मुख्य मजकूराकडे जा

भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

Page 108 of 132
16 जून 2023
Book
12,14,5,7,1,,

७. ब्राह्मण तथा भगवान बुद्ध

(i)

१. एक बार जब भगवान् बुद्ध बहुत से भिक्षुओं के साथ कोशल- जनपद में चारिका कर रहे थे, वे थून नाम के एक ब्राह्मण-ग्राम में पहुंचे।

२. थून के ब्राह्मण गृहपतियो ने समाचार सुना! “श्रमण गौतम हमारे गांव के खेतो तक आ पहुचा है ।"

brahman tatha Bhagwan Buddha - Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma - Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

३. वे ब्राह्मण गृहपति अश्रद्धालु थे, मिथ्या-दृष्टि थे और स्वभाव से लोभी थे ।

४. उन्होंने सोचा :- यदि श्रमण गौतम गांव में आ गया और दो तीन दिन यहाँ रह गया तो सभी लोग उसके उपासक हो जायेंगे । तब ब्राह्मण धर्म के लिये कोई सहारा नही रहेगा। हमें उसका गाँव में आना रोक देना चाहिये ।”

५. गाँव तक पहुचने के लिये एक नदी पार करनी पडती थी । तथागत का गांव में आना रोकने के लिये ब्राह्मणों ने नदी पार करने के लिये सभी पत्तनों से नौकाए हटा ली और जो पुल आदि थे उन्हें निकम्मा बना दिया ।

६. उन्होंने एक कुँए के अतिरिक्त शेष सभी कुओं को घास फूस से भरदिया और पानी के प्याव तथा विश्राम गृहे आदि को छिपा दिया ।

७. भगवान् बुद्ध ने उनकी करतूतों की कहानी सुनी तब भी उन पर दया कर अपने भिक्षुओ सहित उन्होंने नदी पार की । चलते चलते वे थून नामक ब्राह्मण ग्राम में पहुंचे ।

८. सडक छोड़कर वे एक वृक्ष के नीचे जा बैठे। उस समय पानी लिये बहूत सी स्त्रियाँ भगवान् बुद्ध के पास से गुजर रही थीं ।

९. उस गांव में एक निश्चय हो चुका था, “यदि श्रमण गौतम, इस गांव में आ जाय तो उसका कुछ भी स्वागत सत्कार नहीं हो चाहिये । यदि वह किसी घर पर पहुँचे तो न उसे और न उसके भिक्षुओ को ही किसी भी प्रकार अन्न-जल दिया जाय ।”

१०. एक ब्राह्मण की दासी पानी का घडा लिये जा रही थी । उसने तथागत और भिक्षुओ को देखा तथा जाना कि वे थके और प्यासे है । श्रद्धा-प्रसन्न होने के कारण उसने उन्हें पानी देना चाहा ।

११. उसने अपने मन में सोचा, “यद्यपि इस गांव के लोगो का निश्चय है कि श्रमण गौतम को कुछ भी न दिया जाय और उनके प्रति किसी भी प्रकार से सत्कार की भावना तक न प्रदर्शित की जाय, तो भी यदि मैं, इन 'पुण्य- क्षेत्रों को पाकर भी, इन्हें थोडा पानी देकर भी अपने कल्याण की आधार शिला न रखूंगी तो मैं इस दुःख से कब मुक्त होऊगी?”

१२. “मालिको! चाहे जो हो, चाहे इस ग्राम के रहने वाले सभी लोग मिलकर मुझे मारें या बांध डालें तब भी मै ऐसे 'पुण्य- क्षेत्र में पानी सीचूंगी ही ।"

१३. यद्यपि दूसरी स्त्रियों ने उसे रोकने की कोशिश की किन्तु अपने दृढ संकल्प के कारण अपनी जान तक की परवाह न करके, उसने अपने सिर से पानी का घडा उतारा उसे एक ओर रखा और तथागत के पास आई। उसनें उन्हें पानी दिया । तथागत ने पाँव धोये और पानी पिया ।

१४. उसके ब्राह्मण मालिक नें सुना कि उसने तथागत को पानी दिया है । "इसने गांव का नियम भंग कर दिया है, और लोग मुझे दोष दे रहे हैं' सोच वह गुस्से के मारे दांत पीसता आया और उसे जमीन पर गिरा कर लातों और घुसों से पीटने लगा । उस ब्राह्मण की मार से वह मर गई ।

 

(ii)

