मुख्य मजकूराकडे जा

भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

Page 54 of 132
16 जून 2023
Book
12,14,5,7,1,,

६. कल्पनाति विश्वास अ-धम्म है

(i)

१. ऐसे प्रश्नों का मन में उठना स्वाभाविक था जैसे (१) क्या मै पहले था ? (२) क्या मै पहले नहीं था? (३) उस समय मैं क्या था? (४) मैं क्या होकर क्या हुआ ? (५) क्या मैं भविष्य में होऊँगा ? (६) क्या मैं भविष्य में नहीं होऊंगा ? (७) तब मै क्या होऊँगा? (८) तब मैं कैसे होऊँगा? (९) मैं क्या होऊंगा ? अथवा वह अपने वर्तमान के विषय में ही सन्देह-शील होता है (१) क्या मैं हूँ? (२) क्या मैं नहीं हूँ? (३) मैं हूँ क्या ? (४) मैं कैसे हूँ? (५) यह प्राणी कहाँ से आया ? (६) यह किधर जायेगा ?

२. इसी प्रकार विश्व के बारे में बहुत से प्रश्न कुछ इस प्रकार पूछे गये थे-

Kalpnati Vishwas ADhamma hai - Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma - Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

३. “यह संसार किस प्रकार उत्पन्न किया गया? क्या संसार अनन्त हैं ।"

४. पहले प्रश्न के उत्तर में किसी का कहना था कि प्रत्येक वस्तु ब्रम्हा द्वारा उत्पन्न की गई है - दूसरों का कहना था कि यह प्रजापति द्वारा उत्पन्न की गई हैं।

५. दूसरे प्रश्न के उत्तर में किसी का कहना था कि यह अनन्त हैं। किसी का कहना था, यह सान्त है। किसी का कहना था यह ससीम (सीमा सहित) है, किसी का कहना था यह असीम हैं ।

६. इन प्रश्नों को बुद्ध ने अ-व्याकृत रखा । ऐसे प्रश्नों का स्वागत ही नहीं किया । उनका कहना था कि ऐसे प्रश्नों को पूछने वाले और उत्तर देने वाले- दोनों ही कुछ-कुछ विकृत-मस्तिष्क होने चाहिए ।

७. इन प्रश्नों के उत्तर देने वा दे सकने का मतलब होगा कि आदमी को “सर्वज्ञ" होना चाहिये जो कि कोई होता ही नहीं ।

८. उनका कहना था कि वह ऐसे 'सर्वज्ञ' नहीं कि इस तरह के प्रश्नों का उत्तर दें । कोई भी यह दावा नहीं कर सकता कि जो कुछ हम जानना चाहते हैं, वह वह सब कुछ जानता है और न कोई यह ही दावा कर सकता है कि किसी भी समय जो कुछ हम जानना चाहते है वह किसी को हर समय ज्ञात रहता है । हमेशा कुछ न कुछ अज्ञात रहता ही है ।

९. इन्हीं कारणों से भगवान् बुद्ध ने ऐसी सब बातों को अपने धम्म से दूर ही दूर रखा ।

१०. उनकी दृष्टि में जो धर्म ऐसी बातों को धर्म का अंग माने वह अपनाने लायक नहीं हैं ।


(ii)

१. जिन सिद्धान्तों को बुद्ध के समकालीन कुछ आचार्यों ने अपने अपने धर्म का आधार बनाया था, उन सिद्धान्तों का सम्बन्ध दो बातों से था-(१) 'आत्मा' से और (२) विश्व के आरम्भ से ।

२. वे ‘आत्मा' के बारे में या अपने आपके बारे में कुछ प्रश्न उठाते थे । वे पूछते थे: “(१) क्या मैं पहले था ? (२) क्या मैं पहले नही था? (३) उस समय मैं क्या था ? (४) मैं क्या होकर क्या हुआ ? (५) क्या मैं भविष्य में होऊंगा ? (६) क्या मैं भविष्य में नहीं होऊंगा? (७) तब मैं क्या होऊँगा ? (८) तब मैं कैसे होऊँगा ? (९) मैं क्या होकर क्या होऊंगा ? अथवा वह अपने वर्तमान के ही विषय में सन्देह-शील होता है । (१) क्या मैं हूँ? (२) क्या मैं नहीं हूँ? (३) मैं हूँ क्या ? (४) मैं कैसे हूँ? (५) यह 'प्राणी' कहां से आया? (६) यह किधर जायेगा?"

३. दूसरों ने विश्व के आरम्भ के विषय में प्रश्न पूछे ।

४. कुछ ने कहा - इसे ब्रह्मा ने पैदा किया है।

५. दूसरों ने कहा, इसे स्वयं प्रजापति ने अपने आपकी आहुति देकर उत्पन्न किया हैं ।

६. दूसरे आचार्यो ने कुछ दूसरे प्रश्न पूछे: “संसार अनन्त है ? संसार अनन्त नहीं है? संसार ससीम है ? संसार असीम है? जो शरीर है, वही जीव है? शरीर अन्य है, जीव अन्य है ? सत्य-ज्ञाता (तथागत) मरने के बाद रहते है ? तथागत मरने के बाद नहीं रहते ? वे रहते भी है और नहीं भी रहते ? वे न रहते है और न नहीं रहते हैं?"

७. भगवान् बुद्ध का कहना था कि ऐसे प्रश्न उन्हीं लोगों द्वारा पूछे जा सकते हैं कि जिनके मस्तिष्क कुछ विकृत हों ।

८. भगवान बुद्ध ने ऐसे धार्मिक सिद्धान्तों का क्यो खण्डन किया, इसके तीन कारण थे ।

९. पहला कारण तो यही था कि इनको धम्म का अंग बनाने में कोई तुक नही था ।

१०. दूसरे इन प्रश्नों का उत्तर कोई "सर्वज्ञ" ही दे सकता हैं, जो कोई होता ही नहीं । उन्होंने अपने प्रवचनों में इसी बात पर जोर दिया हैं ।

११. उन्होने कहा कि एक ही समय और उसी समय कोई भी सभी बातों का ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता । ज्ञान का कही अन्त नहीं है। कुछ न कुछ और अधिक जानने के लिये हमेशा रहेगा ।

१२. इन सिद्धान्तों के विरूद्ध तीसरा तर्क यह था कि ये सब सिद्धान्त केवल कल्पनाश्रित' था । उनका 'सत्य' परीक्षित नही था और न उनके 'सत्य' की परीक्षा ही हो सकती थी ।

१३. वे केवल कल्पना के घोड़े की लगाम को ढीला छोड़ देने के परिणाम थे । उनके पीछे कहीं कोई तथ्य न था ।

१४. और फिर इन कल्पनाश्रित सिद्धान्तों का एक आदमी और दूसरे आदमी के आपसी सम्बन्ध में क्या प्रयोजन था ? एकदम भी नहीं कुछ भी नहीं ।

१५. तथागत ने यही नहीं माना था कि संसार का निर्माण हुआ है । तथागत की मान्यता थी कि संसार का विकास हुआ है ।