भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
पाचवा भाग : सद्धम्म क्या है ?
(क) सद्धम्म के कार्य
१. मन के मैल को दूर कर उसे निर्मल बनाना
१. एक समय जब भगवान बुद्ध श्रावस्ती में विहार कर रहे थे, तो कोशल नरेश प्रसेनजित वहाँ आया जहाँ तथागत ठहरे हुए थे और अपने रथ से उतर अत्यन्त भक्ति भाव से तथागत के समीप बैठा ।
२. उसने तथागत से प्रार्थना की कि वे कल के लिये उसका निमत्रण स्वीकार करें । उसने उनसे दूसरे दिन नगर में सार्वजनिक- धम्मोपदेश देने की भी प्रार्थना की ताकि लोग उनके दर्शन कर सकें और उनका उपदेश सुन, उसे ग्रहण कर सके ।

३. भगवान् बुद्ध ने स्वीकार किया । दूसरे दिन भिक्षु संघ सहित उन्होंने नगर में प्रवेश किया और नगर के चौरस्तों को पार कर वे वहाँ पहुचे जो स्थान पूर्व निश्चित था, तथा वहाँ विराजमान हुए ।
४. भोजनान्तर राजा ने तथागत से प्रार्थना की कि वे उस खुली सभा में भाषण दें । उस समय उनका प्रवचन सुनने वाले बहुत
५. उस समय उनके श्रोताओं में दो व्यापारी भी थे ।
६. एक ने सोचा “महाराज ने यह कितनी बड़ी बुद्धिमानो की बात की है कि इस प्रकार का सार्वजनिक धम्मोपदेश करवाया है! ये उपदेश कितने व्यापक हैं और ये उपदेश कितने गहरे हैं।"
७. दूसरे ने सोचा, "महाराज ने यह क्या मूर्खता की है कि इस प्रकार इस आदमी से यहाँ उपदेश दिलवा रहे हैं!
८. “जैसे कोई बछड़ा अपनी मां के पीछे पीछे चलता है उस गाड़ी से बंधा हुआ जिसे वह खींचती है उसी प्रकार यह बुद्ध राजा से बंधा हुआ है ।" दोनों व्यापारी नगर से बिदा हो एक सराय में पहुंचे, जहाँ दोनों एक साथ ठहरे ।
९. सुरा पान करते समय जो भला व्यापारी था, उसे चातुर्महाराजिक देवताओं ने संयत रखा और उसकी रक्षा की।
१०. दूसरे को किसी दुष्ट प्रेतात्मा ने पीते रहने की प्रेरणा दी, जब तक वह नशे और नींद से बेहोश नहीं हो गया । वह सराय के पास सड़क पर पड़ा था ।
११. प्रातःकाल जब व्यापारीयों की गाड़ियाँ वहाँ से विदा होने लगीं तो गाडीवानो ने सड़क के बीच पड़े उसे नहीं देखा । वह गाडी के पहियों के नीचे आकर मर गया ।
१२. दुसरा व्यापारी एक दूर देश में आ पहुँचा । वहाँ वह एक पवित्र घोड़े के घुटने टेकने के परिणामस्वरूप उस देश का राजा चुन लिया गया; और वह सिंहासन पर विराजमान हुआ ।
१३. इसके बाद, इन घटनाओं की विचित्रता पर विचार करके, वह अपने देश लौट आया । तब उसने भगवान् बुद्ध को निमंत्रित किया कि वे जनता को उपदेश दें ।
१४. इस अवसर पर तथागत ने उस दुष्ट- हृदय व्यापारी की का मृत्यु कारण बताया और दूसरे बुद्धिमान व्यापारी के ऐश्वर्यशाली बनने का भी । इसके बाद तथागत ने यह भी कहा :-
१५. “मन ही सबका मूल है, मन ही मालिक है; मन ही कारण है ।
१६. “यदि आदमी का मन दुख होता है तो वह दुष्ट वाणी बोलता है और दृष्ट कार्य भी करता है । तब दुःख उस आदमी के पीछे पीछे ऐसे ही हो लेता है जैसे गाड़ी के पहिये, खींचनेवाले बैल के पीछे पीछे ।
१७. "मन ही सबका मूल है, मन ही शासन करता है' मन ही योजना बनाता है "
१८. “यदि आदमी का मन शुद्ध होता है, तो वह शुद्ध वाणी बोलता है और अच्छे अच्छे कार्य करता है । तब सुख आदमी के पीछे पीछे ऐसे ही हो लेता है जैसे कभी साथ न छोड़ने वाली छाया, वस्तु या व्यक्ति के पीछे पीछे ।
१९. यह सुनने पर, राजा और उसके मन्त्री तथा अन्य अनगिनत लोगो ने धम्म-दीक्षा ग्रहण की और वे तथागत के शिष्य हुए ।