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भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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16 जून 2023
Book
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तीसरा भाग : कुलीनों तथा धार्मिकों की धम्म - दीक्षा

१. यश कुल-पुत्र की धम्म-दीक्षा

१. उस समय वाराणसी में यश नाम का एक गृहपतिपुत्र रहता था । वह तरूण था और उसकी आकृति बहुत आकर्षक थी । वह अपने माता-पिता को बहुत प्यारा था और बहुत श्री सम्पन्न था। उसके बहुत से नौकर-चाकर थे, बहुत सी पत्नियाँ थीं और उसका सारा समय नाचने-गाने, सुरा पान करने आदि में ही बीतता था । वह विलासमय जीवन व्यतीत करता था ।

२. कुछ समय बीतने पर उसे विरति ने आ घेरा । उसे इस बेहोशी से कैसे छुटकारा मिले? क्या जो जीवन वह व्यतीत कर रहा था, उससे कोई श्रेष्ठतर जीवन भी था ? यह न सोच सकने के कारण कि वह क्या करे, उसने अपने पिता का घर छोड़ देने का निश्चय किया ।

Kulino tatha Dharmik ko ki Dhamma Diksha - Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma - Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

३. एक रात उसने अपने पिता का घर छोड़ दिया और यों ही भटकने लगा, वह घूमता घूमता ऋषिपतन की ओर ही चला आया ।

४. क्लान्ति के मारे वह एक जगह बैठ गया और बैठा बैठा अकेला ही जोर जोर से बड़बड़ाने लगा “मैं कहाँ हूँ? कौन-सा रास्ता है ? ओह! कितनी परेशानी है? ओ! कितना दुःख है?"

५. वह घटना उसी रात की है जिस दिन तथागत ने ऋषिपतन में पंचवर्गीय भिक्षुओं को अपना उपदेश दिया था । ठीक उस समय जब यश ऋषिपतन की ओर बढ़ा चला आ रहा था, तथागत, जो कि ऋषिपतन में ही विराजमान थे, बहुत सबेरे उठकर, खुली हवा में टहल रहे थे । और तथागत ने देखा कि इस प्रकार के दुःखद वचन कहता हुआ यश कुल-पुत्र चला आ रहा है।

६. और तथागत ने उसकी दुःखभरी आवाज सुनकर कहा “कहीं कोई परेशानी नहीं है, कहीं कोई दुःख नहीं हैं, आ मैं तुझे स् दिखाऊंगा ।” तब तथागत ने यश कुल-पुत्र को अपना उपदेश दिया ।

७. और जब यश ने वह उपदेश सुना, वह हर्षित हुआ, वह प्रमुदित हुआ । उसने अपने सुनहरे जूते छोड़ दिये और जाकर तथागत के पास बैठ उन्हें नमस्कार किया ।

८. बुद्ध के वचन हृदयकम कर यश ने तथागत से प्रार्थना की वह उसे शिष्य रूप में स्वीकार करें ।

९. तब तथागत ने उसे “आ” कहा और उसे भी भिक्षु धम्म की दीक्षा दे दी ।

१०. यश के माता-पिता बड़े परेशान थे कि यश कहीं चला गया । पिता यश की खोज में निकला । यश का पिता ठीक उसी जगह से गुजरा जहाँ स्वयं भगवान् बुद्ध और भिक्षु-वेष में यश कुल-पुत्र बैठा था । यश पिता ने तथागत से प्रश्न किया- “ कृपया कहें कि क्या आपने मेरे पुत्र यश को कहीं देखा है ?"

११. तथागत का उत्तर था- “आर्ये आप अपने पुत्र को देख सकेंगे ।” यश का पिता आया और अपने पुत्र यश के पास ही बैठा, किन्तु उसे पहचान नहीं सका ।

१२. तथागत ने उसे बताया कि कैसे यश उनके पास आया था और कैसे उनका प्रवचन सुनकर वह भिक्षु बन गया है । तब पिता ने अपने पुत्र को पहचान लिया । उसे इस बात से प्रसन्नता हुई कि उसके पुत्र ने शील ग्रहण किये हैं ।

१३. “पुत्र यश!” यश का पिता बोला, “तुम्हारी मां तुम्हारे वियोग के दुःख से बहुत दुःखी है । घर आकर उसे सुखी करो ।”

१४. तब यश ने तथागत की ओर देखा, और तथागत ने यश के पिता से पूछा- “गृहपति ! क्या तुम यह चाहते हो कि यश फिर गृहस्थ बन जाये और जैसे पहले काम भोग का जीवन व्यतीत करता था, वैसा ही अब करे ?"

