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भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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16 जून 2023
Book
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३. धम्मचक्र प्रवर्तन

१. परिव्राजकों ने तब बुद्ध से अपने धम्म की व्याख्या करने की प्रार्थना की ।

२. बुद्ध ने कृपया इसे स्वीकार किया ।

३. उन्होंने सब से पहले उन्हें पवित्रता का पथ ही समझाया ।

४. उन्होंने परिव्राजकों से कहा 'कोई भी आदमी जो अच्छा बनना चाहता है उसके लिये यह आवश्यक है कि वह कोई अच्छाई का मापदण्ड स्वीकार करे ।'

Dhammachakra Pravartan - Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma - Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

५. "मेरे पवित्रता के पथ के अनुसार अच्छे जीवन के पांच माप दण्ड हैं-
(१) किसी प्राणी की हिंसा न करना (२) चोरी न करना अर्थात् दूसरे की चीज को अपनी न बना लेना, (३) व्यभिचार न करना, (४) असत्य न बोलना, (५) नशीली चीजों का ग्रहण न करना ।

६. मैं कहता हूँ कि हर आदमी के लिये यह परमावश्यक है कि वह इन पाच शीलो को स्वीकार करे । क्योकि हर आदमी के लिये जीवन का कोई मापदण्ड होना चाहिये, जिससे वह अपनी अच्छाई-बुराई को माप सके; मेरे धम्म के अनुसार ये पांच शील जीवन की अच्छाई-बुराई मापने के माप दण्ड ही है ।

७. दुनिया में हर जगह पतित (गिरे हुए) लोग होते ही हैं । लेकिन पतित दो तरह के होते हैं; एक तो पतित वे होते हैं जिनके जीवन का कोई माप-दण्ड होता है, दूसरे पतित वे होते हैं जिनके जीवन का कोई माप दण्ड नहीं होता ।

८. जिसके जीवन का कोई माप दण्ड नहीं होता वह 'पतित' होने पर भी यह नहीं जानता कि वह 'पतित' है । इसलिये वह हमेशा ‘पतित’ ही रहता है, दूसरी ओर जिसके जीवन का कोई माप दण्ड होता है वह हमेशा इस बात की कोशिश करता रहता है कि पतितावस्था से ऊपर उठे । क्यों? इसका उत्तर यही है कि वह जानता है कि वह पतित है, गिर गया है ।

९. आदमी के लिये जीवन-सुधार का कोई मापदण्ड होने और न होने का यही बड़ा अन्तर है । आदमी अपने स्तर से नीचे गिर पड़े यह इतनी बड़ी बात नहीं है जितनी यह कि, आदमी के जीवन का कोई स्तर ही न हो ।

१०. हे परिव्राजको । तुम पूछ सकते हो कि इन पाँच शीलों को जीवन का माप दण्ड ही क्यों स्वीकार किया जाय ?

११. इस प्रश्न को उत्तर तुम्हे स्वयं ही मिल जायेगा यदि तुम अपने से ही यह प्रश्न पूछो -क्या यह शील व्यक्ति के लिये कल्याणकारी है? और साथ ही यह भी पूछों, क्या इन शीलों का पालन करना समाज के लिए कल्याणकारी है?

१२. यदि इन दोनों प्रश्नों का तुम्हारा उत्तर स्वीकारात्मक है तो इस से यह सीधा परिणाम निकलता है कि मेरे पवित्रता के पथ के ये पांच शील इस योग्य है कि उन्हें जीवन का सच्चा माप दण्ड मान लिया जाय ।


४. धम्मचक्र प्रवर्तन

अष्टांगिक मार्ग या सम्यकमार्ग

१. इसके आगे बुद्ध ने उन परिव्राजकों को अष्टांगिक मार्ग का उपदेश दिया । बुद्ध ने कहा -- इस मार्ग के आठ अंग हैं ।

२. बुद्ध ने सर्वप्रथम सम्मा दिट्ठी ( - सम्यक् दृष्टि) की व्याख्या की जो अष्टांगिक मार्ग में प्रथम है और प्रधान हैं ।

३. सम्यक् बुद्ध ने परिव्राजकों से दृष्टि का महत्व समझाने के लिये कहा -

४. "हे परिव्राजको! तुम्हे इस का बोध होना चाहिये कि यह संसार एक कारागार है और आदमी इस कारागार में एक कैदी है ।” ५. इस कारागार में इतना अधिक अन्धकार है कि यहाँ कुछ भी दिखाई नहीं देता । कैदी को यहा तक दिखाई नहीं देता कि वह कैदी है ।

६. इतना ही नहीं कि बहुत अधिक समय तक इस अन्धेरी कोठरी में ही पड़े रहने के कारण आदमी एकदम अन्धा हो गया हो, बल्कि उसे इस बात मे भी बड़ा सन्देह हो गया है कि प्रकाश नाम की कोई चीज भी कभी कहीं हो सकती है ?

