भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
पहला भाग मजहब (धर्म) और धम्म
१. महजब (धर्म) क्या है?
१. मजहब एक अनिश्चित शब्द है, जिसका कोई स्थिर अर्थ नहीं ।
२. यह शब्द तो एक है, किन्तु इसके अर्थ अनेक हैं ।
३. इसका कारण है कि मजहब बहुत सी अवस्थाओं में से होकर गुजरा है । हर अवस्था में हम उस मान्यता विशेष को 'मजहब' ही कहते रहे हैं । निस्सन्देह हर एक समय की मान्यता अपने से पूर्व की मान्यताओं से भी भिन्न रही है और अपने बाद में आनेवाली मान्यताओं से भी भिन्न रही है।

४. 'मजहब' की कल्पना कभी स्थिर नहीं रही है ।
५. यह हर समय बदलती चली आई है।
६. एक समय था जब बिजली, वर्षा और बाढ़ की घटनायें आदमी आदमी की समझ से सर्वथा परे की बातें थी । इन सब पर काबू पाने के लिये जो भी कुछ टोना-टोटका किया जाता था, 'जादू' कहलाता था । उस समय 'मजहब' और 'जादू' एक ही चीज के दो नाम थे ।
७. तब 'मजहब' के विकास में दूसरा समय आया । इस समय 'मजहब' का मतलब था -- आदमी के विश्वास, धार्मिक कर्म - काण्ड, रीति-रिवाज, प्रार्थनायें और बलियों वाले यज्ञ ।
८. लेकिन 'मजहब' का यह स्वरूप व्युत्पन्न है ।
९. ‘मजहब' का केन्द्र-बिन्दु इस विश्वास पर निर्भर करता है कि कोई शक्ति विशेष है जिसके कारण ये सभी घटनायें घटती हैं और जो आदिम आदमी की समझ से परे की बाते थीं। अब इस अवस्था को पहुंच कर 'जादू का प्रभाव जाता रहा ।
१०. आरम्भ में यह शक्ति ‘शैतान का ही रूप थी । किन्तु बाद में यह माना जाने लगा कि यह 'शिवं रूप भी हो सकती है ।
११. तरह तरह के विश्वास, कर्म-काण्ड और यज्ञ शिव स्वरूप शक्ति को प्रसन्न करने के लिये और क्रोधरूप शक्ति को संतुष्ट रखने के लिये भी आवश्यक थे ।
१२. आगे चलकर वही शक्ति 'ईश्वर', 'परमात्मा' या दुनिया का बनाने वाला कहलाई ।
१३. तब 'मजहब' की मान्यता ने तीसरी शक्ल ग्रहण की, जब यह माना जाने लगा कि इस एक ही शक्ति ने 'आदमी' और 'दुनिया' दोनों को पैदा किया है।
१४. इस के बाद मजहब की मान्यता में एक यह बात भी शामिल हो गई कि हर आदमी की देह में एक 'आत्मा' है, वह ‘आत्मा नित्य है और आदमी जो कुछ भी भला बुरा काम करता है, उस आत्मा को 'ईश्वर के प्रति उसके लिये उत्तरदायी रहना पड़ता है ।
१५. यही थोड़े में 'मजहब' की मान्यता के विकास का इतिहास है ।
१६. अब 'मजहब का यही अर्थ हो गया है और अब 'मजहब से यही भावार्थ ग्रहण किया जाता है -- ईश्वर में विश्वास, आत्मा में विश्वास, ईश्वर की पूजा, आत्मा का सुधार, प्रार्थना आदि करके ईश्वर को प्रसन्न रखना ।
२. धम्म से महजब (धर्म) कैसे भिन्न है?
१. भगवान बुद्ध जिसे 'धम्म' कहते हैं वह 'मजहब से सर्वथा भिन्न है ।
२. यूं जिसे भगवान् बुद्ध 'धम्म कहते है, वह उसके समानान्तर है जिसे यूरोप के देववादी 'रिलीजन' कहते हैं ।
३. लेकिन दोनों में कोई खास 'समानता' नहीं है। बल्कि दोनो में बहुत बड़ा अन्तर है ।
४. इसीलिये कुछ युरोपीय देव - वादी भगवान् बुद्ध के 'धम्म' को 'मजहब स्वीकार करने से इन्कार करते हैं ।
५. हमें इस के लिये कोई अफसोस नहीं है । नुकसान उन्हीं का है । इससे बुद्ध धम्म की कोई हानि नहीं । बल्कि इससे 'रिलीजन' की कमियाँ स्पष्ट रूप से ध्यान में आ जाती हैं ।
६. इस विवाद में पड़ने की अपेक्षा यह अच्छा है कि हम यह बतायें कि धम्म क्या है और फिर यह दिखाये कि यह 'मजहब' या 'रिलीजन' से कैसे भिज्ञ है?
