Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma - Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar - भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर - Page 35 मुख्य मजकूराकडे जा

भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

Page 35 of 132
16 जून 2023
Book
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७. भगवान बुद्ध का दृढ़ता

१. तब मन्त्री के प्रिय और वफादारी से भरे वचन सुनकर -- उस मन्त्री को जो राजा की आँखों के समान था -- दृढव्रती बुद्ध ने अपना उत्तर दिया- यथोचित न उकताने वाला और न जल्दबाजी से युक्त ।

२. “कुछ है वा नहीं, इसमें मेरे लिये कोई दूसरा प्रमाण नहीं है, तपस्या और साधना द्वारा मैंने स्वयं सत्य को जान लिया हैं ।”

३. “मैं किसी ऐसे सिद्धान्त को सही स्वीकार नहीं कर सकता जो अज्ञानश्रित है और जिसका सिर नीचे और पैर ऊपर की तरफ है। मैं किसी ऐसे सिद्धान्त को सही स्वीकार नहीं कर सकता, जिसमें सैकड़ो बातों को यूं ही पहले से सही मानकर चलना होता है । कौन बुद्धिमान आदमी केवल किसी दूसरे पर आश्रित होकर किसी बात में विश्वास करेगा ? मानव जाति तो अंधेरे में एक अन्धे पीछे चलने वाली चक्षुहीन जाति बनी हुई हैं ।”

The Buddha and His Dhamma - last book written by dr babasaheb ambedkar

४. “लेकिन यदि कोई सत्य और झूठ में विवेक न कर सके, यदि कोई भलाई और बुराई के विषय में संदिग्ध हो तो उसे भी अपना चित्त भलाई में ही लगाये रहना चाहिये । सद्वृत्ति वाले के लिये थोड़ा व्यर्थ का परिश्रम भी कल्याणकारी ही होता है ।"

५. "लेकिन यह देखकर कि इस 'पवित्र परम्परा' का भी ठिकाना नहीं, यह समझ लो कि ठीक वही होता है जो विश्वसनीय लोगों का वचन हो, और विश्वसनीयता का मतलब हैं निर्दोषता । जो सर्वथा निर्दोष है वह सत्य का अपलाप कर ही नहीं सकता ।”

६. “और जो कुछ तुम मुझे घर लौट चलने के बारे में कह रहे हो और अपने पक्ष के समर्थन में कुछ लोगों के उदाहरण दे रहे हो तो ऐसे लोगों की क्या प्रामाणिकता जिन्होंने अपने व्रत को ही तोड़ दिया । "

७. “चाहे सूर्य पृथ्वी पर आ गिरे और चाहे हिमालय भी अपने स्थान से हट जाये, तो भी मैं किसी हालत में भी इन्द्रिय-विषयोन्मुख होकर घर नहीं लौट सकता ।"

८. “मै जलती हुई आग में प्रविष्ट हो जाऊंगा, किन्तु बिना अपने (मानवता के कल्याण के) उद्देश्य को पूरा किये घर नहीं लौट सकता ।” इतना कहा और अपने दृढ़ निश्चय के कारण तथागत सर्वथा उपेक्षावान् होकर उठकर चल दिये ।

९. तब आँखो में आँसू लिये मन्त्री और पुरोहित निराश होकर कपिलवस्तु लौट आये। उन्होंने सिद्धार्थ का अडिग निश्चय सुन लिया था ।

१०. राजपुत्र के प्रति हृदय में प्रेम होने के कारण और राजा के प्रति हृदय में भक्ति होने के कारण वे लौट आये, किन्तु बार बार पीछे मुड़ कर देखते थे । वे न उन्हें देखते ही रह सकते थे, न उन्हें आँखों से ओझल होने दे सकते थे जो कि सूर्य की भाँति अपने तेज से तेजस्वी थे ।

११. राजपुत्र को वापिस लौटा लाने में असमर्थ सिद्ध हो मन्त्री और पुरोहित लडखड़ाते कदमों से वापिस लौटे । वे आपस में कह रहे थे- “हम उस राजा को चल कर अब क्या मुंह दिखायेंगे, जो अपने पुत्र का मुँह देखने के लिये ही तड़प रहा है ।”