७. मन ही एक ऐसा साधन है, जिसके माध्यम से आदमी को प्रकाश की प्राप्ति हो सकती है।

८. लेकिन इन कारागार-वासियों के दिमाग की भी अवस्था ऐसी नहीं है कि यह उद्देश्य पूरा हो सके ।

९. इनका दिमाग जरासा प्रकाश मात्र आने देती है, इतना ही है कि जिनके पास आँख है वह यह देख सकें कि अन्धकार नाम की भी कोई वस्तु है ।

१०. इसलिये ऐसी समझ बड़ी सदोष है ।

११. लेकिन हे परिव्राजको! कैदी की स्थिति ऐसी निराशजनक नहीं है जैसी यह प्रतीत होती है ।

१२. क्योंकि आदमी में एक बल है, एक शक्ति है जिसे संकल्प-बल वा इच्छा-शक्ति कहा जाता है । जब आदमी के सम्मुख कोई उपयुक्त आदर्श उपस्थित होता है तो इस इच्छा-शक्ति को जागृत और क्रिया-शील बनाया जा सकता है ।

१३. आदमी को यदि कहीं से इतना भी प्रकाश मिल जाये कि वह यह देख सके कि उसे अपनी इच्छा-शक्ति का ऐसा संचालन कर सकता है कि वह अन्त में उसे बन्धन मुक्त कर दे ।

१४. इसलिये यद्यपि आदमी बन्धन में है तो भी वह स्वतन्त्र हो सकता है; वह किसी भी समय ऐसा पहला कदम उठा सकता है कि एक न एक दीन वह स्वतन्त्र होकर रहे ।

१५. यह इसलिये कि हम जिस किसी दिशा में भी अपने मन को ले जाना चाहे, हम उसे उस दिशा में ले जा सकते हैं। मन ही है जो हमें जीवन रूपी कारागार का कैदी बनाता है और यह मन ही है जो हमें कैदी बनाये रखता है ।

१६. लेकिन मन ने ही जिसे बनाया है मन ही उसे नष्ट भी कर सकता है, मन अपनी कृति को मटियामेट भी कर सकता है । यदि इसने आदमी को बंधन में बांधा है तो ठीक दिशा में अग्रसर होने पर यही आदमी को बंधन मुक्त कर सकता हैं ।

१७. यह है जो सम्यक दृष्टि कर सकती है ।

१८. तब परिव्राजकों ने प्रश्न किया “सम्यक् दृष्टि का अन्तिम उद्देश्य क्या है?” बुद्ध ने उत्तर दिया “अविद्या का विनाश ही सम्यक- दृष्टि का उद्देश्य है । यह मिथ्या दृष्टि की विरोधिनी है।"

१९. “और अविद्या का अर्थ है कि आदमी दुःख को न जान सके, आदमी दुःख के निरोध के उपाय को न जान सके -- आदमी इन आर्य सत्यों को न जान सके ।"

२०. सम्यक दृष्टि का मतलब है कि आदमी कर्म-काण्ड के क्रिया--कलाप को व्यर्थ समझे, आदमी शास्त्रों की पवित्रता की मिथ्या- धारण से मुक्त हो ।

२१. सम्यक् दृष्टि का मतलब है कि आदमी ऐसी सब मिथ्या विश्वास से मुक्त हो, आदमी यह न समझता रहे कि कोई भी बात प्रकृति के नियमों के विरुद्ध घट सकती है ।

२२. सम्यक् दृष्टि का मतलब है कि आदमी ऐसी सब मिथ्या धारणाओं से मुक्त हो जो आदमी के मन की कल्पना मात्र है और जिनका आदमी के अनुभव या यथार्थता से किसी प्रकार का सम्बन्ध नहीं ।

२३. सम्यक दृष्टि का मतलब है कि आदमी का मन स्वतन्त्र हो, आदमी विचार स्वतन्त्र हों ।

२४. हर आदमी की कुछ आशायें होती हैं, आकांक्षायें होती है, महत्वाकांक्षायें होती है । सम्यक् संकल्प का मतलब है कि हमारी आशायें, हमारी आकांक्षायें ऊंचे स्तर की हों, निम्नस्तर की न हों, हमारे योग्य हों, अयोग्य न हों ।

२५. सम्यकवाणी का मतलब है कि आदमी (१) सत्य ही बोले, (२) आदमी असत्य न बोले, (३) आदमी दूसरों की बुराई न करता फिरे, (४) आदमी दूसरों के बारे में झूठी बाते न फैलाता फिरे, (५) आदमी किसी के प्रति गाली-गलौज का वा कठोर वचनों का व्यवहार न करे, (६) आदमी सभी के साथ विनम्र वाणी का व्यवहार करे, (७) आदमी व्यर्थ की, बेमतलब बातें न करता रहे, बल्कि उसकी वाणी बुद्धिसंगत हो, सार्थक हो और सोद्देश्य हो ।

२६. जैसा मैने समझाया सम्यक - वाणी का व्यवहार न किसी के भय की अपेक्षा रखता है, और न किसी के पक्षपात की । इसका इससे कुछ भी सम्बन्ध नहीं होना चाहिये कि कोई "बड़ा आदमी” उसके बारे में क्या सोचने लगेगा अथवा सम्यक-वाणी के व्यवहार से उसकी क्या हानि हो सकती है।

