भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
२. यशोधरा और राहुल से भेंट
१. तब तथागत को शुद्धोदन घरमें लिवा ले गया । परिवार के सभी लोगों ने उन्हें अभिवादन किया ।
२. लेकिन राहुल-माता यशोधरा नही आई । जब शुद्धोदन ने सूचना भिजवाई तो उसने कहला भेजा:- “मै किसी योग्य समझी जाऊंगी तो सिद्धार्थ यहीं मुझे मिलने आयेगे ।”
३. अपने सभी सम्बन्धियों से भेंट हो चुकने पर सिद्धार्थ ने पुछा - "यशोधरा कहां है?” उत्तर दिया गया- "उसने आने से इनकार कर दिया है।” सिद्धार्थ तुरन्त उठे और सीधे उसके भवन में गये ।

४. सारिपुत्र और मौगल्यायन को, जिन्हे वे यशोधरा के कमरे में भीतर तक साथ ले गये थे, तथागत ने कहा- "मै तो मुक्त हूँ । लेकिन यशोधरा अभी मुक्त नहीं है । इतने लम्बे अर्से तक मुझे नहीं देखा है, इसलिये वह बहुत दुःखी है। जब तक उसका दुःख आँसुओं के मार्ग से बह न जायेगा, उसका जी भारी रहेगा । यदि वह तथागत का स्पर्श भी कर ले तो उसे रोकना नहीं ।"
५. यशोधरा, सोच-विचार में गहरी डूबी हुई अपने कमरे में बैठी थी । तथागत ने प्रवेश किया तो भक्ति- बाहुल्य से उसका वही हाल था जो किसी लबालब भरे पात्र का हो और जो अपने में समा न सके ।
६. वह यह भूल गई कि उसका स्नेहभाजन महामानव बुद्ध है, लोक-गुरू हैं, सत्य का महान् उपदेष्टा है । उसने बड़े जोर से उसके चरण धरे और जोर-जोर रोने लगी ।
७. लेकिन जब उसे इसका ध्यान आया कि शुद्धोदन भी वहाँ आ गया है तो उसे लज्जा आई । वह उठी और बड़ी भक्त सहित एक और बैठ गई ।
८. शुद्धोदन ने यशोधरा की ओर से बोलते हुए कहा- "इसका यह व्यवहार कुछ क्षणिक भावना का परिणाम नहीं है । इसने बड़ी गहरी भक्ति का परिचय दिया है। इन सात वर्षो में, जब से तुम इसे छोड़ कर चले गये, जब इसने सुना कि सिद्धार्थ ने अपना सिर मुंडवा लिया है, इसने भी वैसा ही किया, जब इसने सुना कि सिद्धार्थ ने गहनों और सुगन्धित द्रव्यों का परित्याग कर दिया, इसने भी वैसा ही किया; और जब इसने सुना कि सिद्धार्थ एकाहारी हो गये, तब से यह भी मृत्तिका पात्र में एक ही बार आहार ग्रहण करने लगी ।"
९. “यदि यह क्षणिक भावुकता नहीं है, तो यह सब इसके साहस की ही परिचायक है ।"
