भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
४. आत्मा में विश्वास अ-धम्म है
१. भगवान बुद्ध ने कहा कि जिस धर्म का सारा दारोमदार 'आत्मा' पर है वह कल्पनाश्रित धर्म हैं ।
२. आज तक किसी ने भी न तो 'आत्मा' को देखा है और न उससे बातचीत की हैं।
३. आत्मा अज्ञात है, अदृश्य हैं ।

४. जो चीज वास्तव में है वह 'मन या चित्त' है, 'आत्मा' नहीं । मन 'आत्मा' से भिन्न है ।
५. तथागत ने कहा- ‘आत्मा में विश्वास करना अनुपयोगी है ।
६. इसलिये जो धर्म 'आत्मा' पर आश्रित है, वह अपनाने योग्य नहीं हैं ।
७. ऐसा धर्म केवल मिथ्या विश्वास का जनक हैं ।
८. बुद्ध ने इस बात को यों ही नहीं छोड़ दिया है । तथागत ने इसकी अच्छी तरह चर्चा की है ।
९. 'आत्मा' में विश्वास भी वैसी ही सामान्य बात है जैसी 'परमात्मा' में विश्वास हैं ।
१०. 'आत्मा' में विश्वास रखना भी 'ब्राह्मणी' धर्म का एक अंग था ।
११. 'ब्राह्मणी' धर्म में 'रूह' को 'आत्मा' या 'आत्मन्' कहते हैं ।
१२. ब्राह्मणी धर्म में ‘आत्मा' उस तत्व - विशेष को कहा गया है जो शरीर से पृथक, किन्तु शरीर के ही भीतर, जन्म के समय से लेकर लगातार बना रहता है।
१३. 'आत्मा' के विश्वास के साथ तत्सम्बन्धी दूसरे विश्वास भी जुडे हुए हैं।
१४. शरीर के साथ 'आत्मा' का मरण नहीं होता । यह दूसरे जन्म के समय दूसरे शरीर के साथ जन्म ग्रहण करती है ।
१५. शरीर 'आत्मा' का एक और अतिरिक्त परिधान है।
१६. क्या भगवान बुद्ध ‘आत्मा' में विश्वास रखते थे? नहीं, एकदम नहीं । 'आत्मा' के सम्बन्ध में उनका मत 'अनात्म-वाद' कहलाता हैं ।
१७. यदि एक अशरीरी 'आत्मा' को स्वीकार कर लिया जाय तो उसके सम्बन्ध में बहुत से प्रश्न पैदा होते है । 'आत्मा' क्या है? ‘आत्मा' का आगमन कहां से हुआ? शरीर के मरने पर इसका क्या होता है? यह कहां जाता है ? शरीर के न रहने पर यह 'परलोक' में कैसे रहता है? वहां यह कब तक रहता है ? जो लोग 'आत्मा' के अस्तित्व के सिद्धान्त के समर्थक थे, भगवान् बुद्ध ने उनसे ऐसे प्रश्नों का उत्तर चाहा था ।
१८. पहले तो उन्होंने अपने जिरह करने के सामान्य क्रम से यह दिखाना चाहा कि 'आत्मा' का विचार कितना गोल-मटोल है । १९. जो 'आत्मा' के अस्तित्व में विश्वास रखते थे, उनसे भगवान् बुद्ध ने जानना चाहा कि 'आत्मा' का आकार कितना बड़ा या छोटा है ? 'आत्मा' की शक्ल कैसी हैं ?
