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भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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16 जून 2023
Book
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३. धर्म तभी सद्धम्म हो सकता है, जब यह शिक्षा दे कि करूणा से भी अधिक मैत्री की आवश्यकता है

१. बुद्ध ने 'करूणा को ही धम्म की 'इति' नही कहा ।

२. ‘करूणा' का अर्थ दुखी आदमियो के प्रति दया किया जाना है । बुद्ध ने और आगे बढ़कर 'मैत्री' की शिक्षा दी । मैत्री  का  मतलब है प्राणिमात्र के प्रति दया ।

What is Saddhamma - Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma - Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

३. तथागत चाहते थे कि आदमी दुःखी मनुष्यो के प्रति 'करूणा' की भावना रखने से भी और आगे बढकर प्राणि-मात्र के प्रति मैत्री की भावना रखे ।

४. जिस समय भगवान् बुद्ध श्रावस्ती में विराजमान थे, उस समय अपने एक प्रवचन में उन्होंने यह बात अच्छी तरह से स्पष्ट दी है।

५. मैत्री के बारे में बोलते हुए भगवान बुद्ध ने भिक्षुओं को कहा --

६. “मान लो एक आदमी पृथ्वी खोदने के लिये आता है, तो क्या पृथ्वी उसका विरोध करती है ?"

७. भिक्षुओं ने उत्तर दिया- "भगवान ! नहीं ।"

८. “मान लो एक आदमी लाख और दूसरे रंग लेकर आकाश में चित्र बनाना चाहता है । क्या तुम समझते हो कि वह बना सकेगा ?”

९. “भगवान ! नही ।"

१०. “क्यो?" भिक्षु बोले -- "क्योंकि आकाश काला नहीं है । “

११. “इसी प्रकार तुम्हारे मन में कुछ कालिख नहीं होनी चाहिये, जो कि तुम्हारे राग-द्वेष का परिणाम है ।“

१२. “मान लो एक आदमी जलती हुई मशाल लेकर गंगा नदी में आग लगाने आता है, तो क्या वह आग लगा सकेगा?”

१३. “भगवान ! नहीं ।"

१४. "क्यो?" भिक्षुओं ने उत्तर दिया-- "क्योकि गंगा - जल में जलने का गुण नहीं है ।"

१५. अपना प्रवचन समाप्त करते हुए तथागत ने कहा भिक्षुओं! जैसे पृथ्वी आघात अनुभव नहीं करती और विरोध नहीं करती, जिस प्रकार हवा में किसी प्रकार की प्रतिक्रिया नहीं होती, जिस प्रकार गंगा नदी का जल अग्नि से अप्रभावित रहकर बहता रहता है; इसी प्रकार हे भिक्षुओं! यदि तुम्हारा कोई अपमान भी कर दे, यदि तुम्हारे साथ कोई अन्याय भी करे तो भी तुम अपने विरोधियो के प्रति मैत्री की भावना अपनाये रखो ।

१६. “भिक्षुओं! मैत्री की धारा हमेशा प्रवाहित रहनी चाहिये । तुम्हारा मन पृथ्वी की तरह दृढ़ हो, वायु की तरह स्वच्छ हो और गंगा नदी की तरह गम्भीर हो । यदि तुम मैत्री का अभ्यास रखोगे तो कोई तुम्हारे साथ कैसा भी अप्रीतिकार व्यवहार करे, तुम्हारा चित्त  विचलित नही होगा । क्योकि विरोधी लोग शीघ्र ही थक जोयगे ।

१७. “तुम्हारी मैत्री विश्व की तरह व्यापक होनी चाहिये और तुम्हारी भावनाये असीम होनी चाहिये, जिनमें कहीं द्वेष का लेश भी न हो ।

१८. “मेरे धम्म के अनुसार 'करूणा' ही पर्याप्त नहीं है, आदमी में 'मैत्री' होनी चाहिये ।"

१९. अपने प्रवचन में भगवान् बुद्ध ने एक कथा सुनाई जो याद रखने के लायक है ।

२०. “एक समय श्रावस्ती में विदेसिका नाम की एक सम्पत्र स्त्री रहती थी, जिसकी ख्याति थी कि वह बड़ी सुशील है, बडी शान्त है । उसकी एक नौकरानी थी, जिसका नाम काली था । बड़ी दक्ष, बहुत सुबह उठकर अपना काम करने वाली । एक दिन काली ने सोचा, 'क्या मेरी मालकिन को, जिसकी इतनी ख्याति हैं, क्रोध आता ही नही, वा वह अपना क्रोध प्रगट नही करती ? अथवा मैं अपना काम इतनी अच्छी तरह करती हूँ कि उसका क्रोध अप्रकट रहता है?

