भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
५. यज्ञ (बलि-कर्म) मे विश्वास अ-धम्म है।
(i)
१. ब्राह्मणी धर्म यज्ञों पर निर्भर करता था ।
२. कुछ यज्ञ 'नित्य' कहलाते थे और कुछ यज्ञ 'नैमित्तिक' कहलाते थे ।

३. 'नित्य' यज्ञ का मतलब था वे अनिवार्य कर्तव्य जो चाहे कोई फल मिले और चाहे न मिले करणीय ही थे ।
४. 'नैमित्तिक' यज्ञ उस समय किये जाते जब यजमान किसी सांसारिक इच्छा- - विशेष की पूर्ति के लिये, उसके निमित्त से, वह 'यज्ञ' कराता था ।
५. ब्राह्मणी-यज्ञों में सुरा-पान, पशुओं की बलि और हर तरह का आमोद प्रमोद रहता था ।
६. तब भी ये यज्ञ 'धार्मिक कृत्य समझे जाते थे ।
७. ऐसे धर्म को जिसका आधार 'यज्ञ' थे - बुद्ध ने अपनाने योग्य नहीं समझा ।
८. उन बहुत से ब्राह्मणों को जो भगवान् बुद्ध से विवाद करने पहुंचे, तथागत ने अपने कारण बता दिये थे कि वे क्यों 'यज्ञों' को 'धम्म' का अंग मानने के लिये तैयार न थे ।
९. लिखा मिलता है कि इस विषय में तीन ब्राह्मणों ने तथागत से वाद-विवाद किया था ।
१०. उनके नाम थे, कूटदन्त, उज्जय और उदायी ।

११. कूटदन्त ब्राह्मण ने भगवान् बुद्ध से पूछा था कि यज्ञ के बारे में उनका क्या मत था ?
१२. तथागत बोले -- “अच्छा तो, हे ब्राह्मण सुन, ध्यान दे और जो कुछ मैं कह रहा हूँ उसे सावधान रहकर सुन।”
१३. “बहुत अच्छा”, कूटदन्त बोला । तब भगवान बुद्ध ने कहा -
१४. “हे ब्राह्मण ! बहुत पुराने समय में महा-विजेता नाम का एक राजा था, बडा प्रतापी, बहुत धन वाला तथा बहुत सम्पत्ति वाला । उसके पास सोने चांदी के भण्डार थे, सुख- -भोग के सब सामान थे, धन-धान्य की कमी न थी । उसके खजाने धन से और उसके कोठे अनाज से भरे थे ।”
१५. “अब, एक बार, जब राजा महाविजेता अकेला विचार-मग्न बैठा था, उसके मन में बड़े जारे से यह विचार पैदा हुआ । के सुख भोग के सामानों की मेरे पास कमी नहीं । मैं पृथ्वी का चक्रवर्ती राजा हूँ । यह अच्छा होगा, यदि मैं एक महान् यज्ञ करूँ जो दार्घकाल तक मेरे कल्याण के लिये हो ।"
१६. “तब उस ब्राह्मण ने, जो राजा का पुरोहित था, राजा से कहा- "राजन! इस समय आपकी प्रजा हैरान की जा रही है और लूटी जा रही है । बहुत से डाकू है जो गाँव और नगरों में लूट-मार करते है और जिन्होंने रास्ते अरक्षित कर दिये हैं । जब तक ऐसी अवस्था है, तब तक यदि, महाराज ने प्रजा पर एक नया टैक्स और लगाया तो महाराज निश्चय से गलती करेंगे ।"
१७. “लेकिन हो सकता है कि महाराज यह सोचें कि मैं शीघ्र ही उन दुष्टों की सब कारवाइयाँ रोक दूंगा - उनको पकड़वा लूंगा, उन पर जुर्माने करूंगा, उनको देश निकाला दे दूंगा तथा उनको मरवा डालूंगा । लेकिन इस तरह से उनकी स्वेच्छाचारिता नहीं रोक जा सकती । जो अदण्डित बच रहेंगे, वे प्रजा को हैरान करते रहेंगे ।”
