भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
तीसरा भाग - उन्हें क्या नापसन्द था और क्या पसन्द ?
१. उन्हें दरिद्रता नापसन्द थी
१. एक बार भगवान् बुद्ध श्रावस्ती में अनाथपिण्डिक के जेतवनाराम मे विहार कर रहे थे । उस समय अनाथपिण्डिक गृहपति तथागत के दर्शनार्थ आया । आकर अभिवादन कर एक ओर बैठ गया। बैठकर उसने तथागत से प्रश्न किया- “आदमी को धनार्जन क्यों करना चाहिये?"
२. "तुम पूछ रहे हो तो मैं तुम्हें बताता हूँ ।"
३. किसी एक आर्य - श्रावक को लो जिसने मेहनत करके धन कमाया है, जिसने हाथों से परिश्रम करके धन कमाया है, जिसने पसीना बहा कर धन कमाया है तथा जिससे न्यायतः धन कमाया है वह उस धन से अपने आप को प्रसन्न बनाता है, आनन्दित बनाता है,उसे प्रसन्नता तथा आनन्द को बनाये रखता हैं, वह अपने माता-पिता को सुख और आनन्द देता है तथा उन्हें सुखी और आनन्दित बनाये रखता है; इसी प्रकार अपने स्त्री- बच्चों को, अपने दासों को तथा अपने कमकरों को धनार्जन करने का पहला उद्देश्य यही है ।
४. “जब इस प्रकार धन प्राप्त होता है वह अपने मित्रो, अपने साथीयों को सुख और आनन्द देता है तथा उन्हें सुखी और आनन्दित बनाये रखता है यह दूसरा उद्देश्य है ।
५. "जब इस प्रकार धन प्राप्त हो जाता है, तो वह अग्नि या पानी से अपनी हानि नही होने देता, राजाओ या चोरों से अपनी हानि नहीं होने देता, शत्रुओं या उत्तराधिकारीओं से अपनी हानि नहीं होने देता-- वह अपने माल को सुरक्षित रखता है । यह तीसरा उद्देश्य है ।
६. “जब इस प्रकार धन प्राप्त होता है, तो वह अतिथि- यज्ञ कर सकता है, पितृ-यज्ञ कर सकता है, राज- यज्ञ कर सकता है तथा देव-यज्ञ कर सकता है, यह चौथा उद्देश्य है ।
७. "जब इस प्रकार धन प्राप्त होता है, तो गृहपति उन सब श्रमणो तथा सन्त-! - पुरुषों को दान देता है जो अहंकार तथा प्रमाद से बचते हैं, जो सभी बातों को विनम्रता पूर्वक सहन कर लेते हैं, जो संयत है, जो शान्त है तथा जो आत्म- विकास में लगे हैं । उसका वह दान ऊँचे सदुद्देश्य सहित होता है, सुख देने वाला और स्वर्ग की ओर ले जाने वाला । यह धनार्जन का पांचवा उद्देश्य है।”
८. अनाथपिण्डिक समझ गया कि भगवान् बुद्ध दरिद्रों की दरिद्रता की प्रशंसा करके उन्हें सांत्वना नहीं देते । वे 'दरिद्रता' को ऊँचा उठाकर उसके बारे में यह भी नहीं कहते कि दरिद्रता का जीवन सुखी जीवन होता है ।
२. उन्हें संग्रह-वृत्ति नापसंद थी
१. भगवान बुद्ध एक बार कुरु जनपद के कम्मासदम्म नामक नगर में ठहरे हुए थे ।
२. आनन्द स्थविर, जहाँ भगवान् बुद्ध थे, वहाँ पहुँचे और अभिवादन कर एक ओर बैठ गये ।
३. इस प्रकार बैठे हुए आनन्द स्थविर ने कहा- "तथागत द्वारा उपदिष्ट प्रतीत- समुत्पाद का नियम अदभुत है । यह अत्यन्त गम्भीर है । किन्तु मुझे यह स्पष्ट दिखाई देता है ।"
४. “आनन्द! ऐसा मत कहो । आनन्द! ऐसा मत कहो! ऐसा मत कहो । यह प्रतीत्यसमुत्पाद का नियम बहुत गम्भीर है । इसी प्रतीत्य-समुत्पाद के नियम को ही न समझ सकने के कारण, इसी प्रतीत्य-समुत्पाद के नियम के भीतर ही प्रवेश न कर सकने के कारण यह संसार उलझन में पड गया है, यह दुःख का अन्त नहीं कर सकता है ।
५. “मै ने कहा है कि तृष्णा होने से उपादन होता है । जहाँ किसी के मन में किसी भी चीज के लिये कोई तृष्णा न हो तो क्या किसी प्रकार का भी उपादान होगा?"
