भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
५. धम्मचक्र प्रवर्तन
शील का मार्ग
१. तदनन्तर बुद्ध ने उन परिव्राजकों को शील का पथ वा सद्गुणों का मार्ग समझाया ।
२. उन्होंने उन्हे बताया कि शील के पथ का पथिक होने का मतलब है इन सद्गुणों का अभ्यास करना; (१) शील, (२) दान, (३) उपेक्षा, (४) नैष्क्रम्य, (५) वीर्य, (६) शान्ति, (७) सत्य, (८) अधिष्ठान, (९) करूणा, और (१०) मैत्री ।
३. उन परिव्राजकों ने बुद्ध से इन सद्गुणों का यथार्थ अर्थ समझना चाहा ।
४. तब बुद्ध ने उनकी शंका मिटा कर उन्हे सन्तुष्ट करने के लिये कहा-

५. “शील का मतलब है नैतिकता, अकुशल न करने की प्रवृत्ति और कुशल करने की प्रवृत्ति; बुराई करने में लज्जा-भय मानना । लज्जा-भय के कारण पाप से बचे रहने का प्रयास करना शील है । शील का मतलब है पापभीरूता ।
६. नैष्क्रम्य का मतलब है सांसारिक काम भोगों का त्याग ।
७. दान का मतलब है बदले में किसी भी प्रकार की स्वार्थ पूर्ति की आशा के बिना दूसरों की भलाई के निमित्त अपनी सम्पत्तिं का ही नहीं, अपने रक्त, अपने शरीर के अंगों और यहाँ तक कि अपने प्राणों तक का बलिदान कर देना ।
८. वीर्य का मतलब है सम्यक् प्रयत्न । जो कुछ एक बार करने का निश्चय कर लिया अथवा जो कुछ करने का संकल्प कर लिया उसे अपनी पूरी सामर्थ्य से करने का प्रयास करना और बिना उसे पूरा किये पीछे मुड़कर नहीं देखना ।
९. शान्ति का मतलब है क्षमा-शीलता । घृणा के उत्तर में घृणा नहीं करना यही इसका सार है । क्योंकि घृणा से तो घृणा कभी मिटती ही नहीं । क्षमाशीलता से ही घृणा का मर्दन होता है ।
१०. सत्य का मतलब है मृषावादी न होना । आदमी को कभी झूठ नहीं बोलना चाहिये । उसे सत्य और केवल सत्य ही बोलना चाहिये ।
११. अधिष्ठान का मतलब है अपने उद्देश्य तक पहुंचने का दृढ़ निश्चय ।
१२. करूणा का मतलब है सभी मानवों के प्रति प्रेमभरी दया ।
१३. मैत्री का मतलब है कि सभी प्राणियों के प्रति भ्रातृ-भावना हो, मित्रों के प्रति ही नहीं, शत्रुओं तक के प्रति, आदमियों के प्रति ही नहीं, सभी विश्वशेष प्राणियों के प्रति ।
१४. उपेक्षा का मतलब है अनासक्ति, यह दूसरों के सुख-दुःख के प्रति निरपेक्ष भाव रखने से सर्वथा भिन्न वस्तु है । यह चित्त की वह अवस्था है जिसमें प्रिय-अप्रिय कुछ नहीं है । फल कुछ भी हो उसकी ओर से निरपेक्ष रहकर साधना में रत रहना ।
१५. इन सद्गुणों का आदमी को अपनी पूरी सामर्थ्य भर अभ्यास करना होता है । इसीलिये उन्हे 'पारमिता' कहा गया है ।
६. धम्मचक्र प्रवर्तन
१. अपने धम्म का उपदेश देकर और उसकी सम्यक् व्याख्या करके बुद्ध ने परिव्राजकों से प्रश्न किया-
