भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
२. धर्म तभी सद्धम्म है जब वह यह भी शिक्षा देता है कि केवल 'विद्वान होना पर्याप्त नहीं. इससे आदमी 'पण्डिताऊपन की ओर अग्रसर हो सकता हैं
१. एक बार जब भगवान बुद्ध कौसाम्बी के "सुस्वर" विहार में ठहरे हुए, एकत्रित लोगों को धम्मोपदेश दे रहे थे. उस समय वह कौसाम्बी में ही एक ब्रह्मचारी रहता था ।
२. उस ब्रह्मचारी को अभिमान था कि उस जैसा शास्त्रों का जानकार कोई नहीं । क्योंकि वह किसी दूसरे को शास्त्रार्थ करने में अपने जैसा नहीं समझता था, इसलिये वह जहां कहीं जाता अपने साथ एक जलती हुई मशाल ले जाता था ।
३. एक दिन किसी नगर के एक साधारण आदमी ने उसके इस विचित्र आचरण का कारण पूछा । उसका उत्तर था:-

४. “सँसार में इतना अधिक अन्धकार हैं. लोग इतने अधिक पथ भ्रष्ट है कि मैं जहां तक उन्हें रास्ता दिखा सकता हूँ, वहां तक रास्ता दिखाने के लिये यह मशाल साथ लिये घूमता हूँ ।"
५. तथागत ने यह सुना तो उस ब्रह्मचारी को सम्बोधित किया “अरे! यह मशाल किस मतलब के लिये है? यह मशाल लिये तुम कहा घूमते हो?”
६. ब्रह्मचारी ने उत्तर दिया- "सभी आदमी अज्ञान और अन्धकार के इतने घिरे है कि मैं उन्हें रास्ता दिखाने के लिये यह मशाल लिये फिरता हूँ ।"
७. तब भगवान् बुद्ध ने उसे पूछा- "तो क्या धर्म ग्रन्थों में जिन चार प्रकार की विद्याओं शब्द विद्या, नक्षत्र - विद्या, राज - विद्या तथा युद्ध-विद्या -- का उल्लेख है, तुम उन सबके जानकार हो?"
८. ब्रह्मचारी को मजबूर होकर वह मानना पड़ा कि उसे इनकी जानकारी नहीं है । उसने अपनी मशाल फेंक दी । तब भगवान् बुद्ध ने कहा -
९. “यदि कोई आदमी चाहे पण्डित हो और चाहे अपण्डित, दूसरों को मूर्ख समझकर उनसे घृणा करता है तो वह उस अन्धे की तरह है जो स्वयं अन्धा होकर दूसरों को मशाल दिखाता फिरता है । "
३. धर्म तभी जसद्धम्म है जब वह सिखाता है कि जिस चीज की आवश्यकता है वह 'प्रज्ञा' है
१. ब्राह्मण 'विद्या' को ही बहुत बड़ी बात समझते थे । आदमी चाहे शीलवान हो और चाहे न हो किन्तु यदि वह 'विद्वान' है, तो उनकी दृष्टि में वह 'पूज्य' था ।
२. उन्होंने कहा है कि राजा तो अपने देश में ही पूजा जाता है किन्तु विद्वान सर्वत्र पुजित होता है, इसका मतलब था कि 'विद्वान' राजा से बढ़कर हैं ।
३. तथागत ने 'प्रज्ञा' को 'विद्या' से भिन्न वस्तु माना है ।
४. कहा जा सकता है कि ब्राह्मणों ने भी 'प्रज्ञा' और 'विद्या' को एक नहीं माना ।
५. यह सही हो सकता है किन्तु भगवान् बुद्ध की 'प्रज्ञा' की कल्पना में और ब्राह्मणों की 'प्रज्ञां की कल्पना में जमीन-आसमान का अन्तर है ।
६. तथागत ने अंगुत्तर-निकाय में आये अपने एक प्रवचन मे इस भेद को बहुत अच्छी तरह स्पष्ट किया हैं ।
७. एक बार भगवान् बुद्ध राजगृह के समीप वेळुवनाराम के 'कलन्दक-निवाप' में ठहरे हुए थे।
८. उस समय मगध का एक बड़ा अमात्य वर्षकार ब्राह्मण भगवान बुद्ध के दर्शनार्थ आया । कुशल-क्षेम पूछ चुकने पर वह जाकर एक ओर बैठ गया । एक और बैठकर वर्षकार ब्राह्मण ने भगवान् बुद्ध को कहा -
९. “श्रमण गौतम । यदि किसी आदमी में ये चार गुण हैं, तो हम उसे बड़ा विद्वान समझते हैं, बड़ा आदमी मानते हैं । कौन से हैं वे चार गुण ?