२७. सम्यक-वाणी का माप दण्ड न किसी “ऊपर के आदमी" की आज्ञा है, और न किसी व्यक्ति को हो सकनेवाला व्यक्तिगत लाभ ।

२८. सम्यक-कर्मान्त योग्य व्यवहार की शिक्षा देता है । हमारा हर कार्य ऐसा हो जिसके करते समय हम दूसरों की भावनाओं और अधिकारों का ख्याल रखें ।

२९. सम्यक-कर्मान्त का माप दण्ड क्या है ? सम्यक् कर्मान्त का माप दण्ड यही है कि हमारा कार्य जीवन के जो मुख्य नियम हैं। उनसे अधिक से अधिक समन्वय रखता हो ।

३०. जब किसी आदमी के कार्य इन नियमों से समन्वय रखते हों, तो उन्हें हम सम्यक्-कर्म कह सकते हैं ।

३१. प्रत्येक व्यक्ति को अपनी जीविका कमानी ही होती है। लेकिन जीविका कमाने के ढंगों और ढंगों में अन्तर है । कुछ बुरे हैं, कुछ भले हैं। बुरे ढंग वे है जिनसे किसी की हानि होती है अथवा किसी के प्रति अन्याय होता है । अच्छे ढंग वे हैं जिनसे आदमी बिना किसी को हानि पहुंचाये अथवा बिना किसी के साथ अन्याय किये अपनी जीविका कमा सकता है । यही सम्यक्-आजीविका है ।

३२. सम्यक् व्यायाम; अविद्या को नष्ट करने के प्रयास की प्रथम सीढी है, इस दुःखद कारागार के द्वार तक पहुंचने का रास्ता ताकि उसे खोला जा सके ।

३३. सम्यक् - व्यायाम के चार उद्देश्य हैं ।

३४. एक है अष्टांगिक-मार्ग विरोधी चित्त प्रवृत्तियों की उत्पत्ति को रोकना ।

३५. दूसरा है ऐसी चित्त प्रवृत्तियों को दबाना जो उत्पन्न हो गई हो ।

३६. तीसरा है चित्त-प्रवृत्तियों को उत्पन्न करना जो अष्टांगिक मार्ग की आवश्यकताओं की पूर्ति में सहायक हों ।

३७. चौथा है ऐसी उत्पन्न चित्त - प्रवृत्तियों में और भी अधिक वृद्धि करना तथा उनका विकास करना ।

३८. सम्यक् स्मृति का मतलब है हर बात पर ध्यान दे सकना । यह मन की सतत् जागरूकता है । मन में जो अकुशल विचार उठ है, उन की चौकीदारी करना सम्यक् समृति का ही एक दूसरा नाम है ।

३९. “हे परिव्राजको! जो आदमी सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाणी, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीविका, सम्यक्- व्यायाम और सम्यक् स्मृति को प्राप्त करना चाहता है, उसके मार्ग में पांच बाधाएँ या बन्धन आते हैं ।

४०. ये हैं लोभ, द्वेष, आलस्य, विचिकित्सा तथा अनिश्चय । इन बाधाओं को जो वास्तव में कड़े बंधन ही हैं जीत लेना या तोड़ना आवश्यक है । इन बंधनों से मुक्त होने का उपाय समाधि है । लेकिन परिव्राजको! यह समझ लेना चाहिये कि समाधि और 'सम्यक समाधि' एक ही बात नहीं। दोनों में बड़ा अन्तर हैं।

४१. समाधि का मतलब है केवल चित्त की एकाग्रता । इसमें सन्देह नहीं कि इससे वैसे ध्यानों को प्राप्त किया जा सकता है कि जिनके रहते ये पांचों संयोजन या बन्धन स्थगित रहते हैं ।

४२. लेकिन ध्यान की ये अवस्थायें अस्थायी है । इसलिये संयोजन या बंधन भी अस्थायी तौर पर ही स्थगित रहते हैं । आवश्यकता है चित्त में स्थायी परिवर्तन लाने की । इस प्रकार का स्थायी परिवर्तन सम्यक् समाधि के द्वारा ही लाया जा सकता है ।

४३. खाली समाधि एक नकारात्मक स्थिति है, क्योंकि यह इतना ही तो करती है कि संयोजनों को अस्थायी तौर पर स्थगित रखे । इसमें मन का स्थायी परिवर्तन निहित नहीं है । सम्यक् समाधि एक भावात्मक वस्तु है । यह मन को कुशल-कर्मो का एकाग्रता के साथ चिन्तन करने का अभ्यास डालती है और इस प्रकार मन की संयोजनोत्पन्न अकुशल क - कर्मों की ओर आकर्षित होने की प्रवृत्ति को ही समाप्त कर देते हैं ।

४४. सम्यक् समाधि मन को कुशल और हमेशा कुशल ही कुशल (भलाई ही भलाई ) सोचने की आदत डाल देती है । सम्यक् समाधि मन को वह अपेक्षित शक्ति देती है, जिससे आदमी कत्याणरत रह सके ।