भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
८. रट्ठपाल की धम्म-दीक्षा
१. एक बार जब भिक्षुसंघ सहित भगवान बुद्ध कुरु देश में चारिका कर रहे थे तो वह कुरु-जनपद के ही थुल्लकोट्ठित नाम के एक निगम में ठहरे ।
२. जब कुरु-वासियों को इसका पता लगा तो वे भगवान् बुद्ध के दर्शनार्थ पहुँचे ।
३. जब वे आकर बैठ गये, तब तथागत ने उन्हें धम्मोपदेश दिया । उपदेश श्रवण कर चुकने पर थुल्लकोट्ठित के ब्राह्मण गृहप उठे और श्रद्धा भक्तिपूर्वक नमस्कार कर चले गये ।

४. उन ब्राह्मण गृहपतियों के बीच रट्ठपाल नाम का एक तरूण बैठा था, जो कि एक श्रेष्ठ कुलोत्पन्न था। उस के मन में आया, जहाँ तक मैं समझ सकता हूँ जिस धम्म का भगवान् बुद्ध ने उपदेश दिया है, गृहस्थी में रहते हुए उसे उतनी पवित्रता, उतनी सम्पूर्णता के साथ आचरण में लाना आसान नहीं ।
५. यह कैसा हो यदि मैं बाल दाढी मुण्डा, काषाय वस्त्र धारण कर गृहस्थ न रह प्रव्रजित बन जाऊं - घर-बारी से बे-घर-बारी ।
६. जब ब्राह्मण गृहपति अभी बहुत दूर नहीं भी गये होंगे, रट्ठपाल भगवान बुद्ध के पास आया और अभिवादन कर चुकने के अनन्तर उसने अपना विचार तथागत की सेवा में निवेदन किया । उसने प्रार्थना की कि उसे प्रव्रज्या मिले और उपसम्पदा मिले । ७. तथागत ने पूछा, “रट्ठपाल ! इसके लिये क्या तुम्हें अपने माता-पिता की अनुज्ञा है?"
८. “भगवान ! नहीं।”
९. “जिन्हे माता-पिता से अनुज्ञा प्राप्त नहीं होती उन्हे में प्रव्रजित नहीं करता ।”
१०. तरूण बोला, “मै अनुज्ञा प्राप्त करने का प्रयास करुंगा।” वह उठा और अत्यन्त विनम्रता पूर्वक भगवान् बुद्ध से विदा ग्रहण की । घर पहुंचकर उसने माता-पिता से अपना विचार प्रकट किया और उनसे भिक्षु बनने के लिये अनुज्ञा मांगी ।
११. माता पिता बोले -- “रट्ठपाल ! तू हमारा प्रिय पुत्र है, अत्यन्त प्रिय पुत्र । तू ही हमारा एकमात्र पुत्र है । तू आराम में रहा है, आराम में पला है । तुझे दुःख का कुछ अनुभव नहीं । जा खा, पी, मौज कर और जितने चाहे पुण्य कार्य कर । हम तुम्हें प्रव्रजित होने की अनुज्ञा नहीं देते । "
१२. “तुम नहीं रहोगे तो हमारा जीना दूभर हो जायेगा । हमारे लिये जीने में कुछ आनन्द नहीं रहेगा । हम तुम्हें जीते जी, घर से बेघर हो भिक्षु बनने की अनुज्ञा क्यों दें?"