१०. “श्रमण गौतम! वह १) विज्ञ होता है । जो कुछ वह सुनता है, सुनते ही वह उसके अर्थ को जानता है । वह कह सकता है कि 'इस कथन का यह अर्थ है ।' (२) उसकी स्मरण शक्ति अच्छी होती है । वह बहुत पुरानी कही गई या की गई बात को याद रख सकता है ।
११. “वह (३) अपने गृहस्थी के कार्यो में कुशल होता है, (४) वह यह जानता है कि क्या करना योग्य होगा, क्या व्यवस्था उचि होगी?
१२. “श्रमण गौतम! यदि किसी आदमी में ये चार गुण हैं, तो हम उसे बड़ा विद्वान समझते हैं, बड़ा आदमी मानते हैं । अब हे श्रमण गौतम! यदि आप मेरे कथन का समर्थन करना योग्य समझें तो समर्थन करें, खंडन करना योग्य समझें तो खण्डन करें ।
१३. “ब्राह्मण! मैं न तुम्हारा समर्थन करता हूँ और न विरोध करता हूँ । मैं उस आदमी को बड़ा विद्वान समझता हूँ, जिसमें ये चार गुण है जो कि तुम्हारे बताये चार गुणों से सर्वथा भिन्न हैं ।
१४. “हे ब्राह्मण! एक आदमी बहुत जनों के हित के लिये होता है, बहुत जनों के कल्याण के लिये होता है । उसके कारण बहुत से आदमी सुन्दर, हितकर आर्य-पथ के अनुगामी हैं ।
१५. “वह जिस विषय में मन को लगाना चाहता है, उस विषय में वह मन को लगा सकता है, जिस विषय में मन को नहीं लगाना चाहता उस विषय में वह मन को उधर जाने से रोक सकता हैं।
१६. "जिस संकल्प को वह मन में उत्पज्ञ होने देना चाहता है, उस संकल्प को मन में उत्पज्ञ होने देता है, जिस संकल्प को मन में उत्पत्र होने देना नहीं चाहता उस संकल्प को मन में उत्पन्न होने नहीं देता । इस प्रकार उसे अपने विचारों पर अधिकार होता है ।
१७. “वह जब चाहे बिना कठिनाई के बिना तकलीफ के चारों लोकोत्तर ध्यानों को प्राप्त कर सकता है तो इसी जीवन में भी सुख- विहार के लिये है ।
१८. “और हे ब्राह्मण! वह इसी जन्म में आसवों का क्षय कर, आसव-क्षय ज्ञान को प्राप्त हो, चित्त की विमुक्ति को प्राप्त करता है, प्रज्ञा द्वारा विमुक्ति को प्राप्त कर वह इसमें विहार करता हैं ।
१९. “इसलिये हे ब्राह्मण! न मैं तुम्हारा समर्थन करता हूँ और न विरोध करता हू । मैं उस आदमी को बड़ा 'विद्वान' आदमी समझता हूँ, मैं उस आदमी को 'बड़ा' आदमी समझता हूँ जिसमें कि ये चार तुम्हारे बताये गुण हों, जो गुणों से सर्वथा भित्र है ।"
२०. “श्रमण गौतम! यह अद भूत है । श्रमण गौतम! यह अदभूत है । आपने यह इतनी सुन्दर व्याख्या की है ।
२१. “मै स्वयं समझता हूं कि श्रमण गौतम में ये चारों गुण हैं । श्रमण गौतम बहुत जनों का हित करने में रत हैं । श्रमण गौतम बहु जनों के कल्याण में रत हैं । श्रमण गौतम द्वारा बहुत से आदमी सुन्दर, हितकर आर्य-मार्ग में प्रतिष्ठित हुए हैं ।
२२. “श्रमण गौतम जिस विषय में अपने मन को लगाना चाहते हैं, उस विषय में मन को लगा सकते हैं.... इस प्रकार उन्हें अपने विचारों पर अधिकार होता है ।
२३. “निश्चय से श्रमण गौतम जब चाहें बिना कठिनाई के बिना तकलीफ के चारों ध्यानों को ........ . निश्चय से श्रमण गौतम इसी जन्म में आस्त्रवों का क्षय कर, आस्त्रव क्षय ज्ञान को प्राप्त हो, चित्त की विमुक्ति को प्राप्त करते हैं, प्रज्ञा द्वारा विमुक्ति को, इसे प्राप्त कर वह इसमें विहार करते हैं।
२४. यह बिस्कूल साफ शब्दो में भवगान् बुद्ध द्वारा प्रतिपादित 'प्रज्ञा' में और ब्राह्मणों द्वारा प्रतिपादित 'प्रज्ञा' में भेद स्पष्ट कर दिया गया है ।
२५. यहां यह भी स्पष्ट हो गया कि भगवान् बुद्ध 'विद्या' की अपेक्षा 'प्रज्ञा' को क्यों अधिक महत्व देते थे ।