१०. तब सिद्धार्थ ने यशोधरा को असके महान् पुण्य की याद दिलाई और उस महान् साहस की जिसका परिचय उसने सिद्धार्थ की प्रव्रज्या के समय दिया था । उन्होंने कहा कि जब वे बोधिसत्व की अवस्था मे बुद्धत्व प्राप्त करने के लिये प्रयत्नशील थे, उस समय उसकी पवित्रता, उसकी कोमलता तथा उसकी भक्ति ही उनका सबसे बड़ा संबल सिद्ध हुई थी । यह उसीका “कर्म" था और यह महान् पुण्य का परिणाम था ।
११. यशोधरा की वेदना वचनों से परे की बात थी । किन्तु उसने जो धीरता और वीरता दिखाई उसने उसके आध्यात्मिक उत्तराधिकार को चार चाँद लगा दिये और उसे भी अनुपम पद प्रदान किया ।
१२. तब यशोधरा ने सात वर्ष के राहुल को एक राजकुमार की तरह सजाया और बोली-
१३. “यह श्रमण, जो ब्रह्मा के समान है, तुम्हारे पिता है । उनके पास अक्षय निधि है जिसे मैंने अभी तक नहीं देखा हैं । उनके पास जा और वह अक्षय निधि माँग, क्योंकि वह तेरा उत्तराधिकार है ।"
१४. राहुल बोला - “मेरा पिता कौन है? मैं तो एक बाबा शुद्धोदन को ही पिता जानता हूँ ।"
१५. यशोधरा ने बच्चे को गोद में लिया और खिड़की में से दिखाया- “वह देख, वह तेरे पिता हैं, और शुद्धोदन नहीं ।” उस समय तथागत भिक्षुसंघ के बीच बैठे भिक्षा ग्रहण कर रहे थे और वहाँ से दूर नहीं थे ।
१६. तब राहुल उनके पास गया और ऊपर मुंह उठाकर निर्भयतापूर्वक, किन्तु बड़े ही स्नेह-स्निग्ध स्वर में बोला-
१७. “क्या तुम मेरे पिता नहीं हो?" और उनके पास खड़ा ही खड़ा कहने लगा- “श्रमण ! तुम्हारी छाया बड़ी सुखकर है!” तथागत निःशब्द रहे ।
१८. जब भोजन समाप्त हो गया, तथागत ने आशीर्वाद दिया और महल से विदा हुए। राहुल पीछे-पीछे हो लिया और अपना उत्तराधिकार माँगता रहा ।
१९. राहुल को किसी ने नही रोका, न स्वयं तथागत ने ही ।
२०. तथागत ने सारिपुत्र की ओर देखा और कहा - "राहुल उत्तराधिकार चाहता है । मैं उसको वह नाश्वान् निधि नहीं दे सकता जो अपने साथ चिन्तायें लाती हैं, लेकिन मैं इसे श्रेष्ठ जीवन का उत्तराधिकार दे सकता हूँ जो अपने में एक अक्षय निधि है ।"
२१. तब राहुल को ही संबोधित करके तथागत बोले- “सोना, चाँदी और हीरे मेरे पास नहीं हैं । किन्तु यदि तू आध्यात्मिक निधि चाहता है और उसे ले सकने तथा संभाल कर रखने में समर्थ है तो वह मेरे पास बहुत है । मेरी अध्यात्म निधि मेरे धम्म का मार्ग ही है। क्या तू उन के संघ में प्रविष्ट होना चाहता है जो अपना जीवन साधना में व्यतीत करते है और जो भी ऊंचे से ऊँचा आदर्श हैं - ऊंचे से ऊंचा सुख है, और जो प्राप्य है, उसे प्राप्त करने का प्रयास करते हैं?”
