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भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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16 जून 2023
Book
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४. राजा बिम्बिसार की धम्म - दीक्षा

१. राजगृह मगध - नरेश श्रेणिक बिम्बिसार की राजधानी थी ।

२. जटिलों की इतनी बडी संख्या के बुद्ध की शरण में चले जाने से हर किसी की जबान पर तथागत की चर्चा थी ।

३. इस प्रकार बिम्बिसार को तथागत के नगर में आगमन का पता लग गया ।

Raja bimbisar Ki dhammadiksha - Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma - Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

४. बिम्बिसार नरेश ने सोचा- “उन कट्टर जटिलों के मत को बदल देना, हँसी-खेल नहीं है । निश्चय से वह भगवान होंगे, अर्हत होंगे, सम्यक सम्बुद्ध होंगे, विद्या और आचरण से युक्त होंगे, सुगति प्राप्त होंगे, लोक के जानकार होंगे, सर्वश्रेष्ठ होंगे, आदमियों के मार्ग- दर्शक होंगे, देवता और आदमियों के शास्ता होंगे । वे निश्चय से स्व-बुद्ध धम्म की शिक्षा दे रहे होंगे ।”

५. “वह आदि में कल्याणकारक, मध्य में कल्याणकारक, अन्त में कल्याणकारक धम्म की शिक्षा दे रहे होंगे । वे अर्थो और शब्दों सहित धम्म का ज्ञान करा रहे होंगे। वे पूर्ण परिशुद्ध श्रेष्ठ जीवन प्रकाशित कर रहे होंगे। ऐसे दिव्य पुरुष का दर्शन करना अच्छा है ।”

६. इस प्रकार मगध के बारह लाख ब्राह्मणों और गृहपतियो के साथ मगध नरेश बिम्बिसार जहां भगवान थे वहाँ पहुँचा । उनके पास पहुंच और विनम्रता पूर्वक अभिवादन कर वह उनके निकट बैठ गया । उन बारह लाख ब्राह्मणों और गृहपतियो में से भी कुछ ने भगवान् को विनम्रता पूर्वक अभिवादन किया और पास बैठ गये, कुछ ने भगवान का कुशल-क्षेम पूछा और निकट बैठ गये, कुछ ने भगवान् को हाथ जोड़कर नमस्कार किया और निकट बैठ गये, कुछ ने अपना नाम और गोत्र कहा और भगवान् के निकट बैठ गये और कुछ यूंही चुपचाप समीप आ बैठे ।

७. मगध के उन बारह लाख ब्राह्मणों और गृहपतियों ने उरूवेल काश्यप को भी महाश्रमण के भिक्षुओं में देखा । उनमें से कुछ सोचने लगे । “क्या उरूवेल काश्यप महाश्रमण की अधीनता में श्रेष्ठ जीवन व्यतीत कर रहा है, अथवा महाश्रमण ही उरुवेल काश्यप की अधीनता में श्रेष्ठ जीवन व्यतीत कर रहा है?"

८. मगध के उन बारह लाख ब्राह्मणों और गृहपतियों के मन की बात जान तथागत ने उरूवेल काश्यप को सम्बोधित कर कहा- "हे उरूवेलवासी! तूने क्या देखा जो अग्नि-परिचर्य्या छोड़ दी ? यह कैसे हुआ कि तुने अग्निहोत्र का परित्याग कर दिया?”

९. काश्यप ने उत्तर दिया- "यज्ञों से रूप, शब्द, रस, गन्ध, स्त्री स्पर्श की ही आशा की जा सकती थी । जब मैंने समझ लिया कि मैं वासनामय रूप, रस, शब्द, गन्ध और स्पर्श अविशुद्ध हैं तो फिर मैने यज्ञ-त्याग की कामना नहीं की ।"

१०. “लेकिन यदि हर्ज न हो, तो यह बताओं कि तुम्हारा यह विचार कैसे बदल गया?”

