आपने नहीं कहा था । "
२६. “अथवा तूने ही मुझे कभी कहा था कि मैं आपका शिष्य बनूगा क्योंकि आप मुझे सृष्टि के आरम्भ का पता देंगे?"
२७. “भगवान्! मैंने नहीं कहा था ।"
२८. "जब न मैंने तुझे कहा और न तूने मुझे कहा तो क्या तो मै हूँ और क्या तू है जो, तू त्यागने की बात कर रहा है? सुनक्खत्त! तू क्या सोचता है चाहे मै सृष्टि के आरम्भ का पता बताऊं और चाहे न बताऊं, क्या मेरे धम्म का यही उद्देश्य नहीं है कि जो मेरे धम्म के अनुसार आचरण करेगा, वह अपने दुःख का नाश कर सकेगा?"
२९. “भगवान! चाहे आप सृष्टि के आरम्भ का पता बतायें और चाहे न बताये, निश्चय से तथागत की धम्म देशना का यही उद्देश्य है कि जो कोई भी तथागत के धम्म के अनुसार आचरण करेगा, वह अपने दुःख का नाश कर सकेगा ।”
३०. “सुनक्खत्त! जब धम्म के उद्देश्य की दृष्टि से इसका कोई महत्व ही नहीं कि चाहे सृष्टि के आरम्भ का पता बताया जाय और चाहे न बताया जाय, तो तेरे लिये ही इसका क्या मूल्य है कि सृष्टि के आरम्भ का पता बताया जाय?”
३१. इससे यह प्रकट होता है कि 'मजहब' (धर्म) या 'रिलिजन" को तो सृष्टि के आरम्भ से सरोकार है, 'धम्म' का एकदम नहीं ।
(2)
‘मजहब' अथवा 'रिलीजन' धम्म मे जो दूसरे फर्क हैं वे उस चर्चा के स्पष्ट हो जाते हैं जो भगवान् बुद्ध और पोट्ठपाद के बीच हुई थी ।
१. एक समय भगवान् बुद्धं अनाथपिण्डक के जेतवनाराम में ठहरे थे । उस समय पोट्ठपाद परिव्राजक मल्लिका के महाप्रासाद में ठहरा हुआ था । उसका उद्देश्य दार्शनिक चर्चा करना था ।
२. उसके साथ बहुत से अनुयायी परिव्राजक थे --कोई तीन सौ ।भगवान् बुद्ध और पोट्ठपाद के बीच बातचीत हुई । पोट्ठपाद ने पूछा
३. “भगवान! यदि यह ऐसा ही है, तो कम से कम, मुझे इतना तो बता दें कि क्या यही मत ठीक है कि 'संसार अनंत हैं और शेष मत मृषा हैं?"
४. तथागत बोले --“पोट्ठपाद! मैंने यह कब कहा है कि यही मत ठीक है कि 'संसार अनंत है 'और सब मत मृषा हैं? मैंने इस विषय में कभी अपना मत व्यक्त ही नहीं किया हैं ।”
५. तब इसी तरह से पोट्टपाद ने इन सभी प्रश्नों को क्रमश: पूछा --
(क) क्या संसार अनंत नहीं है?
(ख) क्या संसार ससीम है?
(ग) क्या संसार असीम है?
(घ) क्या आत्मा और शरीर एक ही हैं?
(ड) क्या आत्मा और शरीर भिन्न भिन्न हैं?
(च) क्या तथागत मरणानन्तर रहते हैं ?
(छ) क्या तथागत मरणानन्तर नहीं रहते हैं ?
(ज) क्या वे रहते भी है और नहीं भी रहते हैं ?
६. और इस प्रकार के हर प्रश्न का तथागत ने एक ही उत्तर दिया ।
७. “पोट्ठपाद! इस विषय में भी मैने अपना मत कभी व्यक्त नहीं किया ।”
८. "लेकिन तथागत ने इन विषयो में अपना मत क्यों व्यक्त नही किया ?"
९. “क्योकि इन प्रश्नों का उत्तर देने से किसी को कुछ लाभ नहीं, इनका धम्म से कुछ भी सम्बन्ध नहीं इनसे आदमी को अपना आचरण सुधारने में कुछ भी सहायता नहीं मिलती, इनसे विराग नहीं बढ़ता, इनसे राग-द्वेष से मुक्ति-लाभ नही होता, इनसे शान्ति नहीं मिलती, इनसे शमथ लाभ नहीं होता, इनसे विद्या प्राप्त नहीं होती, इनसे प्रज्ञा का लाभ नहीं होता और न ये निर्वाण की ओर अग्रेसर करते हैं । इसीलीये मैंने इन विषयों पर अपना कोई मत व्यक्त नहीं किया है ।
१०. “तो तथागत ने किन विषयों का व्याख्यान किया है?"
११. “मैने बताया है कि दुःख क्या है? मैंने बताया है कि दुःख का समुदय (= मूल कारण) क्या है? मैंने बताया है कि दुःख का निरोध क्या है ? मैने बताया है कि दुःख के निरोध (= अन्त) का मार्ग क्या है ?"
१२. “और तथागत ने इन विषयों पर व्याख्यान क्यों दिया है ?"
१३. “क्योंकि पोट्ठपाद! इनसे लोगों को लाभ है, इनका धम्म से सम्बन्ध है, इनसे आदमी को अपना आचरण सुधारने में सहायता मिलती है, इनसे विराग बढ्ता है, इनसे राग-द्वेष से मुक्ति मिलती है, इनसे शान्ति मिलती है, इनसे शमथ होता है, इनसे विद्या प्राप्त होती है, इनसे प्रज्ञा का लाभ होता है और ये निर्वाण की ओर अग्रेसर करते हैं । इसीलिये पोट्ठपाद! मैंने इन विषयों का व्याख्यान किया है।"
१४. इस संवाद से यह स्पष्ट हो जाता है कि 'मजहब' और 'रिलीजन' के लिये कौन से प्रश्न विचारणीय हैं, और 'धम्म' के लिये कौन से प्रश्न विचारणीय हैं । दोनो का जमीन-आसमान का अन्तर है ।
१५. 'धम्म का उद्देश्य है संसार का पुनर्निर्माण करना ।