२. “क्या आदमी के चरित्र की पवित्रता ही संसार की भलाई की आधारशिला नहीं है?" उनका उत्तर था -- "हाँ, यह ऐसा ही है।” ३. और फिर बुद्ध ने पूछा “क्या ईर्षा, राग, अज्ञान, हिंसा, चोरी, व्यभिचार और असत्य चरित्र की पवित्रता की जड़ नहीं खोद देते? क्या व्यक्तिगत पवित्रता के लिये यह आवश्यक नहीं है कि आदमी में इतना चारित्रिक बल हो कि वह इस प्रकार की बुराइयों के वश में न आ सके? यदि किसी आदमी में व्यक्तिगत पवित्रता ही नहीं है तो वह जन-कल्याण कैसे कर सकता है?” उनका उत्तर था - "हाँ, यह ऐसा ही है।"
४. “और आदमी दूसरों को अपना गुलाम बनाना, दूसरों को अपने वश में रखना क्यों चाहते हैं? आदमी दूसरों के सुख-दुःख की ओर से उदासीन क्यों है? क्या यह इसलिये नहीं है कि एक आदमी दूसरे के प्रति योग्य व्यवहार नहीं करता?” उनका उत्तर था, “हाँ, यह ऐसा ही है।"
५. "तो क्या अष्टांग मार्ग का अनुसरण सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाणी, सम्यक् आजीविका, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक्-व्यायाम, सम्यक् स्मृति, सम्यक् समाधि-- संक्षेप में सद्धम्म के अनुसार जीवन यापन -- यदि प्रत्येक उस पथ पर चले उस सारी अमानवता का, उस सारे अन्याय का, जो एक आदमी दूसरे के प्रति करता है, अन्त नहीं कर देगा? उनका उत्तर था “हाँ, यह ऐसा ही है।”
६. अब शील या सद्गुणों का उल्लेख करते हुए कहा -- “क्या अभाव ग्रस्तों का अभाव दूर करने के लिये, क्या दरिद्रों की दरिद्रता दूर करने के लिये और सामान्य जन-कल्याण करने के लिये दान आवश्यक नहीं है? क्या जहां कष्ट है, जहां दरिद्रता है, उधर ध्यान देकर उसे दूर करने के लिये करूणा की आवश्यकता नहीं हैं? क्या निस्वार्थ भाव से काम करने के लिये निष्काम भाव की आवश्यकता नहीं हैं? क्या व्यक्तिगत लाभ न होने पर भी सतत् प्रयत्न में लगे रहने के लिये उपेक्षा की आवश्यकता नहीं है?" ७. “क्या आदमी से प्रेम करना आवश्यक नहीं है?" उनका उत्तर था, “हाँ।”
८. मैं एक कदम आगे बढ़कर कहता हूँ, प्रेम करना पर्याप्त नहीं है, जिस चीज की आवश्यकता है, वह मैत्री है। प्रेम की अपेक्षा इस का क्षेत्र व्यापक है । इस का मतलब है न केवल आदमियों के प्रति मैत्री बल्कि प्राणी मात्र के प्रति मैत्री । यह आदमियों में ही सीमित नहीं है । क्या ऐसी मैत्री अपेक्षित नहीं है? इसके अतिरिक्त दूसरी कौन सी चीज है जो सभी आदमियों को वह सुख प्रदान कर सके जो सुख आदमी अपने लिये चाहता है, आदमी का चित्त पक्षपातरहित रहे, सभी के लिये खुला, सभी के लिये प्रेम और घृणा किसी से भी नहीं ?" ९. उन सब ने कहा, “हाँ।”
१०. “लेकिन इन सद्गुणों के आचरण के साथ प्रज्ञा जुड़ी रहनी चाहिये-निर्मल बुद्धि ।”
११. “क्या प्रज्ञा आवश्यक नहीं है?" परिव्राजक मौन रहे, उन्हे अपने प्रश्न का उत्तर देने के लिये मजबूर करने की दृष्टि से तथागत ने अपना कथन जारी रखा । उन्होंने कहा :- “भला आदमी हम उसीको कहेंगे जो कोई बुरा काम न करे, बुरी बात न सोचे, बुरे तरीके से अपनी जीविका न कमाये और मुंह से कोई ऐसी बात भी न निकाले जिससे किसी की हानि हो अथवा किसी को कष्ट पहुंचे ।" परिव्राजक बोले, "हाँ, यह ऐसा ही है।"