२२. राहुल ने दृढ़तापूर्वक कहा - "प्रविष्ट होना चाहता हूँ।”
२३. जब शुद्धोदन ने सुना कि राहुल भी भिक्षु संघ में शामिल हो गया, , उसे बड़ा क्लेश हुआ ।
३. शाक्यों द्वारा स्वागत
१. जब तथागत अपने शाक्य जनपद में पधारे तो उन्होंने देखा कि उनके जनपदवासी दो भागों में विभक्त हैं- कुछ अनुकूल हैं, कुछ प्रतिकूल ।
२. इससे उन्हें उस पुराने मतभेद की याद आई, जिसका परिचय शाक्यों ने उस समय दिया था जब कि कोलियों के विरूद्ध युद्ध छेड़ने का प्रश्न शाक्यों के विचाराधीन था और जिस चर्चा में उसने ऐसा महत्वपूर्ण भाग लिया था ।
३. जो उस समय उसके विरोधी थे उन्होंने अभी भी उसकी महानता को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था और उसे साधारण अभिवादन तक नहीं किया था । जो उसके अनुकूल थे, उन्होंने प्रति परिवार एक-एक तरूण उसके संघ में दीक्षित होने के लिए देना तय किया था। इन सबने अब संघ में दीक्षित होकर, तथागत के साथ ही राजगृह जाने का संकल्प किया ।
४. जिन परिवारों ने अपने अपने यहाँ से एक एक पुत्र देने का निश्चय किया था, उनमें एक परिवार शुक्लोदन का भी था ।
५. शुक्लोदन के दो पुत्र थे, एक था अनुरुद्ध जो बहुत ही सुकुमार था, और दूसरा था महानाम ।
६. तब महानाम अनुरुद्ध के पास गया- “या तो तुम गृह त्याग करो, या मै करता हूँ ।” अनुरुद्ध का उत्तर था- "मैं सुकुमार हूँ । मेरे लिए गृहस्थी का त्याग करना कठिन है । तुम त्याग कर दो।"
७. "लेकिन अनुरुद्ध! मुझसे यह तो सुनो कि गृहस्थी में क्या क्या करना पड़ता है? पहले तो तुम्हें खेत में हल जुतवाना होता है । जब यह हो गया तब खेतों में बीज डलवाना होता है। जब यह हो गया, तब खेतों को पानी से सिंचवाना होता है । जब यह हो गया, तब पानी निकलवाना होता है। जब यह हो गया, तब पौधों की निराई करानी होती है। जब यह हो गयी, तो फसल को कटवाना होता है । जब यह हो गया, तो फसल को ढोकर उठवा ले जाना होता है । जब यह हो गया, तो उसकी पूली बंधवाना होता है । जब यह हो गया, तो बैलों से रौंदवाना होता है । जब यह हो गया, तो तिनके पृथक कराना होता है । जब यह हो गया, तो भूसी पृथक करना होता है । जब यह हो गया तो उसे फटकवाना होता है । जब यह हो गया तो फसल को कोठों में भरवाना होता है । जब यह हो गया, तो फिर अगले वर्ष यही क्रम दोहराना होता है । और यह कम प्रत्येक वर्ष चालू रखना होता है ।”
८. “कामों का तो कोई अन्त नहीं । आदमी के कामों की समाप्ति तो कभी होती ही नहीं । ओह! हमारे काम कब खत्म होंगे? ओह ! हमारे काम कब समाप्त होंगे? इन पाँचो इन्द्रियों और उनके भोगों के रहते हुए, हम कब आराम से रह सकेंगे ? हाँ, प्रिय अनुरुद्ध कामों का तो कोई अन्त नहीं । आदमी के कामों की समाप्ति तो कभी होती नहीं ।"
९. अनुरुद्ध बोला-- "तो गृहस्थी को तुम ही संभालो । मैं ही घर से बेघर होता हूँ ।”
१०. तब अनुरुद्ध शाक्य अपनी मां के पास गया -- “मां, मैं गृह त्याग कर प्रव्रजित होना चाहता हूँ । मुझे अनुमति दे दो ।"
११. अनुरुद्ध शाक्य के ऐसा कहने पर उसकी मां बोली- “ अनुरुद्ध! तुम दोनों मेरे प्रिय पुत्र हो । तुम दोनों में से मै किसी में कोई दोष नहीं देखती । मै जानती हूँ कि मृत्यु आयेगी तो मुझे तुमसे खुदा कर देगी, किन्तु मैं जीते जी प्रव्रजित होने की अनुमति कैसे दे सकती हूँ?"