१. द्रोण नामक ब्राह्मण तथागत के पास आया और उन्हें अभिवादन किया । तदनन्तर कुशल- समाचार पूछा और एक ओर गया। एक ओर बैठे हुए द्रोण ब्राह्मण ने तथागत से शिकायत की -

२. “श्रमण गौतम! मैं ने लोगों को यह कहते सुना कि श्रमण गौतम किसी वृद्ध, वयोवृद्ध आयु प्राप्त ब्राह्मण के आगमण पर न उठते है और न उन्हें बैठने के लिये आसन देते हैं ।

३. “श्रमण गौतम! क्यो यह ऐसा ही है कि श्रमण गौतम किसी वृद्ध, वयोवृद्ध, आयुप्राप्त ब्राह्मण के आगमन पर न उठते है और न उन्हें बैठने के लिये आसन देते है । श्रमण गौतम ! यह तो ठीक नहीं हैं ।”

४. “द्रोण! क्यो तुम अपने आप को ब्राह्मण समझते हो?”

५. “श्रमण गौतम! यदि कोई किसी ब्राह्मण के बारे मे ठीक ठीक कुछ कहना चाहे तो उसे कहना चाहिये कि ब्राह्मण अपनी माता तथा पिता दोनो की ओर से सुजात होता है, सात पूर्व पीढियों तक पवित्र होता है, जन्म की दृष्टि से सर्वथा निर्दोष अध्यायी, वेदमन्त्रज्ञ, अक्षर और प्रभेदों सहित तीनों वेदो में पारंगत, शुद्ध-शास्त्र का ज्ञाता, इतिहास- पुराण का जानकार, काव्य और व्याकरण का पण्डित, महापुरुष - लक्षणों का कोविद विश्व-चिंतक होता है, और श्रमण गौतम! मेरे बारे में भी ठीक ठीक यह कहा जा सकता है क्योंकि मैं भी माता-पिता दोनों की ओर से सूजात हूँ . .......विश्व-चिंतक हूँ ।"

६. “द्रोण! जो पुराने मन्त्र निर्माता, मन्त्र रचयिता, मन्त्र धर ब्राह्मण हैं, जिन्हें अपने मन्त्रों का अक्षरशः शब्दशः ज्ञान है:- जैसे अट्ठक, वामक्, यमदेव, विश्वमित्र, यमदग्नि, अंगिरस, भारद्वाज का कहना है कि ब्राह्मण पाच तरह के होते है -(१) ब्रह्म-सदृश ब्राह्मण, (२) देव-सदृश ब्राह्मण, (३) बन्धन-युक्त ब्राह्मण (४) बंधन भंजक ब्राह्मण तथा (५) अन्त्यज ब्राह्मण । अब तुम इन पांच प्रकार के ब्राह्मणों मे से किस प्रकार के ब्राह्मण हो ?"

७. “श्रमण गौतम! मुझे ब्राह्मणों के पांच प्रकारों की जानकारी नही है । किन्तु तब भी मैं मानता हूँ कि हम ब्राह्मण है । आप हमें धर्म का उपदेश दें, ताकि हमें पांच प्रकार के ब्राह्मणों की जानकारी हो ।”

८. “ब्राह्मण! तो ध्यान देकर सुनो। मैं कहता हूँ ।”

९. “बहुत अच्छा" उसने कहा । तब तथागत बोले--

१०. “हे द्रोण! अब एक ब्राह्मण ब्रह्म-सदृश कैसे होता है?"

११. "हे द्रोण! एक ब्राह्मण को लो जो माता पिता दोनों की ओर से सुजात हो सात पूर्व-पीढियों तक पवित्र हो, जन्म की दृष्टि से सर्व निर्दोष -वह अडतालिस वर्ष तक ब्रह्मचर्य-वास करता है, वह अधम्मानुसार नहीं बल्कि धम्मानुसार आचार्य को दक्षिणा चुकाने में रत रहता है ।

१२. “और द्रोण! धम्मानुसार का क्या मतलब है? वह न कृषि से, न व्यापार से, न ग्वालेपन से, न धनुर्धारी बन, न राजकर्मचारी बन और न किसी दूसरे पेशे से ही अपनी जीविका कमाता है । वह जीविका के लिये भिक्षाटन ही करता है, भिक्षा पात्र का आदर करता है ।

१३. “वह अपनी गुरु -दक्षिणा चुकाता है, सिर दाढी मुंडवाता है, काषाय वस्त्र धारण करता है और गृहत्याग कर अनागरिक हो जाता है ।

