भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
३. ब्रह्म- सायुज्य प्रर आधारित धर्म मिथ्या-धर्म है
१. जब बुद्ध अपने धम्म का प्रचार कर रहे थे, उस समय एक मत प्रचलित था, जिसे अब हम 'वेदान्त' कहते हैं ।
२. इस धर्म के सिद्धान्त थोडे से हैं और सरल हैं ।
३. इस विश्व की पृष्ठ-भूमि में एक सर्व-व्यापक जीवन-तत्व विद्यमान है, जिसे हम 'ब्रह्म' या ‘ब्रह्मन्' कहते हैं ।

४. यह 'ब्रह्म' एक वास्तविकता हैं ।
५. 'आत्मा' और 'ब्रह्म' में कोई अन्तर नहीं, दोनो एक ही हैं ।
६. 'जीवात्मा' और 'ब्रह्मात्मा' को जो वास्तव में एक हैं एक मान लेने से ही आदमी को 'मोक्ष' लाभ हो सकता हैं ।
७. 'जीवात्मा' और 'ब्रह्मात्मा' की एकता तभी स्थापित हो सकती है, जब इसका ज्ञान हो जाय कि दोनों एक है ।
८. और 'जीवात्मा' तथा 'ब्रह्मात्मा' की एकता का बोध प्राप्त करने के लिये संसार का त्याग आवश्यक हैं ।
९. यही सिद्धान्त वेदान्त' कहलाते हैं ।
१०. बुद्ध के मन में इस सिद्धान्त के लिये कोई आदर न था । उनको लगता था कि इसका आधार ही मिथ्या है, इसकी कुछ उपयोगिता नहीं है और इसीलिये यह अपनाने योग्य नहीं ।
११. इसे भगवान् बुद्ध ने वासेठ और भारद्वाज नामक दो ब्राह्मण तरूणों के साथ हुई बातचीत में स्पष्ट किया हैं ।
१२. भगवान् बुद्ध का कहना था कि किसी बात को भी सत्य स्वीकार करने के लिये उसका कोई न कोई प्रमाण होना चाहिये ।
१३. प्रमाण दो तरह के होते हैं, प्रत्यक्ष और अनुमान ।
१४. भगवान् बुद्ध का सीधा प्रश्न था, “क्या किसी को भी 'ब्रह्म' का प्रत्यक्ष हुआ है? क्या तुमने 'ब्रह्म' को देखा है ? क्या तुम 'ब्रह्म' से बातचीत की है? क्या तुमने 'ब्रह्म' को सूंघा है?”
१५. वासेठ का उत्तर था -- "नहीं।"
१६. ब्रह्म के अस्तित्व का दूसरा अनुमान प्रमाण भी असन्तोषजनक है
१७. भगवान् बुद्ध का प्रश्न था -- "हम किस चीज के होने से 'ब्रह्म' के होने का अनुमान लगाते है?” इसका भी कोई उत्तर न था ।
१८. कुछ लोगों का कहना है कि अदृश्य वस्तु का भी अस्तित्व हो सकता हैं । इसलिये वे कहते हैं कि अदृश्य होने पर भी 'ब्रह्म' का अस्तित्व है ।
१९. यह कथन तो एक दम नंगा - कथन है और एक असम्भव स्थापना लिये हुए हैं ।
२०. लेकिन तर्क के लिये यह मान लेते है कि अदृश्य होने पर भी किसी वस्तु का अस्तित्व हो सकता हैं ।
२१. लोग कहते हैं कि इसका सब से अच्छा उदाहरण बिजली हैं। यह अदृश्य है, लेकिन तब भी इसका अस्तित्व हैं ।
२२. यह तर्क पर्याप्त नहीं हैं ।
२३. किसी अदृश्य वस्तु को किसी दूसरे दृश्य रूप में अपने आपको प्रकट करना चाहिये। तभी हम उसकी वास्तविकता स्वीकार कर सकते हैं।
२४. लेकिन यदि कोई अदृश्य वस्तु किसी भी दूसरे दृश्य रुप में अपने को प्रकट नहीं करती तो हम उसकी वास्तविकता स्वीका नही कर सकते ।
२५. हम अदृश्य होने पर भी बिजली की वास्तविकता उससे उत्पन्न होने वाले परिणामों को देखकर स्वीकार करते हैं ।
२६. बिजली से प्रकाश पैदा होता है। प्रकाश के होने से ही इस अदृश्य होने पर भी बिजली की वास्तविकता को स्वीकार करते हैं ।
२७. वह कौनसी दृश्य चीज है, जिसे यह अदृश्य 'ब्रह्म' उत्पन्न करता है?
२८. उत्तर है-- "कुछ नहीं ।"
२९. एक दूसरा उदाहरण दिया जा सकता हैं । कानून मे भी यह सामान्य बात है कि किसी एक बात को, किसी एक स्थापना को मान लिया जाता है, उसे सिद्ध नहीं किया जाता, वह केवल एक 'कानूनी कल्पना' होती है ।
३०. इस तरह की 'कानूनी कल्पना' को हम सभी स्वीकार करते हैं।
३१. लेकिन इस तरह की 'कानूनी कल्पना' क्यों स्वीकार की जाती हैं ?
