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भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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16 जून 2023
Book
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२. धर्म तभी सद्धम्म है जब वह यह शिक्षा दे कि किसी आदमी के 'जन्म' से नहीं, बल्कि उसके 'कर्म' से ही उसका मुल्यांकन किया जाना चाहिए

१. ब्राह्मण जिस चातुर्वर्ण्य का उपदेश देते थे, उसका आधार जन्म था ।

२. जो ब्राह्मण माता-पिता के घर पैदा हो गया, वह ब्राह्मण हैं । जो क्षत्रिय माता-पिता के घर पैदा हो गया है, वह क्षत्रिय है । जो वैश्य माता-पिता के घर पैदा हो गया, वह वैश्य है । जो शूद्र माता-पिता के घर पैदा हो गया, वह शूद्र है।

Dharma is true only when it teaches that a man should be judged not by his birth but by his karma bhagwan buddha aur unka dhamma - Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

३. ब्राह्मणों के अनुसार आदमी अपने जन्म के ही हिसाब से छोटा-बड़ा होता है -- और किसी दूसरी बात से नहीं ।

४. यह जन्माश्रित ऊँच-नीच का सिद्धान्त तथागत को उतना ही अप्रिय था, जितना चातुर्वर्ण्य का सिद्धान्त ।

५. भगवान् बुद्ध का सिद्धान्त ब्राह्मणों के सिद्धान्त से सर्वथा विरोधी था । उनका सिद्धान्त था कि किसी आदमी के 'जन्म' से नहीं, बल्कि उसके 'कर्म' से ही उसका मूल्यांकन किया जाना चाहिये ।

६. जिस अवसर पर भगवान् बुद्ध ने अपने इस सिद्धान्त का उपदेश दिया, वह अवसर भी विशेष था ।

७. एक समय भगवान् बुद्ध अनाथपिण्डक के जेतवनाराम में ठहरे हुए थे । एक दिन पूर्वाह में उन्होने अपना भिक्षा पात्र लिया और भिक्षार्थ श्रावस्ती में प्रवेश किया ।

८. उस समय यज्ञाग्नि प्रज्ज्वलित थी और यज्ञ की तैयारी हो रही थी । भिक्षाटन करते - करते भगवान् बुद्ध उस अग्गिक के घर पर आ पहुंचे ।

९. तथागत को कुछ दूरी पर आता देख अग्गिक आग-बबूला हो गया । बोला- - “मुण्डक वहीं रह । दरिद्र श्रमण वही रह । वृषल वहीं रह ।"

१०. जब ब्राह्मण को इस प्राकर बोलते सुना, तो तथागत ने उसे सम्बोधित करके पूछा -- “हे ब्राह्मण ! क्या तू जानता है कि वृषल (अछूत) कौन होता है? क्या तू जानता है कि क्या करने से आदमी वृषल (अछूत) बनता है?”

११. “नही श्रमण गौतम! मैं नहीं जानता कि वृषल कौन होता है? अथवा क्या करने से आदमी वृषल (= अछूत) होता है?"

१२. भगवान् बुद्ध ने कहा कि यदि तुम यह जान लोगे कि वृषल कौन होता हैं, तो इससे तुम्हारी कुछ हानि नहीं होगी । “ अच्छा जब आप चाहते है कि मैं जान ही लू तो बतायें ।”

१३. ब्राह्मण के सुनने की इच्छा प्रकट करने पर तथागत ने कहा -

१४. “जो आदमी क्रोधी हो, लोभी हो, अनैतिक हो, चुगलखोर हो, मिथ्या-दृष्टि हो और वंचक हो -- उसे 'वृषल' समझना ।

१५. “जो भी चाहे एकज हों, चाहे द्विज (पक्षी आदि) हों, प्राणियों को हानि पहुंचाता है, जिसके मन में प्राणियों के लिये दया नहीं है -- उसे 'वृषल' करके जानना ।

१६. जो भी कोई ग्रामों और झोपड़ियों को नष्ट करता है ' जो अत्याचारी है -- उसे 'वृषलं करके जानना ।

१७. “चाहे गाँव में, चाहे गाँव के बाहर जंगल में, जो भी किसी दूसरे की चीज को बिना दिये लेता है अर्थात् चुराता है -- उसे 'वृषल' करके जानना ।

१८. “जो किसी का ‘ऋण' लेकर बिना लौटाये, यह कहकर कि मुझे तुम्हारा कुछ नही देना है, भाग जाना है- उसे 'वृषलं करके जानना ।

