भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
४. सिद्धार्थ को गृहस्थ बनाने का अंतिम प्रयास
१. यह सोच कि अब वह अपने पुत्र को फिर कभी न देख सकेगा, शुद्धोदन जोर जोर रोया ।
२. तब शुद्धोदन ने अपने मन्त्री और अपने पुरोहित से पूछा कि क्या वे जाकर सिद्धार्थ को यहीं रोके रखने का और अपने परिवार ही सम्मिलित हो जाने का प्रयास कर सकते हैं?
३. राजा की इच्छा के अनुसार मन्त्री और पुरोहित विदा हुए और अभी भगवान बुद्ध रास्ते में ही थे कि उनके पास जा पहुँचे ।
४. उन्होंने यथोचित अभिवादन किया और उनकी अनुज्ञा पाकर एक और बैठ गये ।

५. जिस समय तथागत वृक्ष की छाया के नीचे बैठे थे, राज-पुरोहित ने निवेदन किया --
६. “हे राजकुमार! जिस राजा के हृदय को आपकी विदाई के तीर ने बुरी तरह बांधा है और जिस की आंखों से आंसुओं की धारा बहती रहती है, उस राजा की भावनाओं का जरा तो ख्याल करें । उसकी कामना है कि आप फिर घर में चले आयें। वह तभी शान्ति से मर सकेगा ।" उसका कथन हैं--
७. “मैं जानता हूँ कि आप धम्म- स्थित है और मैं यह भी जानता हूँ कि आपका यह संकल्प वज्र के समान दृढ़ है । लेकिन इस प्रकार घर छोड़ कर चले जाने से उत्पन्न वियोगाग्नि से मेरा दिल जल रहा है।”
८. "हे धम्म- प्रिय, धम्म के लिए ही आप अपने इस संकल्प को छोड़ दें ।”
९. “कुछ समय के लिए पृथ्वी के राज्य का उपभोग करें; बाद में शास्त्र सम्मत विधि से आरण्यवास भी कर सकते हैं । अपने दुःखी सम्बन्धियों के प्रति निर्दयी न बनें। सभी के प्रति दयावान होना ही धर्म है। "
१०. “धम्म की साधना अनिवार्य तौर पर जंगल में ही नही होती, साधु नगर में रहकर भी मोक्ष-लाभ कर सकता है । ज्ञान और आचरण ही धम्म के यथार्थ साधन हैं । साधु-भेष और वनवास तो केवल कायरता के द्योतक हैं ।”
११. “शाक्य-राजा दुःख के सागर में डूबा हुआ है, जिसमें तीव्र वेदना की लहरे उठ रही है। इसलिए तुम उसका उद्धार करो, क्योंकि उसकी वही दुरवस्था है जो समुद्र में डूबती हुई गौ की ।"
१२. “और उस रानी - उस प्रजापति गौतमी की और भी ध्यान दें, जिसने आपको पाल-पोस कर इतना बड़ा किया, जो अभी तक अगस्त्य लोक को नहीं पधारी है। क्या आप उसकी तनिक भी चिन्ता नहीं करेंगे जो बिना बछड़े की गौ की तरह निरन्तर रँभाती रहती हैं?"
