भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
३. अहिंसा के सिद्धांत की आलोचना
१. ऐसे लोग थे जो 'अहिंसा' के सिद्धान्त के समर्थक न थे । उनका कहना था कि 'अहिंसा' का मतलब है 'अन्याय' तथा 'अत्याचार' के सामने सिर झुकाना ।
२. भगवान् बुद्ध का ‘अहिंसा' से जो आशय था, यह उसकी मूलत: गलत व्याख्या है
३. भगवान् बुद्ध ने अनेक अवसरों पर अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है जिससे किसी को किसी प्रकार की अस्पष्टता वा गलत फहमी न रहे ।

४. एक तो वह ही ऐसा अवसर है जिसका उल्लेख किया जाना चाहिये जब उन्होंने एक सैनिक के संघ में प्रविष्ट होने के बारे में नियम बनाया ।
५. एक बार मगध के सीमांत - प्रदेश में उत्पात मच गया था । तब मगध नरेश बिंबिसार ने अपने सेनापति को आज्ञा दी," अब जाओ,और सेना-नायकों को कहो कि वे सीमा- प्रान्त में ढूँढ ढूँढ कर अपराधियों का पता लगायें, उन्हें दण्ड दें और शान्ति स्थापित करे । "सेनापति ने आज्ञा का पालन किया ।
६. सेनापति की आज्ञा पाकर सेना नायक बडी दुविधा में पड गये । वे जानते थे कि तथागत की शिक्षा है कि जो 'युद्ध में लडने जाते है और जिन्हें 'युद्ध ‘करने में आनन्द आता है वे 'पाप 'करते हैं और बहुत 'अपुण्य 'लाभ करते है । दूसरी ओर राजा की आज्ञा यह थी कि अपराधियों का पता लगाकर उन्हें मार डाला जाय । सेना नायक अपने से पूछने लगे-हम क्या करें?
७. तब इन सेना-नायको ने सोचा:- 'यदि हम तथागत के भिक्षु संघ में प्रविष्ट हो जाए, तों हम इस दुविधा से बच जायेंगे ।
८. तब ये सेना-न -नायक भिक्षुओं के पास पहुंचे और उन से प्रव्रज्या की याचना की । भिक्षुओं ने उन्हें प्रव्रजित तथा उपसमपन्न कर दिया । सेना नायक सेना से गायब हो गये ।
९. सेनापति ने जब देखा कि सेना नायक नहीं दिखाई देते तो उसने सैनिको को पूछा:- 'क्या बात है कि सेना-नायक नहीं दिखाई देते?” सैनिकों ने उत्तर दिया सेनापति । सेना नायक भिक्षु संघ में सम्मिलित हो गये है।”
१०. सेनापति बहुत अप्रसत्र तथा बहुत क्रोधित हुआ,” राजकीय सेना के लोगों को भिक्षु कैसे प्रव्रजित कर सकते है?”
११. सेनापति ने इस बात की सूचना राजा को दी । राजा ने न्यायाधीशों से प्रश्न किया - "कृपया बताये कि जो राजकीय-सेना के आदमियो को प्रव्रजित करे, उसे क्या दण्ड मिलना चाहिये?"
१२. “महाराज! उपाध्याय का सिर काट डालना चाहिये. कम्मावाचा पढने वाले की जबान निकाल डालनी चाहिये और संघ के उन सदस्यों की जो किसी राजकीय सैनिक को प्रव्रजित करें- आधी पसलियाँ तोड डालनी चाहिये । ”
१३. तब राजा वहाँ पहुंचा, जहाँ तथागत विराजमान थे; और अभिवादन कर चुकने के अनन्तर उसने भगवान् बुद्ध को सारी बात सुनाई ।
१४. “भगवान्! आप जानते है कि कई राजा धम्म के विरुद्ध है । ये विरोधी राजा बहुत मामूली मामूली बातों के लिए भिक्षुओ को कष्ट देने लिये तैयार रहते है । यदि ये जान जायेंगे कि भिक्षु सैनिको को वरगला कर भिक्षु संघ में भर्ती करते हैं तो फिर इसक कल्पना कर सकना कठिन है कि ये भिक्षुओं के विरूद्ध क्या क्या कार्रवाईयाँ कर सकते है ? इस विपत्ति से बचे रहने के लिये तथागत यथायोग्य करे ।"