१३. रट्ठपाल ने दूसरी और तीसरी बार भी अपनी प्रार्थना दोहराई । उसके माता पिता का एक ही उत्तर था ।
१४. जब वह इस प्रकार अपने माता-पिता की अनुज्ञा प्राप्त करने में असफल रहा, तो वह तरूण नंगी जमीन पर लेट गया और बोला- “या तो मैं भिक्षु बनूंगा, या यहीं पड़ा पड़ा मर जाऊंगा ।”
१५. उसके माता-पिता ने भिक्षु बनने के प्रति अपना विरोध प्रकट करते हुए उससे उठ बैठने का बहूत आग्रह किया । लेकिन रट्ठपाल मुंह से एक शब्द नहीं बोला। उन्होंने दूसरी बार, और तीसरी बार भी - इस प्रकार बार-बार आग्रह किया, तब भी पाल चुप ही रहा ।
१६. उसके माता-पिता ने रट्ठपाल के मित्रों को सारी बात बता कर उनसे कहा कि वे अपनी और से रट्ठपाल से आग्रह करें । १७. उसके मित्रों ने तीन बार प्रयास किया, किन्तु वह एक शब्द नहीं बोला । तब उसके मित्र रट्ठपाल के माता-पिता के पास गये और बोले- “वहाँ वह नंगी जमीन पर पड़ा है । कहता है या तो भिक्षु बनूंगा, या वहीं पडा मर जाऊंगा । यदि तुम अनुज्ञा नहीं दोगे तो वह जीते जी कभी नहीं उठेगा । लेकिन यदि तुम अनुज्ञा दे दोगे तो उसे भिक्षु बनने पर भी देख सकोगे । यदि भिक्षु-जीवन में उसका मन नहीं रमेगा अर्थात् उसे भिक्षु रहना अच्छा नहीं लगेगा तो यहीं वापस चले आने के अतिरिक्त दूसरा क्या करेगा? आप उसे अपनी अनुज्ञा दे ही दे ।"
१८. “अच्छा, हम अपनी अनुज्ञा देते हैं । किन्तु भिक्षु बन चुकने के बाद हमें मिलने के लिये आना होगा ।"
१९. उस के मित्र तुरन्त रट्ठपाल के पास गये । उन्होंने उसे जाकर कहा- "तुम्हारे माता- -पिता ने तुम्हें इस शर्त पर भिक्षु बनने की अनुमति दे दी है कि भिक्षु बनने पर तुम उनसे मिलने आओगे ।"
२०. तब रट्ठपाल उठ बैठा और सशक्त होने पर तथागत के पास पहुंच और अभिवादन कर चुकने पर एक ओर बैठकर निवेदन किया -- “मुझे अपने माता-पिता से भिक्षु बनने की अनुज्ञा मिल गई है । मेरी प्रार्थना है कि भगवान् मुझे संघ में दीक्षित कर लें ।”
२१. रट्ठपाल ने प्रव्रज्या और उपसम्पदा प्राप्त की । थुल्लकोट्ठित में यथेच्छ ठहर कर इसके दो सप्ताह बाद, भगवान बुद्ध चारि के लिये श्रावस्ती की ओर चल पड़े । श्रावस्ती वे अनाथपिण्डक के जेतवनाराम में विहार करने लगे ।
२२. अकेले, एकान्त में रहते हुए सतत प्रयत्न-शील रट्ठपाल ने अचिर काल में ही उस उद्देश्य को प्राप्त कर लिया जिसकी प्राप्ति के लिये कुल पुत्र घर से बेघर हो भिक्षु जीवन ग्रहण करते हैं- मानव का श्रेष्ठतम आदर्श ।
२३. तब वह भगवान् बुद्ध के पास गया और अभिवादन कर चुकने के अनन्तर बोला- “आप की अनुज्ञा से मैं अपने माता-पिता को देख आना चाहता हूँ ।"
२४. अपने चित्त से रट्ठपाल के चित्त को जान कर और रट्ठपाल के पुनः गृहस्थ न बनने के बारे में पूरी तरह आश्वस्त होकर तथा ने उसे जब चाहे जाने की अनुमति दे दी ।
२५. तब अत्यन्त विनम्रतापूर्वक भगवान बुद्ध से विदा ग्रहण कर, अपना पात्र चीवर ले रट्ठपाल थुलकोट्ठित की ओर चारिका के लिये निकल पड़ा जहां पहुँच कर उसने कुरु नरेश के मृगोद्यन में विहार किया ।
२६. दूसरे दिन प्रातःकाल जब वह भिक्षाटन के लिये निकला तो प्रत्येक घर के सामने भिक्षा के निमित्त खड़ा होता हुआ पा अपने ही घर के द्वार पर आ पहुंचा ।
२७. अन्दर, कमरे के बीच दरवाजे में, उसका पिता कंघी से अपने बाल सँवार रहा था । रट्ठपाल को दूर से आता देख कर बोला- ऐसे ही सिरमुंडोने मेरे इकलौते प्रिय पुत्र को घर से बेघर बना दिया ।
२८. इसलिये अपने ही पिता के घर से रट्ठपाल को कुछ नहीं मिला, एक इनकार तक नहीं; मात्र गालियाँ ।
२९. ठीक उसी समय घर की एक दासी पहले दिन का बासी चावल फेंकने जा रही थी । रट्ठपाल ने उसे कहा:-“बहन यदि इसे फेंकने जा रही है तो इसे मेरे पात्र में ही डाल दे ।”
३०. जब दासी उसके पात्र में बासी चावल डाल रही थी, उसने रट्ठपाल के हाथ, पाँव और स्वर पहचान लिया । वह दौडी दौ अपनी मालकिन के पास गई और बोली -- “मालकिन ! मालुम होता है कि छोटे मालिक वापस लौट आये हैं।”
३१. मां बोली, “यदि तेरा कहना ठीक है तो तू दास्ता के बंधन से इसी क्षण मुक्त हुई ।” वह दौडी दौडी अपने पति के पास गई और कहा कि उसने सुना है कि उसका पुत्र लौट आया है ।
३२. झाड़ी के नीचे बैठा रट्ठपाल वह बासी चावल खा रहा था कि पिता आ पहुंचा । बोला -- "प्रिय पुत्र । क्या यह हो सकता है कि तुम ही बैठे यह बासी भात खा रहे हो ? क्या तुम्हें अपने घर नहीं आना चाहिये था?"
