भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
४. असहनशीलों के प्रति सहनशीलता
१. एक बार भगवान् बुद्ध आलवक यक्ष की राज्य-सीमा में आलवी मे रहते थे । तब आलवक यक्ष तथागत के पास आया और बोला- “श्रमण ! यहाँ से निकल ।”
२. तथागत का उत्तर था “मित्र! बहुत अच्छा ।" इतना कहा और वे बाहर चले गये ।
३. तब यक्ष ने आज्ञा दी, “श्रमण ! भीतर आओं ।"
४. तथागत भीतर चले आये । बोलेः "मित्र! बहुत अच्छा ।”
५. दूसरी बार भी आलवक यक्ष ने तथागत को कहा-- “श्रमण! निकल यहाँ से ।
६. तथागत बाहर चले गये । बोले:-- "मित्र! बहुत अच्छा ।”
७. दूसरी बार भी यक्ष ने आज्ञा दी -- “श्रमण ! भीतर आओ ।"
८. तथागत भीतर चले आये बोले:-- “मित्र! बहुत अच्छा ।"
९. तीसरी बार भी आलवक यक्ष ने तथागत को कहा- “श्रमण ! निकल यहाँ से ।”
१०. तथागत बाहर चले गये । बोले-- "मित्र! बहुत अच्छा ।”
११. तीसरी बार फिर यक्ष ने आज्ञा दी -- “भ्रमण ! भीतर चले आओ ।"
१२. "तथागत भीतर चले आये । बोले:-- "मित्र । बहुत अच्छा "
१३. चौथी बार भी आलवक यक्ष ने कहा-- “श्रमण ! निकल यहाँ से!”
१४. इस बार तथागत ने कहा-- “मित्र! मैं नहीं निकलूंगा । तुझे जो करना हो करो ।
१५. यक्ष को क्रोध आ गया । बोला-- “मैं एक प्रश्न पूछूंगा श्रमण ! यदि मेरे प्रश्न का उत्तर न दे सके तो या तो मैं तुझे पागल बना दूंगा, या हृदय फाड डालूंगा और नहीं तो पांव से पकड़ कर नदी के उस पार फेंक दूंगा ।"
१६. “मित्र! मुझे इस लोक में कोई ऐसा नहीं दिखाई देता जो या तो मुझे पागल बना दे या मेरा हृदय फाड डाले और या मुझे पाँव से पकडकर नदी के उस पार फेंक दे। लेकिन तब भी तुझे जो प्रश्न पूछना हो पूछ ।”
१७. तब आलवक यक्ष ने तथागत से निम्नलिखित प्रश्न पूछा--
१८. “इस संसार में आदमी के लिये सर्वश्रेष्ठ धन कौन सा है? कौनसा कुशल-कर्म सुखदायक है? रसों में मधुरतम रस कौन सा है? किस तरह का जीवन सर्वश्रेष्ठ जीवन कहा जाता है?"
१९. तथागत ने उत्तर दिया-- “श्रद्धा सर्व श्रेष्ठ धन है । धम्मानुसार रहने से सुख मिलता है । सत्य का रस भी रसों से मधुरतम है । प्रज्ञा मूलक जीवन से बढ़ कर कुछ नहीं ।
२०. आलवक यक्ष ने पूछा-- “आदमी बाढ को कैसे पार करता है? आदमी समुद्र को कैसे लाँघता है? आदमी दुःख का अन्त कैसे करता है ।"
२१. तथागत ने उत्तर दिया-- “आदमी श्रद्धा से बाढ को पार करता है । आदमी अप्रमाद से ( भव) सागर को लाँघ जाता है । आदमी प्रयत्न से दुःख का नाश करता है । आदमी प्रज्ञा से परिशुद्ध होता है ।"
२२. तब आलवक यक्ष ने पूछा-- “आदमी ज्ञान कैसे प्राप्त करता है? आदमी धन कैसे प्राप्त करता है? आदमी यश कैसे प्राप्त करता है? आदमी मित्र कैसे प्राप्त करता है ? इस लोक से परलोक को जाने पर आदमी को अनुताप कैसे नहीं होता ?”