१८. “इस गड़बड़ी को जडमूल से समाप्त करने का एक रास्ता है । आपके राज्य में जितने भी ऐसे हो जो पशु पालते हो या खेती करते हो, उन्हें महाराज ! आप खाने को दें और खेतों में बीज बोने के लिये बीज दें। आपके राज्य में जितने भी ऐसे हो जो व्यापार में लगे हों, उन्हें महाराज ! आप व्यापार करने के लिये पुंजी दें। आपके राज्य मे जितने भी ऐसे हों जो सरकारी कर्मचारी हों, महाराज ! आप भोजन और वेतन दें।"
१९. “तब जब सब कोई अपने अपने काम में लगे रहेंगे तो वे देश में उत्पात नहीं मचायेंगे, राजा को राज्यकर से अधिक आय होने लगेगी, देश सुख और शान्ति का अनुभव करेगा; और जनता खुश-हाल हो जायेगी । लोग अपने बच्चों को गोद में लेकर नाचेंगे और निर्भय होकर खुले दरवाजे सोयेंगे ।”
२०. “तब हे ब्राह्मण! राजा महाविजेता ने अपने पुरोहित की बात मान वैसा ही किया । लोग अपने अपने काम में लग गये । उन्होंने देश में उत्पात मचाना छोड़ दिया । राजा को राज्य कर से अधिक आय होने लगी । देश सुख और शान्ति का अनुभव करने लगा । जनता खुश-हाल हो गई । लोग अपने अपने बच्चों को गोद में लेकर नाचने लगे और निर्भय होकर खुले दरवाजे सोने लगे ।” २१. “जब उत्पात शान्त हो गया, तो राजा महाविजेता ने फिर अपने पुरोहित से कहा -- “अब उत्पात शान्त है । देश खुशहाल है । मै अपने दीर्घकालीन कल्याण के लिये वह महान् यज्ञ करना चाहता हूँ-- आप बतायें कि कैसे करू?"
२२. पुरोहित ने राजा को उत्तर देते हुए कहा--"राजन! अब यज्ञ होने दें । राजन्! अब आप राजधानी में और राजधानी के बाहर समस्त देश में ऐसे जितने भी क्षत्रिय हों जो आपके मालगुजार हों उन्हें निमंत्रण दें, जो मन्त्री हों, राज्याधिकारी हो या प्रतिष्ठित ब्राह्मण हों, या जो सम्पन्न गृहपति हों -- उन सब को निमंत्रण भेजे और कहे कि मैं अपने दीर्घकालीन कल्याण के लिये महान् यज्ञ करना चाहता हूँ । आप उसकी स्वीकृति दे दें ।”
२३. “तब हे ब्राह्मण कूटदन्त ! जैसा पुरोहित ने कहा था, वैसा ही राजा ने किया । उन क्षत्रियों, मन्त्रियों, ब्राह्मणों तथा गृहपतियो ने भी वैसा ही उत्तर दिया--“राजन्! आप महान् यज्ञ करें । राजन्! यह समय महान् यज्ञ करने के लिये अनुकूल है ।”
२४. “राजा महाविजेता बुद्धिमान था और अनेक बातों मे बहुत कुशल था । उसका पुरोहित भी वैसा ही बुद्धिमान था और बहु बातों में कुशल था ।"
२५. “हे ब्राह्मण! तब उस पुरोहित ने यज्ञ के आरम्भ होने से पहले राजा को बता दिया कि उसमें कितना धन व्यय हो सकता है?”