११. तब ऊरूवेल काश्यप ने अपने स्थान से उठ, अपने एक कंधे को नंगा किया और भगवान् बुद्ध के चरणों में सिर रखकर वन्दना की और निवेदन
किया: “मै शिष्य हूँ और तथागत मेरे शास्ता है ।” तब मगध के उन असंख्य ब्राह्मणी और गृहपतियों ने जाना कि उरुवेल का महाश्रमण की अधीनता में श्रेष्ठ जीवन व्यतीत कर रहा हैं ।

१२. तब मगध के उन बारह लाख ब्राह्मणों और गृहपतियो के मन की बात को जानकर भगवान् बुद्ध ने उन्हें धम्मोपदेश दिया । जिस प्रकार बिना धब्बों का स्वच्छ कपडा रंग को अच्छी तरह पकड़ लेता है, उसी तरह बिम्बिसार प्रमुख उन मगध के बारह लाख ब्राह्मणों और गृहपतियों को विरज, विमल ज्ञान चक्षु प्राप्त हो गया । उनमें से एक लाख ने अपने उपासकत्व की घोषणा की।

१३. इस दृश्य का साक्षी होकर, धम्म को समझ कर, धम्म की तह तक जाकर, सन्देह रहित होकर, विचिकित्सा को जीतकर और पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर मगध-नरेश बिम्बिसार बोला :- “भगवान ! जिस समय मै राजकुमार था, उस समय मेरी पांच आकांक्षायें थीं, वे पांचों अब पूरी हो गई ।”

१४. “पूर्व समय में, भगवान! जब मैं राजकुमार था, मेरे मन में इच्छा उत्पन्न हुई कि मेरा राज्याभिषेक हो जाता । भगवान! यह मेरी पहली इच्छा थी, जो अब पूरी हो गई । और तब अर्हत् सम्यक् सम्बुद्ध मेरे राज्य में आते ! यह मेरी दूसरी इच्छा थी । भगवान! जो अब पूरी हो गई । और मैं उन भगवान् की सेवा में उपस्थित होता! यह मेरी तीसरी इच्छा थी, भगवान! जो अब पूरी हो गई । और वह भगवान मुझे धम्मोपदेश देते! यह मेरी चौथी इच्छा थी भगवान! जो अब पूरी हो गई । और मैं उन भगवान् का धम्म हृदयंगम कर पाता! यह मेरी पाँचवी इच्छा थी भगवान! जो अब पूरी हो गई । भगवान! जिस समय मैं राजकुमार था, उस समय मेरी ये पाँच इच्छाये थीं जो अब पूरी हो गई ।"

१५. “अद्भुत है भगवान्! अद्भुत है । जैसे कोई औंधे को सीधा कर दे, अथवा ढके हुए को उघाड दे, अथवा पथ-भ्रष्ट को मार्ग दिखा दे, अथवा अंधेरे में प्रदीप जला दे ताकि आँख वाले रास्ता देख सकें, उसी तरह से भगवान ने नाना प्रकार से धम्मोपदेश दिया है । मैं भगवान् की शरण ग्रहण करता हूं । आज दिन से जब तक इस शरीर में प्राण है, तब तक के लिये भगवान् मुझे अपना शरणागत उपासक माने ।”


५. अनाथपिण्डिक की धम्म दीक्षा

१. सुदत्त कोसल जनपद की राजधानी श्रावस्ती का एक नागरिक था । कोसल जनपद पर राजा प्रसेनजित् का अधिकार था । प्रसेनजित् का श्रेष्ठी (खजांची ) था । क्योंकि वह दरिद्रों को बहुत दान देता था, इसलिये उसका नाम अनाथपिण्डक पड गया था ।

२. जिस समय भगवान् राजगृह में ठहरे हुए थे, उस समय सुदत्त किसी निजी काम से राजगृह गया । वह राजगृह श्रेष्ठी के यहाँ ठहरा था, जिसकी बहन से उसका विवाह हुआ था ।

३. जब वह वहाँ पहुँचा तो उसने देखा कि उसका साला श्रेष्ठी भिक्षुसंघ तथा भगवान् बुद्ध को भोजन कराने के लिए इतनी बड़ी तैयारी करा रहा है कि उसने सोचा कि या तो किसी आवाह - विवाह की तैयारी है या राजा को निमंत्रण दिया गया है ।

४. जब उसे ठीक बात की जानाकरी हुई तो वह भगवान बुद्ध का दर्शन करने के लिये अत्यन्त उत्सुक हो उठा । वह उसी रात भगवान् बुद्ध के दर्शनार्थ निकल पड़ा ।

५. और तथागत ने अनाथपिण्डक के हृदय की निर्मलता को तुरन्त भाँप लिया । उन्होंने उसका सांत्वना भरे शब्दों में स्वागत किया । अपने आसन पर बैठ चुकने पर अनाथपिण्डक ने भगवान् से कुछ सदुपदेश सुनने की
इच्छा प्रकट की ।

