भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
दुसरा भाग : परिव्राजको की दीक्षा
१. सारनाथ आगमन
१. धम्मोपदेश का निश्चय कर चुकने के अनन्तर बुद्ध ने अपने आप से प्रश्न किया कि मैं सर्व प्रथम किसे धम्मोपदेश दूं? उन्हे सब से पहले आलार-कालाम का ख्याल आया जो बुद्ध की सम्मति में विद्वान् था, बुद्धिमान था, समझदार था और काफी निर्मल था । बुद्ध ने सोचा यह कैसा हो, यदि मै सर्वप्रथम उसे ही धम्मोपदेश करूं ? लेकिन बुद्ध को पता लगा कि आलारकालाम की मृत्यु हो चुकी है।
२. तब उन्होंने उद्दक रामपुत्त को भी उपदेश देने का विचार किया । किन्तु उसका भी शरीरान्त हो चुका था ।
३. तब उन्हे अपने उन पाँच साथियों का ध्यान आया जो निरञ्जना नदी के तट पर उनकी सेवा में थे, और जो सिद्धार्थ गौतम के तपस्या और काय-क्लेश का पथ त्याग देने पर असन्तुष्ट हो उन्हें छोड़ कर चले गये थे ।
४. उन्होंने सोचा "उन्होंने मेरे लिये बहुत किया, मेरी बड़ी सेवा की, मेरे लिये बहुत कष्ट उठाया । कैसा हो यदि मैं उन्हें ही सर्व प्रथम धम्म का उपदेश दु?"

५. उन्होनें उनके ठोर-ठिकाने का पता लगाया । जब उन्हें पता लगा कि वे वाराणसी (सारनाथ) के इसिपतन के मृगदाय: में रहते है, तो बुद्ध उधर ही चले दिये ।
६. उन पांचों ने जब बुद्ध को आते देखा तो आपस में तय किया कि बुद्ध का स्वागत नहीं करेंगे। उनमें से एक बोला, “मित्रो, वह श्रमण गौतम चला आ रहा है, जो पथ भ्रष्ट हो गया है, जिस ने तपस्या का मार्ग त्याग आराम- तलबी और कामभोग का पंथ अपना लिया है । वह पापी है । इसलिये हमें न उसका स्वागत करना चाहिये न उसके सम्मान में उठ कर खड़ा होना चाहिये । न उसका पात्र और चीवर ग्रहण करना चाहिये । हम उसके लिये एक आसन रख देते हैं, इच्छा होगी तो उस पर बैठ जायेगा ।" वे सब सहमत थे ।
७. लेकिन जब बुद्ध समीप पहुचे तो वह पांचों परिव्राजक अपने संकल्प पर दृढ़ न रह सके। बुद्ध के व्यक्तित्व ने उन्हें इतना प्रभावित किया कि वे सभी अपने आसन से उठ खड़े हुए। एक ने बुद्ध का पात्र लिया, एक ने चीवर लिया, एक ने आसन बिछाया और दूसरा पांव धोने के लिये पानी ले लाया ।
८. यह सचमुच एक अप्रिय अतिथि का असाधारण स्वागत था ।
९. इस प्रकार तो उपेक्षावान थे, श्रद्धावान बन गये ।
२. धम्मचक्र प्रवर्तन
१. कुशल-क्षेम की बातचीत हो चुकने के बाद परिव्राजकों ने बुद्ध से प्रश्न किया -- “क्या आप अब भी तपश्चर्य्या तथा काय-क्लेश में विश्वास रखते है?"
२. बुद्ध ने कहा -- दो सिरे की बातें है, दोनो किनारों की एक तो काम भोग का जीवन और दूसरा काय- क्लेश का जीवन । ३. एक का कहना है, खाओ पीयो मौज उडाओ क्योंकि कल तो मरना ही है । दूसरे का कहना है तमाम वासनाओं का मूलोच्छेद कर दो क्योकि वे पुनर्जन्म का कारण है । उन्होंने दोनों को आदमी की शान के योग्य नहीं माना ।
४. वे मध्यम मार्ग को मानने वाले थे -- बीच का मार्ग, जो कि न तो कामभोग का मार्ग है और न काय व - क्लेश का मार्ग है ।
५. बुद्ध ने परिव्राजको से प्रश्न किया -- मेरे इस प्रश्न का उत्तर दो कि जब तक किसी के मन में पार्थिव वा स्वर्गीय भोगों की कामना बनी रहेगी, तब तक क्या उसका समस्त काय - क्लेश व्यर्थ नही होगा? उनका उत्तर था - " जैसा आप कहते है वैसा ही है ।"
६. "यदि आप काय- क्लेश द्वारा काम तृष्णा को शान्त नहीं कर सकते तो काय - क्लेश का दरिद्री जीवन बिताने से आप अपने को कैसे जीत सकते हैं?"
