भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
चौथा भाग : अ-धम्म क्या हैं ?
१. परा प्राकृतिक में विश्वास अ-धम्म है
१. जब भी कोई घटना घटती है, आदमी हमेशा यह जानना चाहता है कि यह घटना कैसे घटी ? इसका क्या कारण है?
२. कभी- कभी कारण और उससे फलित होने वाला कार्य एक दूसरे के इतने समीप होते है कि कार्य के कारण का पता लगाना कठिन नहीं होता ।

३. लेकिन कभी-कभी कारण से कार्य इतना दूर होता है कि कार्य के कारण का पता लगाना कठिन हो जाता है । सरसरी दृष्टि से देखने से उस कार्य का कोई कारण प्रतीत ही नहीं होता ।
४. तब प्रश्न पैदा होता है अमुक घटना कैसे घटी ?
५. बड़ा सरल सीधा-साधा उत्तर है कि घटना किसी परा- प्राकृतिक कारण से घटीं जिसे बहुधा 'करिश्मा का प्रातिहार्य भी कहा जाता है।
६. बुद्ध के कुछ पूर्वजों ने इस प्रश्न के विविध उत्तर दिये है ।
७. पकुद कच्चान यह मानता ही नही था कि हर कार्य का कारण होता है । उसका मत था कि घटनाएँ बिना किसी कारण के ही घटती है ।
८. मक्कली गोशाल मानता था कि हर घटना का कारण होना चाहिये । लेकिन वह प्रचार करता था कि कारण आदमी की शक्ति से बाहर किसी 'प्रकृति' किसी 'अनिवार्य आवश्यकता', किसी 'अनुत्पन्न नियम' अथवा किसी 'भाग्य' में ही खोजना चाहिये ।
९. भगवान् बुद्ध ने इस प्रकार के सिद्धान्तो का खण्डन किया। उनका कहना था कि इतना ही नहीं कि हर घटना का कोई न कोई कारण होता है, बल्कि वह कारण या तो कोई न कोई मानवी कारण होता है या प्राकृतिक होता है ।
१०. काल (समय), प्रकृति, आवश्यकता (?) आदि को किसी घटना का कारण मानने के खिलाफ उनका यहाँ विरोध था । ११. यदि काल (समय), प्रकृति, आवश्यकता (?) आदि ही किसी घटना के एकमात्र कारण है, तो हमारी अपनी स्थिति क्या रह जाती है?
१२. तो क्या आदमी काल (समय), प्रकृति, अकस्मात-पन, ईश्वर, भाग्य, आवश्यकता (?) आदि के हाथ की मात्र कुठ - पुतली है ?
१३. यदि आदमी स्वतन्त्र नही है तो उसके अस्तित्व का ही क्या प्रयोजन है? यदि आदमी परा - प्राकृतिक में विश्वास रखता है तो उसकी बुद्धि का ही क्या प्रयोजन है?
१४. यदि आदमी स्वतन्त्र है, तो हर घटना का या तो कोई मानवी कारण होना चाहिये, या प्राकृतिक कारण । कोई घटना ऐसी ही हो नही सकती जिसका परा प्राकृतिक कारण हो ।
१५. यह सम्भव है कि आदमी किसी घटना के वास्तविक कारण का पता न लगा सके । लेकिन यदि वह बुद्धिमान है तो किसी न किसी दिन पता लगा ही लेगा ।
१६. परा-प्राकृतिक-वाद का खण्डन करने में भगवान् बुद्ध के तीन हेतु थे--
१७. उनका पहला हेतु था की आदमी बुद्धवादी बने ।
१८. उनका दूसरा हेतु था कि आदमी स्वतन्त्रता पूर्वक सत्य की खोज कर सके ।
१९. उनका तीसरा उद्देश्य था कि मिथ्या विश्वास के प्रधान कारण की जड़ काट दी जाय, क्योंकि इसी के परिणाम स्वरूप आदमी की खोज करने की प्रवृत्ति की हत्या हो जाती है ।
२०. यही बुद्ध धम्म का 'हेतु-वाद' है ।
२१. यह 'हेतु-वाद' बुद्ध धम्म का मुख्य-सिद्धान्त है । यह बुद्धिवाद की शिक्षा देता है और बुद्ध धम्म यदि बुद्धिवादी भी नहीं है तो फिर कुछ नहीं है ।
२२. यही कारण है कि परा- प्राकृति की पूजा अ-धम्म है ।