२०. आनन्द स्थविर को उन्होंने कहा था-- “आनन्द ! आत्मा के सम्बन्ध में लोगों के अनगिनत मत है । कोई कहते हैं-- “मेरा 'आत्मा' रूपी है और बड़ा ही सूक्ष्म है।” कुछ दूसरों का कहना है कि आत्मा की शक्ल है, यह अनन्त है और यह सूक्ष्म है । कुछ दूसरे हैं जिनका कहना है कि यह निराकार है और अनन्त हैं ।
२१. “आनन्द ! ‘आत्मा’' के बारे में नाना तरह के मत हैं ।”
२२. "जो लोग 'आत्मा' के अस्तित्व में विश्वास करते हैं, उनकी आत्मा की कल्पना क्या है?" यह भी भगवान् बुद्ध का एक प्रश्न था । कोई कहते हैं- “हमारी आत्मा (सूख-दुःख) अनुभव- क्रिया है ।" दूसरे कहते हैं "नही आत्मा अनुभव क्रिया नहीं, आत्मा अनुभव - क्रिया है ।" या फिर कोई कोई कहते हैं, "मेरी आत्मा अनुभव क्रिया नहीं है, न यह अनुभव क्रिया है, बल्कि मेरी आत्मा अनुभव करता है, मेरी आत्मा का गुण है अनुभव करना ।” आत्मा के बारे में इस तरह की नाना कल्पनाएँ हैं ।
२३. जो लोग ‘आत्मा' में विश्वास रखते थे, उनसे भगवान् बुद्ध ने यह भी पूछा है कि मरणान्तर 'आत्मा' की क्या हालत होती है? २४. तथागत ने यह भी प्रश्न पूछा है कि क्या मरने के बाद 'आत्मा' देखी जा सकती है ?
२५. उन्हें अनगिनत गोल-मटोल जवाब मिले ।
२६. क्या शरीर का नाश हो जाने पर 'आत्मा' अपने आकार-प्रकार को बनाये रखती हैं? उन्होंने देखा कि इस एक प्रश्न के आठ काल्पनिक उत्तर थे ।
२७ . क्या 'आत्मा' शरीर के साथ मर जाती है? इस पर भी अनगिनत कल्पनाएँ थीं ।
२८. तथागत ने यह भी पूछा है कि शरीर के मरने के बाद 'आत्मा' सुखी रहता है वा दुःखी रहता है? क्या 'आत्मा' शरीर की मृत्यु के बाद सुखी रहता है? इस विषय में भी श्रमणों और ब्राह्मणो के भिन्न-भिन्न मत थे । कुछ का कहना था कि यह एकदम दुःखी है । कुछ का कहना था सुखी रहता है। कुछ का कहना था कि यह सुखी भी रहता है, दुःखी भी रहता है। कुछ का कहना था किन यह सुखी रहता है और न दुःखी रहता हैं ।
२९. ‘आत्मा' के सम्बन्ध में इन सब मतों के बारे में तथागत का वही एक उत्तर था, जो उन्होंने चुन्द को दिया ।
३०. चुन्द को उन्होंने कहा था: "हे चुन्द ! जो श्रमण या ब्राह्मण इन मतो में से कोई भी मत रखते है, मैं उनके पास जाता हूँ और उनसे पूछता हूँ, 'मित्र ! क्या आपका यह कहना ठीक है?' और यदि वे उत्तर देते हैं, 'हाँ ! मेरा मत ही ठीक है, शेष सब बेहूदा है', तो मै उनके इस मत को नहीं मानता । ऐसा क्यों ? क्योकि इस विषय में लोगों के नाना मत हैं। मैं इनमें से किसी भी एक मत को अपने मत से श्रेष्ठ मानने की तो बात ही नहीं, अपने मत के समान स्तर पर ही नहीं मानता ।”
३१. अब महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि 'आत्मा' के अस्तित्व के सिद्धान्त के विरूद्ध भगवान बुद्ध ने कौन कौन से तर्क दिये हैं?