६. "भगवान् । नहीं होगा ।"
७. "तृष्णा होने से ही आदमी लाभ के पीछे जाता है ।
८. "लाभ के पीछे भागने से काम और राग उत्पन्न होते हैं ।
९ . “काम और राग होने से वस्तुओं के लिये आग्रह हो जाता है ।
१०. “आग्रह होने से अधिकार ( मलकीयत ) हो जाता है ।
११. “ मलकीयत होने से लोभ तथा और भी अधिक सम्पत्ति का स्वामित्व पैदा होता है ।
१२. "मलकीयत होने से सम्पत्ति की देख-भाल करनी होती है ।
१३. “सम्पत्ति की देख- भाल में से ही बहुत से अकुशल- धम्म पैदा हो जाते है जैसे मुक्के तथा ज़ख़म, झगडे, कलह, बदनामी और झूठ ।
१४. "आनन्द ! यह प्रतीत्य- -समुत्पाद का नियम है। आनन्द ! यदि तृष्णा न हो तो क्या लाभ के पीछे भागना होगा? यदि लाभ के पीछे भागना 'न हो तो क्या कामना उत्पत्र होगी ? यदि कामना न हो तो क्या आग्रह होगा? यदि सम्पत्ति के लिये आग्रह न हो तो क्या व्यक्तिगत सम्पत्ति के लिये प्रेम होगा? यदि सम्पत्ति ही न हो तो क्या अधिक सम्पत्ति के लिये लोभ होगा ?
१५. "भगवान् ! नहीं होगा ।"
१६. "यदि निजी सम्पत्ति के लिये आसक्ति न हो तो क्या संसार में शान्ति नहीं होगी ?"
१७. "भगवान्! होगी ।"
१८. तब तथागत ने कहा- "मै पृथ्वी को पृथ्वी मानता हूँ। लेकिन मेरे मन में इसके लिये तृष्णा नहीं है ।
१९. “इसीलिये मैं कहता हूँ कि तमाम तृष्णाओं का मूलोच्छेद कर देने से, उनके पीछे न भागने से, बल्कि उनका नाश कर देने से, उनका त्याग कर देने से, उनका परित्याग कर देने से ही मैंने 'बुद्धत्व' लाभ किया है ।
२०. “भिक्षुओं, भौतिक वस्तुओं के नहीं, किन्तु मेरे धम्म के उत्तराधिकारी बनो । क्योंकि तृष्णा से आसक्ति पैदा होती है और आसक्ति से मानसिक दासता । "
२१. इन शब्दों में भगवान बुद्ध ने आनन्द स्थविर तथा अन्य भिक्षुओं को संग्रह करने की प्रवृत्ति के दुष्परिणाम समझाये ।
३. उन्हें सुसंगति पसंद थी
१. भगवान् बुद्ध को सुसंगति इतनी अधिक प्रिय थी कि उनको सुसंगति-प्रिय बुद्ध का नाम ही दिया जा सकता है ।
२. इसीलिये उन्होंने अपने अनुयायियों को कहा- “कल्याण मित्रों की संगति करो ।”
३. भिक्षुओं को सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा:-
४. “भिक्षुओ! मैं कोई दूसरी ऐसी बात नहीं जानता तो अनुत्पन्न कुशल धम्मों में वृद्धि कर दे अथवा उत्पन्न अकुशल-धम्मो में ह्रास पैदा कर दे । जैसी कि यह कल्याण- मित्रता ।
५. "जो सुसंगति में रहता है, उसमें अनुत्पन्न कुशल धम्म उत्पन्न हो जाते है और उत्पन्न अकुशल धम्मो का ह्रास हो जाता है । अकुशल धम्म तथा अकुशल- प्रवृत्ति का ह्रास हो जाता है कुशल धम्मो के प्रति प्रवृत्ति की कमी का ह्रास हो जाता है, कुशल-धम् तथा कुशल धम्मो के प्रति प्रवृत्ति बढ जाती है तथा अकुशल-धम्मो के प्रति प्रवृत्ति की कमी में वृद्धि होती है ।
६. “भिक्षुओं, मैं दूसरी कोई ऐसी बात नहीं जानता जो अनुत्पन्न बोधि अंगों को उत्पन्न न होने दे अथवा उत्पन्न बोधि अंगो को पूर्णता तक न पहुंचने दे, जैसे कि यह बेढंगा - विचार ।
