भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
७. भगवान बुद्ध के 'फूलों' के लिये कलह
१. जब तथागत का शरीर अग्नि द्वारा भस्म में परिणित कर दिया गया कुसीनारा के मल्लों ने समस्त राख और अस्थियाँ इकट्ठी लीं और अपने संथागार में रखकर उन्हें भालों से घेर दिया और उन पर धनुर्धारियों का पहरा बैठा दिया ताकि कोई उनका एक हिस्सा भी चुरा कर न ले जा सके ।
२. सात दिन तक मल्लों ने नृत्य, गीत, वाद्य, माला तथा सुगन्धियो द्वारा उनके प्रति आदर, सत्कार तथा गौरव प्रदर्शित किया और उनकी पूजा की ।

३. अब मगध- नरेश अजातशत्रु ने समाचार सुना कि कुसीनारा में तथागत परिनिर्वाण को प्राप्त हो गये ।
४. इसलिये उसने मल्लों के पास अपना दूत भेजा ताकि वे उसे कृपया अवशेषो में से एक हिस्सा दे दें ।
५. इसी प्रकार वैशाली के लिच्छवियो ने दूत भेजा, कपिलवस्तु के शाक्यों ने भेजा, अहकप्य के वल्लियों ने भेजा, रामग्राम के कोलियों ने भेजा तथा पावा के मल्लो ने भेजा ।
६. अस्थियो का एक हिस्सा मांगने वालों में वेठ द्वीप का एक ब्राह्मण था ।
७. जब कुसीनारा के मल्लों ने इतनी मांगो की बात सुनी तो वे बोले :-- “हमारी सीमा मे तथागत का परिनिर्वाण हुआ है । हम किसी को कोई हिस्सा न देंगे । इस पर केवल हमारा अधिकार है ।"
८. परिस्थिति को बिगडते देखकर द्रोण नाम के एक ब्राह्मण ने मध्यस्थता की । बोला-- “मेरे दो शब्द सुन लें ।”
९. द्रोण बोला-- "तथागत ने शान्ति और सहन-शीलता की शिक्षा दी है। यह उचित नहीं है कि उन्ही तथागत की अस्थियों के लिये- प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ थे-झगडा हो, कलह हो, लडाई हो ।
१०. “हम सब सहमत होकर अस्थियों को आठ बराबर हिस्सों में बांटे और हर जनपद में उन पर स्तुप बनाये जायें ताकि हर जनपद में उनकी पूजा हो सके ।”
११. कुसीनारा के मल्ल सहमत हो गये । बोले:-- “अच्छा तो ब्राह्मण! तू ही इन्हें सही सही आठ बराबर हिस्सों में बाँट दे ।”
१२. "बहुत अच्छा" कह द्रोण ने स्वीकार किया ।
१३. उसने तथागत के अवशेषो के बराबर बराबर आठ हिस्से कर दिये ।
१४. बंटवारा कर चुकने पर उस ने कहा कि मुझे यह बर्तन मिल जायें, तो मैं इस पर एक स्तुप बनवाऊँगा । १५. सबने मिलकर ब्राह्मण को बर्तन देना स्वीकार किया ।
१६. इस प्रकार तथागत की अस्थियों के हिस्से हो गये और जिस झगडे का अन्देशा था, वह शान्ति से निपट गया ।
८. बुद्ध-भक्ति
१. यह बात श्रावस्ती में ही घटी
२. उस समय बहुत से भिक्षु यह सोचकर कि जब चीवर तैयार हो जायेगा तीन महीने के बाद, तथागत चारिका के लिये निकल पड़ेंगे, तथागत के लिये एक चीवर तैयार कर रहे थे ।
३. उसी समय इसिदत्त तथा पूर्ण नाम के दो राज्याधिकारी किसी काम से साधुका मे ठहरे हुए थे। तब उन्होंने यह समाचार सुना-- “कहते है कि बहुत से भिक्षु यह सोचकर कि जब चीवर तैयार हो जायगा, तीन महिने के बाद तथागत चारिका के लिये निकल पड़ेगे, तथागत के लिये एक चीवर तैयार कर रहे हैं ।
