भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
४. तृष्णा का त्याग धम्म है
१. धम्मपद में भगवान बुद्ध ने कहा है, “आरोग्य से बढ़कर लाभ नहीं, सन्तोष से बढ़कर धन नहीं ।"
२. यहां संतोष का मतलब बेचारगी वा परिस्थिति के सामने सिर झुका देना नहीं है ।
३. ऐसा समझना भगवान् बुद्ध की दूसरी शिक्षाओं के सर्वथा प्रतिकूल पड़ेगा ।

४. भगवान् बुद्ध ने यह कहीं नहीं कहा कि “भाग्यवान् हैं वे जो गरीब है ।”
५. भगवान बुद्ध ने यह कहीं न कहा कि जो पीड़ित हैं उन्हें अपनी परिस्थिति बदलने का प्रयास नहीं करना चाहिये ।
६. दूसरी और उन्होंने 'ऐश्वर्य' का स्वागत किया है । अपनी परिस्थिति की ओर से उपेक्षावान् होकर पड़े-पड़े, कष्ट सहते रहने के उपदेश के स्थान पर उन्होंने वीर्य्य, उत्साहपूर्वक परिस्थिति को बदलने का प्रयास करने का उपदेश दिया हैं ।
७. जब भगवान् बुद्ध ने यह कहा कि 'संतोष सबसे बड़ा धन है' तो उनके कहने का अभिप्राय यही था कि आदमी को लोभ के वीभूत नहीं होना चाहिये, जिसकी कहीं कोई सीमा नहीं।
८. जैसा कि भिक्षु राष्ट्रपाल ने कहा है; "मै धनियों को देखता हूं जो मूर्खता वश अधिक से अधिक इकट्ठा ही करते चले जाते है, उसमें से कभी भी किसी को कुछ नहीं देते, उनकी तृष्णा रूपी प्यास बुझती ही नहीं, राजाओं को देखता हू कि जिनका राज्य समुद्र तक पहुंच गया है, किन्तु अब समुद्रपार साम्राज्य के लिये दुखी हैं, अभी भी तृष्णार्त हैं, राजा प्रजा सभी संसार से गुजर जाते हैं, उनका अभाव बना ही रहता है, वे शरीर त्याग देते हैं, किन्तु इस पृथ्वी पर उनकी काम भोग की इच्छा की कभी तृप्ति ही नही होती ।
९. महा-निदान-सुत्त में भगवान बुद्ध ने आनन्द को 'लोभ' को अपने वश में रखने के लिये कहा हैं । तथागत का वचन हैं :-
१०. “इस प्रकार आनन्द! लाभ की इच्छा में से तृष्णा पैदा होती है, जब लाभ की इच्छा मिल्कीयत की इच्छा में बदल जाती है, जब मिल्कीयत की इच्छा अपनी मिल्कीयत से बुरी तरह चिपटे रहने की इच्छा बन जाती है, तो यह 'लोभ' कहलाती है ।”
११. लोभ या संग्रह करने की असंयत-कामना पर नजर रखने की जरूरत है ।
१२. “इस तृष्णा या लोभ को वश में रखने की क्यों जरूरत है?” “क्योकि इसी से,” भगवान् बुद्ध ने आनन्द से कहा, “बहुत सी बुराइयां पैदा होती हैं, मुक्कामुक्की भी हो जाती है, लोगों को आघात भी लगते हैं, झगड़े भी होते हैं । परस्पर विरोध भी होते हैं, कलह भी होते हैं, एक दुसरे की निन्दा तथा झूठ बोलना भी होता है ।"
१३. इस में कोई सन्देह नही कि वर्ग संघर्ष का यह सही सही विश्लेषण है ।
१४. इसीलीए भगवान् बुद्ध ने 'तृष्णा' और लोभ को अपने वश में रखने के लिये कहा है ।
५. यह मानना कि सभी संस्कार अनित्य है धम्म है
१. अनित्यता के सिद्धान्त के तीन पहलू हैं ।
२. अनेक तत्वों के मेल से बनी हुई चीजें अनित्य हैं ।
३. व्यक्तिगत रूप से प्राणी अनित्य हैं ।
४. प्रतीत्य-समुत्पन्न वस्तुओं का 'आत्म-तत्व' अनित्य हैं ।
५. अनेक तत्वों के मेल से बनी हुई चीजों की अनित्यता की बात महान बौद्ध दार्शनिक असंग ने अच्छी तरह समझाई है ।
६. “सभी चीजें,” असंग का कहना है, "हेतुओं तथा प्रत्ययो से उत्पन्न है । किसी का कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नही है । जब हेतु- प्रत्ययों का उच्छेद हो जाता है वस्तुओं का अस्तित्व नहीं रहता । "