१२. “लेकिन क्या सत्कर्म भी एक अन्धे की भाँति किये जाने चाहिये ? मैं कहता हूँ कि नहीं । यह पर्याप्त नहीं है । यदि यह पर्याप्त होता तो हम एक छोटे बच्चे के बारे में कह सकते कि वह हमेशा भला ही भला है । क्योंकि अभी एक छोटा बच्चा यह भी नहीं जानता कि शरीर क्या होता है, वह लात चलाते रहने के अतिरिक्त और शरीर से कर ही क्या सकता है? वह यह भी नहीं जानता कि वाणी क्या है? वह चिल्लाने के अतिरिक्त और उससे कोई बुरी बात कर ही क्या सकता है? वह यह भी नहीं जानता कि विचार क्या होता है? वह ज्यादा से ज्यादा प्रसन्नता के मारे किलकारी भर मार सकता है। वह यह नहीं जानता कि जीविकार्जन क्या होता है ? वह किसी बुरे तरीके से अपनी जीविका क्या कमा सकता है? वह अपनी मां की छाती से दूध पीने के अतिरिक्त और कुछ जानता ही नहीं ।"
१३. “इसलिये सद्गुणों का अनुसरण भी प्रज्ञा-पूर्वक होना चाहिए, अर्थात् निम्रल बुद्धि के साथ ।”
१४. “एक और कारण भी है जिसकी वजह से प्रज्ञा पारमिता इतनी अधिक महत्वपूर्ण और इतनी अधिक आवश्यक है । दान तो होना ही चाहिये । किन्तु बिना प्रज्ञा के दान का भी दुष्परिणाम हो सकता है । करूणा तो होनी ही चाहिये । किन्तु बिना प्रज्ञा करूणा भी बुराई की समर्थक बन जाती है । सभी दूसरी पारमिताये प्रज्ञा पारमिता की कसौटी पर खरी उतरनी चाहिये । निर्मल- बुद्धि का ही दूसरा नाम प्रज्ञा पारमिता है ।"
१५. “मेरी स्थापना है कि आदमी को अकुशल कर्म का ज्ञान होना चाहिये, अकुशल कर्म की उत्पत्ति किस प्रकार होती है, इसी तरह उसे कुशल-कर्म का भी ज्ञान होना चाहिये, कुशल कर्म की उत्पत्ति कैसे होती है? इसी प्रकार आदमी को कुशल कर्म और अकुशल-कर्म का भेद भी स्पष्ट ज्ञात होना चाहिये । इस प्रकार के ज्ञान के बिना चाहे कम - विशेष अपने में शुभ कर्म ही कुशल कर्म ही क्यों न हो, चाहे शुभ- कर्म अपने में शुभ-कर्म ही क्यों न हो, तब भी यथार्थ कुशल-भाव या यथार्थ शुभ-भाव नहीं ही है । इसीलिये मैं कहता हूँ कि प्रज्ञा एक आवश्यक सद्गुण है ।
१६. तब बुद्ध ने परिव्राजकों को इस प्रकार की प्रेरणा देते हुए अपना प्रवचन समाप्त किया :-
१७. “हो सकता है कि तुम मेरे धम्म को निराशावादी धम्म समझ बैठो, क्योंकि मैं आदमियों का ध्यान मानव-जाति के दुःख की ओर आकर्षित करता हूँ । मेरे धम्म के बारे में ऐसी धारणा बनाना गलती होगी ।”
१८. “निस्सन्देह मेरा धम्म दुःख के अस्तित्व को स्वीकार करता है, किन्तु यह उतना ही जोर उस दुःख के दूर करने पर भी देता है
१९. “मेरे धम्म में दोनों बातें है -- इस में मानव जीवन का उद्देश्य भी निहित है और यह अपने में आशा का संदेश भी है । " २०. “इसका उद्देश्य है अविद्या का नाश, जिसकी मतलब है दुःख के अस्तित्व के सम्बन्ध में अज्ञान का नाश ।”