१५. यश के पिता ने उत्तर दिया -- “यदि मेरे पुत्र यश को आप के साथ ठहरना ही अच्छा लगता है, तो वह आप के साथ ही ठहरे।” यश ने एक भिक्षु ही बने रहना ठीक समझा ।

१६. विदा लेने से पहले, यश के पिता ने कहा- “भिक्षु संघ सहित तथागत मेरे घर पर भोजन करना स्वीकार करें ।”

१७. चीवर-धारण कर, भिक्षा पात्र हाथ में ले, यश कुल-पुत्र सहित तथागत यश गृहपति के घर पहुँचे ।

१८. घर आने पर मां और यश कुल-पुत्र की पूर्व भार्या ने भी तथागत के दर्शन किये । भोजनान्तर तथागत ने यश गृहपति के परिवार के लोगों को धम्मोपदेश दिया । वे बहुत प्रमुदित हुए और उन्होंने तथागत की शरण ग्रहण की ।

१९. यश के चार मित्र थे, जो वाराणसी के ही धनियों के पुत्र थे । उनके नाम थे विमल, पूर्णजित् तथा गवाम्पति ।

२०. जब यश के मित्रों ने सुना कि यश ने 'बुद्ध' और उनके धम्म की शरण ग्रहण की है, तो उन्हें लगा कि जो बात यश के लिये अच्छी है, वही उनके लिये भी अच्छी होगी ।

२१. इसलिये वे यश के पास गये और उससे कहा कि वह भगवान् बुद्ध से उनकी ओर से प्रार्थना करे कि वे उन्हें भी अपना शिष्य बना लें ।

२२. यश ने स्वीकार किया और भगवान् से प्रार्थना की- "कृपया इन मेरे चार मित्रों को धर्मोपदेश देकर कृतार्थ करें ।” भगवान् ने स्वीकार किया । यश के मित्रों ने भी 'धम्म' की दीक्षा ग्रहण की।


२. काश्यप-बन्धुओं की धम्म-दीक्षा


१. काश्यप-परिवार नामक वाराणसी में एक प्रसिद्ध परिवार था । उस परिवार में तीन भाई थे। तीनों बहुत शिक्षित थे और अत्यन्त धार्मिक ।

२. कुछ समय बाद ज्येष्ठ पुत्र ने संन्यास लेने की सोची । तदनुसार उसने गृह-त्याग किया, संन्यास ग्रहण किया और उरूवेल की ओर गया, जहां पहुंच कर उसने अपना एक आश्रम स्थापित किया ।

३. उसके दोनों छोटे भाइयों ने भी उसका अनुसरण किया और वे भी संन्यासी बन गये ।

४. वे सभी अग्निहोत्री अर्थात आग की पूजा करने वाले थे । बडी-बड़ी जटायें धारण करने के कारण वे जटिल कहलाते थे ।

५. तीनों भाइयों में से एक उरूवेल काश्यप कहलाता था, दूसरा नदी - काश्यप तीसरा गया-काश्यप ।

६. इन तीनों में से उरुवेल काश्यप के पांच सौ जटिल शिष्य थे, नदी काश्यप के तीन सौ जटिल शिष्य थे और गया- काश्यप के दो सौ जटिल शिष्य थे। इनमें से मुख्य उरूवेल काश्यप ही था ।

७. उरूवेल काश्यप की दूर-दूर तक ख्याति हो गई थी। उसके बारे में कहा जाता था कि उसे जीते जी मुक्ति प्राप्त हो गई है । फल्गु नदी के तट पर स्थित उसके आश्रम में बहुत दूर-दूर के लोग आते थे ।