२३. तथागत ने उत्तर दिया-- "निर्वाण प्राप्ति के लिए अर्हतों तथा धम्म मे श्रद्धा रखने से, आज्ञाकारी होने से, अप्रमादी होने से,ध्यान लगाकर सुनने वाला होने से, आदमी ज्ञान प्राप्त करता है ।"
२४. "जो उचित हि करता है, जो दृढ निश्चयी है, जो जागरुक है, वह धन प्राप्त करता है। जो देता है वह मित्र प्राप्त करता है ।
२५. “जिस श्रद्धावान उपासक में सत्य, सदाचार, सबर और सदाशयता तथा उदारता होती है, उसे मरने पर अनुताप नहीं होता ।
२६. “आओ! जो दूसरे बहुत से श्रमण-ब्राह्मण हैं, उनसे भी पूछ लो कि क्या सत्य, संयम, दान-शीलता तथा सबर से भी बडकर कुछ हैं?
२७. आळवक यक्ष बोला-- “अब मै किसी दूसरे श्रमण ब्राह्मण से भी क्यों पूछू? आज मैं अपने भावी ऐश्वर्व्य से परिचित हो गया हूँ
२८. “निश्चय से, तथागत मेरे ही कल्याण के लिये आळवी पधारे हैं। आज मैं जानता हूँ कि किन्हे (दान) देने से अधिक से अधिक फल मिलता है ।
२९. “आज से मै तथागत तथा उनके धम्म को नमस्कार करता हुआ, एक गांव से दूसरे गाँव, एक नगर से दूसरे नगर विचरुंगा ।”
५. समानता तथा समान व्यवहार के समर्थक
१. तथागत ने जितने भी नियम भिक्षु संघ के लिये बनाये, स्वेच्छा से उन सभी नियमों को उन्होंने अपने ऊपर भी लागू किया।
२. इसलिये कि वे ही 'संघ' के मूल है, वा वे ही संघ के नायक है, उन्होंने अपने लिये कभी किसी नियम में भी अपवाद नहीं चाहा । यदि वे चाहते तो उस असीम आदर और प्रेम की भावना के कारण जो संघ के सदस्यों के मन में उनके लिये थी वे तथागत को बडी प्रसन्नता से उन नियमों से मुक्त करते ।
३. भिक्षु एक ही बार भोजन ग्रहण कर सकते है-- यह नियम अन्य सभी भिक्षुओं के साथ साथ तथागत को भी स्वीकृत था ।
४. भिक्षु के पास कोई निजी सम्पत्ति नहीं रहनी चाहिये-- यह नियम अन्य सभी भिक्षुओं के साथ-साथ तथागत को भी स्वीकृत था ।
५. भिक्षु के पास केवल तीन चीवर ही होने चाहिये- यह नियम सभी भिक्षुओं के साथ-साथ तथागत को भी स्वीकृत था ।
६. एक बार जब भगवान बुद्ध शाक्य जन पद के कपिलवस्तु नगर में न्याग्रोधाराम में रहते थे, तो भगवान् बुद्ध की मौसी प्रजापति गौतमी अपने हाथ का काता, हाथ का बुना धुस्सा जोडा लाई और तथागत से उसे स्वीकार करने की प्रार्थना की ।
७. तथागत ने उसे उत्तर दिया, "प्रजापति ! उसे संघ को दे ।”
८. दूसरी ओर तीसरी बार भी प्रजापति गौतमी ने अपनी प्रार्थना दोहराई । उसे हर बार वही उत्तर मिला ।
९. तब आनन्द ने आग्रह किया- “भगवान् प्रजापति गौतमी आप की मौसी है । प्रजापति गौतमी ने आप को दूध पिलाया है । आप उसका दिया धुस्सा जोडा स्वीकार कर लें ।” लेकिन तथागत का यही आग्रह रहा कि धुस्सा जोडा संघ को ही दिया जाय ।
१०. आरम्भ में भिक्षु संघ का यही नियम था कि कूडों की ढेरियों पर पड़े मिले चीथड़ों से ही भिक्षु संघ के वस्त्र बनाये जायें । यह नियम इसी लिये बना था कि जिसमें धनी वर्ग के लोग ही संघ में आकर न भर जाये ।
११. लेकिन एक बार जीवक तथागत को नये वस्त्र का बना चीवर देने में सफल हो गया । जब तथागत ने वह चीवर स्वीकार किया, उन्होंने उसी समय सभी भिखुओं के लिये भी चीथडो के बने चीवर ही पहनने का नियम ढीला कर दिया ।