भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
(घ) धर्म तभी सद्धम्म कहला सकता है, जब वह तमाम सामाजिक भेद-भावों को मिटा दे
१. धर्म तभी सद्धम्म हो सकता है जब एक आदमी और दूसरे आदमी के बीच की तमाम दीवारो को गिरा दे
१. एक ‘आदर्श- समाज' क्या है? ब्राह्मणों के अनुसार वेदों ने आदर्श समाज की परिभाषा की है, और क्योंकि वेद स्वतः प्रमाण है और उसमें कभी कोई गलती हो ही नही सकती, इसलिये आदमी का आदर्श समाज' वही है जो वेदो में वर्णित है ।
२. वेदों में जिस 'आदर्श समाज का विधान किया गया है, वह 'चातुर्वर्ण्य' कहलाता है ।

३. वेदों के अनुसार इस प्रकार के समाज में तीन बातें अवश्य होनी चाहिये ।
४. इसमें चार वर्ग होने चाहिये - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र ।
५. इन वर्गों का आपसी सम्बन्ध क्रमिक असमानता के सिद्धान्त तर आश्रित होना चाहिये । दूसरे शब्दों में ये तमाम वर्ग एक दूसरे के समान नहीं हो सकते । उन्हें एक दूसरे के ऊपर-नीचे होना चाहिये -- सामाजिक दर्जे के बारे में, अधिकारों के बारे में तथा सुविधाओं के बारे में।
६. सबसे ऊपर ब्राह्मण; उनके नीचे क्षत्रिय किन्तु वैश्यों से ऊपर, उनके भी नीचे वैश्य किन्तु शूद्रों से ऊपर । सबसे नीचे शूद्र ।
७. चातुर्वर्ण्य से सम्बन्ध रखनेवाली तीसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि हर वर्ग को अपने अपने पेशे में लगा रहना होगा । ब्राह्मण का काम है पढ़ना, पढ़ाना और धार्मिक संस्कार करना । क्षत्रिय का काम है शस्त्र धारण करना और लडना । वैश्य का काम है व्यापार तथा दूसरे कारोबार करना । शूद्र का काम है ऊपर के तीनों वर्गों की सेवा करना- उनके सभी मैले-कुचैले काम करना ।
८. कोई एक वर्ग दूसरे वर्गो का पेशा नहीं कर सकता । वह उसके पेशे की सीमा में पैर नहीं रख सकता ।
९. इस ‘आदर्श-समाज' के सिद्धान्त को ब्राह्मणों ने ऊंचा दर्जा दिया और लोगों में इसका प्रचार किया ।
१०. यह स्पष्ट ही है कि इस चातुर्वर्ण्य के सिद्धान्त की “आत्मा” ही है असमानता, । यह सामाजिक असमानता किसी सामाजिक - खेत की अनायास उगी हुई उपज नहीं है । असमानता ब्राह्मणवाद का शास्त्र सम्मत सिद्धान्त है ।
११. भगवान् बुद्ध ने इसका जड़ मूल से विरोध किया ।
१२. भगवान् बुद्ध जाति-व - वाद के सबसे बड़े विरोधी थे । वे समानता के सबसे बड़े समर्थक थे ।
१३. जातिवाद और असमानता का समर्थन करने वाला एक भी तर्क ऐसा नहीं है, जिसका उन्होंने खण्डन नहीं किया ।
१४. ऐसे ब्राह्मण बहुत थे जिन्होंने इस विषय में बुद्ध से विवाद करने का प्रयास किया । लेकिन तथागत ने उन्हें एकदम मौन कर दिया ।
१५. अश्वालायन सुत्त में कथा है कि एक बार सभी ब्राह्मणों ने इकट्ठे होकर अश्वलायन ब्राह्मण को भगवान् बुद्ध के पास भेजा कि वह जाकर उनसे जातिवाद के बारे में शास्त्रार्थ करे ।
१६. अश्वलायन भगवान् बुद्ध के सामने उपस्थित हुआ और ब्राह्मणों की श्रेष्ठता का पक्ष भगवान् बुद्ध के सामने रखा ।
१७. उससे कहा -- “श्रमण गौतम! ब्राह्मणो का कहना है कि ब्राह्मण ही ऊँचे वर्ग के हैं, शेष सब उनके नीचे हैं; ब्राह्मण ही शुक-वर्ण हैं, शेष सब कृष्ण-वर्ण हैं, पवित्रता या शुचिता का वास केवल ब्राह्मणों में ही है, अब्राह्मणों में नही हैं, केवल ब्राह्मण ही ब्रह्मा औरस-पुत्र हैं, उसके मुख से उत्पज्ञ 'उसके रचे हुए, उसके पैदा किए हुए तथा उसके उत्तराधिकारी । श्रमण गौतम का इस विषय में क्या कहना है?"