८. जब भगवान् बुद्ध को उरूवेल काश्यप की ख्याति का पता लगा तो उनके मन में आया कि उरूवेल काश्यप को धम्मोपदेश दिया जाय और सम्भव हो तो धम्म दीक्षा भी ।

९. उसके निवास का पता-ठिकाना पाकर तथागत उरूवेल पहुँचे ।

१०. तथागत उससे मिले और उसे शिक्षित करने तथा दीक्षित करने का योग्य अवसर पाने के लिये बोले - "काश्यप । यदि तुम्हें असुविधा न हो तो एक रात मैं तुम्हारी आश्रम में रहूँ ।"

११. काश्यप का उत्तर था, “मैं इस से सहमत नहीं हूँ । मुचलिंद नाम का एक जंगली नागराजा यहां रहता है । उसी का यहाँ शासन चलता है । वह बड़ा भयानक है । वह सभी अग्नि-पूजक साधुओं का विशेष विरोधी है । वह रात को इस आश्रम में आता है और बड़ी हानि पहुंचाता है । मुझे डर है कि वह तुम्हें भी वैसा ही कष्ट न दे जैसा वह मुझे देता है ।”

१२. काश्यप को यह पता नहीं था कि नाग लोग बुद्ध के मित्र और अनुयायी बन चुके थे । लेकिन तथागत इसे जानते थे ।

१३. इसलिये तथागत ने पुनः आग्रह किया : "इसकी कोई सम्भावना नहीं है कि वह मुझे किसी तरह का कष्ट देगा । काश्यप ! एक रात मुझे अपनी अग्निशाला में रहने दे ।”

१४. काश्यप बार-बार इनकार करता रहा और तथागत बार-बार आग्रह करते रहे ।

१५. तब काश्यप ने कहा, “मैं अधिक विवाद नहीं करना चाहता । किन्तु मुझे डर बहुत है । जो अच्छा समझें, करे ।"

१६. तथागत ने उसी समय अग्नि शाला में प्रवेश किया और अपना आसन जमा लिया ।

१७. नागराज मुचलिन्द ने अपने समय पर शाला में प्रवेश किया । लेकिन काश्यप के स्थान पर वहाँ उसने तथागत को बैठे देखा ।

१८. तथागत की शान्त गम्भीर मुद्रा को देखकर मुचलिन्द को ऐसा लगा मानो वह किसी दिव्य पुरुष के सामने है । उसने सिर झुका कर तथागत की पूजा की ।

१९. उस रात काश्यप को ठीक-ठीक नींद नहीं आई । वह यही सोचता रहा कि उसके अतिथि के साथ क्या बीती होगी? इसलिये वह बड़ी घबराहट लिये जागा । उसे डर था कि शायद उस रात उसका अतिथि जला ही दिया गया हो ।

२०. प्रातःकाल होने पर अपने अनुयायियों सहित काश्यप देखने के लिये आया । मुचलिन्द द्वारा भगवान् बुद्ध को हानि पहुंचाये जाने की तो बात ही क्या उन्होंने देखा कि मुचलिन्द भगवान् बुद्ध की पूजा कर रहा है ।

२१. यह दृश्य देखा तो काश्यप को लगा कि वह कोई चमत्कार देख रहा है, उसकी आंखों के सामने कोई प्रातिहार्य घट रहा है ।

२२. उस चमत्कार से प्रभावित होकर काश्यप ने भगवान् बुद्ध से प्रार्थना की कि वे वहीं एक आश्रम में रहें और वह स्वयं उनकी देख-भाल करेगा ।

२३. भगवान बुद्ध ने वहां ठहरना स्वीकार किया ।

२५. लेकिन काश्यप ने कभी कोई ऐसा अवसर नहीं दिया । वह समझता था कि तथागत एक चमत्कार कर सकने वाले के अतिरिक्त और कुछ नहीं हैं ।

२६. एक दिन तथागत ने स्वयं ही काश्यप से पूछा “क्या तुम अर्हत् हो ?”

२७. “यदि अर्हत् नहीं हो, तो यह अग्निहोत्र तुम्हारा क्या कल्याण करेगा ?”