१३. “निश्चय से आप अपने दर्शन से अपनी पत्नी को तो संतुष्ट रखना ही चाहेंगे, जो अपने पति के जीवित रहते भी एक विधवा की तरह दुःखी रहती हैं, अथवा एक हंसिनी की तरह जिसका हंस उससे पृथक कर दिया गया हो, अथवा उस हथिनी की तरह जिसका हाथी उसे जंगल मैं छोड़ कर चला गया हो ।”
१४. राज-पुरोहित के ये वचन सुन उस धम्म-ज्ञाता ने उन पर क्षण भर विचार किया और तब उसे इस प्रकार उत्तर दिया-
५. भगवान बुद्ध का उत्तर
१. “मेरे प्रति राजा का जो वात्सल्य भाव है, उससे मैं सुपरिचित हूँ, विशेष रूप से वह जो उसने मेरे प्रति दरसाया है, लेकिन यह सब होते हुए भी, क्योंकि मैं संसार के दुःखमय रुप से भी सुपरिचित हूँ, इसीलिए मैं अपने संबंधियों का त्याग करने के लिये मजबूर
२. “यदि संसार में प्रियजनों से यह अनिवार्य वियोग न होता तो कौन है जो अपने प्रियजनों के साथ ही न रहता ? लेकिन, एक बार होने पर भी, यह वियोग फिर दुबारा होकर रहेगा, इसीलिए मैं अपने प्रिय पिता को छोड़ कर जा रहा हूँ ।"
३. “लेकिन मैं इसे ठीक नहीं समझता कि तुम यह सोचो कि मैं ही राजा के दुःख का कारण हूँ, क्योंकि वह अपने इस स्वप्नवत् समागम में भावी वियोग की चिन्ता करता हैं ।”
४. “ इसलिए इस विषय में तुम्हारा मत निश्चित होना चाहिए । वियोग के नाना रूपों को देखकर तुम्हें यह समझ लेना चाहिए कि न कोई पुत्र और न कोई दूसरा सम्बन्धी ही दुःख का कारण है । सारा दुःख अज्ञान जनित हैं ।
५. "जिस प्रकार जो राही सड़क पर इकट्ठे होते है वे आगे चल कर पृथक होते ही हैं, इसी प्रकार जब आज या कल सभी का परस्पर वियोग अनिवार्य हैं, तो कोई भी बुद्धिमान आदमी किसी भी स्वजन से पृथक होने पर दुःखी क्यों होगा - भले ही वह स्वजन उसका कितना ही प्रिय क्यों न हो?"
६. “अपने सम्बन्धियों को दूसरे लोक मे छोड़ कर आदमी यहां इसमें चला आता हैं, और फिर इसमें उन्हें छोड़ कर दूसरे में चला जाता है, और वहां जाकर, वहाँ से भी अन्यत्र चला जाता है -- यही मानव मात्र का हाल है। एक मुक्त पुरुष इस सबके लिये दुःखी क्यों हो?"
७. “जब मां के गर्भ से निकलते ही, मृत्यु प्राणी का पीछा करने लग जाती हैं, तो तुमने अपने स्नेह में मेरे वनगमन को 'असमय' क्यों कहा?"
८. “किसी सांसारिक वस्तु को प्राप्त करने के लिए 'समय-असमय हो सकता है, समय हर चीज के साथ लगा ही है, समय संसार को नाना परिवर्तनों में से गुजारता है; लेकिन जब जीवन अस्थिर है, तो 'धम्म' करने के लिए कोई असमय नहीं हैं ।”
९. “राजा का तो यह संकल्प ठीक ही है, एक पिता के योग्य है कि वह मुझे राज्य देना चाहे, लेकिन मेरे लिए यह ऐसे ही होगा जैसे कोई लोभी रोगी प्रतिकूल भोजन ग्रहण कर ले।"
१०. “किसी भी बुद्धिमान् के लिए 'राज्याधिकार' कैसे उचित हो सकता है, जहां चिन्ता है, राग-द्वेष है, क्लान्ति है और है दूसरों के प्रति अन्याय ।"
११. “सोने का महल तो मुझे लगता है जैसे उसमें आग लगी है, अच्छे से अच्छे भोजन विष मिले प्रतीत होते है और कमलों के आच्छादित शय्या पर लगता है, जैसे मगरमच्छ लोट रहे हों ।”
६. मन्त्री का उत्तर
१. उसके ज्ञान और गरिमा के अनुरुप, तृष्णा - विमुत्त, तर्कपूर्ण कथन सुना तो मन्त्री बोला --
२. “आपका यह संकल्प तो सर्वथा योग्य है और किसी भी तरह आपके अयोग्य नहीं, किन्तु केवल समय की दृष्टि से यह इस समय अयोग्य है । यह किसी भी तरह तुम्हारा धम्म नहीं हो सकता कि अपने वृद्ध पिता को दुःख में छोड़कर चल दो ।”