२६. पुरोहित ने कहा--“महाराज ! कहीं ऐसा न हो कि यज्ञ आरम्भ करने से पूर्व या यज्ञ करते समय अथवा यज्ञ हो चुकने के अनन्तर आपके मन में यह विचार उत्पन्न हो कि “अरे! इस यज्ञ में तो मेरी सम्पत्ति का बड़ा हिस्सा लग गया, तो ऐसा विचार मन नही आना चाहियें ।”
२७. “और हे ब्राह्मण! उस पुरोहित ने यज्ञ आरम्भ होने से ही पहले, बाद में राजा के मन में यज्ञ में भाग लेने वालो को लेकर कोई पश्चाताप न हों, इसलिये राजा को कहा--"राजन् । आपके यज्ञ में हर तरह के लोग आयेंगे -- ऐसे भी जो जीव-हत्या करते हैं, ऐसे भी जो जीव हत्या नहीं करते। ऐसे भी जो चोरी करते हैं, एसे भी जो चोरी नहीं करते। एसे भी जो काम - भोग सम्बन्धी मिथ्याचार करते है, और एसे भी जो नहीं करते। ऐसे भी जो झूठ बोलते हैं ऐसे भी जो झूठ नहीं बोलते। ऐसे भी जो झूठी चुगली खाते हैं, ऐसे भी जो झूठी चुगली नहीं खाते। ऐसे भी जो कठोर बोलते हैं, ऐसे भी जो कठोर नहीं बोलते। ऐसे भी जो व्यर्थ बकवाद करते हैं, ऐसे भी जो व्यर्थ बकवाद नहीं करते, ऐसे भी जो लोभ करते हैं, ऐसे भी जो लोभ नहीं करते । ऐसे भी जो द्वेष करते हैं, ऐसे भी जो द्वेष नहीं करते । ऐसे भी जिनकी सम्यक दृष्टि होगी ऐसे भी जिनकी मिथ्या दृष्टि होगी । इन्हे जो बुरे हों, उन्हें अपनी बुराई के साथ पृथक रहने दें । और राजन्! जो भले हों, उनके लिये आप यथायोग्य करें, उन्हें सन्तुष्ट करें, इससे आपके चित्त को आन्तरिक शान्ति प्राप्त होगी ।"
२८. “और हे ब्राह्मण! महाविजेता द्वारा कराये गये इस यज्ञ में वृषभ हत्या नहीं हुई थी, बकरियों के गले नहीं कटे थे, मुर्गे-मुर्गीया नही मारी गयी थी न मोटे सुअर और न अन्य किसी भी तरह के प्राणियों की बलि चढ़ाई गई थी । यूप (वध- स्तंभ) बनाने के लिये कोई पेड नही काटे गये थे, और यज्ञ स्थल पर बिखेरने के लिये दूब घास नहीं काटी गई थी । और वहाँ जो दास, जो इधर-उधर आने-जाने वाले तथा जो अन्य कर्मी काम कर रहे थे, वे दण्ड या भय के कारण अश्रु-मुख होकर काम नहीं कर रहे थे । जिसकी सहायता करने की इच्छा होती थी, काम करता था, जिसकी इच्छा नही होती थी, नहीं करता था । जो किसी ने करना चाहा, वह किया; जो नहीं करना चाहा वह बिना किये छोड़ दिया गया । उस यज्ञ में घी, तेल, मक्खन, दूध, मधु और शक्कर के अतिरिक्त और कुछ नही काम में आया।”
२९. “यदि आप कोई यज्ञ करना ही चाहते हैं, तो आपका 'यज्ञ' वैसा ही होना चाहिये जैसा महाराज महाविजेता का । अन्यथा यज्ञ व्यर्थ है । पशुओ की बलि निर्दयता मात्र है । 'यज्ञ' कभी धर्म का अंग हो ही नही सकते । यह 'धर्म' का निकृष्ट तम रूप है जो ह है कि पशुओं की बलि देने से आदमी स्वर्ग जा सकते हैं ।”
३०. तब कूटदन्त ब्राह्मण ने प्रश्न किया "हे गौतम! तो क्या कोई दूसरा 'यज्ञ' है जिसमें पशुओं की बलि तो न देनी पड़े किन्तु जिसके करने में अधिक फल मिले अधिक कल्याण हो ।”
३१. "हे ब्राह्मण! हाँ, ऐसा है ।"
३२. " हे गौतम! ऐसा 'यज्ञ' कैसे क्या होगा ?"