२८. काश्यप बोला- “मै नहीं जानता कि अर्हत् क्या होता है? कृपया मुझे समझायें ।”

२९. तब भगवान् ने कहा- “आर्य अष्टांगिक मार्ग पर चलने वाले पथिक के पथ के बाधक सभी राग-द्वेषों को जिसने जीत लिया है, वह अर्हत् है । अग्निहोत्र किसी को पाप मुक्त नहीं कर सकता । "

३०. यू काश्यप अभिमानी स्वभाव का था । लेकिन असके मन पर तथागत के तर्क का प्रभाव पड़ा । अपने मन को कुछ झुकाकर और विनम्र बनाकर, यहां तक कि उसे सद्धम्म के ग्रहण करने का पात्र बनाकर उसने कहा कि लोक-गुरु बुद्ध की बुद्धि और उसकी बुद्धि का कोई मुकाबला नहीं ।

३१. और इस प्रकार, अंत में सभी शंकाओं का समाधान होने पर, उरूवेल काश्यप ने तथागत के धम्म को स्वीकार किया और उनका अनुयायी हो गया ।

३२. अपने गुरु के अनुगामी बन, काश्यप के सभी शिष्यों ने भी सद्धम्म ग्रहण किया । इस प्रकार काश्यप और उसके सभी शिष्य हो गये ।

३३. तब उरूवेल काश्यप ने अग्निहोत्र करने के अपने सभी पात्र आदि उठाकर नदी में फेंक दिये जो जाकर पानी में तैरने लगे ।

३४. नदी - काश्यप और गया - काश्यप ने जो नदी के नीचे की ओर रहते थे अग्रिहोत्र के सामान को नदी में बहते जाते देखा । वे बोले- "यह सारा सामान हमारे भाई का है। उसने यह सारा सामान फेंक क्यों दिया है? कोई न कोई असाधारण घटना घटी होगी ।” वे बहुत अधिक बेचैन हो गये । अपने पांच सौ अनुयायियों सहित वे अपने भाई से मिलने के लिये नदी के ऊपर की ओर आगे बढ़े ।

३५. सभी अनुयायियों सहित अपने भाई को श्रमण-वेष पहने देख उनके मन में नाना तरह के विचार उठे । तब उन्होंने इसका कारण जानना चाहा । उरूवेल काश्यप ने उन्हें बताया कि उसने किस प्रकार बुद्ध के धम्म को अंगिकार कर लिया है । ३६. वे बोले- “अब हमारे भाई ने बुद्ध के धम्म को स्वीकार कर लिया है, तो हमें अभी उसका अनुकरण करना चाहिये ।”

३७. उन्होंने अपने बड़े भाई से अपनी इच्छा व्यक्त की । तब अपने सभी अनुयायियों सहित वे दोनों भाई तथागत का प्रवचन सुनने के लिये सामने उपस्थित किये गये । तथागत ने अग्निहोत्री धर्म और अपने धम्म की तुलना करते हुए प्रवचन किया ।

३८. उन दोनों भाइयों को उपदेश देते हुए भगवान् बुद्ध ने कहा- "जिस प्रकार लकड़ी से लकड़ी के रगड़ खाने पर आग पैदा होती है उसी प्रकार असम्यक विचार जब आपस में रगड़ खाते हैं तो अविद्या का जन्म होता है ।"

३९. “काम, क्रोध तथा अविद्या ये ही वह अग्नि हैं जो सभी चीजों को भस्मसात् कर देती है और संसार में दुःख और शोक का कारण बनती है ।"

४०. "लेकिन यदि एक बार आदमी सही रास्ते पर चल सके और काम, क्रोध तथा अविद्या रूपी आग को बुझा सके तो फिर विद्या और पवित्र आचरण जन्म लेते है ।"

४१. “इसलिये जब एक बार आदमी को अकुशल कर्मों से घृणा हो जाती है तो उससे तृष्णा का क्षय होता है । तृष्णा का क्षय करने से ही आदमी श्रमण बनता है ।"

४२. उन बड़े ऋषियों ने जब ये बुद्ध वचन सुने तो अग्निहोत्र से उनकी सर्वथा उपेक्षा हो गई। उन्होंने भी बुद्ध का शिष्यत्व स्वीकार करने की इच्छा की ।