१८ तथागत के उत्तर ने अश्वलायन को एक बार तो हतप्रभ ही कर दिया ।
१९. बुद्ध ने कहा -- “अश्वलायन ! क्या ब्राह्मणों की ब्राह्मण-पत्निया ऋतुमती नही होतीं, गर्भ धारण नहीं करती और सन्तान का प्रसव नहीं करती? यह होते हुए भी क्या ब्राह्मणों का कहना है कि ब्राह्मण ही ऊंचे वर्ण के है.. . ब्राह्मण ब्रह्मा के औरस पुत्र है.... ब्राह्मण ही उसके उत्तराधिकारी है ?
अश्वलायन -- “यह तो ऐसा ही है, लेकिन तब भी ब्राह्मण कहते हैं कि वे ही ऊंचे वर्ण के हैं... वे ही ब्रह्मा के औरस पुत्र है ... वे ही ब्रह्मा के उत्तराधिकारी हैं ।"
२१. तब तथागत ने अश्वलायन से दूसरा प्रश्न पूछा--
२२. “अश्वलायन! यदि एक क्षत्रिय एक ब्राह्मण कन्या से सहवास करे तो संतान मानव-र - संतान ही होगी अथवा उन दोनों के संयोग से कोई जानवर जन्म ग्रहण करेगा?"
२३. अश्वलायन के पास कोई उत्तर न था ।
२४. “जहाँ तक नैतिक उन्नति कर सकने की बात है तो क्या एकमात्र ब्राह्मण ही अपने आप को राग-द्वेष से मुक्त कर सकता है, एक क्षत्रिय नहीं? एक वैश्य नहीं? एक शुद्ध नहीं?”
२५. अश्वलायन बोला- "नहीं, चारों वर्ण के लोग कर सकते हैं ।"
२६. “अश्वलायन! क्या तुमने कभी सुना है कि यवन और कम्बोज देश में तथा अन्य पड़ोसी देशों में भी दो ही तरह के वर्ग होते हैं, एक आर्य (स्वामी) दूसरे दास (गुलाम ); और एक आर्य दास बन सकता है, तथा एक दास आर्य ?
२७. अश्वलायन -- “हा मैंने ऐसा सुना है ।"
२८. "यदि तुम्हारा चातुर्वर्ण्य, एक आदर्श समाज है तो फिर यह सभी देशो में क्यों नहीं?"
२९. इनमें से किसी भी एक बात को लेकर अश्वलायन अपने जातिवाद और असमानता के पक्ष का समर्थन न कर सका । उसे एकदम मौन ही रह जाना पड़ा । अंत में अश्वलायन को बुद्ध का एक शिष्य ही बनना पड़ा ।
३०. वासेट्ठ नाम के एक ब्राह्मण ने तथागत की शरण ग्रहण कर ली थी। दूसरे ब्राह्मण इस बात के लिये उसे बुरा-भला कहते थे ।
३१. एक दिन वह भगवान बुद्ध के पास गया और उन्हें जाकर वह सब सुना दिया, जो ब्राह्मण उसके बारे में कहते-सुनते थे ।
३२. वासेटु ने कहा -- “भगवान्! ब्राह्मण कहते हे कि ब्राह्मण का ही सामाजिक स्तर श्रेष्ठ है बाकी सबका निकृष्ट है । केवल ब्राह्मण शुक्ल वर्ण होता है; दूसरे वर्ण कृष्ण-वर्ण होते हैं। केवल ब्राह्मण ही शुद्ध वंशोत्पन्न हैं, अब्राह्मण नही, केवल ब्राह्मण ही ब्रह्मा के औरस पुत्र है, उसके मुंह से उत्पज्ञ, ब्रह्मा की संतान, ब्रह्मा द्वारा रचे गये, ब्रह्मा के उत्तराधिकारी ।
३३. “जहाँ तक तुम्हारी बात है तुमने अपने अभिजात वर्ग का त्याग करके उच नीचे वर्ग की संगति की है । तुम उन सिरमुण्डों में शामिल हो गये हो. उन गंवारो में, कृष्णवर्णी लोगों में, उन शूद्रों में । तुम्हारे लिये ऐसा करना उचित नहीं । तुम्हारे लिये ऐसा करना ठीक नहीं । यह क्या है जो तुमने अपने अभिजात वर्ग का त्याग कर उस नीच वर्ग की संगति की है? तुम उन सिरमुण्डों में शामिल हो गये हो, उन गंवारों मे, उन कृष्ण वर्ण के लोगों में, उन शूद्रों में -- हमारी जाति की जुतियों से उत्पन्न वर्ण में ।