३३. रट्ठपाल का उत्तर था, “गृहपति । हम बेघरों का क्या घर ? हम तो घर छोड़ चुके । हाँ, मैं तुम्हारे घर आया था, जहां मुझे कुछ नहीं मिला, इन्कार भी नही; मात्र गालियां । ”
३४. “पुत्र! आओ । घर चलें ।" "नहीं गृहपति! मेरा आज का भोजन समाप्त हो गया ।”
३५. “अच्छा तो, पुत्र कल का भोजन ग्रहण करने का वचन दो ।”
३६. भिक्षु रट्ठपाल ने मौन से स्वीकार कर लिया ।
३७. तब पिता घर के भीतर गया । उसने आज्ञा दी कि सोने का ढेर लगाकर उसे चटाई से ढक दिया जाय । उसके बाद उसने अपनी पुत्र-वधु से जो रट्ठपाल की पूर्व - भार्या थी कहा कि वह अपने को अच्छे से अच्छे उस शृंगार से अलंकृत करे जिसमें अलंकृत देखकर उसका पति उससे प्रसन्न होता था ।
३८. रात के बीतने पर घर में अच्छे से अच्छा भोजन तैयार कर रट्ठपाल को तैयारी की सूचना दी गई । उस पूर्वाह्य में रट्ठपाल उचित ढंग से चीवर धारण किये तथा अपना पात्र - चीवर लिये आकर अपने लिये सज्जित आसन पर विराजमान हुए ।
३९. तब उस सोने के ढेर पर से चटाई हटवाकर रट्ठपाल के पिता ने कहा- "यह तुम्हारा मातृ-धन है । यह पीतृ-धन है । यह तुम्हारे दादा के समय से चला आया है । तुम्हारे पास भोगने के लिये बहुत है और पुण्य करने के लिये भी बहुत है ।”
४०. “पुत्र । आ । अपनी श्रमण-चर्या को त्याग दो । गृही के निम्नस्तर के जीवन को पुनः अंगीकार कर ले । भोग भी भोग और पुण्य भी कर ।"
४१. रट्ठपाल का उत्तर था :- "गृहपति ! यदि मेरा कहना मानो तो सोने के इस सारे ढेर को गाड़ी में लदवाकर बीच गंगा में फेंकवा दो । यह किस लिये? क्योंकि इस से तुम्हें दुःख दौर्मनस्य, क्लेश, मन और शरीर की पीड़ा और कष्ट ही होने वाला है।" ४२. उसके पांव पकड़ कर रट्ठपाल की अन्य पत्नियां पूछने लगीं कि आखिर वे अप्सरायें कैसी हैं जिनके लिये वह यह ब्रह्मचर्य वास कर रहा है?
४३. रट्ठपाल का उत्तर था- "बहनों । किन्हीं अप्सराओं के लिये नहीं ।"
४४. अपने लिये “बहनों” सम्बोधन सुना तो सभी देवियां मूर्छित होकर जमीन पर गिर पडी ।
४५. रट्ठपाल ने पिता से कहा, “गृहपति । यदि भोजन कराना है तो दो, कष्ट मत दो ।”
४६. “पुत्र! भोजन तैयार है, करो", कहकर पिता ने रट्ठपाल को यथेच्छ भोजन करावाया ।
४७. भोजनान्तर रट्ठपाल कुरु-नरेश के मृगोद्यान में चला गया और वहाँ पहुचकर मध्यान्ह की कड़ी धूप के समय एक वृक्ष की छाया के नीचे बैठ गया ।
४८. अब राजा ने अपने माली को आज्ञा दे रखी थी कि उसके बाग को देखने आने से पहले वह उसे ठीक-ट -ठाक करके रखे । माली अपना काम कर रहा था, उसने रट्ठपाल को एक वृक्ष के नीचे बैठा देखा । उसने राजा को सूचना दी कि बाग और तो सब तरह से ठीक-ठाक है, लेकिन, एक वृक्ष के नीचे वह रट्ठपाल विराजमान है जिन के बारे में महाराज ने सुना हैं ।
४९. “आज उद्यान-यात्रा रहने दो । आज मैं उन श्रमण के दर्शन करूंगा ।" जितना भी पाथेय आवश्यक था, उस सब की तैयारी की आज्ञा दे, अपने अनुयायियों को साथ ले वह राजकीय रथ पर चढ़ा और रट्ठपाल को देखने के लिये नगर से बाहर निकला ।
५०. जहां तक रथ से जाना योग्य था, वही तक रथ से जाकर और आगे पैदल चलकर, अपने अनुयायियों सहित राजा वहां पहुँचा जहां रट्ठपाल विराजमान थे । कुशल-क्षेम की बात-चीत हो चुकने पर स्वयं अभी भी खडे हुए राजा ने रट्ठपाल को फूलों की एक ढेरी पर बैठने का निमंत्रण दिया ।