१९. “जो भी किसी वस्तु की कामना से, सड़क पर चलते हुए किसी को मार डालता है वा लूट लेता है -- उसे 'वृषलं' करके जानना

२०. “जो भी कोई, अपने हित में, वा किसी दूसरे के हित में, अथवा धन के लोभ से पूछ जाने पर झूठी गवाही देता है -- उसे 'वृषल' करके जानना ।

२१. "जो कोई जबर्दस्ती या रजामन्दी से अपने मित्रों वा सम्बन्धियों की पत्नी से अनाचार करता है उसे 'वृषल करके जानना ।

२२. “जो अपने पास पैसा होने पर भी गत जीवन अपने वृद्ध माता- - पिता का पालन-पोषण नही करता - उसे 'वृषल' करके जानना

२३. “जो कोई 'कुशल' धम्म पूछे जाने पर “अकुशल” धम्म की शिक्षा देता है और 'रहस्य' बनाकर शिक्षा देता है -- उसे 'वृषल' जानना ।

२४ “जन्म से न कोई ब्राह्मण होता है, जन्म से न कोई शूद्र होता है ।

२५. यह सब सुना तो अग्गिक ब्राह्मण ने जो कुछ बुरा-भला तथागत को कहा था, उसके लिये वह बहुत लज्जित हुआ ।


३. धर्म तभी सद्धम्म है जब वह आदमी और आदमी के बीच समानता के भाव अभिवृद्धि करे

१. आदमी असमान ही जन्म लेते है ।

२. कुछ मजबूत होते हैं, कुछ कमजोर ।

३. कुछ अधिक बुद्धिमान होते है, कुछ कम, कुछ एकदम नहीं ।

४. कुछ अधिक सामर्थ्यवान् होते है, कुछ कम ।

५. कुछ धनी होते हैं, कुछ गरीब ।

६. सभी को "जीवन संघर्ष में प्रवेश करना पड़ता है ।

७. इस "जीवन-संघर्ष” में यदि असमानता को स्वाभाविक स्थिति स्वीकार कर लिया जाय तो जो कमजोर है, उसका तो कही ठिकाना ही नहीं रहेगा

८. क्या यह 'असमानता' का नियम जीवन का नियम बन जाना चाहिये?

९. कुछ कहते हैं “हां” ! उनका तर्क है कि जो 'जीवन- सघर्ष में टिकने के अधिक योग्य होगा, वह टिका रहेगा ।

१०. प्रश्न यह है कि जो आदमी 'जीवन संघर्ष' में टिके रहने के लिये योग्यतम है, क्या समाज के दृष्टि कोण से भी वही आदमी श्रेष्ठतम है?

११. कोई भी इसका निश्चयात्मक उत्तर नहीं दे सकता ।

१२. इसी सन्देह के कारण धम्म “समानता” का उपदेशक है। हो सकता है कि "समानता" के कारण जो "श्रेष्ठतम" व्यक्ति है वह भी बना रह सके, चाहे वह 'जीवन-संघर्ष' की दृष्टि से योग्यतम न भी हो ।

१३. समाज को “श्रेष्ठतम” आदमी चाहिये, "योग्यतम" नहीं ।

१४. यही प्राथमिक कारण है जिस से धम्म समानता' का समर्थक है ।

१५. भगवान् बुद्ध का यही दृष्टिकोण था और इसीलिये उनका यह कहना था कि जो धर्म 'समानता' का समर्थक नहीं है, वह अपनाने योग्य नहीं है ।

१६. क्या आप किसी एसे धर्म में विश्वास कर सकते है या उसके लिये मन में आदर का भाव रख सकते हैं, जो दूसरों को दुःखी बनाकर स्वयं सुखी बनने की शिक्षा देता हो, अथवा अपने को दुःखी बनाकर दूसरों को सुखी बनाने की शिक्षा देता ह अपने को और दूसरों को -- दोनों को - दुःखी बनाने शिक्षा देता हो ?

१७. क्या वह धम्म अधिक श्रेष्ठतर नहीं है जो अपने सुख के साथ साथ दूसरों के सुख में वृद्धि करता है और किसी प्रकार के अत्याचार को सहन नही करता?

१८. जो ब्राह्मण ‘असमानता के विरोधी थे, भगवान् बुद्ध ने उनसे कई बड़े खास प्रश्न पूछे हैं ।

१९. भगवान् बुद्ध का धम्म आदमी की अपनी पुण्य-परक प्रवृत्ति में से उत्पन्न होने वाला अत्यन्त न्याय संगत धम्म है ।