३४. “भगवान! इन शब्दो में ब्राह्मण मुझे बुरा-भला कहते है, गाली देते है, किसी तरह की कोई कसर नहीं छोड़ते ।”
३५. वासेठ्ठ ! तो निश्चय से यदि ब्राह्मण ऐसा कहते हैं तो वह अपनी प्राचीन परम्परा को भूल गये हैं । सभी दूसरे वर्णों की स्त्रियों की तरह ब्राह्मणियाँ भी सन्तान उत्पत्र करती तथा उसका पालन-पोषण करती देखी जाती है। ऐसा होने पर भी यह सभी, माता की योनि से उत्पन्न ब्राह्मण ब्रह्मा के औरस पुत्र हैं, ब्रह्मा के मुँह से उत्पत्र हुए है, ब्राह्मण ब्रह्मा की सन्तान हैं, ब्राह्मण ब्रह्मा की रचना हैं तथा ब्राह्मण ब्रह्मा के उत्तराधिकारी है।
३६. एक बार एसुकारी ब्राह्मण तीन बातों को लेकर बुद्ध से शास्त्रार्थ करने गया
३७. पहला प्रश्न जो उसने उठाया, वह पेशों के स्थायी वर्गीकरण के बारे मे था. । वर्गीकरण के पक्ष में बोलते हुए उसने कहा:- "मैं आप से एक प्रश्न पूछने आया हूँ । ब्राह्मणों का कहना है कि क्योंकि वे सर्वोपरि हैं, इसलिये वे किसी की सेवा नही करेंगे। सभी उन्हीं की सेवा करने के लिये उत्पन्न हुए है ।
३८. “श्रमण गौतम! सेवा (= पेशों) के चार विभाग किये गये हैं -- (१) ब्राह्मणों द्वारा की जाने वाली सेवा, (२) क्षत्रियों द्वारा की जाने वाली सेवा, (३) वैश्यों द्वारा की जानेवाली सेवा तथा (४) शूद्रो द्वारा की जाने वाली सेवा ; किन्तु एक शूद्र की तो कोई दूसरा शूद्र ही सेवा कर सकता है । दूसरा कौन शूद्र की सेवा करेगा ? श्रमण गौतम का इसके बारे में क्या मत है?"
३९. भगवान बुद्ध के एसुकारी ब्राह्मण से एक प्रति-प्रश्न पूछकर उसके प्रश्न का उत्तर दिया । तथागत ने कहा 'क्या सारा संसार ब्राह्मणों के इस वर्गीकरण से सहमत है?
४०. “जहाँ तक मेरी बात है न मैं यही कहता हूँ कि सभी सेवाएँ (पेशे) की ही जानी चाहिये, न यही कहता हूं कि सभी सेवायें (= पेशे) नहीं ही की जानी चाहिये । यदि किसी सेवा (= पेशे) के करने से आदमी की स्थिति अच्छी न होती हो, खराब होती हो तो वह सेवा (= पेशा) नहीं की जानी चाहिये; यदि किसी सेवा (पेशे) के करने से आदमी की स्थिति खराब होने की बजाय बेहतर होती हो तो वह सेवा (= पेशा) की जानी चाहिये ।
४१. इसी एक कसौटी पर क्षत्रियो, ब्राह्मणों, वैश्यो, शुद्रों सभी की सेवा कैसी जानी चाहिये, हर व्यक्ति को ऐसी सेवा (= पेशा ) करने से इनकार करना चाहिये जो उसकी स्थिति को खराब बनाती हो, किन्तु हर व्यक्ति को ऐसी सेवा ( पेशा ) करनी चाहिये जो उसकी स्थिती को अच्छा बनाती हो ।
४२. चर्चा का दूसरा विषय जो एसुकारी ब्राह्मण ने उपस्थित किया, वह यही था कि आदमी के दर्जे का विचार करते समय उसकी वंश-परम्परा का भी विचार क्यों नहीं किया जाना चाहिये ?
