भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
३. रोगी शुश्रूषक तथागत
(१)
१. एक समय एक भिक्षु को अतिसार हो गया था और वह अपने मल- मूत्र में पड़ा था ।
२. आनन्द स्थिविर को साथ लिये घूमते-घूमते भगवान् बुद्ध उस भिक्षु के निवास-स्थान पर पहुचे ।
३. तथागत ने उस भिक्षु को देखा कि वह अपने ही मल-मूत्र में पड़ा है । यह देख वे उसकी ओर गये और जाकर पूछा- “भिक्षु ! तुझे क्या कष्ट है ।"

४. “भगवान! मैं अतिसार से पीडित हूँ ।"
५. “भिक्षु! क्या कोई तुम्हारी सेवा नहीं कर रहा है?”
६. “भगवान! नहीं!”
७. "मिभु ऐसा क्यों है कि दूसरे भिक्षु तुम्हारी सेवा नही करते?
८. “भगवान! मैं भिक्षुओं के लिये किसी भी तरह उपयोगी नहीं हूँ इसलिये भिक्षु मेरी सेवा नहीं करते ।”
९. तब तथागत ने आनन्द स्थविर को कहा-- “आनन्द ! जा पानी ले आ । मैं इस भिक्षु का मल-मूत्र साफ करूँगा।”
१०. “बहुत अच्छा” कह आनन्द स्थविर ने स्वीकार किया । जब पानी आ गया तो - तथागत ने पानी गिराया और आनन्द स्थविर ने उस भिक्षु का शरीर मल- मल कर धोया । तब तथागत ने उसे सिर की ओर से उठाया और आनन्द स्थविर ने पाँव की ओर से दोनों ने मिलकर उसे उठाकर बिस्तर पर लिटा दिया ।
११. तब तथागत ने इस अवसर पर सभी भिक्षुओ को इकट्ठा किया और उनसे पूछा ।
१२. “भिक्षुओं, अमुक आवास (कमरे में कोई बीमार भिक्षु है?"
१३. "भगवान्! है ।”
१४. “उस भिक्षु को क्या कष्ट है?"
१५. "भगवान । उस भिक्षु को अतिसार है । "
१६. “लेकिन भिक्षुओं! क्या कोई भी उसकी देख-भाल कर रहा है?"
१७. “भगवान! नहीं ।"
१८. “क्यों नहीं? भिक्षु उसकी देख-भाल क्यो नहीं करते?”
१९. “भगवान । वह भिक्षु भिक्षुओं के किसी काम नहीं आता । इसलिये भिक्षु उसकी देख-भाल नहीं करते ।”
२०. भिक्षुओं! तुम्हारी देख- भाल करने वाले तुम्हारे माता-पिता नहीं है । यदि तुम आपस में ही एक दूसरे की सेवा नहीं करोगे तो कौन करेगा? भिक्षुओं! जो रोगी की सेवा करता है, वह मेरी सेवा करता है ।
२१. “यदि उपाध्याय हो तो उसे जीवन भर रोगी की सेवा करनी चाहिये और उसके स्वास्थ लाभ तक प्रतीक्षा करनी चाहिये । यदि आचार्य हो, यदि नेवासिक भिक्षु हो, यदि शिष्य हो, यदि साथ रहने वाला हो, यदि गुरु- भाई हो- - हर किसी को दूसरे के स्वास्थ्य- लाभ तक उसकी देखभाल करनी चाहिये । यदि कोई रोगी की देख भाल नहीं करता, तो यह उसका दोष माना जायगा ।"
(२)
१. एक बार भगवान् बुद्ध राजगृह के महावन में कलन्दक निवास में ठहरे हुए थे ।
२. उस समय स्थविर वक्कली एक कुम्हार के छाये हुए स्थान पर पडे थे, रुग्ण, पीडित, भयंकर बीमारी से ग्रस्त ।
३. तब स्थविर वक्कली ने अपने उपस्थापको को बुलाया और कहा "मित्रों! यहाँ आओ । तथागत के पास जाओ । मेरा नाम लेकर उनके चरणों की वन्दना कर कहो ।--" भगवान! भिक्षु वक्कली रुग्ण है, पीडित है, भयंकर बीमारी से ग्रस्त है । वह तथागत चरणों की वन्दना करता है ।" और तुम यह भी कहना, भगवान्. यह अच्छा होगा, यदि आप वक्कली पर दया करके, उसे देख आने की कृपा करेंगें ।
४. भगवान बुद्ध ने मौन रहकर स्वीकार कर लिया । तदनंतर तथागत चीवर पहन, पात्र - चीवर ग्रहण कर स्थविर वक्कली को देखने के लिये चले ।
५. स्थविर वक्कली ने तथागत को दूर से ही आते देखा । उन्हें देख स्थविर वक्कली बिस्तर पर ही हिलने-डोलने लगे ।
६. तब तथागत ने वक्कली स्थविर को कहा, “वक्कली । हिल डोल मत! आसन सज्जित है । मैं इस पर बैठूंगा ।" वे बिछे आसन पर विराजमान हुए । बैठकर तथागत ने वक्कली स्थविर से कहा--
७. “वक्कली! मैं समझता हूँ कि तुम अपने कष्ट को सहन कर रहे हो। मैं समझता हूँ तुम बडी सहनशीलता से काम ले रहे हो । अब क्या तुम्हारी पीडा घट रही हैं, बढ तो नहीं रही है? इसके घटने के लक्षण हैं, बढने के तो नहीं?”