१५. तथागत ने उत्तर दिया- “मेरी यह कभी मंशा नही रही कि 'अहिंसा' का नाम लेकर 'अहिंसा' कि आड मे सैनिक अपने राजा वा देश के प्रति जो उनका कर्तव्य है, उससे विमुख हो जाए ।"
१६. तदनुसार भगवान बुद्ध ने राजकीय सैनिकों के संघ में प्रविष्ट होने के विरूद्ध एक कानून बना दिया और इसकि घोषणा कर दी- “भिक्षुओ, किसी राजकीय सैनिक को प्रव्रज्या न मिले । यदि कोई देगा तो उसे दुष्कृत की आपत्ति (दोष) होगी ।”
१७. एक बार एक श्रमण महावीर के अनुयायी सिंह सेनापति ने 'अहिंसा' के ही विषय में तथागत से प्रश्न किया था ।
१८. सिंह ने पूछा:- “अभी भी एक सन्देह मेरे मन मे शेष है । क्या आप कृपया मेरे मन के अन्धकार को दूर कर देंगे ताकि मैं धम्म को उसी रुप मे समझ सकूँ, जिस रुप में आपने उसका प्रतिपादन किया है ।”
१९. तथागत के स्वीकार कर लेने पर सिंह सेनापति ने पूछा- “भगवान्! मैं सेनापति हूँ । मुझे राजा ने युद्ध लडने के लिये और अपने कानूनों का जनता द्वारा पालन करवाने के लिये ही नियुक्त किया है । तो क्या तथागत जो दुखियों के प्रति दया और असीम करुणा कि शिक्षा देते है, अपराधियो को दण्ड देने की अनुमति देते है ? और क्या तथागत का यह भी कहना है कि अपने घरों, अपने बीबी-बच्चों और अपनी सम्पत्ति की रक्षा के लिये युद्ध करना ठीक नहीं है? क्या तथागत सम्पूर्ण आत्म समर्पण की शिक्षा देते है कि हम आततायी को जो वह चाहे कर दे, और जो जोर जबर्दस्ती हमारी चीज हमसे छीनना चाहे उसे वह ले लेने दें? क्या तथागत को यह कहना है कि सभी प्रकार के युद्ध - ऐसे युद्ध भी जो न्याय की रक्षा के लिये लडे जाय हैं-वर्जित है?"
२०. तथागत का उत्तर था :- "जो दण्डनीय है, उसे दण्ड मिलना ही चाहिये । जो उपहार देने योग्य हो, उसे उपहार ही दिया जाना चाहिये। साथ ही किसी भी प्राणी को कष्ट नहीं दिया जाना चाहिये बल्कि उनके साथ प्रेम और दया का बर्ताव होना चाहिये । ये आदेश परस्पर विरोधी नहीं है । जो कोई अपने अपराध के लिये दण्ड भुगतता है, वह न्यायाधीश की द्वेष- बुद्धि के कारण नहीं, बल्कि अपने ही अकुशल- कर्म के परिणाम स्वरुप । न्यायाधीश द्वारा दिया गया दण्ड उसके अपने कर्म का फल है । न्यायाधीश जब दण्ड देता है तो उसके मन मे दण्डनीय व्यक्ति के प्रति किसी भी प्रकार की द्वेष की भावना नहीं होनी चाहिये, और एक हत्यारे को भी जब फांसी की सजा दी जाय तो यही सोचना चाहिये कि यह उसके अपने कर्मो का फल है । जब वह समझेगा कि 'दण्ड' उसके अन्तरतम को 'शुद्ध' ही बनायेगा तो कोई भी दण्डनीय व्यक्ति अपने भाग्य को रोयेगा नहीं बल्कि प्रसन्न ही होगा ।" २१. इन बातों पर अच्छी तरह विचार करने से यह बात स्पष्ट हो जानी चाहिए कि भगवान् बुद्ध की देशना में 'अहिंसा' का मुख्य- स्थान है; किन्तु वह निरपेक्ष नहीं ही है ।
२२. उन्होंने सिखाया कि बुराई को भलाई से जीतो लेकिन यह कहीं नहीं सिखाया कि बुराई को ही भलाई से जीत लेने दो ।
२३. वह अहिंसा के समर्थक थे और हिंसा के निन्दक । लेकिन उन्होंने इससे कहीं इनकार नहीं किया कि बुराई से भलाई की रक्षा करनें के लिये आखरी दर्जे कहीं कहीं हिंसा का भी आश्रय लेना पड सकता है ।
२४. भगवान् बुद्ध ने किसी खतरनाक सिद्धान्त का प्रतिपादन नहीं किया । आलोचक ही उसके यथार्थ स्वरुप और क्षेत्र को ठीक ठीक समझ नहीं पाये ।