४३. काश्यप-बन्धुओं की दीक्षा भगवान बुद्ध की बड़ी विजय थी । क्योंकि जनता के मन पर उनका बड़ा प्रभाव था ।


३. सारिपुत्र तथा मौगल्यायन की धम्म-दीक्षा

१. जिस समय भगवान् बुद्ध राजगृह में निवास करते थे, उसी समय अपने ढाई सौ अनुयायियों के साथ सञ्जय नाम का एक प्रसिद्ध परिव्राजक भी वहीं रहता था ।

२. उसके शिष्यों में दो ब्राह्मण तरूण भी थे - सारिपुत्र और मौगल्यायन ।

३. सारिपुत्र और मौगल्यायन सञ्जय की शिक्षाओं से सन्तुष्ट न थे और किसी श्रेष्ठतर धर्म की खोज में थे ।

४. एक दिन की बात है । पञ्चवर्गीय भिक्षुओं में से एक भिक्षु अश्वजित् पूर्वाहन में अपना चीवर पहन तथा पात्र और चीवर ले, भिक्षाटन करने के लिये राजगृह नगर में प्रविष्ट हुए ।

५. सारिपुत्र पर अश्वजित की गम्भीर गति - विधि का बडा प्रभाव हुआ । अश्वजित् स्थविर को देख सारिपुत्र ने सोचा निश्चय से यह भिक्षु उन भिक्षुओं में से एक होगा, जो संसार में इस पद के योग्य हैं । यह कैसा होगा, यदि मैं इस भिक्षु के पास जाऊं और इससे पूंछू कि मित्र, तुम किसके नाम से प्रव्रजित हुए हो? तुम्हारा गुरु कौन है? तुम किस का धर्म मानते हो?”

६. फिर सारिपुत्र ने सोचा- "यह समय इस भिक्षु से कुछ पूछने का नही ? यह भिक्षाटन के लिये भीतरी आँगन में प्रवेश कर चुका है । कैसा हो यदि सभी अर्थियों की तरह मैं इस भिक्षु के पीछे पीछे हो लू?"

७. राजगृह में भिक्षाटन कर चुकने पर अश्वजित स्थविर प्राप्त भिक्षा ग्रहण कर वापस लौट गये । तब सारिपुत्र वहीं पहुंचे जहाँ अश्वजित् थे । समीप पहुंच कर कुशल-क्षेम पूछ एक ओर खड़े हो गये ।

८. एक और खड़े हुए सारिपुत्र परिव्राजक ने अश्वजित स्थविर से कहा- “मित्र! आपकी शक्ल शान्त है । आपकी छबि आभा-पूर्ण है । मित्र! आप किसके नाम से प्रव्रजित हुए है? आपका गुरु कौन है? आप किस के धर्म को मानते हैं?"

९. अश्वजित् का उत्तर था- “मित्र! निश्चय से जो शाक्य-कुल- प्रव्रजित महान् श्रमण हैं, मैं उन्हीं के नाम से प्रव्रजित हुआ हूँ, वे ही मेरे गुरु है और मैं उन्हीं के धम्म को मानता हूँ ।"

१०. “और हे पूज्यवर ! आपके गुरु का सिद्धान्त क्या है? वह आपको किस बात की शिक्षा देते हैं?"

११. “मित्र! मैं एक नया ही शिष्य हूँ, मुझे प्रव्रजित हुए थोडा ही समय हुआ है । मैंने अभी-अभी - कुछ ही समय पूर्व - इस धम्म- विनय को ग्रहण किया है । मैं विस्तार पूर्वक तो आपको धम्म बता नहीं सकता । लेकिन मै आप को संक्षेप में ही बताऊँगा ।"

१२. तब परिव्राजक सारिपुत्र ने स्थविर अश्वजित से कहा- “मित्र! कम या अधिक आप जितना चाहे मुझे बतायें, लेकिन मुझे उसका सार अवश्य बता दें । मैं सार ही चाहता हूं। बहुत से शद्धो को लेकर क्या करूंगा?"