७. प्राणी का शरीर पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु नामक चार महाभूतों का परिणाम हैं । जब इन चारों महाभूतों का पृथक्करण हो जाता है, प्राणी नही रहता ।
८. 'अनेक तत्वों के मेल से बनी हुई चीजें अनित्य हैं' कहने का अभिप्राय यही है ।
९. जीवित प्राणी की अनित्यता की सर्वश्रेष्ठ व्याख्या यही है कि वह है नही, वह हो रहा है।
१०. इस अर्थ में भूत काल का प्राणी अपना जीवन व्यतीत कर चुका, न वह वर्तमान में कर रहा है और न भविष्य में करेगा! भविष्यत् काल का प्राणी रहेगा, लेकिन न रहा है और न रहता है । वर्तमान काल का प्राणी रहता है, लेकिन न रहा है, और न रहेगा ।
११. संक्षेप यही है कि मानव निरन्तर परिवर्तन-शील है, निरन्तर संवर्धनशील है। वह अपने जीवन के दो भिन्न क्षणों में भी एक ही नहीं है ।
१२. इस सिद्धान्त का तीसरा पहलू एक सामान्य आदमी के लिये समझ सकना कुछ कठिन है ।
१३. यह समझ लेना कि आदमी किसी न किसी दिन अवश्य मर जायेगा, बड़ा आसान है ।
१४. किन्तु यह समझ सकना कि किस प्रकार एक प्राणी जीते जी परिवर्तित होता रहता है, उतना ही आसान नहीं ।
१५. “यह कैसे सम्भव है?” भगवान बुद्ध का उत्तर था - "यह इसीलिये सम्भव है कि हर चीज अनित्य है ।”
१६. आगे चलकर इसी 'अनित्यता' के सिद्धान्त ने शून्यवाद का रूप ग्रहण कर लिया है।
१७. बौद्ध ‘शुन्यता' का मतलब सोलह आने निषेध नहीं है । इस का मतलब इतना ही है कि संसार में जो कुछ है वह प्रतिक्षण बदल रहा हैं ।
१८. बहुत कम लोग इस बात को समझ पाते हैं कि 'शुन्यता' के ही कारण सभी कुछ सम्भव है, इसके बिना संसार में कुछ भी सम्भव नहीं रहेगा । सभी दूसरी बाते चीजों के अनित्यता के स्वभाव पर ही निर्भर करती है ।
१९. यदि चीजें परिवर्तन-शील न हों बल्कि स्थायी और अपरिवर्तनशील हों, तब एक रूप से किसी दूसरे रूप में जीवन का सारा विकास ही रुक जायेगा, किसी में कुछ भी परिवर्तन न हो सकेगा, किसी की कुछ भी उन्नति न हो सकेगी ।
२०. यदि आदमी मर जाते या उन में परिवर्तन आ जाता और फिर वे सब उसी अवस्था में अपरिवर्तित स्थिति में रहते, तो क्या हालत होती? मानव-उ -जाति की प्रगति सर्वथा रूक जाती ।
२१. यदि 'शुन्य' का मतलब 'अभाव' माना जाये तो कई कठिनाइयाँ उत्पन्न हो जाती हैं।
२२. 'शून्य' उस बिन्दु के समान है, जो कि एक पदार्थ है किन्तु जिसकी कोई लम्बाई-चौड़ाई नही ।
२३. भगवान् बुद्ध का यह उपदेश था कि सभी चीजें अनित्य हैं।
२४. इस सिद्धान्त से हमें क्या शिक्षा मिलती हैं? यह अधिक महत्व का प्रश्न हैं ।
२५. इस सिद्धान्त से हमें जो शिक्षा मिलती है, वह सरल है । किसी वस्तु के प्रति आसक्त न होओ।
२६. यह अनासक्ति - सम्पत्ति के प्रति अनासक्ति, सम्बन्धियो, मित्रो, तथा परिचितों के प्रति अनासक्ति का ही अभ्यास करने के लिये यह कहा गया है कि सभी चीजें अनित्य हैं ।
६. 'कर्म' को मानव जीवन के नैतिक संस्थान का आधार मानना धम्म है
१. भौतिक संसार में एक प्रकार का नियम दिखाई देता है । निम्नलिखित बाते इसकी साक्षी है ।
२. आकाश के नक्षत्रों के चलन में एक प्रकार का नियम है ।
३. ऋतुओं के नियमानुसार आवागमन में भी एक नियम है ।
४. बीजों से वृक्ष उत्पन्न होते है, वृक्षों में फल लगते है और फलों से फिर बीज प्राप्त होते है -- इस में भी एक प्रकार का नियम हैं ।
५. बौद्ध परिभाषा में यह सब 'बीज नियम' तथा 'ऋतु-नियम' आदि कहलाते हैं ।
६. इसी प्रकार क्या समाज में भी कोई नैतिक क्रम है? यदि है तो यह कैसे उत्पन्न हुआ है ? इस का सरंक्षण कैसे होता है?
