भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
८. "धर्म" की पुस्तकों को गलती की सम्भावना से परे मानना अ-धम्म है
१. ब्राह्मणों की घोषणा थी कि वेद न केवल पवित्र ग्रन्थ ही हैं, बल्कि वे स्वत: प्रमाण हैं ।
२. ब्राह्मणों ने वेदों के स्वतः प्रमाण होने की घोषणा नही की, बल्कि उन्होंने वेदों को गलती की सम्भावना से परे माना ।
३. इस विषय में भगवान बुद्ध ब्राह्मणों से सर्वथा विरोधी मत रखते थे ।

४. उन्होंने वेदो को पवित्र नहीं माना। उन्होंने वेदों को स्वत: प्रमाण नही माना। उन्होंने वेदों को गलती की सम्भावना से परे नहीं माना ।
५. उनके समकालीन कई दूसरे धम्मोपदेशक का भी यही मत था । लेकिन, बाद में या तो उन्होंने अथवा उनके अनुयायियों ने अपने अपने मत को ब्राह्मणो की दृष्टि में आदृत बनाने के लिये अपना बुद्धिवादी पक्ष छोड़ दिया । लेकिन भगवान बुद्ध ने इस विषय में कभी समझौता नहीं किया ।
६. तेविज्ज सुत्त में भगवान् बुद्ध ने वेदों को जल-विहीन कान्तार कहा है, पथविहीन जंगल कहा है, वास्तव में विनाश-पथ । कोई भी आदमी जिसमें कुछ बौद्धिक तथा नैतिक प्यास है, वह वेदों के पास जाकर अपनी प्यास नहीं बुझा सकता ।
७. जहाँ तक वेदो को गलत होने की सम्भावना से परे होने की बात है, तथागत ने कहा, कोई ऐसी चीजें हो ही नहीं सकती जो गलत होने की सम्भावना से सर्वथा परे हों -- वेद भी नहीं । इसलिये भगवान् बुद्ध ने कहा कि हर चीज का परीक्षण और पुर्नपरीक्षण होते रहना चाहिये ।
८. यह बात उन्होंने कालाम लोगों को दिये गये अपने प्रवचन में स्पष्ट की हैं।
९. एक बार भिक्षु संघ सहित चारिका करते करते भगवान बद्ध कोसल जनपद के केस पुत्तिय नगर में आ पहुचे । वह नगर कालाम नामक क्षत्रियों की बस्ती थी ।
१०. जब कालाम नामक क्षत्रियों को तथागत के आगमन की सूचना मिली, वे वहां पहुंचे जहां तथागत विहार कर रहे थे और जाकर एक और बैठ गये । एक और बैठे हुए कालाम क्षत्रियों ने भगवान् बुद्ध को इस प्रकार सम्बोधित किया:-
११. “हे श्रमण गौतम! हमारे गाँव में कुछ श्रमण-ब्राह्मण आते हैं, वे अपने मत की स्थापना करते है, अपने मत को ऊँचा उठाते हैं और दूसरे के मत का खण्डन करते हैं, दूसरे के मत को नीचा दिखाते हे । इसी प्रकार दूसरे कुछ श्रमण ब्राह्मण आते हैं, वे भी अपने मत की स्थापना करते हैं, अपने मत को ऊँचा उठाते हैं और दूसरे के मत का खण्डन करते हैं, दूसरे के मत को नीचा दिखाते हैं ।”
१२. “इसलिये हे श्रमण गौतम! हम सन्देह में पड़ जाते हैं कि इन श्रमण ब्राह्मणों में कौन सत्य बोल रहा है और कौन झूठ?"
१३. “हे कालामो! तुम्हें योग्य विषय में सन्देह उत्पन्न हुआ है; तुम्हारे मन में योग्य विषय में शक उत्पन्न हुआ है ।”
१४. “हे कालामों,” तथागत ने कथन जारी रखा, “किसी बात को केवल इसलिये मत मानो कि वह तुम्हारे सुनने में आई है, किसी बात को केवल इसलिये मत मानो कि वह परम्परा से प्राप्त हुई है: किसी बात को केवल इसलिये मत मानो कि बहुत से लोग उसके समर्थक हैं, किसी बात को केवल इसलिये मत मानो कि वह (धर्म) ग्रन्थो में लिखी है, किसी बात को केवल इसलिये मत मानो, कि वह तर्क (शास्त्र) के अनुसार है, किसी बात को केवल इसलिये मत मानो कि वह न्याय (-शास्त्र) के अनुसार है; किसी बात को केवल इसलिये मत मानो कि ऊपरी तौर पर वह मान्य प्रतीत होती हैं। किसी बात को केवल इसलिये मत मानो कि वह अनुकूल- विश्वास वा अनुकूल-दृष्टि की है, किसी बात को केवल इसलिये मत मानो कि वह ऊपरी तौर पर सच्ची प्रतीत होती है, किस बात को केवल इसलिये मत मानो कि वह किसी आदरणीय आचार्य की कही हुई हैं ।"
१५. “तो फिर हमें क्या करना चाहिये ? हमारी क्या कसौटी होनी चाहिये?" कालाम क्षत्रियों ने प्रश्न किया ।
१६. तथागत बोले- “कालामो ! कसौटी यही है कि स्वयं अपने से प्रश्न करो कि क्या अमुक बात का करना हितकर है? क्या अमुक बात निन्दनीय है? क्या अमुक बात विज्ञाजनो द्वारा निषिद्ध है ? क्या अमुक बात के करने से कष्ट और दुःख होता है?"
