भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
पहला भाग उनका व्यक्तित्व
१. उनकी व्यक्तिगत आकृति इत्यादी
१. जितने भी वर्णन मिलते है उनसे यही ज्ञात होता है कि तथागत एक सुन्दर शरीर वाले थे ।
२. वह एक स्वर्ण-पर्वत के शिखर के समान थे । उनका कद ऊँचा था, शरीर सुडौल था, आकार-प्रकार आकर्षक था ।
३. उनकी लम्बी-लम्बी बाहे, उनकी शेर की सी चाल, उनकी वृषभ की सी आंखें, उनका सौन्दर्य, उनकी स्वर्ण समान दीप्ति, उनकी चौड़ी छाती -- सभी को अपनी ओर आकर्षित करती थी ।

४. उनकी भौंहे, उनका माथा, उनका चेहरा और उनकी आखें उनका बदन, उनके हाथ, उनके पांव अथवा उनकी चाल -उनके शरीर के किसी भी हिस्से पर जिसकी भी आंखें पडी, वे फिर वहाँ से हिल न सकीं ।
५. जिस किसी ने भी उन्हें देखा, उस पर उन की तेजस्विता, उनकी सामर्थ्य, उनके अनुपम सौन्दर्य का प्रभाव पड़ा है ।
६. उनका दर्शन होने पर कही जाने वाले रुक जाते, जो खडे होते वे पीछे चल देते, जो शान्तिपूर्वक धीरे धीरे चलते होते वे तेजी से दौड़ने लगते और जो बैठा होता वह तुरंत खड़ा हो जाता ।
७. जो भी उनके दर्शनार्थ आता, कोई हाथ जोड़कर नमस्कार करता, कोई सिर झुका कर नमस्कार करता, कोई स्नेहसिक्त शब्दों से सम्बोधित करता -- कोई भी बिना गौरव प्रदर्शित किये न जाता ।
८. वे सभी के प्रिय पात्र थे और सभी के आदर-भाजन ।
९. स्त्री-पुरुष सभी उनके वचन सुनने के लिये उत्सुक रहते थे ।
१०. उनका स्वर असाधारण रुप से मधुर था, गम्भीर था, आकर्षक था, गतिमान था और स्पष्ट था । उनकी वाणी दिव्य संगीत के समान थी।
११. उनका स्वर ही श्रोता के मन में आश्वासन पैदा कर देता था, उनकी तेजस्विता रौबीली थी ।
१२. उनका व्यक्तित्व ही ऐसा था कि न केवल वे लोगों के स्वाभाविक नेता थे बल्कि उनके दिलों के देवता थे ।
१३. उनको कभी श्रोताओं की कमी न होती थी ।
१४. यह बात विशेष महत्व की नहीं थी कि वे क्या कहते थे, वे कुछ भी कहें, सुनने वाले की भावनायें बदल जाती थी और उसकी इच्छा- शक्ति उनकी प्रबल इच्छाशक्ति के सामने झुकती थी ।
१५. उनकी वाणी से ही उनके श्रोताओ को यह विश्वास हो जाता था कि जो कुछ वे कह रहें हैं वह अक्षरशः सत्य तो है ही, साथ ही उनकी 'मुक्ति' का एकमात्र मार्ग भी वही है ।
१६. उनके श्रोताओ को उनकी वाणी में उस सत्य के दर्शन होते थे जिसमें दासो को मुक्त कर देने की सामर्थ्य थी । गुलामों को आजाद बना देने की ताकत थी ।
१७. जब भी वे स्त्री-पुरुष से बात-चीत करते उनका गम्भीर - शांत स्वरुप लोगो के मन मे एक आदर की भावना का सञ्चार रा और उनकी मधुर वाणी लोगों को आश्चर्य और आनन्द से विभोर कर देती ।
१८. डाकू अँगुलिमाल और आळवी के आदमखोर को कौन धम्म की दीक्षा दे सकता था? एक शब्द के द्वारा कौन राजा प्रसेनजित तथा रानी मल्लिका का मेल करा सकता था ? जिस पर उनका मन्त्र चल जाता, वह सदा के लिये उन्ही का हो जाता ।
२. आंख से देखने वालो की साक्षी
१. इस परम्परागत मत का समर्थन उन लोगों की साक्षी से भी होता है जिन्होने भगवान् बुद्ध को उनके जीवनकाल में देखा है, जिन्होने उनसे भेंट की हैं ।
२. एक ऐसा प्रत्यक्ष साक्षी साल नाम का ब्राह्मण था । भगवान् बुद्ध को आमने सामने देखकर उसने उनकी इस प्रकार स्तुती की थी ।
३. जब तथागत के सामने आया, तो उस ब्राह्मण ने बैठने तथा कुशल समाचार पूछ लेने के अनन्तर भगवान् बुद्ध के शरीर पर बत्तीस महापुरुष लक्षणो के होने न होने की जांच की ।
४. बत्तीस महापुरुष लक्षणो के विषय में असन्दिग्ध होकर भी उसका यह सन्देह बना रहा कि वह 'बुद्ध' है या नही? लेकिन उसने पुराने वृद्ध ब्राह्मणों से, आचार्यो- प्राचार्यो से यह सुन रखा था जो अर्हत होते हैं, सम्यक् समबुद्ध होते हैं, वे अपनी स्तुती सुनने पर अपने आप को प्रकट करते है । इसलिये उसने निम्नलिखित शब्दों से तथागत की स्तुती करने कर ठानी ।
५. “भगवान! आप का शरीर अंग- सम्पूर्ण है, श्रेष्ठ है, समृद्ध है, आकर्षक है । स्वर्ण वर्ण है, दान्तो से स्वर्ण रश्मिया निकलती हैं, अंग अंग सशक्त है, पूरे बत्तीस - महापुरुष लक्षणों से युक्त है।
६. “स्पष्ट दृष्टि, सुन्दर,ऊंचे और सीधे है आप । अपने अनुयायियो में सूर्य-समान प्रज्वल्लित है । आप ऐसे प्रकाश- युक्त, ऐसे स्वर्णिम-वर्ण-- अपने तारुण्य को आप अनागारिक श्रमण बनकर क्यों व्यर्थ गंवा रहे हैं?