३. “निश्चय से तुम्हारी बुद्धि बहुत सूक्ष्म नहीं है, कम से कम धर्म, अर्थ और काम के मामले में तो सूक्ष्म नहीं हैं । जब कि किसी अविद्यमान अदृश्य वस्तु के लिए आप विद्यमान दृश्य का त्याग करने के लिए तैयार हैं ।”
४. “फिर कोई कहता है कि पुनर्जन्म है, कोई उतने ही विश्वास के साथ कहता है कि नहीं है, जब इस विषय में इतना सन्देह है तो फिर यही उचित है कि वर्तमान भोगों को भोगा जाय ।"
५. “यदि कोई परलोक होगा, तो हम परलोक में भी आनन्द मनायेंगे, किन्तु यदि कोई परलोक नही होगा तो फिर सारा सँसार ही निश्चित रूप से अनायास मुक्त है ।"
६. “कुछ ऐसे है जो पुनर्जन्म तो मानते हैं, किन्तु मोक्ष की कोई सम्भावना नहीं मानते । उनका कहना है कि जैसे अग्नि स्वभाव से ही उष्ण होती है और पानी स्वभाव से ही तरल होता है, इसी प्रकार यह संसार स्वभाव ही संसरण - शील हैं ।”
७. "कुछ का मत है कि सभी वस्तुएं स्वभावज हैं- चाहे अच्छी हों, चाहे बुरी हो चाहे सत् हों, चाहे असत् हों और जब यह सारा संसार ही स्वभावज हैं, इसलिए भी हमारे सब प्रयास व्यर्थ हैं ।"
८. “जब इन्द्रियों की प्रक्रिया निश्चित है और बाह्य पदार्थों की अनुकुलता प्रतिकूलता भी - तो फिर जिसका वृद्धावस्था और कष्ट से अटूट सम्बन्ध हैं, उसे कौन कैसे पृथक् कर सकता है? क्या यह सब प्राकृतिक ही नहीं है?"
९. “पानी आग को बुझा देता है और आग पानी को भाप बना कर उड़ा देती है । ये सभी तत्व जब इकट्ठे हो जाते हैं तो संसार का निर्माण करते हैं ।"
१०. “गर्भ में ही हाथ, पांव, पेट, पीठ और सिर की रचना हो जाती हैं- बुद्धिमानों का कहना हैं कि यह सब प्राकृतिक ही हैं।"
११. “कांटों के तीखेपन का कौन निर्माण करता है? अथवा पशुओं और पक्षियों के स्वभाव की ही कौन रचना करता है? यह सब प्राकृतिक है । कोई भी कार्य ऐसा नहीं जिसमें चेतना कारण हो, तो फिर 'चेतना' का अस्तित्व ही कैसे हो सकता है ?"
१२. "कुछ का कहना है कि सृष्टि ईश्वर की रचना है । यदि ऐसा है तो फिर किसी चेतन आत्मा के प्रयत्नशील होने की आवश्यकता ही क्या है? जो सृष्टि को गति प्रदान करेगा, वही उस गति को अवरूद्ध भी करेगा?”
१३. “कुछ कहते हैं कि प्राणी का जन्म और मरण दोनों 'आत्मा' पर निर्भर करते हैं । किन्तु उनका कहना है कि प्राणी का जन्म तो अनायास होता हैं, किन्तु मोक्ष प्रयास सिद्ध हैं ।”
१४. “आदमी संतानोत्पत्ति द्वारा पितृ ऋण से उऋण होता है, शास्त्र अध्ययन द्वारा ऋषि ऋण से और यज्ञों द्वारा देव ऋण से - जो इन तीनों ऋणों से मुक्त है, वही वास्तव में मुक्त हैं ।"
१५. “इसलिए बुद्धिमानों का कहना है कि जो इस क्रम से मोक्ष के लिए प्रयास करते है, उन्हें ही मोक्ष प्राप्त होता है । जो इस क्रम से प्रयास नहीं करते, उन्हें व्यर्थ का आयास ही होता हैं ।”
१६. “इसलिये हे सौम्य! यदि मोक्ष की ही चाह है तो शास्त्र-क्रम से उसकी और अग्रसर हों; इस प्रकार आपको भी 'मोक्ष' प्राप्त हो जायेगा और राजा भी दुःख से 'मोक्ष' पा जायेगा ।”
१७. “और जहाँ तक आपको वन से दुबारा घर वापिस आने के बारे में आशंका है, तो इसका विचार करने की आवश्यकता नहीं । पूर्व समय में भी लोग वन जाकर वापस घर लौटे ही है- अम्बरीश लौटा है, द्रुमकेश लौटा है, राम लौटा है और भी बहुत लौटे हैं ।”