भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
२. संसार को 'धम्म- राज्य' बनाना
१. धम्म का प्रयोजन क्या है?
२. भिन्न-भिन्न धर्मो ने इस प्रश्न के भिन्न भिन्न उत्तर दिये हैं ।

३. आदमी को ईश्वर प्राप्ति के मार्ग पर लगाना और उसे अपने 'आत्मा' के 'मोक्ष का महत्व समझाना -- यह एक सामान्य उत्तर है ।
४. बहुत से धर्म तीन राज्यों की बात करते हैं ।
५. एक 'स्वर्ग का राज्य' कहलाता हैं, दुसरा 'पृथवि का राज्य' कहलाता हैं, तीसरा 'नरक का राज्य' कहलाता हैं ।
६. कहा जाता है कि 'स्वर्ग के राज्य पर ईश्वर का शासन है । 'नरक के राज्य पर शैतान का एकाधिकार माना जाता हे। 'पृथ्वी के राज्य' के बारे में झगडा है । इस पर शैतान का अधिकार नहीं है । साथ साथ इसे 'ईश्वर के राज्य के अन्तर्गत भी नहीं माना जा सकता । आशा की जाती हैं कि शायद किसी दिन हो जाय ।
७. कुछ धर्मो में माना जाता है कि 'स्वर्ग का राज्य' 'धर्म- राज्य' हैं ' क्योकि वहा ईश्वर का सीधा शासन है ।
८. कुछ दूसरे धर्मों में ‘स्वर्ग का राज्य' पृथ्वी पर नहीं है । यह केवल 'स्वर्ग' का ही दुसरा नाम है। जो कोई ईश्वर और उसके पैगम्बर पर ईमान लाता है, वह वहां पहुंच सकता है। जब पहुंचने वाले स्वर्ग पहुंचते हैं तो जीवन के जितने भी भोग-विलास के साधन हैं वे सब उन्हें वहा प्राप्त हो जाते हैं ।
९. सभी धर्मों का यही उपदेश है कि आदमी के जीवन का उद्देश्य इस 'स्वर्ग के राज्य' को प्राप्त करना और कैसे प्राप्त करना -- यही होना चाहिये ।
१०. “धम्म का उद्देश्य क्या है? इस प्रश्न का बुद्ध ने सर्वथा भिन्न उत्तर दिया है ।
११. भगवान बुद्ध ने लोगों को यह नहीं कहा कि उनके जीवन का उद्देश्य किसी काल्पनिक 'स्वर्ग' की प्राप्ति होना चाहिये । उनका कहना था कि 'धम्म का राज्य' इस पृथ्वी पर ही है और वह धम्म- पथ पर चलकर प्राप्त किया जा सकता है ।
१२. उन्होंने लोगों से कहा कि यदि तुम अपने दुख का अन्त करना चाहते हो, तो हर किसी को दूसरे के साथ न्याय- संगत, धम्म- संगत व्यवहार करना होगा । तभी यह पृथ्वी 'धम्म का राज्य' बन सकेगी ।
१३. अन्य सब धर्मो की अपेक्षा तथागत के धम्म की यही अपनी विशेषता है ।
१४. तथागत के धम्म में पचशीलों पर जोर दिया गया है, अष्टांगिक मार्ग पर जोर दिया गया है और पारमिताओं पर जोर दिया गया हैं ।
१५. भगवान् बुद्ध ने इन सबको अपने धम्म का आधार क्यों बनाया? क्योंकि ये एक ऐसी जीवन विधि है कि केवल यह ही आदमी को सदाचारी बना सकती हैं।
१६. आदमी आदमी के प्रति जो अनुचित व्यवहार करता है, उसी में से आदमी का सारा दुःख पैदा हुआ हैं ।
१७. आदमी का आदमी के प्रति जो अनुचित व्यवहार है, उसका नाश केवल 'धम्म' ही कर सकता है और उससे उत्पन्न दुःख का भी ।
१८. इसीलिये भगवान बुद्ध ने कहा कि 'धम्म' का काम केवल 'उपदेश' देना नहीं है बल्कि जैसे भी हो आदमी के मन में यह बात जमाना है कि सर्वोपरि आवश्यकता सदाचारी बनने की है ।
१९. लोगों में सदाचार की भावना भरने के लिये, धम्म के लिये आवश्यक है कि वह दूसरे कार्य भी करे ।
२०. धम्म को यह शिक्षा देनी होगी कि आदमी जान सके कि कुशल-कर्म ( शुभ-कर्म) कौन सा होता है और वह उस कुशल-कर्म को कर सके ।
२१. धम्म को यह भी शिक्षा देनी होगी कि आदमी जान सके कि अकुशल (-अशुभ) क्या है और जो अकुशल है, उससे वह बच सके ।
२२. धम्म के इन दो कामों के अतिरिक्त, भगवान् बुद्ध ने धम्म के दूसरे भी काम बतायें हैं और जिन्हें वे बहुत महत्वपूर्ण समझते थे
२३. पहला है आदमी के स्वभाव और उसकी प्रवृत्तियों की ट्रेनिंग । यह प्रार्थना करने से भिज्ञ प्रक्रिया है। यह व्रत यदि रखने से भिन्न प्रक्रिया है । यह यज्ञ - बलि से भिन्न प्रक्रिया हैं ।
२४. देवदह सुत्त मे 'जैन-धर्म की चर्चा करते हुए भगवान् बुद्ध ने यह बात स्पष्ट की है ।
२५. जैन-धर्म के संस्थापक माने जाने वाले तीर्थकर महावीर का कहना था कि व्यक्ति जो कुछ भी दुःख या सुख अनुभव करता है, यह सब उसके पूर्वजन्म के कर्मों का परिणाम होता है ।
२६. ऐसा होने पर, पूर्वजन्म के दुश्कर्मो की निर्जरा हो जाने से और नये दुश्कर्म न करने से भविष्य के लिये कुछ संग्रह नहीं होता, जब भविष्य के लिये कुछ संग्रह नहीं होता तो दुश्कर्मों का क्षय हो जाता है, जब क्षय हो जाता है, तो दुःख का क्षय हो जाता है, जब सुख दुःख अनुभव करने की शक्ति (-वेदना) का क्षय हो जाता है। जब वेदना का क्षय हो जाता है तो सारे दुःख का मूलोच्छेद हो जाता हैं ।
२७. यही निगण्ठनाथ की शिक्षा (जैन-धर्म) थी ।
२८. इस पर तथागत ने यह प्रश्न किया- “क्या तुम जानते हो कि यहाँ ही और अब ही, अकुशल प्रवृत्तियों को मूलोच्छेद हो गया और कुशल प्रवृत्ति की स्थापना हो गई ?"