६. तथागत ने उसकी इच्छापूर्ति करने के निमित्त एक प्रश्न से आरम्भ किया । “कौन है जो हमारा निर्माण करता है, और हमें -- जैसे चाहता है -- चलाता है? क्या यह कोई ईश्वर है? कोई सृष्टिकर्ता ? यदि ईश्वर निर्माणकर्ता है तो सभी प्राणियों को चुपचाप व उसकी इच्छा के अधीन चलना होगा । वे कुम्हार के बनाये हुए बरतनों के समान होंगे । यदि यह संसार ईश्वर द्वारा निर्मित होता उसमें दुःख, आपत्तियां और पाप कैसे होते? क्योंकि पवित्र अपवित्र दोनों का तो रचयिता उसीको मानना होगा । यदि दुःख, आपत्तियों और पाप का मूल-स्त्रोत ईश्वर को न माना जाय, तो उससे भिन्न और उससे स्वतन्त्र एक दूसरा कारण स्वीकार करना होगा । तब ईश्वर सर्व-शक्तिमान नहीं रहेगा । इस प्रकार तुमने देखा कि ईश्वर के विचार की ही जड खुद गई ।”

७. “तो फिर क्या 'ब्रह्मा' से सृष्टि की उत्पत्ति हुई है? 'ब्रह्म' भी सृष्टि का कारण नहीं हो सकता । जिस प्रकार बीज में से पौधे उत्पत्ति होती है- उसी प्रकार सभी चीजों की उत्पत्ति होती है। तो फिर एक ही 'ब्रह्म' से सभी चीजें कैसे उत्पन्न हो सकती है? यदि 'ब्रह्म' सर्वव्यापक है, तो फिर वह निश्चय से उनका निर्माता तो नहीं ही है ।”

८. “फिर यह भी कहा जाता है कि 'आत्मा' से ही उत्पति हुई है । यदि 'आत्मा' ही निर्माता है तो उसने सभी वस्तुओं को वाञ्छनीय रूप ही क्यों नहीं दिया? दुःख सुख वास्तविक सत्य है, और उनका बाह्य अस्तित्व है । वह 'आत्मा' की कृति कैसे हो सकते हैं?" ९. “यदि तुम यही मत बना लो कि न कहीं कोई सृष्टि-कर्ता है और न कहीं कोई हेतु प्रत्यय है तो फिर जीवन में जो साधना की जाती है, जो साधनों तथा साध्य का मेल बिठाने का प्रयत्न किया जाता है, उस सब का कोई प्रयोजन नहीं होगा ?"

१०. “इसलिये हमारा कहना है कि जो भी चीजें अस्तित्व में आती हैं वे सब सहेतुक होती हैं। न वे ईश्वर द्वारा निर्मित होती है, न 'ब्रह्म' द्वारा, न 'आत्मा' द्वारा और न बिना हेतु के यूंही अस्तित्व में आती हैं। हमारे अपने कर्म ही हैं जो अच्छे बुरे परिणामों को जन्म देते हैं।"

११. “सारा संसार ‘प्रतीत्य-समुत्पाद' के नियम से बंधा है और जितने भी हेतु हैं वे अचैतसिक नहीं हैं। जिस सोने से सोने का प्याला निर्मित होता है वह आदि से अंत तक सोना ही सोना होता हैं ।”

१२. “इसलिये हम ‘ईश्वर' और उससे प्रार्थना करने सम्बन्धी मिथ्या धारणाओं का त्याग करें, हम व्यर्थ की सूक्ष्म काल्पनिक उड़ानों में न उलझे रहें, हम ‘आत्मा' और 'आत्मार्थ' से मुक्त हों क्योंकि सभी चीजें सहेतुक हैं, इसलिए हम कुशल-कर्म करें ताकि उनका परिणाम भी कुशल ही हो ।”

१३. अनाथपिण्डक बोला- “तथागत के वचनों का सत्य मैं हृदयंगम कर रहा हूँ । मैं अपने अज्ञान को और भी अधिक दूर करना चाहता हूँ । जो कुछ मै निवेदन करना चाहता हूँ, उसे सुनकर भगवान् मुझे मेरे कर्तव्य का आदेश दें ।”

