भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
दुसरा भाग उनकी मानवता
१. उनकी करुणा - महकारुणिक
१. एक बार जब तथागत श्रावस्ती मे ठहरे हुए थे, तो कुछ भिक्षुओं ने आकर शिकायत की कि कई देव- गण आते है और उन्हे हैरान करते हैं, तथा उनकी ध्यान भावना में विघ्न उपस्थित करते हैं ।
२. उनकी कष्ट कथा सुनी तो भगवान बुद्ध ने उन्हें निम्नलिखित उपदेश दिया:-

३. “जो परमार्थ के विषय में कुशल हैं, जो शान्ति पद को प्राप्त करना चाहता है, उसे इस प्रकार बरतना चाहिये । उसे समर्थ होना चाहिये,उसे ऋजु-सुऋजु होना चाहिये, उसे सुवच होना चाहिये, उसे मृदु तथा विनम्र होना चाहिये ।
४. उसे सन्तोषी होना चाहिये, उसकी आवश्यकतायें अधिक नहीं होनी चाहिये, उसपर बहुत जिम्मेदारियाँ नहीं होनी चाहिये, उसकी वृत्ति (जिविका ) हलकी होनी चाहिये, उसे संयतेन्द्रिय होना चाहिये, उसे ज्ञानी होना चाहिये, उसे प्रगल्भ होना चाहिये तथा उसे गृहस्थ जनो में आसक्त नही होना चाहिये ।
५. “उसे कोई भी छोटी से छोटी ऐसी गलती नहीं करनी चाहिये कि विज्ञजन उसे दोष दे सके । उसकी यही कामना होनी चाहिये कि 'सभी प्राणियों का मंगल हो, सभी प्राणी सकुशल रहे, सभी प्राणी सुखी रहें।"
६. "कैसे भी प्राणी हो -- दुर्बल हों वा सबल हो, ऊंचे हो या नीचे हों, मध्यम कद के हों, वा छोटे कद के हों, आकार के बड़े हों वा छोटे हों-- कोई भी हों सभी--
७. “चाहे देखे गये हो और चाहे न देखें गये हो, चाहे समीप रहते हों और चाहे दूर रहते हो, चाहे पैदा हो गये हो, चाहे अभी पैदा हो वाले हो सभी प्राणी सुखी रहें।
८. “कोई एक दूसरे को धोखा न दे। कोई किसी से घुणा ना करें, कोई किसी का बुरा न चाहे कोई किसी से द्वेष न करे ।
९. “जैसे माँ अपनी जान देकर भी अपने इकलौते पुत्र की रक्षा के लिये तैयार रहती है वही भाव आदमियों का सभी प्राणियों रहना चाहिये ।
१०. “उसे समस्त लोक में अपनी असीम मैत्री का संचार करना चाहिये - ऊपर, नीचे, तिर्यक बिना किसी बाधा के, द्वेष भाव से सर्वथा रहित ।
११. “चाहे वह खडा हो, चलता हो, बैठा हो, लेटा हो जितने समय भी वह जागता रहे-- उसे अपनी सतत जागरुकता बनाये रखनी चाहिये, यही श्रेष्ठ जीवन है ।
१२. "किसी (मिथ्या) दृष्टि में न पडे, शीलवान हो, ज्ञानी हो, इन्द्रिय-सुखों में आसक्त न हों-- ऐसा होने से ही उसे पुन: पुन: : गर्भ में नहीं आना पड़ता ।"
१३. थोडे शब्दों में भगवान् बुद्ध ने उन्हें कहा:- “अपने शत्रुओं से भी प्रेम करो ।”
२. दुःखियों का दुःख दूर करने वाले मानसिक दुःखों के महान चिकित्सक
(१) विशाखा को दी गई सान्तवना
१. विशाखा एक उपासिका थी । वह रोज रोज भिक्षुओ को भिक्षा दिया करती थी ।
२. एक दिन उसके साथ रहने वाली उसकी पोती बीमार पड़ी और मर गई ।
३. विशाखा के लिये शोक असह्य हो गया ।
४. उसकी दाह- क्रिया के अनन्तर वह भगवान् बुद्ध के पास गई और आँखों से आँसू गिराती हुई एक ओर बैठ गई ।
५. तथागत ने पूछा-- "विशाखे ! तू दुःखी और शोकाकुल, आँखो से आंसू गिराती हुई क्यों बैठी है?"
६. उसने अपनी पोती की मृत्यु की बात कही और कहा कि वह बडी आज्ञाकारिणी थी, और उस जैसी मिल नहीं सकती ।”
७. “विशाखे! श्रावस्ती मे कुल कितनी लडकियाँ होगी?”
८. "भगवान्! लोगों का कहना है कि करोडो !"
९. “यदि वे सभी तुम्हारी पोतीयाँ हो तो क्या तुम उन को प्यार नहीं करोगी?
१०. "भगवान्! निश्चय से ।"
११. " और प्रति दिन श्रावस्ती में कितनी लडकियों की मृत्यु होती है ?"
१२. “भगवान् ! अनेको की ।”
१३. “तब तो एक क्षण भी ऐसा न आयेगा, जब तुम किसी न किसी के शोक से व्याकुल न होगी ।”
१४. "भगवान्! सत्य है !"
१५. “तब क्या तुम दिन-रात रोती ही रहोगी ?"
१६. "भगवान्! आपने ठीक ठीक समझा दिया। मैं समझ गई । "
१७. " तो अब फिर और शोक मत करो ।”