३२. भगवान बुद्ध ने 'आत्मा' के विरुद्ध भी सामान्य रुप से वे ही तर्क दिये है जो उन्होंने 'परमात्मा' के विरुद्ध दिये हैं ।
३३. उनका एक तर्क तो यही था कि 'आत्मा' की चर्चा उतनी ही बेकार वा अनुपयोगी है, जितनी 'परमात्मा' की चर्चा ।
३४. उनका तर्क था कि 'आत्मा' के अस्तित्व में विश्वास सम्यक दृष्टि के विकास में उतना ही बाधक है, जितना 'परमात्मा' का विश्वास ।
३५. उनका तर्क था कि 'आत्मा' में विश्वास भी उतना ही मिथ्या विश्वास का घर है जितना 'परमात्मा' में विश्वास । उनकी सम्मति में 'आत्मा' में विश्वास करना 'परमात्मा' में विश्वास करने की अपेक्षा भी अधिक खतरनाक था । क्योंकि इससे इतना ही नहीं होता कि पुरोहितो का वर्ग पैदा हो जाता है, इससे इतना ही नहीं होता कि मिथ्या विश्वासों के जन्म का रास्ता खुल जाता है बल्कि 'आत्मा' के विश्वास के फलस्वरूप आदमी के जन्म से मरण-पर्यन्त उसके समस्त जीवन पर पुरोहित-शाही का अधिकार हो जाता हैं ।
३६. इन्ही सामान्य तर्को के कारण कहा जाता है कि भगवान बुद्ध ने 'आत्मा' के बारे में अपना कोई निश्चित मत अभिव्यक्त नहीं किया । कुछ दूसरे लोगों का कहना है कि उन्होंने 'आत्मा' के सिद्धान्त का खण्डन नही किया । कुछ औरों ने कहा है कि भगवान् बुद्ध हमेशा इस प्रश्न को बचा जाते थे ।
३७. ये सभी मत एकदम गलत है । क्योंकि महाली को भगवान् बुद्ध ने स्पष्ट रूप से निश्चित शब्दों में यह कहा था कि 'आत्मा' नाम का कोई पदार्थ नहीं है । इसीलिये 'आत्मा' के सम्बन्ध में तथागत का मत 'अनात्मवाद' कहलाता है ।
३८. ‘आत्मा' के विरुद्ध सामान्य तर्क के अतिरिक्त भगवान् बुद्ध ने विशेष तर्क भी दिया है जो कि उनके अनुसार 'आत्मा' के सिद्धान्त के लिए एकदम मारक तर्क ही था ।
३९. ‘आत्मा' के अस्तित्व की स्थापना के मुकाबले में भगवान् बुद्ध का अपना सिद्धान्त या नाम-रूप का सिद्धान्त ।
४०. यह नाम-रूप का सिद्धान्त 'विभज्ज-वाद' द्वारा परीक्षण का परिणाम है, मानव-व्यक्तित्व अथवा मानव के बड़े ही सूक्ष्म कठोर विश्लेषण का परिणाम है।
४१. 'नाम-रूप' एक प्राणी का सामूहीक नाम हैं ।
४२. भगवान् बुद्ध के अनुसार हर प्राणी कुछ भौतिक तत्वों तथा कुछ मानसिक तत्वों के सम्मिश्रण का परिणाम है । वे भौतिक तथा मानसिक तत्व 'स्कन्ध' कहलाते हैं ।
४३. रूप-स्कन्ध प्रधान रूप से पृथ्वी, जल, वायु तथा अग्नि - इन चार भौतिक तत्वों का परिणाम हैं । वे 'रूप' अथवा शरीर हैं ।
४४. रूप-स्कन्ध के अतिरिक्त (चित्त - चैतसिकों का समूह) नाम-स्कन्ध है, जिससे एक प्राणी की रचना होती है ।
४५. इस नाम-स्कन्ध को हम विज्ञान (चेतना) भी कह सकते हैं । यू इस नाम-स्कन्ध के अन्तर्गत वेदना (छः इन्द्रियों तथा उनके विषयों के सम्पर्क से उत्पन्न होने वाली अनुभूति), सञ्जा (संज्ञा) तथा संखार (संस्कार) हैं। विज्ञान भी इन तीनों के साथ शामिल किया जाता हैं । (इस प्रकार पूर्व के तीन चैतसिक और विज्ञान (चित्त) को मिलाकर नाम-स्कन्ध होता है -- अनु.) एक आधुनिक मानस-शास्त्र-वेत्ता कदाचित् इसे इस रूप में कहना पसन्द करेगा कि चित्त ही वह मूल स्त्रोत है, जिससे सभी चैतसिक उत्पन्न होते है (अथवा चैतसिको के समुह विशेष का नाम हो चित्त हो जाता है - अनु.) । विज्ञान (चित्त) किसी भी प्राणी का केन्द्र-बिन्दु हैं ।
४६.पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु-- इन चार तत्वों के सम्मिश्रण से 'विज्ञान' उत्पन्न होता हैं ।
४७. बुद्ध द्वारा प्रतिपादित 'विज्ञान' की उत्पत्ति के इस सिद्धान्त पर एक आपत्ति उठाई जाती हैं ।
४८. जो इस सिद्धान्त के विरोधी है, वे पूछते है “विज्ञान (चित्त) की उत्पत्ति कैसे होती है?”