७. “आप को चक्रवती नरेश बनाना चाहिये और समुद्र पर्यंत आप का राज्य होना चाहिये । अभिमानी राजाओं को आपके सम्मुख नतमस्तक होना चाहियें और आप को समस्त जगत का चक्रवर्ती राजा होना चाहिये ।”
८. आनन्द स्थविर के अनुसार तथागत का शरीर इतना अधिक स्वच्छ और ज्योतित था कि यदि उन के बदन पर किसी स्वर्णिम वस्त्र का जोड़ा रखा जाता तो उस की ज्योंति शरीर की ज्योती के सम्मुख म्लान पड जाती ।
९. तब इसमें क्या आश्चर्य है यदि तथागत के विरोधी तथागत को एक जादूगर समझते थे!
३. उनके नेतृत्व की सामर्थ्य
१. भिक्षुसंघ का कोई वैधानिक अध्यक्ष आदि नहीं था । तथागत का संघपर कोई अधिकार नहीं था । भिक्षु संघ एक स्वायत पूर्ण संस्था थी ।
२. तो भी संघ और उसके सदस्यों पर तथागत को क्या अधिकार था ?
३. इस विषय मे हमारे पास तथागत के समकालीन दो जनों के वक्तव्य उपलब्ध हैं ।
४. एक बार तथागत राजगृह के वेळूवन में विहार कर रहे थे ।
५. एक दिन तथागत राजगृह में भिक्षाटन के लिये चले किन्तु 'अभी कुछ जल्दी हैं' ऐसा समझ वह परिव्राजकाराम में सकुलदायी के पास चले गये ।
६. उस समय सकुलदायी बहुत से परिव्राजकों से घिरा हुआ था । वे 'है' अथवा 'नहीं हैं' की तात्विक चर्चा करके बड़ा हल्ला मचा रहे थे ।
७. कुछ दूर से ही जब सकुलदायी ने तथागत को आते देखा, उसने अपने साथियों से कहा "चुप करो । हल्ला मत मचाओ । श्रमण गौतम आ रहे हैं। उन्हें हल्ला प्रिय नहीं है ।"
८. इस प्रकार वे चुप हो गये । तब तक तथागत आ पहुचे । सकुलदायी ने कहा-- “भगवान्! आप से यहाँ पधारने की प्रार्थना है । आप का सच्चे हृदय से स्वागत है । चिरकाल से आपका इधर आगमन नहीं हुआ । आप के लिये आसन सुसज्जित है । कृपया आसन ग्रहण करें ।"
९. तथागत ने आसन ग्रहण किया और पूछा कि क्या बात-चीत चल रही थी ?
१०. सकुलदायी बोला-- “इसे जाने दें, कोई महत्वपूर्ण बात नहीं । यह कभी भी जान ले सकते हैं ।
११. कुछ समय पूर्व, जब नाना मतों के श्रमण-ब्राह्मण संथागार में इकट्ठे हुए तो उनमें इस विषय पर चर्चा चली कि मगध के लोगों के लिये यह कितनी अच्छी बात है, कितनी अधिक अच्छी बात है कि जितने गणाचार्य हैं, जितने विख्यात श्रमण हैं, जितने नाना मतों के संस्थापक हैं, जितने बहुत लोगों द्वारा आद्रत है - वे सभी राजगृह में वर्षावास करने आये है ।
१२. “उनमें पूर्ण काश्यप हैं, मक्खली - गोशाल है, अजित केशकम्बल है, पकुधकच्चायन है, सञ्जय बेलट्ठिपुत्त है, निगंठनाथ पुत्त हैं-- सभी विशिष्ट हैं और सभी यहाँ वर्षावास करने आये है । उन में श्रमण गौतम भी हैं, जो संघ के नायक है, ज्ञात - विख्यात धम्मानुशासक हैं, धम्म-संस्थापक हैं; अनेक लोगों के श्रद्धा भाजन हैं ।
१३. अब इन ज्ञात विख्यात विशिष्ट पुरुषों में कौन है जो अपने शिष्यों द्वारा यथार्थ विधि से आद्रत होता है, सत्कृत होता है तथा सम्मानित होता है? ओर वे कैसे तथा कितने गौरव की भावना के साथ अपने गुरु के पास रहते हैं ?
१४. कुछ ने कहा--पूर्ण काश्यप का कोई आदर सत्कार नहीं करता, उसे अपने शिष्यों से कुछ गौरव प्राप्त नहीं होता । वे अपने गुरु के प्रति तनिक भी गौरव का भाव नहीं रखते ।
१५. ऐसा भी अवसर रहा है कि पूर्ण काश्यप अपने कुछ सौ अनुयायियों को उपदेश दे रहा है, तब तक एक शिष्य बीच में ही ब पड़ा है-- “पूर्ण काश्यप से मत पूछो। वह इस विषय में कुछ नहीं जानता । मुझे पूछो। मैं जानता हूँ । मैं आप सब को सब बाते समझा दूँगा ।"
१६. तब पूर्ण-काश्यप ने आँखों में आसू भर कर और हाथ फैला कर कहा है-- "चुप रहो । हल्ला मत करो ।”