७. “जब आप अपने आप पर विजय पा लेंगे तभी आप काम तृष्णा से मुक्त होंगे, तब आप को काम भोग की कामना न रहेंगी, और तब प्राकृतिक इच्छाओं की पूर्ति विकार पैदा नहीं करेगी । आप अपनी शारीरिक आवश्यकताओं के हिसाब से खाना-पीना ग्रहण करें ।
८. “सभी तरह की काम-वासना उत्तेजक होती है । कामुक अपनी काम वासना का गुलाम होता है । सभी काम-भोगों के चक्कर में पड़े रहना गँवारपन और नीच कर्म है । लेकिन मैं तुम्हे कहता हूँ कि शरीर की स्वाभाविक आवश्यकताओं की पूर्ति में बुराई नहीं है । शरीर को स्वस्थ बनाये रखना एक कर्तव्य है । अन्यथा तुम अपने मनोबल को दृढ़ बनाये न रख सकोगे और प्रज्ञारूपी प्रदीप भी प्रज्ज्वलित न रह सकेगा ।"
९. हे परिव्राजको इस बात को समझ लो कि आदमी को इन दोनों अन्त की बातों से सदा बचना चाहिये एक तो उन चीजों के चक्कर में पड़े रहने से जिनका आकर्षण काम भोग सम्बन्धी तृष्णा पर निर्भर करता है -- यह एक बहुत निम्न कोटि की बात है, अयोग्य है, हानिकर है तथा दूसरी और तपश्चर्या अथवा काय- क्लेश से, क्योंकि वह भी कष्टप्रद है, अयोग्य है तथा हानिकार है ।
१०. इन दोनों अन्तों से, इन दोनों सिरे की बातों के बीच में एक मध्यम मार्ग है -- बीच का रास्ता । यह समझ लो कि मैं उसी मध्यम मार्ग का उपदेष्टा हूँ ।
११. पांचों परिव्राजकों ने उनकी बात ध्यान से सुनी। वे यह नहीं जानते थे कि बुद्ध के मध्यम मार्ग के बारे में क्या कहे । इसलिये उन्होंने प्रश्न किया -- जब हम आपका साथ छोड़कर चले आये, उस के बाद से आप कहाँ कहाँ रहे, क्या क्या किया? तब बुद्ध ने उन्हे बताया कि किस प्रकार गया पहुँचे, कैसे उस पीपल के पेड़ के नीचे ध्यान लगाकर बैठे और कैसे चार सप्ताह की निरन्तर समाधि के बाद उन्हें वह नया बोध प्राप्त हुआ जिससे वह नये मार्ग का आविष्कार कर सके ।
१२. यह सुना तो परिव्राजक उस नये मार्ग को विस्तारपूर्वक जानने के लिये अत्यन्त उत्सुक हो उठे। उन्होंने बुद्ध से प्रार्थना की कि वे उन्हें बतायें ।
१३. बुद्ध ने स्वीकार किया ।
१४. बुद्ध ने पहली बात यह बताई कि उनके सद्धर्म को आत्मा, परमात्मा से कुछ लेना देना नहीं है । उनके सद्धर्म को मरने के बाद (आत्मा का) क्या होता है इससे कुछ सरोकार नहीं है। उनके सद्धर्म को कर्म-काण्ड के क्रिया-कलापों से भी कुछ लेना-देना नहीं ।
१५. बुद्ध के धम्म का केन्द्र - बिन्दु है आदमी और इस पृथ्वी पर रहते समय आदमी का आदमी के प्रति क्या कर्तव्य होना चाहिये ?
१६. बुद्ध ने कहा, यह उनकी पहली स्थापना है ।
१७. उनकी दूसरी स्थापना है कि आदमी दुःखी हैं, कष्ट में हैं और दरिद्रता का जीवन व्यतीत कर रहे हैं। संसार दुःख से भरा पड़ा हैं और धम्म का उद्देश इस दुःख का नाश करना ही है । इसके अतिरिक्त सद्धर्म और कुछ नहीं है ।
१८. दुःख के अस्तित्व की स्वीकृति और दुःख के नाश करने का उपाय -- यही धम्म की आधार शिला है ।
१९. धम्म के लिये एकमात्र यही सही आधार हो सकता है । जो धर्म इस प्राथमिक बात को भी अंगीकारी नहीं कर सकता, धम्म ही नहीं है।
२०. हे परिव्राजैको! जो भी श्रमण या ब्राह्मण ( धर्मोपदेष्टा ) यह भी नहीं समझ पाते कि संसार मे दुःख है और उस दुःख के नाश का उपाय है । ऐसे श्रमण ब्राह्मण मेरी सम्मति में श्रमण-ब्राह्मण ही नहीं हैं, न वे अपने को ज्येष्ठ-श्रेष्ठ समझने वाले इतना भी समझ पाये हैं कि धम्म का सही अर्थ क्या है?
२१. तब परिव्राजकों ने पूछाः दुःख और दुःख का विनाश ही यदि आप के धम्म की आधारशिला है तो हमें बताइये कि आप का धम्म कैसे दुःख का नाश कर सकता है ?
२२. तब बुद्ध ने उन्हें समझाया कि उनके धम्म के अनुसार यदि हर आदमी (१) पवित्रता के पथ पर चले, (२) धम्म के पथ पर चले, (३) शील-मार्ग पर चले तो इस दुःख का एकान्तिक निरोध हो सकता है ।
२३. और उन्होने कहा कि उन्होंने ऐसे धम्म का आविष्कार कर लिया है ।