५१. "नही राजन् । आप वहां बैठे। मै अपने स्थान पर बैठा हूँ ।"
५२. संकेत किये गये स्थान पर बैठकर राजा ने कहा- "रट्ठपाल ! चार तरह की हानियाँ हैं जिन के कारण आदमी दाढ़ी मूछ मुड़वा, काषाय वस्त्र धारण कर घर से बेघर हो जाते हैं - (१) बुढापा, (२) गिरता हुआ स्वास्थ्य, (३) दरिद्रता, (४) निकट सम्बन्धियों का मरण । "
५३. “एक आदमी को लो, जो वृद्ध होने पर, बहुत आयु प्राप्त हो जाने पर, जरा-जीर्ण हो जाने पर, अन्तिम समय के नजदीक आ पहुँचने पर उसे या तो और कमाने में कष्ट अनुभव होता है या जो कुछ उसके पास है उस से गुजारा नहीं चलता, तो वह घर से बेघर होने का निश्चय कर लेता है । इसे बुढापे से उत्पन्न होने वाली हानि कहते हैं । लेकिन तुम्हारी तो अभी चढ़ती जवानी है, काले काले केश हैं जिन्हें सफेदी छू भी नहीं गई है; तुम्हे तो वार्धक्य से उत्पन्न होने वाली किसी हानि का खतरा नहीं । तुमने क्या जाना, , देखा या सुना है कि तुम घर से बेघर हो गये?"
५४. “या एक आदमी को लो जो रोग ग्रस्त है, जिसे बड़ा कष्ट है और जो बहुत बीमार है, उसे या तो और कमाने में कष्ट अनुभव होता है या जो कुछ उसके पास है उससे गुजारा नहीं चलता, तो वह घर से बेघर होने का निश्चय कर लेता है । इसे गिरते हुए स्वास्थ्य से उत्पन्न होने वाली हानि कहते हैं । लेकिन तुम न तो बीमार ही हो और न तुम्हें कष्ट ही है, तुम्हारा हाजमा अच्छा है . तुम्हें गिरते हुए स्वास्थ्य से उत्पन्न होने वाली किसी हानि से कोई खतरा नहीं । तुमने क्या जाना, देखा या सुना है कि तुम घर से बेघर हो गये हो?"
५५. “या एक आदमी को जो बड़ा धनी रहा है, जिसके पास बड़ी सम्पत्ति रही है और धीरे धीरे उसका नाश हो गया है या तो उसे और कमाने में कष्ट अनुभव होता है या जो कुछ उसके पास है उससे गुजारा नहीं चलता, तो वह घर से बेघर होने का निश्चय कर लेता है । इसे दरिद्रता से उत्पनन होने वाली हानि कहते हैं । लेकिन तुम तो न दरिद्र हो न सम्पत्ति शून्य हो... तुम्हें तो दरिद्रता से उत्पन्न होने वाली किसी हानि से कोई खतरा नही, तुमने क्या जाना, देखा या सुना कि तुम घर से बेघर हो गये हो?”
५६. " या एक आदमी को लो जिसके सगे-सम्बन्धी जाते रहे हैं, जिसके रिश्तेदारों का मरण हो गया है उसे या तो और कमाने में कष्ट होने लगता है या जो कुछ उसके पास है उस से गुजारा नहीं चलता, तो वह घर से बेघर
होने का निश्चय कर लेता है । इसे सम्बन्धियों के मरण से उत्पन्न होने वाली हानि कहते है । लेकिन तुम्हारे तो मित्रों और सगे- सम्बन्धियों की कमी नहीं । तुम्हे तो सगे-सम्बन्धियों के मरण से उत्पन्न होने वाली किसी हानि से कोई खतरा नहीं । तुमने क्या जाना देखा या सुना कि तुम घर से बेघर हो गये ?"
५७. “राजन! मैं घर से बेघर इसलिये हो गया कि मैंने मैं चार बाते जानी देखी और जानने वाले तथा देखने वाले सम्यक सम्बुद्ध से सुनी.
(क) संसार अनित्य है, निरन्तर परिवर्तनशील हैं ।
(ख) संसार का कोई मालिक वा संरक्षक नहीं ।
(ग) हमारा कुछ भी नहीं, हमें सभी कुछ पीछे छोड़ जाना है ।
(घ) तृष्णा के वशीभूत होने से ही संसार दुःखी हैं।”
५८. "यह अद्भुत है । यह अद्भुत है," राजा कह उठा, “तथागत का कथन कितना सत्य है !”