भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
७. धर्म की पुस्तकों का वाचन मात्र अ-धम्म है
१. ब्राह्मणों ने सारा जोर (अपने लिये) 'विद्या' पर दिया है। उन्होंने शिक्षा दी है कि 'विद्या' ही 'अथ' और 'विद्या' ही 'इति' है । इससे आगे और कुछ नही ।
२. इसके विरुद्ध भगवान् बुद्ध सभी के लिये 'विद्या' के पक्षपाती थे । इसके अतिरिक्त उन्हें इस बात की भी बड़ी चिन्ता थी कि 'विद्या' प्राप्त करके आदमी उसका क्या उपयोग करता है? उनकी 'विद्या'; 'विद्या' के लिये न थी, उनकी विद्या उपयोग के लिये थी
३. इसलिये वे इस बात पर खास जोर देते ही थे कि जो विद्वान् हो उसे शीलवान् भी होना ही चाहिये । बिना 'शील' की 'विद्या' अत्यन्त खतरनाक थी ।

४. भिक्षु पटिसेन को जो कुछ भगवान् बुद्ध ने कहा था उससे 'विद्या' के विरुद्ध 'शील' का महत्व स्पष्ट होता हैं ।
५. पुराने समय में जब भगवान् बुद्ध श्रावस्ती में बिहार कर रहे थे, उस समय पटिसेन नाम का एक वृद्ध भिक्षु था, जो इतना अधिक कूढ-मगज था कि एक गाथा भी याद न कर सकता था ।
६. बुद्ध ने दिन प्रति दिन पांच सौ अर्हतों को उसे शिक्षा देने के लिये कहा । लेकिन तीन वर्ष के बाद भी उसे एक भी गाथा याद न थी ।
७. तब उस जनपद के चारों प्रकार के लोग - भिक्षु, भिक्षुणियाँ, उपासक, उपासिकाएँ- उसकी हंसी उड़ाने लगे । भगवान् बुद्ध को उस पर दया आई । उन्होंने उसे पास बुलाया और बड़ी कोमलता के साथ यह गाथा कही-
कायेन संवरो साधु, साधु वाचाय संव
मनसा संवरो साधु, साधु सब्बत्व संवरो
सम्बत्थ संवुतों भिक्खु सब्ब दुक्खा पि
(अर्थ -- जिसका मुंह संयत है, जिसके विचार संयत है, और जो अपने शरीर से भी विरुद्धाचरण नहीं करता, वह निर्वाण प्राप्त करता है ।)
८. तथागत की करूणा से जैसे पटिसेन के हृदय की कली खिल गई । वृद्ध भिक्षु पटिसेन ने भी वह गाथा दोहराई ।
९. तब भगवान बुद्ध ने उससे कहा :- "हे वृद्ध ! अब तुम केवल एक गाथा कह सकते हो, और लोग इसे जानते हैं । इसलिये अभी भी लोग तुम्हारा मजाक उड़ायेगे । मैं अब तुम्हे इस गाथा का अर्थ भी समझाता हू । तुम ध्यान पूर्वक सुनो।”
१०. तब भगवान बुद्ध ने शरीर के तीन अकुशल कर्म, वाणी के चार अकुशल कर्म और मन के तीन अकुशल कर्म - दस अकुशल - कर्म समझाये । इन दस अकुशल कर्मों के त्याग से आदमी निर्वाण प्राप्त कर सकता है । इस प्रकार समझाये जाने पर भिक्षु पटिसेन को सत्य का बोध हो गया और वह अर्हत्व - पद का लाभी हुआ ।
११. इस समय विहार में पाँच सौ भिक्षुणियाँ रह रही थी । उन्होंने अपने में से एक को बुद्ध के पास भेजा कि वे किसी भिक्षु को उन्हें धम्मोपदेश देने के लिये भेज दें ।
१२. उनकी प्रार्थना सुनकर भगवान् बुद्ध ने वृद्ध पटिसेन को ही उन्हे धम्मोपदेश देने के लिये भेजना चाहा ।
१३. जब उन भिक्षुणियों को यह पता लगा तो वे आपस में बहुत हंसी । उन्होने तय किया कि दूसरे दिन वृद्ध पटिसेन के आने पर वे गाथा का उल्ला उच्चारण कर उसे गड़बड़ा देंगी, और शर्मिंदा करेंगी।
१४. दूसरे दिन जब बुद्ध पटिसेन आया, छोटी बडी सभी भिखुणियों ने उसका स्वागत किया और तब उसे अभिवादन करते समय वे आपस में हंसने लगी ।
१५. तब बैठने पर उन्होंने वृद्ध पटिसेन को भोजन कराया । जब भोजन हो चुका और उसने हाथ धो लिये तब उन्होंने उसे अपना प्रवचन आरम्भ करने के लिये कहा । उनके प्रार्थना करने पर वृद्ध पटिसेन ने, धम्मासन ग्रहण किया और अपना प्रवचन आरम्भ किया:-