७. “भिक्षुओं, जो बेढंगे-ढंग से विचार करता है उसमें अनुत्पत्र बोधि-अंग उत्पन्न नहीं होते और उत्पन्न बोधि-अंग परिपूर्णता को प्राप्त नहीं होते ।
८. “भिक्षुओं, सगे-सम्बन्धियो की हानि कोई बडी हानि नही है । प्रज्ञा की हानि बडी हानि है ।
९. “भिक्षुओं, सगे-सम्बन्धियों की वृद्धि कोई बडी अभिवृद्धि नहीं है । प्रज्ञा की वृद्धि बडी अभिवृद्धि है ।
१०. “इसलिये भिक्षुओं! तुम्हें यही अभ्यास करना चाहिये कि हम प्रज्ञा का लाभ करेंगे। तुम्हें प्रज्ञावान बनना चाहिये ।
११. “भिक्षुओ ! धन की वृद्धि को बडी अभिवृद्धि नहीं है । सभी अभिवृद्धियो में श्रेष्ठ है प्रज्ञा की अभिवृद्धि । इसलिये भिक्षुओ तुम्हें यही अभ्यास करना चाहिये कि हम प्रज्ञा का लाभ करेगें । तुम्हें प्रज्ञावान बनना चाहिये ।
१२. भिक्षुओं ! यश की हानि कोई बडी हानि नही है, प्रज्ञा की हानि बडी हानि है ।”
४. वे सुसंगति से प्रेम करते थे
१. एक बार तथागत शाक्य जनपद में शाक्यों के एक नगर सक्कर में ठहरे हुए थे ।
२. तब स्थविर आनन्द तथागत के पास आये, अभिवादन किया और एक ओर बैठ गये । इस प्रकार बैठे हुए आनन्द स्थविर ने कहा:--
३. भगवान्! सत्संगति आधा श्रेष्ठ - जीवन है, कल्याण-मित्रता आधा श्रेष्ठ - जीवन है, भलों की संगति आधा श्रेष्ठ - जीवन है ।"
४. “आनन्द! ऐसा मत कहो । सत्संगति आधा नहीं पूरा श्रेष्ठ जीवन है । कल्याण-मित्रता आधा नही, पूरा श्रेष्ठ - जीवन है । भलों की संगति आधा नहीं पूरा - श्रेष्ठ जीवन है ।
५. “भिक्षुओं जो भी सत्संगति मे रहता है, जिसके कल्याण-मित्र है, ओर जो भलों की संगति मे रहता है--उससे हम यह आशा सकते है कि वह आर्य अष्टांगिक मार्ग पर अधिक से अधिक प्रगति करेगा ।
६. “आनन्द! ऐसा भिक्षु आर्य अष्टांगिक मार्ग पर अधिक से अधिक प्रगति कैसे करता है?
७. “आनन्द! वह सम्यक्-दृष्टि का अभ्यास करता है, जो त्यागाश्रित है, जो विरागाश्रित है, जो निरोधाश्रित है, वह सम्यक्-संकल्प का अभ्यास करता है । वह सम्यक् - वाणी का अभ्यास करता है । वह सम्यक् कर्मान्त का अभ्यास करता है । वह सम्यक्- आजीविका का अभ्यास करता है । वह सम्यक् व्यायाम का अभ्यास करता है । वह सम्यक् स्मृति का अभ्यास करता है तथा वह सम्यक् समाधि का अभ्यास करता है-- ये सभी त्यागाश्रित है, विरागाश्रित है तथा निरोधाश्रित है ।
८. “आनन्द ! जो भिक्षु सत्संगति में रहता है, जिसके कल्याण- - मित्र हैं और जो भलों की संगति में रहता है वह आर्य अष्टांगिक मार्ग पर अधिक से अधिक प्रगति करता है ।
९. “इस तरह से आनन्द ! तुम्हें यह समझना चाहिये कि यह जो सत्संगति में रहना है यह जो कल्याण-मित्रता है, यह जो भलों की संगति में रहना है, यह पूरा श्रेष्ठ जीवन है ।
१०. “निश्चय से आनन्द ! जो जरा- धर्म प्राणी है, जो मरण- धर्म प्राणी है, जो दुःख, शोक, रोने पीटने वाले हैं, वे कल्याण - मित्रता के परिणाम- स्वरूप इन सब से मुक्त हो जाते है ।
११. “इस तरह से आनन्द! तुम्हे यह समझना चाहिये कि यह जो सत्संगति में रहना है, यह जो कल्याण- ण - मित्रता है, यह जो भलों की संगति में रहना है- यह पूरा श्रेष्ठ जीवन है ।"