७. जो 'ईश्वर' में विश्वास रखते है, उन्हें इस प्रश्न का उत्तर देने में कोई कठिनाई नहीं है। उनका उत्तर सरल हैं ।
८. उन का कहना है कि संसार का नैतिक क्रम-ईश्वरेच्छा का परिणाम है। ईश्वर ने संसार को जन्म दिया है और ईश्वर ही संसार का कर्ता-धर्ता हैं । वही भौतिक तथा नैतिक नियमों का रचयिता भी हैं ।
९. उनका कहना है कि नैतिक नियम आदमी की भलाई के लिये है क्योंकि वे ईश्वर की आज्ञा है । आदमी को अपने रचयिता ईश्वर की आज्ञाओं का पालन करना ही पड़ेगा । और यह 'ईश्वर की आज्ञाओं का पालन ही है जो संसार को चलाता हैं ।
१०. संसार का नैतिक-संस्थान ईश्वरेच्छा का परिणाम है - इसके पक्ष में यही तर्क दिया जाता है ।
११. लेकिन यह व्याख्या किसी भी तरह संतोषजनक नहीं है । क्योंकि यदि 'ईश्वर' नैतिक नियमों का जनक है और यदि 'ईश्वर' ही नैतिक-नियमों का आरम्भ और अवसान है और यदि आदमी ईश्वर की आज्ञाओं का पालन करने के लिये मजबूर है, तो संसार में इतनी नैतिक अराजकता वा अनैतिकता क्यों है?
१२. इस ‘ईश्वरीय-नियम' के पास कौन सी शक्ति है ? इस 'ईश्वरीय नियम' का व्यक्ति पर कौन सा अधिकार है? ये महत्वपूर्ण प्रश्न हैं। लेकिन जो लोग यह मानते हैं कि संसार का नैतिक संस्थान ईश्वरेच्छा का परिणाम है- उनके पास इन प्रश्नों का कोई संतोषजनक उत्तर नहीं ।
१३. इन कठिनाइयों पर पार पाने के लिये बात कुछ थोड़ी बदल दी गई है ।
१४. अब यह कहा जाने लगा है; निस्सन्देह ईश्वर की इच्छा से ही सृष्टि अस्तित्व मे आई । यह भी सत्य है कि प्रकृति ने ईश्वर की इच्छा और मार्गदर्शन के अनुसार ही अपना कार्य आरम्भ किया । यह भी सत्य है कि उसने प्रकृति को एक ही बार वह सब शक्ति प्रदान कर दी जो अब उसकी समस्त क्रिया-शीलता के मूल में है ।
१५. लेकिन इसके बाद ‘ईश्वर' ने प्रकृति को स्वतन्त्र छोड़ दिया है कि वह शुरू में उसी के बनाये हुए नियमों के अनुसार कार्य
करती रहे ।
१६. इसलिये अब यदि ईश्वरेच्छा या ईश्वर की आज्ञा के अनुसार कार्य नहीं होता, तो अब इसमें ईश्वर का कोई दोष नहीं, सारा दोष प्रकृति का है।
१७. लेकिन सिद्धान्त में इस तरह थोड़ा परिवर्तन कर देने से भी काम नहीं चलता । इससे केवल इतना ही होता है कि ईश्वर पर कोई जिम्मेदारी नही रहती । लेकिन तब प्रश्न पैदा होता है कि ईश्वर ने यह काम प्रकृति को क्यों सौंपा है कि वह उसके बनाये नियमों का पालन कराये ? इस प्रकार के अनुपस्थित, इस प्रकार के निकम्मे 'ईश्वर' का क्या प्रयोजन है?