८. “भगवान्! नहीं मैं सह नहीं सक रहा हूँ। मैं सहनशीलता से काम नहीं ले सक रहा हूँ । मुझे तीव्र वेदना होती है । कष्ट घट नहीं रहा है । कष्ट के घटने का कोई लक्षण नहीं । बढने का ही है । "
९. "वक्कली । तेरे मन में किसी प्रकार का कोई सन्देह हैं, कोई अनुताप है?"
१०. “भगवान्! मेरे मन में कोई सन्देह नहीं, कोई अनुताप नहीं ।"
११. “वक्कली! कोई ऐसी बात तो नहीं जिससे तुम अपने शील की ओर देख कर स्वयं आप अपनी गर्हा करते हो?”
१२. भगवान् ! नहीं कोई ऐसी बात नही, कि मैं अपने शील की ओर देख कर आप अपनी गर्हा करूँ ।"
१३. “तब भी वक्कली! तुम्हें कुछ चिन्ता अवश्य होगी । कोई न कोई अनुताप अवश्य होगा?”
१४. “भगवान्! मैं बहुत समय से तथागत के दर्शनों की कामना कर रहा था लेकिन तथागत के दर्शनार्थ आ सकने की मेरे शरीर में ताकत नहीं थी । "
१५. “वक्कली! इस मेरे गन्दे शरीर के दर्शन करने में क्या रखा है। जो धम्म को देखता है, मुझे देखता है। जो मुझे देखता है, धम्म को देखता है । वक्कली ! जो धम्म को देखता है, मुझे देखता है । जो मुझे देखता है, धम्म को देखता है ।”
(३)
१. ऐसा मैंने सुना एक समय भगवान् बुद्ध भग्गी जनपद में, मृगुदाय में, भेसुकला वन में सिंसुमार गिरि पर विराजमान थे तब गृहपति नकुल- पिता आया और तथागत को अभिवादन कर एक ओर बैठ गया ।
२. वहाँ बैठकर गृहपति नकुल- पिता ने तथागत से निवेदन किया: “भगवान्! जरा जीर्ण हूँ, वय प्राप्त हूँ, जीवन की घडियाँ गिन रहा हूँ, मैं बीमार रहता हूँ और हर घडी कष्ट में रहता हूँ। और भगवान् मुझे बडी मुश्किल से बुद्ध तथा संघ का दर्शन करना मिलता है । भगवान् आप मुझे सांत्वना के कृपया ऐसे दो शब्द कहें जो मेरे आनन्द में वृद्धि करने वाले हो तथा चिरकाल तक मेरे हित और सुख के लिये हों । "
३. “यह ठीक है, यह ठीक है, गृहपति कि तुम्हारा शरीर दुर्बल है और कष्टों से लदा हुआ है । इस तरह की शरीरिक अवस्था होने स्वास्थ्य की आशा नहीं ही की जा सकती । लकिन तब भी गहपति! तुम्हें ऐसी भावना करनी चाहिये कि 'यद्यपि मेरा शरीर रोगी है, लेकिन मैं मन से निरोग रहुंगा । गृहपति तुम्हें ऐसा अभ्यास करना चाहिये ।”
४. गृहपति नकुलपिता ने बडे प्रसन्न मन से तथागत के वचन सुने । फिर अपने स्थान से उठ, तथागत को अभिवादन किया और प्रदक्षिणा कर चला गया ।
(४)
१. एक बार तथागत शाक्यो के कपिलवस्तु में अंजीरों के उद्यान में ठहरे हुए थे ।
२. उस समय बहुत से भिक्षु तथागत के लिये चीवर बनाने मे लगे थे । उनका कहना था, “चीवर तैयार हो जाने पर, और तीन महीने - समाप्त हो जाने पर तथागत चारिका के लिये निकल पडेंगे ।"
३. तब महानाम शाक्य ने सुना कि बहुत से भिक्षु तथागत के लिये चीवर बना रहे हैं और उनका कहना है ...... और तब वह तथा के पास पहुंच एक ओर बैठा । एक ओर बैठे हुए महानाम शाक्य ने तथागत से निवेदन किया-