४३. इस प्रश्न का तथागत ने यू उत्तर दिया-- “जहाँ तक वंश-परम्परा के अभिमान की बात है, एक आदमी जिस वंश में जन्म ग्रहण करता हैं, उससे उसका नाम करण मात्र ही होता हैं कि यह क्षत्रिय वंश में पैदा हुआ है, यह ब्राह्मण-वंश में पैदा हुआ है, यह वैश्य-वंश में पैदा हुआ है और यह शूद्र-वंश में पैदा हुआ है । जैसे, किस प्रकार के ईंधन से आग उत्पन्न होती है, उससे उसका नाम-करण हो जाता है -- यह लकड़ी की आग है, यह चैली की आग है, यह लकड़ी की गाठ की आग है और यह गोबर की आग है, इसी प्रकार आदमी के लिये सद्धम्म ही उसका वास्तविक धन है, जन्म से तो आदमी की चारों वर्णों में से किसी न किसी एक वर्ण में गिनती मात्र होती है ।
४४. “न वंश-परम्परा से, न अच्छी शक्ल होने से और न धन होने से कोई आदमी अच्छा या बुरा होता है । अच्छे वंश में उत्पन्न हुआ एक आदमी भी हत्यारा होता है, चोर होता है, व्यभिचारी होता है, झूठा होता है, चुगलखोर होता है, कठोर बोलने वाला होता है, बकवास करने वाला होता है, लोभी होता है, द्वेषी होता है और मिथ्या-दृष्टि वाला होता है । इसीलिये मैं कहता हूँ कि अच्छे वंश में उत्पन्न होने से ही कोई आदमी अच्छा नहीं होता । और अच्छे वश में उत्पन्न होने पर भी एक आदमी इन सभी दोषों से युक्त होता है । इसलिये मैं यह भी नहीं कहता हूँ कि अच्छे वश में उत्पन्न होने से ही कोई आदमी अच्छा नहीं होता । "
४५. एसुकारी ब्राहृमण का तीसरा प्रश्न प्रत्येक वर्ग के पेशे वा जीविका के साधन के सम्बन्ध में था ।
४६. एसुकारी ब्राह्मण ने तथागत से कहा - "ब्राह्मण चार तरह के जीविका के साधनों का विधान करते हैं -- १) ब्राह्मणों के लिये भिक्षा, २) क्षत्रियों के लिये तीर-कमान, ३) वैश्यों के लिये व्यापार तथा पशु-पालन और ४) शूद्रो के लिये बैहेंगी पर (दूसरो का ) धान ढोना । यदि इनमें से कोई अपना पेशा छोड़ कर किसी दूसरे का पेशा करता है तो यह उसके लिये अच्छा नहीं, ठीक वैसे ही जैसे कोई चौकीदार किसी दूसरे की सम्पत्ति पर अधिकार कर ले । श्रमण गौतम का इस बारे में क्या मत है?"
४७ “क्या सारा संसार इस ब्राह्मणी वर्गीकरण से सहमत है?"
४८. एसुकारी ब्राह्मण का उत्तर था -- "नहीं"
४९. वासेट्ठ को तथागत ने कहा था -- “उंचे आदर्श का महत्व है, ऊंची जाति में जन्म ग्रहण करने का नहीं ।"
५०. जाति नहीं, असमानता नहीं, ऊंच-नीच नही -- यही तथागत की देशना थी ।
५१. “दूसरे के साथ अपने आप को एक कर दो । यही सोचो जैसे वे हैं, वैसा मैं हूँ, जैसा मैं हूँ, वैसे वे हैं ।”