१३. तब अश्वजित् ने सारिपुत्र को तथागत की शिक्षाओं का सार बताया, जिससे सारिपुत्र का पूर्ण संतोष हो गया ।

१४. यद्यपि सारिपुत्र और मौगल्यायन भाई भाई नहीं थे । लेकिन वे दोनों दो भाइयों के ही समान थे । उन्होंने परस्पर एक दूसरे को वचन दे रखा था । जिसे सत्य की पहले प्राप्ति हो वह दूसरे को इसकी सूचना देगा । यही दोनों की आपस की वचन बद्धता थी ।

१५. तदनुसार सारिपुत्र वहाँ पहुँचे जहाँ मौगल्यायन थे । उन्हें देखकर मौगल्यायन ने सारिपुत्र से कहा – “मित्र! आपकी शकल शान्त है । आपकी दबि आभा-पूर्ण है । तो क्या आपने सत्य प्राप्त कर लिया है?”

१६. “हाँ मित्र! मैंने सत्य प्राप्त कर लिया है ।” “और मित्र ! आपने सत्य कैसे पा लिया है?" तब सारिपुत्र ने वह सारी घटना कह सुनाई जो उसके और अश्वजित के साथ घटी थी ।

१७. तब मौगल्यायन से सारिपुत्र से कहा- "तो मित्र ! हम भगवान तथागत के पास चलें ताकि वह हमारे शास्ता बनें ।”

१८. सारिपुत्र ने कहा- “मित्र ! यह जो ढाई सौ परिव्राजक यहाँ रहते हैं, ये हमारी ओर ही देखकर यहाँ रहते हैं । इससे पहले कि हम उन्हें छोड़कर जायें, हमारे लिये यह उचित है कि हम उन्हें बता दें । वे जो चाहेंगे करेंगे ।"

१९. तब सारिपुत्र और मौगल्यायन वहाँ गये जहाँ वे थे । उनके पास जाकर उन्होंने कहा- “हम महाश्रमण की शरण ग्रहण करने जा रहे है । वह महाश्रमण ही हमारे शास्ता हैं ।”

२०. उन्होंने उत्तर दिया :- “आपके ही कारण हम यहाँ रहते रहे हैं और आप को ही मानते रहे हें। यदि आप महाश्रमण के अधीन ब्रह्मचर्य का जीवन व्यतीत करेंगे, तो हम सब भी यही करेंगे ।”

२१. तब सारिपुत्र और मौगल्यायन सञ्जय के पास गये और पहुंचकर सञ्जय से कहा :- "मित्र! हम तथागत की शरण में जाते हैं । वह तथागत ही हमारे शास्ता हैं ।"

२२. सञ्जय बोला -- “आप मत जायें । हम तीनों मिलकर इन सबकी गुरुवाई करेंगे ।"

२३. दूसरी और तीसरी बार भी सारिपुत्र और मौदगल्यायन ने अपनी बात दोहराई । सञ्जय का भी वही उत्तर था ।

२४. तब इन ढाई सौ परिव्राजकों सहित सारिपुत्र और मौगल्यायन राजगृह के वेळुवन उद्यान में वहाँ पहुंचे जहाँ तथागत विराजमान थे ।

२५. तथागत ने उन्हें -- सारिपुत्र और मौगल्यायन को दूर से आते देखा । उन्हें देखकर तथागत ने भिक्षुओं को सम्बोधन किया- “भिक्षुओ, ये दो मित्र चले आ रहे हैं, सारिपुत्र और मौगल्यायन, ये दोनों मेरे श्रावक- युगल होंगे, श्रेष्ठ शिष्य-युगल ।”

२६. जब वे वेळुवन पहुंचे तो वह जहाँ तथागत थे वहाँ गये । वहा पहुँचकर उन्होंने तथागत के चरणों में सिर से वन्दना की ओर प्रार्थना की- "भगवान! हमें आप से प्रव्रज्या मिले, उपसम्पदा मिले।"

२७. तब भगवान् ने धम्म-द -दीक्षा के निश्चित शद्ध भिक्षुओं! आओ (एहि भिक्खवे ) कहे और ढाई सौ जटाधारियों सहित सारिपुत्र और मौगल्यायन भगवान् बुद्ध की शरण आये ।