४. “भगवान! मैं सुनता हूँ कि बहुत से भिक्षु तथागत के लिये चीवर बनाने में लगे है और उनका कहना है चीवर तैयार हो जाने पर, और तीन महीने समाप्त हो जाने पर, तथागत चारिका के लिये निकल पडेंगे । अब भगवान्! हमने आप के श्रीमुख से यह कभी नहीं सुना कि एक समझदार गृहस्थ अपने साथी रोगी, पीडित दुःखी गृहस्थ को किस प्रकार सांत्वना दे सकता है, क्या कहकर उसका मन प्रसन्न कर सकता है?"
५. “एक समझदार गृहस्थ को अपने साथी रोगी, पीडित, दुःखी गृहस्थ को चार तरह से सान्तवना देनी चाहिये: “भाई, धम्म और संघ में श्रद्धा रखों और उस शील में जो अखण्डित रहने से, परिशुद्ध रहने से, चित्त को शांति देता है ।
६. “महानाम एक समझदार गृहस्थ दूसरे रोगी, पीडित दुःखी गृहस्थ को इस प्रकार सान्तवना दे चुके तो इससे आगे उसे इस प्रकार बोलना चाहिये:-
७. “मान लो कि वह मरणासन्न रोगी अपने माता-पिता को देखने के लिये व्याकुल है तो उसे कहना चाहिये कि मित्र ! चाहे तुम अपने माता-पिता को देखने के लिये व्याकुल हो और चाहे व्याकुल न हो, तुम्हारा मरण समीप है । इसलिये अच्छा होगा कि तुम अपने माता-पिता से मिलने की इच्छा छोड़ दो ।
८. “यदि रोगी कहे कि मैंने माता-पिता की कामना छोड़ दी तो उससे कहना चाहिये कि मित्र! अभी तुम्हारे मन में बच्चों को देखने की कामना है । क्योंकि हर हालत में तुम मरणासत्र हो, इसलिये यह भी अच्छा ही होगा यदि तुम बच्चों की कामना को भी त्याग दो
९. “इसी प्रकार उसे पाचों इन्द्रियों के सुख भोगों के बारे में भी कहना चाहिये । मान लो कि रोगी कहता है, मुझे पांचों इन्द्रियो के सुखों की कामना है । तो उसे कहना चाहिये कि मित्र! इन पांच इन्द्रियों के सुखों की अपेक्षा दिव्य-लोक के सुख अधिक प्रणीत हैं । यह भी अच्छा ही होगा की इन पांच इन्द्रियों के सुखों का त्याग कर आप दिव्यलोक के सुखों पर मन लगाये।”
१०. “तब यदि रोगी कहे कि मेरा ध्यान दिव्य लोक के सुखों पर ही केंन्द्रित हैं, तो उससे कहना चाहिये कि अच्छा होगा कि अपना ध्यान ब्रह्म-लोक के सुखों पर केन्द्रित करो। और तब यदि रोगों का मन वही केन्द्रित है, तब उससे कहना चाहिये--
११. “मित्र! ब्रह्म लोक भी अनित्य है, परिवर्तनशील है, उसमें भी ममत्व हो सकता है । मित्र! यह अच्छा होगा कि तुम ब्रह्मलोक की आशा का भी त्याग कर दो और ममत्व का मूलोच्छेद करने की ओर ध्यान दो ।
१२. “और यदि उस रोगी ने ऐसा कर लिया है, तो जहाँ तक आश्रवों से मुक्ति की बात है, तो जो सद्गृहस्थ इस प्रकार ममत्व से मुक्त हो सकता है उसमें और जिस श्रावक ने आश्रव क्षय किया है उसमें-- दोनो में कोई अन्तर नहीं ।"