४. . तब इसिदत्त और पूर्ण ने एक आदमी को सड़क पर नियुक्त कर दिया । उसे कहा - "ज्यो ही तुम उन भगवान् अर्हत, सम्यक् समबुद्ध को आते देखो,तुरन्त आकर इसकी हमें सूचना दो।”
५. दो तीन दिन तक वही रहकर प्रतीक्षा करते रहने के बाद उसने कुछ दूर से ही तथागत को आते देखा । वह दौड़ा दौड़ा इसिदत्त तथा पूर्ण राज्याधिकारियों के पास गया और सूचना दी । “भगवान्, अर्हत,सम्यक्- समबुद्ध चले आ रहे हैं । अब आप जो इच्छा हो करें ।"
६. तब इसिदत्त और पूर्ण दोनों राज्याधिकारी तथागत की ओर आगे बढें । पास पहुँच कर उन्होंने तथागत को अभिवादन किया और तथागत के पीछे पीछे हो लिये ।
७. तब तथागत सडक से हट कर एक वृक्ष के नीचे बिछे एक आसन पर जा बैठे। तथा इसिदत्त और पूर्ण राज्याधिकारी भी तथागत को नमस्कार कर एक और बैठ गये । बैठ चुकनें पर उन्होंने तथागत से कहा--
८. “भगवान ! जब हमने सुना कि तथागत कोशल जनपद में चारिका करेंगे तो हम निराश हो गये ओर हमारा दिल छोटा हो गया कि हाय ! अब तथागत हम से दूर हो जायेंगे ।
९. “भगवान्! जब हमने सुना कि तथागत कोशल जनपद में चारिका करने के लिये श्रावस्ती से निकल रहे हैं तो हम निराश हो गये और हमारा दिल छोटा हो गया कि हाय ! अब तथागत हमसे दूर हो जायेगे ।
१०. “भगवान्! फिर जब हमने सुना कि तथागत कोशल जनपद को छोड़ मल्ल जनपद में चारिका के लिये चले जायेगे..... कि वे चले गये हैं, तो हम निराश हो गये... हो जायेगे ।
११. “भगवान् फिर जब हम ने सुना कि तथागत मल्ल जनपद को छोड वज्जी जनपद में चले जायेसंगे... कि वे वास्तव मे चले गये हैं... कि वे वज्जी छोड़ काशी चले जायेसंगे... कि वे वास्तव में चलें गये हैं... कि वे काशी के लोगों को भी छोड़ मगध में चारिका करने के लिये चले जायेगे... कि वे वास्तव मे चले गये हैं तो हम निराश हो गये और हमारा दिल छोटा हो गया कि हाय ! तथागत हम से बहुत दूर हो गये ।
१२. लेकिन भगवान्! जब हमने सूना कि तथागत मगध छोड़कर काशी पधारेंगे तो हम बडे प्रसन्न हुए और हमारा दिल बल्लियों उछलने लगा कि अब तथागत हमारें नजदीक आ रहे है ।
१३. “और जब हमने सुना कि वे काशी आ गये हैं तो हम बडे प्रसन्न हुए....
१४. (उन्होंने तथागत के काशी से वज्जी.... वज्जी से मल्लों के जनपद में..... मल्लों के जनपद से कोशल के जनपद में आने का इसी तरह वर्णन किया ।)
१५. “लेकिन भगवान्! जब हमने सुना कि तथागत कोशल जनपद से भी श्रावस्ती की ओर चारिका करने के लिये चले आ रहे हैं तो हम बडे प्रसन्न हुए और हमारा दिल बल्लियों उछलने लगा कि तथागत अब हमारे बहुत समीप आ गये ।
१६. “तब जब हमने सुना कि तथागत श्रावस्ती के अनाथपिण्डिक के जेतवनाराम में ठहरे हुए हैं तो हमें असीम प्रसन्नता हुई, हमें असीम आल्हाद हुआ कि अब तथागत हमारें समीप है । "