भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
(ग) धर्म तो तभी सद्धम्म कहला सकता है जब वह मैत्री की वृद्धि करे
1. धर्म तभी सद्धम्म है जब वह यह शिक्षा देता है कि केवल 'प्रज्ञा' भी अपर्याप्त है : इसके साथ शील अनिवार्य है
१. प्रज्ञा आवश्यक है । लेकिन शील अधिक आवश्यक है। शील के बिना प्रज्ञा खतरनाक हैं ।
२. अकेली 'प्रज्ञा खतरनाक है ।

३. प्रज्ञा आदमी के हाथ की दुधारी तलवार है ।
४. शीलवान आदमी के हाथ में होने पर यह खतरे में पड़े हुए किसी आदमी की रक्षा कर सकती है ।
५.. लेकिन शील- रहित आदमी के हाथ में होने पर यह किसी की हत्या भी करा सकती हैं।
६. इसलिये प्रज्ञा से भी शील का महत्व अधिक है ।
७. प्रज्ञा विचार-धम्म है, सम्यक् विचार करना । शील आचार- धम्म है, सम्यक् आचरण करना ।
८. भगवान बुद्ध ने शील के पांच मूलाधार स्वीकार किये हैं ।
९. एक का सम्बन्ध जीव - हिंसा से है ।
१०. दूसरे का सम्बन्ध चोरी से है ।
११ तीसरे का सम्बन्ध काम भोग सम्बन्धी मिध्याचार से है ।
१२ चौथे का सम्बन्ध झूठ बोलने से है ।
१३. पांचवें का सम्बन्ध नशील पदार्थ सेवन करने से है ।
१४. इन पांचों मूलाधारों को लेकर तथागत ने लोगों को जीव हत्या से विरत रहने के लिये कहा, चोरी से विरत रहने के लिये कहा ‘कामभोग सम्बन्धी मिथ्याचार से विरत रहने के लिये कहा 'झूठ बोलने से विरत रहने के लिये कहा तथा शराब आदि नशील पदार्थ ग्रहण करने से विरत रहने के लिये कहा ।
१५. भगवान् बुद्ध ने ‘शील' को 'विद्या के भी ऊपर क्यों स्थान दिया - यह स्पष्ट ही है ।
१६. ज्ञान का उपयोग आदमी के शील के अनुसार ही होकर रहेगा । शील के बिना ज्ञान का कोई मूत्य नहीं । यही उनके कथन का सार है।
१७. एक दूसरे स्थान पर उन्होंने कहा है “संसार में शील के समान कुछ नहीं ।
१८. “शील ही आरम्भ है, शील की शरण स्थान है, शील ही समस्त कल्याण की जननी है। शील ही सर्वप्रथम है । इसलिये अपने शील को शुद्ध करो।"
2. धर्म तभी सद्धम्म है जब वह यह शिक्षा देता है कि प्रज्ञा और शील के साथ-साथ करूणा का होना भी अनिवार्य है
१. इस प्रश्न पर कि बौद्ध-धम्म की आधार शिला क्या है, कुछ मतभेद रहा है ।
२. क्या अकेली प्रज्ञा बौद्ध - धम्म की आधारशिला है ? क्या अकेली करूणा बौद्ध-धम्म की आधारशिला है ?
३. इस मत-भेद के कारण भगवान् बुद्ध के अनुयायी दो पक्षों में विभक्त हो गये थे । एक पक्ष का मत था कि अकेली 'प्रज्ञा' ही भगवान् बुद्ध के धम्म की आधार शिला है। दूसरे पक्ष का कहना था कि अकेली 'करुणा' ही बौद्ध- - धम्म की आधारशिला है ।
४. ये दोनों पक्ष अभी भी विभक्त हैं ।
५. यदि 'बुद्ध-वचनों' को लेकर विचार किया जाय तो दोनों पक्ष गलत प्रतीत होते है ।
६. इसमें कोई मतभेद नहीं है कि बुद्ध धम्म के दो स्तम्भों में से एक 'प्रज्ञा है ।
७. प्रश्न यही है कि करूणा भी दूसरा स्तम्भ है या नहीं?
८. करूणा भी भगवान् बुद्ध के धम्म का एक स्तम्भ है -- यह विवाद से परे की बात है ।
९. इसके समर्थन में 'बुद्ध वचन' उद्धृत किया जा सकता है ।
१०. पुराने समय में गान्धार देश में एक बहुत ही भयानक बीमारी से पीड़ित कोई साधु था । वह जहां कहीं बैठता, उसी जगह को गंदा कर देता ।
११. वह एक ऐसे विहार में था, जहां कोई उसकी सहायता न करता था ।
१२. पांच सौ भिक्षुओं के साथ तथागत आवश्यक बर्तन तथा गर्म पानी आदि लेकर वहां पहुँचे ।
१३. वह स्थान इतना दुर्गन्धपूर्ण था कि सभी भिक्षुओं को उस साधु घुणा हो गई । लेकिन तथागत ने शुक्रदेव से पानी आदि डलवाकर उस रोगी को अपने हाथ से स्नान कराया और उसकी सेवा की।
१४. उस समय पृथ्वी काँपी और वह सारा स्थान एक अलौकिक प्रकाश से भर गया । तब राजा, उसके मंत्री, आकाश-स्थित देवता, नाग आदि सभी वहाँ एकत्रित हुए और तथागत की पूजा की ।
१५. जितने भी वहाँ एकत्रित हुए थे उन सभी को आश्चर्य हुआ, इसलिये उन्होंने पूछा कि इतने ऊंचे होकर आपने इतना सामान्य काम क्यों किया ? तथागत ने समझाया:-
१६. “संसार में आने का तथागत का उद्देश्य ही यह है कि दरिद्रों, असहायों और अरक्षितों का मित्र बनना । जो रोगी हो -- श्रमण हो वा दूसरे कोई भी हों -- उनकी सेवा करना । दरिद्रों, अनाथों और बूढ़ों की सहायता करना तथा दूसरों को ऐसा करने की प्रेरणा देना ।":