१४. “मुझे काम-काम बहुत रहता है और क्योंकि मैंने बहुत धन इकट्ठा कर रखा है, इसलिए बहुत बातों की फिकर करनी पड़ती है । तो भी मैं अपने कार्य को आनन्दपूर्वक करता हूँ और बिना किसी प्रमाद के उसमें लगा रहता हूँ । मेरे बहुत से नौकर-चाकर हैं और उन सब की जीविका मेरे ही व्यापार की सफलता पर निर्भर करती है ।”

१५. “अब मैंने सुना है कि आपके शिष्य प्रव्रज्या के सुखों के गुण गाते हैं और गृहस्थ जीवन की गर्हा करते हैं। वे कहते हैं कि 'तथागत ने अपना राज्य और परम्परागत ऐश्वर्य का त्याग कर दिया और सद्धम्म का पथ प्राप्त किया है। इस प्रकार उन्होंने सारे संसार को निर्वाण का रास्ता दिखाया है । "

१६. “मै जो उचीत हो वही करना चाहता हूँ और मेरी उत्कट अभिलाषा है कि अपने मानव-बन्धुओं की कुछ सेवा कर सकू । मैं जानना चाहता हूँ कि क्या मेरे लिये यह उचित है कि मैं अपनी सम्पत्ति, अपने घर और अपने कार- बार का त्याग कर दू आपकी तरह ही धम्म-जीवन का सुख प्राप्त करने के लिये घर से बेघर हो जाऊँ?”

१७. तथागत का उत्तर था- “धम्म- जीवन का सुख हर उस व्यक्ति के लिये प्राप्य है जो आर्य अष्टांगिक मार्ग का पथिक हैं । जो धन से चिपका हुआ है उसके लिये यही अच्छा है कि धन की आसक्ति से अपने हृदय को विषाक्त बनाने के बजाय धन का त्याग कर दे लेकिन जिसकी धन में आसक्ति नहीं है और जिसके पास धन है तथा वह उसका उचित उपयोग करता है, ऐसा आदमी अपने मानव-बन्धुओं के किए एक वरदान है।”

१८. “मै तुम्हें कहता हूँ कि गृहस्थ ही बने रहो । अपने कारोबार में अप्रमाद पूर्वक लगे रहो । आदमी का जीवन, ऐश्वर्य और अधिकार उसे अपना दास नहीं बनाते किन्तु जीवन, ऐश्वर्य और अधिकार के प्रति जो आदमी की आसक्ति है, वह उसे अपना दास बना लेती है ।"

१९. “जो भिक्षु इसलिये संसार का त्याग करता है कि भिक्षु बनकर आराम तलबी का जीवन व्यतीत करे, उसे इससे कुछ लाभ नहीं होगा । क्योंकि आलस्य का जीवन घृणित जीवन है और शक्ति का अभाव स्पृहणीय नहीं है ।”

२०. “जब तक अन्तःप्रेरणा न हो तब तक तथागत का धम्म किसी को भी प्रव्रजित होने वा संसार का त्याग करने के लिये नहीं कहता, तथागत का धम्म हर आदमी से यही मांग करता है कि वह 'आत्म-दृष्टि से मुक्त हो, उसका हृदय शुद्ध हो, उसे काम- भोगादि सुखों की प्यास न हो और वह श्रेष्ठ जीवन व्यतीत करे ।”

२१. “और आदमी चाहे जो करें, चाहे वे शिल्पी रहें, चाहे व्यापार करें, चाहे सरकारी नौकरी करें अथवा संसार त्याग कर ध्यान- भावना में रत रहें, उन्हें अपना कार्य पूरे दिल से करना चाहिए । उन्हें परिश्रमी और उत्साही होना चाहिए । और यदि वे उस कमल की तरह जो पानी में रहता हुआ भी पानी से अछूता रहता है, जीवन संघर्ष में लगे रहने पर भी अपने मन में ईर्षा और घृणा को जगह नहीं देते, यदि वह संसार में रहते हुए भी स्वार्थ भरा नहीं बल्कि परमार्थ भरा जीवन व्यतीत करते हैं तो इसमें कुछ भी सन्देह नहीं कि उनका मन आनन्द, शान्ति और सुख से भर जाएगा ।"

२२. अनाथपिण्डक को लगा कि यह सत्य का धम्म है, सरलता का धम्म है और प्रज्ञा का धम्म है ।

२३. उसकी तथागत के सद्धम्म में प्रगाढ़ आस्था हो गई । वह तथागत के चरणों पर नतमस्तक हुआ और प्रार्थना की कि उसे प्राण रहने तक शरणागत उपासक जाने ।