१७. “कालामों! इतना ही नहीं, तुम्हे यह भी देखना चाहिये कि क्या मत-मत- विशेष, तृष्णा, घृणा, मूढता और द्वेष की भावना की वृद्धि में तो सहायक नहीं होता?"
१८. “कालामों! इतना ही नहीं, तुम्हें यह भी देखना चाहिये कि मत विशेष किसी को उसकी अपनी इन्द्रियों का गुलाम तो नहीं बनाता? उसे हिंसा करने में प्रवृत्त तो नहीं करता? उसे चोरी करने की प्रेरणा तो नहीं देता? उसे कामभोग सम्बन्धी मिथ्याचार में प्रवृत्त तो नहीं करता? उसे झूठ बोलने में प्रवृत्त तो नहीं करता? उसे दूसरों को वैसा ही करने की प्रेरणा देने में तो प्रवृत्त नहीं करता?"
१९. “और हे कालामों! अंत में तुम्हें यही पूछना चाहिये कि यह दुःख के लिये, अहित के लिये तो नहीं है?"
२०. “हे कालामों! अब तुम क्या सोचते हो?"
२१. “इन बातों के करने में आदमी का अहित है वा हित है?"
२२. “भन्ते! अहित है ।”
२३. " हे कालामों! क्या ये बातें लाभप्रद है वा हानि- प्रद?"
२४. "भन्ते! हानिप्रद ।"
२५. "क्या ये बाते निन्दनीय हैं?"
२६. “भन्ते! निन्दनीय हैं।”
२७. " विज्ञ पुरुषों द्वारा निषिद्ध हैं वा समर्पित हैं?"
२८. “विज्ञ पुसषों द्वारा निषिद्ध ।”
२९. “इनके करने से कष्ट और दुःख होता है?"
३०. “भन्ते! इनके करने से कष्ट और दुःख होता है।"
३१. “कोई धर्म-ग्रन्थ जो यह सब सिखाता हो, क्या वह स्वत: प्रमाण माना जा सकता है? क्या वह गलत होने की सम्भावना से परे माना जा सकता है?"
३२. "भन्ते! नहीं!”
३३. “लेकिन कालामो! यही तो मैंने कहा है । मैंने कहा है किसी बात को केवल इसलिये मत मानो कि वह तुम्हारे सुनने मे आई है, किसी बात को केवल इसलिये मत मानो कि वह परम्परा से प्राप्त हुई है; किसी बात को केवल इसलिये मत मानो कि बहुत से लोग उसके समर्थक है, किसी बात को केवल इसलिये मत मानो कि वह (धर्म) ग्रन्थो में लिखी है; किसी बात को केवल इसलिये मत मानो कि वह तर्क (-शास्त्र) के अनुसार है, किसी बात को केवल इसलिये मत मानो कि वह न्याय (-शास्त्र ) के अनुसार है, किसी बात को केवल इसलिये मत मानो कि वह ऊपरी तौर पर मान्य प्रतीत होती है, किसी बात को केवल इसलिये मत मानो कि वह अनुकूल विश्वास वा अनुकूल दृष्टि की है, किसी बात को केवल इसलिये मत मानो कि वह ऊपरी तौर पर सच्ची प्रतीत होती हैं, किसी बात को केवल इसलिये मत मानो कि वह किसी आदरणीय आचार्य की कही हुई हैं ।”
३४. “केवल जब तुम आत्मानुभव से ही यह जानो कि ये बातें अहितकर हैं, ये बातें निन्दनीय हैं, ये बातें विज्ञ पुरुषों द्वारा निषिद्ध है, ये बातें करने से कष्ट होता है, दुःख होता है-- - हे कालामो ! तब तुम्हे उनका त्याग कर देना चाहिये ।”
३५. “भन्ते! अदभूत है । गौतम! अदभूत है । हम आपकी, आपके धम्म की और संघ की शरण ग्रहण करते हैं । आज से प्राण रहने तक भगवान् हमें अपना शरणागत उपासक जानें ।"
३६. इस दलील का सार स्पष्ट है। किसी आदमी की शिक्षा को प्रमाणित स्वीकार करते समय इस बात का विचार मत करो कि वह किसी (धर्म) ग्रन्थ में लिखी हुई है, इस बात का विचार मत करो कि वह तर्क (-शास्त्र) अनुकूल है, इस बात का विचार मत करो कि वह ऊपरी दृष्टि से मान्य प्रतीत होती है, इस बात का विचार मत करो कि वह अनुकूल - विश्वास वा अनुकूल दृष्टि की है, इस बात का विचार मत करो कि वह ऊपरी दृष्टि से सच्ची प्रतीत होती है तथा इस बात का विचार न करों कि वह किसी आदरणीय आचार्य की कही हुई प्रतीत होती हैं ।
३७. लेकिन इस बात का विचार करो कि जिन मतों को या जिस दृष्टि को तुम स्वीकार करना चाहते हो वे हितकर हैं वा नहीं, निन्दनीय हैं वा नहीं, कष्ट प्रद तथा हानिप्रद हैं वा नहीं?
३८. केवल एक इसी आधार पर कोई किसी दूसरे की दी हुई शिक्षा को स्वीकार या अस्वीकार कर सकता हैं ।