७. कहा जाता है कि 'मजहब' या 'रिलीजन' व्यक्तिगत चीज है और आदमी को इसे अपने तक ही सीमित रखना चाहिये । इसे सार्वजनिक जीवन में बिल्कुल दखल नहीं देना चाहिय ।
८. इसके सर्वथा विरुद्ध 'धम्म' एक सामाजिक वस्तु है । यह प्रधान रूप से और आवश्यक रूप से सामाजिक है ।
९. धम्म का मतलब है सदाचरण, जिस का मतलब है जीवन के सभी क्षेत्रों में एक आदमी का दूसरी आदमी के प्रति अच्छा व्यवहार ।
१०. इससे स्पष्ट है कि यदि कही एक आदमी अकेला ही हो तो उसे किसी 'धम्म' की आवश्यकता नहीं ।
११. लेकिन यदि कहीं परस्पर सम्बन्धित दो आदमी भी एक साथ रहते हों, तो चाहे वे चाहें और चाहे न चाहें उन्हे 'धम्म' के लिये जगह बनानी होगी । दोनों में से कोई एक भी बचकर नहीं जा सकता ।
१२. दूसरे शब्दो में बिना 'धम्म' के समाज का काम चल ही नहीं सकता ।
१३. समाज को तीन बातों में से एक का चुनाव करना ही पड़ेगा ।
१४. समाज चाहे तो अपने ‘अनुशासन' के लिये धम्म का चुनाव नहीं कर सकता । यदि धम्म 'अनुशासन' नहीं करता तो वह 'धम्म' ही नहीं है ।
१५. इसका मतलब है कि समाज 'अराजकता' के पथ पर आगे बढ़ना ठीक समझता है ।
१६. दुसरे समाज पुलिस को अर्थात् डिक्टेटर को 'अनुशासन' के लिये चुन सकता है ।
१७. तीसरे समाज ‘धम्मं' और 'मजिस्ट्रेट' दोनों का चुनाव कर सकता है, जितने अंश में समाज 'धम्म' का पालन करे उतने अंश में 'धम्म' और जहाँ 'धम्मं' का पालन न करे, वहाँ मजिस्ट्रेट ।
१८. न आराजकता में स्वतन्त्रता है और न डिक्टेटर-राज्य में स्वतन्त्रता है ।
१९. केवल तीसरी व्यवस्था में ही स्वतन्त्रता जीवित रहती है ।
२०. इसलिये जो स्वतन्त्रता चाहते हैं, उनके लिये 'धम्मं' अनिवार्य है ।
२१. 'धम्मं' क्या है? 'धम्मं' की अनिवार्य आवश्यकता क्यों है? भगवान् बुद्ध के अनुसार धम्म के दो प्रधान तत्व हैं - प्रज्ञा तथा करूणा ।
२२. प्रज्ञा क्या है? प्रज्ञा किस लिये ? प्रज्ञा का मतलब है बुद्धि (निर्मल बुद्धि) । भगवान बुद्ध ने प्रज्ञा को अपने धम्म के दो स्तंभों में से एक माना है, क्योंकि वह नहीं चाहते थे कि 'मिथ्या विश्वासों के लिये कहीं कोई गुंजाईश बची रहे ।
२३. करूणा क्या है? और करूणा किसलिये ? करूणा का मतलब है (दया) प्रेम (मैत्री) । इसके बिना न समाज जीवित रह सकता है और न समाज की उन्नति हो सकती है -- इसीलिये भगवान् बुद्ध ने करूणा को अपने धम्म का दूसरा स्तम्भ बनाया ।
२४. भगवान् बुद्ध के 'धम्म' की यही परिभाषा है ।
२५. 'मजहब (धर्म)' या 'रिलीजन' की परिभाषा से यह कितनी भिन्न है ?
२६. कितनी प्राचीन और कितनी आधुनिक है यह भगवान् बुद्ध द्वारा दी गई 'धम्म की परिभाषा !
२७. कितनी अलौकिक और कितनी मौलिक !
२८. किसी से उधार नहीं ली गई । कितनी सच्ची !
२९. 'प्रज्ञा' और 'करुणा' का एक अलौकिक सम्मिश्रण ही तथागत का 'धम्म' है ।
३०. 'मजहब' अथवा 'रिलीजन और 'धम्म में इतना अन्तर है !