१२ दूसरी बार फिर अनुरुद्ध ने अपनी प्रार्थना दोहराई । दूसरी बार भी उसे वही उत्तर मिला । तिसरी बार फिर अनुरूद्ध ने अपनी मां से प्रार्थना की।
१३. उस समय शाक्य जनपद पर भद्दिय शाक्य राज्य करता था । वह अनुरुद्ध शाक्य का मित्र था । अनुरूद्ध की मां ने सोचा कि भद्दिय-शाक्य कभी अपने राज्य को छोड़ कर नही जा सकता । इसलिये बोली -- “ अनुरुद्ध ! यदि शाक्य राजा भद्दिय राज्य का त्याग करे तो तू भी उसके साथ प्रव्रज्ञित हो जा सकता है ।"
१४. तब अनुरुद्ध भद्दिय के पास पहुंचा और उससे कहा -- “मित्र ! मेरी प्रव्रज्या में तुम बाधक हो रहे हो ।”
१५. “मित्र! यदि मै बाधक हूं, तो वह बाधा दूर हो। मै तुम्हारे साथ हूँ । प्रसन्नतापूर्वक संसार त्याग कर दो।”
१६. “प्रिय मित्र! आ, हम दोनों इकट्ठे संसार त्याग करें ।”
१७. भद्दिय बोला -- “मित्र! मै, करूँगा । मैं संसार त्याग करने में असमर्थ हूँ । और जो कुछ तुम मुझे करने के लिये कहो, मैं करूँगा। तुम अकेले ही प्रवजित हो जाओ ।"
१८. “मित्र! मां ने मुझे कहा है कि यदि तुम प्रव्रजित होओ, तो मै भी हो सकता हूँ। और तुमने अभी अभी कहा है 'यदि मैं बाधक हूँ, तो वह बाधा दूर हो । मैं तुम्हारे साथ हूँ । प्रसन्नतापूर्वक संसार त्याग कर दो।' इसलिए मित्र! आओ, हम दोनों इकट्ठे संसार त्याग करें ।"
१९. तब शाक्य-राजा भद्दिय अनुरुद्ध से बोला- “मित्र! सात वर्ष तक प्रतीक्षा करो । सात वर्ष की समाप्ति कर हम इकट्ठे प्रव्रजित होंगे।"
२०. “मित्र! सात वर्ष का समय बहुत होता है । मै सात वर्ष प्रतीक्षा नहीं कर सकता ।”
२१. भद्दिय ने छ: वर्ष, पाँच वर्ष और इस प्रकार घटाते घटाते एक वर्ष प्रतीक्षा करने की बात कही । फिर ग्यारह महीने, इस महीने और इस प्रकार घटाते घटाते पन्द्रह दिन प्रतीक्षा करने की बात कही । अनुरुद्ध का एक ही उत्तर था- “इतना समय बहुत होता है ।”
२२. तब भद्दिय बोला- “अच्छा मित्र ! एक सप्ताह प्रतीक्षा करो। इतने समय में मैं अपने भाइयों और पुत्रों को राज्य सौंप दूं ।”
२३. अनुरूद्ध बोला- “सात दिन बहुत नहीं होते । इतने दिन मैं प्रतीक्षा करूंगा ।”
२४. तब शाक्य राजा भद्दिय, अनुरुद्ध, आनन्द, भृगु, किम्बिल और देवदत्त जैसे कभी वह अपनी चतुरंगिणी सेना सहित उद्यान- क्रिड़ा के लिये साथ साथ जाते थे, उसी प्रकार अब भी वह अपनी चतुरंगिणी सेना को साथ ले घर से निकले । उपाली नाई भी साथ हो लिया । सब मिलाकर उनकी संख्या सात हो गई ।
२५. कुछ दूर जाने पर उन्होंने अपनी सेना को वापिस लौटा दिया और सीमा पार कर दूसरे जनपद में प्रवेश किया । उन्होने अपने सुन्दर गहने कपड़े उतारे, उनकी गठरी बनाई और उपाली नाई से बोले- 'उपाली! तुम वापिस कपिलवस्तु चले जाओ । तुम्हारे जीने के लिए यह सब पर्याप्त हैं । हम तथागत की शरण ग्रहण करने जा रहे हैं ।' और वे चले गये ।
२६. वे चले गये और वापिस कपिलवस्तु लौटने के लिए उपाली ने विदा ली ।