३३. “हे ब्राह्मण! जब एक आदमी श्रद्धायुक्त होकर (१) जीव हत्या से विरत रहने का संकल्प करता है, (२) चोरी से विरत रहने का संकल्प करता है, (३) काम - भोग सम्बन्धी मिथ्याचार से विरत रहने का संकल्प करता है, (४) झूठ से विरत रहने का संकल्प करता है, तथा (५) सुरा-मेरय - मद्य आदि नशीली चीजों के सेवन से विरत रहने का संकल्प करता है तो यह एक ऐसा यज्ञ है जो यज्ञों के निमित्त बड़े खर्चे करने से अच्छा है, जो भिक्षुओं के ठहरने के निमित्त विहरादि बनवाने से भी अच्छा है, जो निरन्तर भिक्षा देते रहने से भी अच्छा है, जो (त्रि) शरण ग्रहण करने से भी अच्छा है ।”
३४. जब भवगान् बुद्ध ने यह कहा तो कूटदन्त ब्राह्मण को भी कहना पड़ा- “श्रमण गौतम! आप का कथन सर्व- श्रेष्ठ हैं । श्रमण गौतम! आपका कथन सर्वश्रेष्ठ है ।"
(ii)
१. अब ब्राम्हण उज्जय ने तथागत से पूछा--
२. “श्रमण गौतम! क्या आप यज्ञों के प्रशंसक हैं?"
३. “ब्राह्मण! न मैं हर ‘यज्ञ की प्रशंसा करता हूँ, न मै हर 'यज्ञ' को सदोष कहता हूँ । हे ब्राह्मण! जिस किसी यज्ञ में भी गो-हत्या हो, बकरियाँ और भेडें मारी जायें, मुर्गे- मुर्गियाँ और सूअर मारे जायें और भी दूसरे नाना तरह के प्राणियों की हत्या हो इस प्रकार का 'यज्ञ' जिसमें पशु बलि दी जाती हो, हे ब्राह्मण ! मेरी प्रशंसा का पात्र नहीं ।" “ऐसा क्यों?"
४. “हे ब्राम्हण! इस प्रकार के 'यज्ञ' के जिसमें पशुओं की हत्या होती हैं - न तो श्रेष्ठजन पास फटकते है और न श्रेष्ठ मार्ग पर चलने वाले ही पास फटकते हैं ।"
५. “लेकिन हे ब्राह्मण! जिस यज्ञ में गो-हत्या नहीं होती- पशुओं की हत्या नहीं होती- ऐसा यज्ञ जिसमें पशुओं की बलि नहीं दी जाती- ऐसा यज्ञ मेरी प्रशंसा का पात्र है । उदाहरण के लिये चिर स्थापित दान या परिवार के सदस्यों के कल्याण के लिये त्याग ।” "ऐसा क्यों?"
६. “क्योकि ब्राह्मण! जिस यज्ञ में पशुओं की बलि नहीं दी जाती, ऐसे यज्ञ के श्रेष्ठजन भी पास जाते हैं और वे भी जो श्रेष्ठमार्ग पर आरूढ़ हैं।"
(iii)
१. उदायी ब्राह्मण ने भी तथागत से वही प्रश्न पूछा जो उज्जय ब्राह्मण ने पूछा-
२. “श्रमण गौतम! क्या आप 'यज्ञ' की प्रशंसा करते हैं?” तथागत ने जो उत्तर उज्जय को दिया था, वही उदायी ब्राह्मण को दिया --
३. तथागत बोले -- “ऐसे यज्ञ के जो उचित समय पर किया जाए, ऐसे यज्ञ के जिसमें पशुओं की बलि न दी जाये, वे निकट जाते हैं, जो श्रेष्ठ-जीवी हैं, जिनकी आँख पर से पर्दा हट गया हैं। जो कालातीत हैं, जो जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हैं, वे तथा वैसे ही दूसरे प्राणज्ञ तथा कुशलज्ञ यज्ञ की प्रशंसा करते हैं ।" "यज्ञ अथवा श्रद्धायुक्त-कर्म में श्रद्धायुक्त चित्त से, पुष्प - क्षेत्र में, जो बीज बोया जाता है; अथवा जो श्रेष्ठ-जीवी हैं, उन्हें जो दान दिया जाता हैं, उससे देवता भी प्रसन्न होते हैं, इस प्रकार के दान से विज्ञजन विद्या का लाभ करते हैं, तथा दुःख से मुक्त हो, सुखी अवस्था को प्राप्त होते हैं ।”