४९. यह सत्य है कि आदमी के जन्म के साथ विज्ञान (चित्त) की उत्पत्ति होती है और आदमी के मरण साथ विज्ञान (-चित्त) का विनाश होता है । लेकिन साथ ही क्या यह कहा जा सकता है कि विज्ञान (चित्त) चार तत्वों के सम्मिश्रण का परिणाम है ?
५०. भगवान् बुद्ध ने इसे इस रूप में नहीं कहा कि भौतिक तत्वों की सहस्थिति अथवा उनके समिश्रण से विज्ञान (चित्त) की उत्पत्ति होती है । तथागत ने इसे इस रुप में कहा है कि जहाँ भी शरीर या रूप काया है, वहाँ साथ-साथ नामकाया भी रहता हैं ।
५१. आधुनिक विज्ञान से एक उपमा ले । जहाँ जहाँ विद्युत क्षेत्र (electric field) होता है, वहाँ वहाँ उसके साथ आकर्षण-क्षेत्र (magnetic field) रहता है । कोई नहीं जानता कि यह आकर्षक क्षेत्र किस प्रकार उत्पन्न होता है, या किस प्रकार अस्तित्व मे आता है? लेकिन जहाँ जहाँ विद्युत क्षेत्र होता है, वहाँ वहाँ यह उसके साथ अनिवार्य रूप में रहता है ।
५२. शरीर और विज्ञान (-चित्त) में भी हम कुछ कुछ इसी प्रकार का सम्बन्ध क्यों न मान ले?
५३. विद्युत क्षेत्र की अपेक्षा से उसका आकर्षण क्षेत्र विद्युत क्षेत्र द्वारा प्रेरित क्षेत्र (induced field) कहलाता है । तो फिर हम विज्ञान (चित्त) को भी रूप काय (शरीर) की दृष्टि से उसके द्वारा प्रेरित क्षेत्र क्यों न कहें?
५४. ‘आत्मा' के विरुद्ध तथागत का तर्क यहीं समाप्त नहीं होता। अभी विशेष महत्वपूर्ण व्यक्ततव्य शेष है ।
५५. जब विज्ञान (-चित्त-चेतना) का उदय होता है तभी आदमी जीवित प्राणी बनता है । इसलिये विज्ञान (- चित्त-चेतनता) आदमी के जीवन में प्रधान वस्तु है ।
५६. विज्ञान की प्रकृति है ज्ञान-मूलक, भावना--मूलक, और क्रिया-शील ।
५७. विज्ञान को हम ज्ञान-मूलक उस समय कहते है जब यह हमें कुछ जानकारी देता है, कुछ ज्ञान प्रदान करता है - वह ज्ञान रूचिकर भी हो सकता है और अरुचिकर भी हो सकता है, वह अपने भीतर घटनेवाली घटनाओं का भी हो सकता है, बाह्य- घटनाओं का भी हो सकता हैं।
५८. विज्ञान को हम भावना मूलक उस समय कहते है जब यह चित्त की उन अवस्थाओं में उपस्थित रहता है जो अनुकूल अनुभूतियाँ भी हो सकती है और प्रतिकूल - अनुभूतियाँ भी, जब भावना मुलक ज्ञान वेदना ( अनुभुति) की उत्पत्ति का कारण बनता हैं ।
५९. विज्ञान अपनी क्रीया-शील अवस्था में आदमी को उद्देश्य विशेष की सिद्धि के लिए कुछ करने की प्रेरणा देता है । क्रिया-शील विज्ञान ही संकल्पो का या इरादों का जनक हैं ।
६०. इस प्रकार यह स्पष्ट है कि एक प्राणी की जितनी भी क्रियायें है वे या तो विज्ञान के द्वारा अथवा विज्ञान के परिणाम स्वरूप पूरी होती हैं।
६१. इस विश्लेषण के बाद भगवान बुद्ध प्रश्न करते हैं कि वह कौनसा कार्य है जो 'आत्मा' के करने के लिये बचा रहता है? 'आत्मा' के जो कार्य माने जाते हैं, वे सब तो विज्ञान (चित्त) द्वारा हो जाते हैं ।
६२. जिसका कुछ 'कार्य' ही नहीं ऐसा 'आत्मा' एक बेहूदगी हैं ।
६३. इस प्रकार भगवान् बुद्ध ने 'आत्मा' का अस्तित्व असिद्ध किया है ।
६४. यही कारण है कि 'आत्मा' का अस्तित्व स्वीकार करना अ-धम्म है ।