२१. “यह आशा का संदेश भी है क्योंकि यह दुःख के नाश का मार्ग बताता है ।”
२२. “क्या तुम इस सब से सहमत हो या नहीं?” परिव्राजको का उत्तर था-"हाँ ।”
७. परिव्राजकों की धम्म - दीक्षा
१. उन पांचों परिव्राजकों ने यह तुरन्त देख लिया कि यह वास्तव में एक नया धम्म है । जीवन की समस्या के प्रति इस नये दृष्टि- कोण से वे इतने अधिक प्रभावित हुए कि सभी एक साथ कहने लगे “संसार के इतिहास में इससे पहले किसी भी धर्म के संस्थापक कभी यह शिक्षा नहीं दी कि दुनिया के दुःख की स्वीकृति ही धम्म का वास्तविक आधार है ।"
२. “संसार के इतिहास में इससे पहले कभी किसी भी धम्म के संस्थापक ने यह शिक्षा नहीं दी कि दुनिया के इस दुःख को दूर करना ही धम्म का वास्तविक उद्देश्य हैं ।”
३. “संसार के इतिहास में इससे पहले किसी ने भी कभी मुक्ति का ऐसा मार्ग नहीं सुझाया था जो इतना सरल हो, जो मिथ्या विश्वास और ‘अपौरूषेय’' शक्तियों की मध्यस्थता से इतना मुक्त हो, जो इतना स्वतन्त्र ही नहीं बल्कि जो किसी 'आत्मा' या 'परमात्मा' के विश्वास का इतना विरोधी हो और जो मोक्ष लाभ के लिये मरणान्तर किसी जीवन में विश्वास रखना या न रखना भी अनिवार्य न मानता हो ।"
४. “संसार के इतिहास में इससे पहले किसीने भी कभी ऐसे धम्म की स्थापना नहीं की, जिसका इलहाम' या 'ईश्वर वचन से किसी भी तरह का कुछ भी सम्बन्ध न हो और जिसके 'अनुशासन' आदमी की सामाजिक आवश्यकताओं के अध्ययन के परिणाम हों और जो किसी 'ईश्वर' की आज्ञायें न हों ।”
५. “संसार के इतिहास में इससे पहले किसी ने भी कभी 'मोक्ष' का यह अर्थ नहीं किया कि वह एक ऐसा 'सुख' है जिसे आदमी धम्मानुसार जीवन व्यतीत करने से, अपने ही प्रयत्न द्वारा यहीं इसी पृथ्वी पर प्राप्त कर सकता है ।"
६. उन परिव्राजकों ने जब भगवान् बुद्ध से उनके द्वारा उपदिष्ट नया सद्धम्म सुना तो इसी प्रकार अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति की ।
७. उन्हे लगा कि बुद्ध के रूप में उन्हें एक ऐसे जीवन-सुधारक मिल गये हैं, जिनका रोम-रोम धम्म की भावना से ओत-प्रोत है, और जो अपने युग के बौद्धिक ज्ञान से सुपरिचित हैं, जिन में ऐसी मौलिकता है और साहस है कि वे विरोधी विचारों की जानकारी रखने के बावजूद मुक्ति के एक ऐसे मार्ग का प्रतिपादन कर सकें, जिस मुक्ति को यहीं, इसी जीवन में आत्म-साधना और आत्म- संयम द्वारा प्राप्त किया जा सकता है ।
८. बुद्ध के लिये उनके मन में एसी असीम श्रद्धा उत्पन्न हुई कि उन्होंने उनके प्रति तुरन्त आत्म-समर्पण कर दिया और प्रार्थना की कि बुद्ध उन्हें अपना शिष्य बना लें ।
९. बुद्ध ने उन्हे 'एहि भिक्खवे' (भिक्षुओ, आओ) कहकर भिक्षु संघ में दीक्षित कर लिया । वे पंचवर्गीय भिक्षु नाम से प्रसिद्ध हुए ।