१८. इस प्रश्न का कि संसार का नैतिक क्रम कैसे सुरक्षित है? जो उत्तर बुद्ध ने दिया है, वह सर्वथा भिन्न हैं । १९. तथागत का उत्तर है, विश्व के नैतिक- -क्रम के बनाये रखने वाला कोई 'ईश्वर' नहीं है, वह 'कर्म-नियम' ही है जो विश्व के नैतिकक्रम को बनाये हुए हैं।
२०. विश्व का नैतिक क्रम चाहे भला हो, चाहे बुरा हो, लेकिन भगवान बुद्ध के उपदेशानुसार जैसा भी है वह आदमी पर निर्भर करता है, और किसी पर नहीं ।
२१. 'कर्म' का मतलब है मनुष्य द्वारा किया जाने वाला 'कर्म' और 'विपाक' का मतलब है उसका परिणाम । यदि नैतिक-क्रम बुरा है तो इसका मतलब है कि आदमी बुरा (अकुशल) कर्म करता है, यदि नैतिक-क्रम अच्छा है तो इसका मतलब है कि आदमी भला (कुशल) कर्म करता हैं ।
२२. बुद्ध ने केवल कम्म (कर्म) की ही बात नहीं कही। उन्होंने कम्म (कर्म) नियम की भी बात कही है - अर्थात् कर्म के कानून की ।
२३. कर्म के नियम से बुद्ध का अभिप्राय था कि यह अनिवार्य है कि कर्म का परिणाम उसी प्रकार उसका पीछा करे जैसे रात दिन का करती है । यह एक कानून है ।
२४. कुशल कर्म से होने वाला लाभ भी हर कोई उठा सकता है और अकुशल कर्म से होने वाली हानि से भी कोई नही बच सक
२५. इसलिये भगवान् बुद्ध की देशना थी : कुशल-कर्म करो ताकि उससे नैतिकक्रम को सहारा मिले और उससे मानवता लाभान्वित हो; अकुशल-कर्म मत करो ताकि उससे नैतिक क्रम को हानि पहुंचे और उससे मानवता दुःखी हो ।
२६. यह हो सकता है कि एक कर्म और उसके विपाक में समय का थोड़ा बहुत या काफी अन्तर भी हो जाय । ऐसा बहुधा होता हैं
२७. इस दृष्टि से कर्म के कई विभाग है जैसे--दिट्ठधम्मवेदनीय कर्म (इसी जन्म में फल देने वाला कर्म), उपपज्जवेदनीय कर्म (उत्पन्न होने पर फल देने वाला कर्म), अपरापरियवेदनीय कर्म (अनिश्चित समय पर फल देने वाला कर्म) ।
२८. कर्म कभी-कभी ‘आहोसि कर्म भी हो सकता है, अर्थात् कर्म जिसका कुछ 'विपाक' न हो । इस अहोसि-कर्म के अन्तर्गत वे सब कर्म आते हैं जो या तो इतने दुर्बल होते है कि उनका कोई 'विपाक' नहीं हो सकता अथवा जो किसी अन्य सबल कर्म द्वारा बाधित हो जाते है ।
२९. इन सब बातों के लिये थोड़ी गुंजाइश भी मान ली जाय तो भी भगवान् बुद्ध की यह देशना अपने स्थान पर ठीक ही है कि कर्म का नियम लागू होकर ही रहता हैं ।
३०. कर्म के सिद्धान्त का अनिवार्य तौर पर यह मतलब नहीं कि करने वाले को ही कर्म का फल भुगतना पड़ता है, और इससे अधिक कुछ नहीं । ऐसा समझना गलती है । कभी कभी करने वाले की अपेक्षा दूसरे पर ही कर्म का प्रभाव पड़ता है । लेकिन यह सब कर्म का नियम ही है, क्योंकि यह या तो नैतिक क्रम को संभालना है अथवा उसे गडबडाता है ।
३१. व्यक्ति आते रहते हैं, व्यक्ति जाते रहते है। लेकिन विश्व का नैतिक क्रम बना रहता है और उसके साथ वह कर्म-नियम भी जो इसे बनाये रखता हैं ।
३२. यही कारण है कि बुद्ध के धम्म में, नैतिकता को वह स्थान प्राप्त है जो अन्य धम्म में 'ईश्वर' को है ।
३३. इसलिये इस प्रश्न का कि 'विश्व का नैतिक-क्रम कैसे बना रहता है?', बुद्ध ने जो उत्तर दिया है वह इतना सरल है और इतना पक्का है ।
३४. इतना होने पर भी इसका सच्चा अर्थ बहुधा स्पष्ट नहीं होता । प्रायः ही नहीं, बल्कि लगभग हमेशा, या तो यह अच्छी तरह से समझा नहीं जाता, या गलत तौर पर बयान किया जाता है अथवा इसकी गलत व्याख्या की जाती है । बहुत लोग इस बात को समझते प्रतीत नहीं होते कि 'कर्म के नियम' का सिद्धान्त इस प्रश्न का उत्तर है कि 'विश्व का नैतिक क्रम कैसे बना रहता है?' ३५. लेकिन बुद्ध के 'कर्म के नियम' के सिद्धान्त का यही प्रयोजन हैं ।
३६. 'कर्म के नियम' का सम्बन्ध केवल विश्व के नैतिक- क-क्रम के प्रश्न से है । इसे व्यक्ति विशेष के धनी - निर्धन होने वा भाग्यवान- अभाग्यवान होने से कुछ लेना देना नहीं ।
३७. इसे केवल विश्व के नैतिक क्रम के बने रहने से सरोकार हैं ।
३८. इसी कारण से 'कर्म का नियम' धम्म का एक महत्वपूर्ण अंग हैं ।