२९. उत्तर था -- "नहीं ।"
३० तब बुद्ध ने आपत्ति की: "तो पूर्व- दुश्कर्मो की निर्जरा से और नये दुश्कर्मों के भी न करने से क्या लाभ है, यदि चित्त को इसका अभ्यास नहीं है कि वह अकुशल प्रवृत्ति को कुशल प्रवृत्ति में बदल सके ।"
३१ उनके मत में किसी भी धर्म की यह सबसे भारी कमी थी । शुभप्रवृत्ति या शुभ-संस्कार ही किसी के स्थायी रूप से अच्छा बने रहने की सबसे बड़ी गारण्टी हैं ।
३२. यही कारण है कि बुद्ध ने चित्त की साधना को प्रथम स्थान दिया है, जो कि संस्कारों को सुधारने का ही दूसरा नाम है ।
३३. दूसरी बात जिसें उन्होंने विशेष महत्व दिया वह यह है कि आदमी में इस बात का साहस हो कि चाहे वह अकेला ही हो तब भी उचित मार्ग से विचलित न हो ।
३४. सल्लेख-: व्र- सुत- में तथागत ने इसी बात पर जोर दिया हैं ।
३५. उन्होंने कहा है-
३६. “तुम्हें अपने मन को निर्मल बनाने के लिये निश्चय करना चाहिये कि चाहे दूसरे लोग हानि करें, मैं हानि नहीं करूंगा ।
३७. “चाहे दूसरे लोग हिसा करें, मै हिसा नहीं करूँगा ।
३८. “चाहे दूसरे लोग चोरी करें, मैं चोरी नहीं करूंगा ।
३९. “चाहे दूसरे लोग श्रेष्ठ जीवन व्यतीत न करें, मैं श्रेष्ठ जीवन व्यतीत करूगा ।
४०. “चाहे दूसरे लोग झूठ बोले, चुगली खावें, कठोर बोले अथवा व्यर्थ बकवास करें, मैं नहीं करूंगा ।
४१. “चाहे दूसरे लोग लोभी हो, मै लोभ नही करूंगा ।
४२. “चाहे दूसरे लोग द्वेष करें, मैं द्वेष नही करूंगा ।
४३. “चाहे दूसरे लोग सत्य के विषय में भी गलती पर हो, मिथ्या-दृष्टि हों, मिथ्या संकल्प वाले हो, मिथ्या वाणी वाले हो, मिथ्या- कर्मान्त वाले हों, मिथ्या- समाधिवाले हो, मैं सम्यक् - दृष्टि होऊंगा, सम्यक् संकल्प वाला होऊंगा, सम्यक् - वाणी, सम्यक् - कमन्ति, सम्यक् - आजीविका, सम्यक् वायाम, सम्यक् समाधि तथा सम्यक् स्मृति वाला होऊंगा ।
४४. “चाहे दूसरे सत्य के विषय में भी गलती पर हों, मुक्ति के विषय में भी गलती पर हों, मैं सत्य और मुक्ति दोनों विषयों में गलती पर न होऊंगा ।
४५. “चाहे दूसरे आलस्य और तन्द्रा से युक्त हों, मैं आलस्य और तन्द्रा से मुक्त रहूगा ।
४६. “चाहे दूसरे उद्धत स्वभाव के हों, में विनम्र स्वभाव का रहूंगा ।
४७. “चाहे दूसरे विचिकित्सा - युक्त हों, मैं विचिकित्सा से मुक्त रहूँगा ।
४८. “चाहे दूसरे क्रोधी हों, द्वेषी हों, ईर्ष्यालु हों, कंजूस हो, लोभी हो,, ढोंगी हो, ठग हो, बाधक हों, उद्धत हों, दुस्साहसी हों, कुसंगति वाले हों ‘ढीले-ढाले हों 'अविश्वासी हों, निर्लज्ज हों, अधार्मिक हों, अशिक्षित हो, व्यस्त हो, चकित हों तथा मूर्ख हों, मैं इन सबके विराद्ध होऊंगा ।
४९. “चाहे दूसरे लोग लौकिक वस्तुओं से चिपट रहें, मैं जो लौकिक वस्तुए नही है उनसे चिपटुंगा और परित्याग-शील रहुगा ।"
५०. “चुन्द! वाणी और कर्म का तो कहना ही क्या, विज्ञान भी चेतना से प्रभावित होता है । इसलिये मैं कहता हूँ कि चुन्द! इन सभी संकल्पों के सम्बन्ध में जो मैंने बताये हैं, दृढ़ निश्चयी होना चाहिये ।"
५१. भगवान् बुद्ध के अनुसार यही धम्म का उद्देश्य हैं ।