३२. इसका कारण यह है कि 'कानूनी कल्पना' इसलिये स्वीकार की जाती है कि उससे न्याय संगत तथा उपयोगी परिणाम निकलता है ।
३३. 'ब्रह्म' को भी एक कल्पना मान लेते हैं । किन्तु इससे कौनसा उपयोगी परिणाम निकलता है ?
३४. वासेट्ठ और भारद्वाज के पास कोई उत्तर न था ।
३५. इनके दिमाग में अच्छी तरह कील ठोकने के लिये उन्होंने वासेठ को सम्बोधित करके उससे पूछा- क्या तुमने 'ब्रह्म' को देखा है?
३६. “क्या तीनों वेदों के जानकार ब्राह्मणों में कोई एक भी ऐसा है जिसने 'ब्रह्म' को आमने-सामने देखा है?"
३७. "गौतम ! निश्चय से नहीं ।"
३८. “वासेटू ! क्या इन तीनों वेदों के जानकार ब्राह्मणों के आचार्यो मे कोई एक भी है, जिसने 'ब्रह्म' को आमने-सामने देखा हो ?”
३९. “गौतम ! निश्चय से नहीं !”
४०. “वासेट्ठ ! क्या इन ब्राह्मणों की पहले की सात पीढ़ियों में भी कोई एक भी ब्राह्मण है, जिसने 'ब्रह्म' को आमने-सामने देखा हो ?”
४१. " गौतम । निश्चय से नहीं !”
४२. “अच्छा तो वासेट्ठ ! क्या ब्राह्मणों के पुराने ऋषियों ने कभी कहा है- "हम 'ब्रह्म' को जानते है, हम ने 'ब्रह्म' को देखा है । हम जानते है कि वह कहाँ है, किधर है?
४३. "गौतम ! नहीं ही ।"
४४. तथागत ने उन दोनों ब्राह्मण-तरूणों से प्रश्न पूछना जारी रखा :-
४५. “तो वासेट्ठ ! अब तुम्हें कैसा लगता है? यदि ऐसा ही है तो क्या तुम्हे यह नहीं लगता कि 'ब्रह्म- सायुज्य' की ब्राह्मणों की यह सारी बात-चीत ही मूर्खता पूर्ण बात-चीत है?"
४६. “वासेट्ठ ! जैसे कोई अंधो की कतार हो । न आगे आगे चलने वाला अंधा देख सकता हो, न बीच में चलने वाला अन्धा देख सकता हो और न पीछे चलने वाला अन्धा देख सकता हो इसी तरह वासेट्ठ! मुझे लगता है कि ब्राह्मणों का कथन केवल अन्धा- कथन है । न आगे आगे चलने वाला देखता है, न बीच में चलने वाला देखता है, और न पीछे चलने वाला देखता है । इन ब्राह्मणों की बात-चीत केवल उपहासास्पद है, शब्द मात्र जिन में कुछ भी सार नहीं ।"
४७. "वासे ! क्या यह ठीक ऐसा ही नहीं है जैसे किसी आदमी का किसी स्त्री से प्रेम हो गया हो जिसे उसने कभी देखा न हो ?" वासेटू बोला- "हां! यह तो ऐसा ही है?"
४८. “वासेटू ! अब तुम बताओ कि यह कैसा होगा जब लोग उस आदमी से पूछेंगे कि मित्र ! तुम सारे प्रदेश की जिस सुन्दरतम स्त्री से इतना प्रेम करने की बात करते हो, वह कौन है? वह क्षत्रिय जाति से है ? ब्राह्मण जाति से है ? वैश्य जाति से है ? अथवा शूद्र जाति से है?"
४९. “लेकिन तब उससे पूछा जायेगा, उसका उत्तर होगा 'नही' ।”
५०. “और जब लोग उससे पूछेंगे कि मित्र ! तुम सारे देश की जिस सुन्दरतम स्त्री से इतना प्रेम करने की बात करते हो, उसका नाम क्या है? उसका गोत्र क्या है ? वह लम्बे कद की है। छोटे कद की है वा मंझले कद की है । क्या वह काले रंग की है, भूरे रंग की है वा हुए रंग की है? वह किसी गांव, नगर या शहर में रहती है? लेकिन जब उस से ये सब प्रश्न पूछे जायेंगे उसका एकही उत्तर हो- 'नहीं'।"
५१. “तो वासेट्ठ ! तुम्हें कैसा लगता है? क्या तुम्हें ऐसा नहीं लगता कि उस आदमी का कथन मूर्खता पूर्ण कथन है?”
५२. दोनों ब्राह्मण तरूण बोले-- “गौतम ! सचमुच, यह ऐसा ही है ।”
५३. इसलिये 'ब्रह्म' यथार्थ नहीं है और यदि कोई धर्म 'ब्रम्हाश्रित' है तो वह व्यर्थ हैं ।