२१. इसलिये दूसरे दिन वह विलम्ब से उठी । मालकिन बोली - "काली! काली !"लडकी बोली - "हाँ, मालकिन ! " “तू इतनी देर करके क्यों उठी?” “मालकिन ! कुछ बात नहीं ।" "दृष्ट लड़की! कहती है, कुछ बात नहीं" कहते हुए मालकिन गुस्से के मारे धुधवाने लगी ।

२२. “यद्यपि यह क्रोध को प्रकट नहीं होने देती, किन्तु भीतर क्रोध तो है । क्योंकि मैं अपना काम बहुत अच्छी तरह करती हूँ इसलिये इसका क्रोध अप्रकट रहता है । मैं इसकी और परीक्षा करूँगी" लड़की ने सोचा । इसलिये दूसरे दिन वह और भी अधिक देर करके उठी । मालकिन बोली - "काली! काली !” उत्तर दिया- "हा मालकिन !" तू इतनी देर करके क्यो उठी?” “मालकिन ! कुछ बात नहीं है । "दृष्ट लड़की! कहती है कुछ बात नहीं" ", कहते हुए मालकिन और भी अधिक भिनभिनाई ।

२३. “हां! क्रोध तो निश्चित रूप से है। लेकिन क्योंकि मैं अपना काम अच्छी तरह से करती हूँ, इसीलीये वह अप्रकट रहता है । मैं इसकी और परीक्षा करूगी । “इसलिये अगले दिन वह और भी विशेष देर करके उठी । मालकिन चिल्लाई - "काली !
काली!”लड़की बोली - “ही मालकिन !' 'तू इतनी देरी से क्यों उठी?" मालकिन ! यह कुछ बात नहीं है ।”

२४. “दृष्ट लड़की! इतनी अधिक देर से उठना, कुछ बात ही नहीं है"- इतना कहा और गुस्से में आकर मालकिन ने दरवाजे की अर्गल निकाल कर लडकी के सिर में दे मारी। लड़की के सिर से खून बहने लगा ।

२५. रक्त बहते हुए अपने फूटे सिर को लेकर लड़की चिल्ला चिल्लाकर पड़ोसियों को सुना रही थी -- "देखो रे लोगो, अपनी शान्त मालकिन को । देखो रे लोगो, अपनी क्रोध-रहित मालकिन को । इतनी सी बात पर कि उसका काम करने वाली लडकी देर से उठी, वह क्रोध से इतनी पागल हो गई कि दरवाजे की अर्गल निकाल कर मेरे सिर में दे मारी और उसे फोड दिया ।"

२६. “परिणाम-स्वरूप विदेसिका मशहूर हो गई कि बड़ी अशान्त है, बड़े क्रोधी स्वभाव की है - शान्त और विनम्र तो है ही नही ।

२७. “इसी तरह से कोई भिक्षु भी बड़ा शान्त और विनम्र रह सकता है, जब तक उसे अप्रसन्न करने वाली बात न कही जाय । लेकिन किसी भिक्षु मैत्री है या नही, इसकी परीक्षा तभी होती है जब उसके विराद्ध कोई कुछ कहता है ।

२८. इसके आगे तथागत ने कहा- 'मै उस भिक्षु को मैत्री भाव-संपन्न नहीं कहता जो केवल भोजन-वस्त्र प्राप्त करने के लिये मैत्री प्रदर्शित करता है । मै उसे ही सच्चा भिक्षु कहता हूँ जिस को मैत्री का मूल स्रोत उसका धम्म है ।

२९. “भिखुओ! कोई मी पुण्य-र्कम मैत्री भावना के सोलहवें हिस्से के भी बराबर नहीं है । मैत्री जो कि चित्त की विमुक्ति है, उन सबको अपने अन्तर्गत ले लेती है -- यह प्रकाशमान होती हैं, यह प्रदीप्त होती है, यह प्रज्जवलित होती है ।

३० “इसी प्रकार भिक्षुओ ! जैसे भी तारों मिलकर भी अकेले चन्द्रमा के प्रकाश सोलहवें हिस्से के भी बराबर नही, चन्द्रमा का प्रकाश प्रकाश-मान होता है, प्रदीप्त होता है, प्रज्ज्वलित होता है । इसी प्रकार भिखुओ । कोई भी पुण्य-कर्म मैत्री भावना के सोलहवें हिस्से के भी बराबर नहि हैं । मैत्री, जो कि चित्त की विमुक्ति है, उन सबको अपने अन्तर्गत ले लेती है -- वह प्रकाशमान होती हैं, यह प्रदीप्त होती है, यह प्रज्ज्वलित होती है ।

३१. “और भिक्षुओ! जैसे वर्षा ऋतु की समाप्ति पर स्वच्छ, अनभ्र आकाश में उगने वाला सूर्य, तमाम अन्धकार को विदीर्ण कर देता है, वह प्रकाशित होता है, प्रदीप्त होता है तथा प्रज्ज्वलित होता है और जैसे रात्रि की समाप्ति पर भोर का तारा प्रकाशित होता है, प्रदीप्त होता है तथा प्रज्ज्वलित होता है: ठीक उसी प्रकार कोई भी पुण्य-कर्म मैत्री भावना के सोलहवें हिस्से के भी बराबर नहीं है । मैत्री, जो चित्त की विमुक्ति है, उन सबको अपने अन्तर्गत ले लेती है -- यह प्रकाशमान होती है, यह प्रदीप्त होती है, यह प्रज्ज्वलित होती है ।"