१६. “बहनो ! मेरी बुद्धि अधिक नहीं है । मेरा ज्ञान और कम हैं। मैं केवल एक गाथा जानता हूँ । मैं वह पढूंगा और उसका अर्थ भी समझाऊगा । तुम ध्यान से सुनकर उसके अर्थ को धारण करो ।”
१७. तब सभी भिक्षुणियों ने उल्टे क्रम से उस गाथा को कहने का प्रयास किया । लेकिन यह क्या ! उनका मुंह ही नहीं खुल सका । वे लज्जा से मर गई । उन्होंने अपने सिर नीचे लटका लिये ।
१८. तब भगवान् बुद्ध से प्राप्त शिक्षण के अनुसार वृद्ध पटिसेन ने उस गाथा को दोहरा कर उसकी व्याख्या करनी शुरू की ।
१९. उसका प्रवचन सब भिक्षुणियों को आश्चर्य हुआ । उस उपदेश को सुनकर वे बहुत प्रसन्न हुई । उन्होंने उसे सिर-माथे स्वीकार किया । वे अर्हत हो गयी ।
२०. इसके अगले दिन राजा प्रसेनजित ने बुद्धप्रमुख भिक्षु संघ को अपने यहां भोजन के लिये निमंत्रित किया ।
२१. बुद्ध ने पटिसेन की विशेष उन्नत स्थिति पहचान, उसे अपना भिक्षा पात्र लेकर साथ चलने के लिये कहा ।
२२. लेकिन जब वे राज-महल के द्वार पर पहुँचे, तो उस द्वारपाल ने जो उससे पूर्व-परिचित था, वृद्ध पटिसेन को अन्दर नहीं जाने दिया । बोला- “जो भिक्षु केवल एक गाथा जानता है, हमें उसका आतिथ्य नहीं करना है । तुम्हारे जैसे सामान्यों के लिये स्थान नहीं है । अपने से श्रेष्ठतर लोगों को रास्ता दो और स्वयं चल दो ।"
२३. तदनुसार पटिसेन दरवाजे के बाहर ही बैठ गये ।
२४. अब बुद्ध आसन पर विराजमान हुए । उन्होंने हाथ धोया । लेकिन यह क्या ! भिक्षा पात्र लिये हुए पटिसेन का हाथ वहाँ उपस्थित था ।
२५. राजा, मन्त्रियों तथा अन्य उपस्थित जनों ने जब यह देखा तो उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ । वे बोले- “ओह ! यह कौन है ?"
२६. तथागत ने उत्तर दिया- "यह भिक्षु पटिसेन है । इसने अभी बोधि प्राप्त की है । मैंने इसे अपना भिक्षापात्र लेकर पीछे पीछे आने के लिये कहा था, किन्तु द्वारपाल ने उसे नहीं आने दिया ।"
२७. तब पटिसेन को भी प्रवेश मिला और वह भी संघ में आ सम्मिलित हुआ ।
२८. तब राजा प्रसेनजित ने बुद्ध से पूछा: “मैं सुनता हूँ कि इस पटिसेन की योग्यता नहीं । यह केवल एक ही गाथा जानता है । तो उसे बोधि कैसे प्राप्त कैसे प्राप्त हो गयी?"
२९. तथागत ने उत्तर दिया- "ज्ञान अधिक न भी हो, शील मुख्य वस्तु हैं ।"
३०. "इस पटिसेन ने इस एक गाथा के मर्म को अच्छी तरह हड़यंगम कर लिया है। इसका शरीर, वाणी और विचार रूप से शान्त हो गये हैं । यदि किसी आदमी के पास ज्ञान अधिक भी हो, किन्तु यदि उसका आचरण तदनुसार नहीं है, तो फिर यह सारा ज्ञान उस आदमी को विनाशोन्मुख होने से नही बचा सकता ।"
३१. इसके बाद तथागत ने कहा-
३२. "चाहे कोई आदमी एक हजार गाथाओं का वाचन करें, लेकिन यदि वह उन गाथाओं के अर्थ से अपरिचित है, तो उसका वह वाचन किसी भी एक गाथा के वाचन के समान नहीं जिसे सुनकर चित्त शान्ति को प्राप्त हो । बिना समझे हजारों शब्दों के उच्चारण का क्या प्रयोजन? लेकिन एक शब्द का सुनना, समझना और तदनुसार आचरण करना मोक्ष-लाभ का कारण हो सकता है" ।
३३. “एक आदमी अनेक ग्रन्थों का वाचन कर सकता हैं, लेकिन यदि वह उन्हें समझता नहीं तो उसका वाचन निष्प्रयोजन है । धम्म के एक ही पद को जानना और तदनुसार चलना मोक्ष का मार्ग है।"
३४. इन शब्दो को सुनकर उपस्थित दो सौ भिक्षु, राजा तथा उसके मन्त्रीगण सभी प्रमूदित हुए ।