१४. “इस प्रकार घर से बेघर हो वह एक दिशा को, दूसरी दिशा को, तीसरी दिशा को, चौथी दिशा को ऊपर, नीचे - सभी दिशाओं को मैत्री - भावना से युक्त होकर विहार करता है- दूर तक जाने वाली, प्रशस्त, असीम, घुणा वा द्वेष से सर्वथा शून्य ।

१५. “वह करुणा युक्त हो विहार करता है..... मुदिता युक्त हों विहार करता है...... उपेक्षा युक्त हो विहार करता है - दूर तक जाने वाली, प्रशस्त, असीम, घुणा वा द्वेष से सर्वथा शून्य ।

१६. “इस प्रकार इस चारो ब्रह्म - विहारों में विहार कर, मृत्यु होने पर, शरीर के न रहने पर वह ब्रह्म-लोक गामी होता है । हे द्रोण ! इस प्रकार एक ब्राह्मण ब्रह्म सदृश होता है ।

१७. " हे द्रोण ! एक ब्राह्मण देव सदृश कैसे होता है ?

१८. “हे द्रोण! अब एक ब्राह्मण को लो जो पहले ब्राह्मण की ही तरह माता तथा पिता दोनों की ओर से सुजात है..... वह न कृषि से, न व्यापार से..... अपनी जीविका कमाता है । वह जीविका के लिये भिक्षाटन ...... करता है । वह अपनी गुरु- दक्षिणा चुकाता है और अधम्मानुसार नहीं बल्कि धम्मानुसार पत्नि ग्रहण करता है ।

१९. “इस विषय में धम्मानुसार का मतलब क्या है? वह किसी ऐसी ब्राह्मणी को ग्रहण नहीं करता है जो खरीदी- बेची गई हो, बल्कि ऐसी ही जिस के हाथ पर जल डाला गया हो। वह एक ब्राह्मणी के ही पास जाता है, किसी अन्त्यज, किसी बहेलिये, किसी बंस- फोड, किसी रथ- कार अथवा किसी आदिवासी की लड़की के पास नहीं । वह बच्चे वाली स्त्री के पास नहीं जाता, न दूध पिलाने वाली स्त्री के पास जाता है और न उसके पास जो ऋतुनी न हो ।

२०. “हे द्रोण! वह बच्चे वाली के पास क्यों नहीं जाता ? यदि वह जायें तो निश्चय से बालक या बालिका का जन्म अपरिशुद्ध होगा । और वह दूध पिलाने वाली के पास क्यों नहीं जाता ? यदि वह जाये तो निश्चय से बालक या बालिका का दूध-पान अपरिशुद्ध होगा ।

२१. “और जो ऋतुनी नहीं है उसके पास भी वह क्यों नहीं जाता? हे द्रोण ! यदि एक ब्राह्मण जो ऋतुनी नहीं है उसके पास नहीं जाता है तो वह कभी भी उसके लिये कामाग्नि की तृप्ति का साधन नहीं बनती, वह उसके लिये केवल सन्तान की जननी ही बनी रहती है  ।

२२. “ और जब विवाहित जीवन से उसे सन्तान की प्राप्ति हो जाती है वह सिर दाढी मुंडवाता है......... और गृह त्याग कर अनागरिक हो जाता है........

२३. “और इस प्रकार घर से बेघर ही वह काम भोगों की तृष्णा को त्याग प्रथम ध्यान प्राप्त कर विचरता है, द्वितीय ध्यान. तृतीय ध्यान. . चतुर्थ ध्यान प्राप्त कर विचरता है ।

२४. “इन चारों ध्यानों को प्राप्त कर विचरने वाला वह मृत्यु होने पर, शरीर के न रहने पर देव-लोक में उत्पत्र होता है ।

२५. "हे द्रोण! इस प्रकार एक ब्राह्मण देव सदृश होता है ।

२६. "हे द्रोण! और एक ब्राह्मण बन्धन- युक्त ब्राह्मण कैसे होता है?

२७. "हे द्रोण ! एक ब्राह्मण को लो जो समान माता पिता को ....... और वैसे ही विवाह करता है ......

२८. “और अब विवाहित जीवन से उसे सन्तान प्राप्ति हो जाती है, तो वह अपनी सन्तान के प्रेम के वश में हो जाता है और वह घर पर ही रहता है । वह गृह त्याग कर अनागरिक नही होता ।

२९. “वह अपने परम्परा-गत ब्राह्मणी बन्धनों को निभाता है, उनका उल्लंघन नहीं करता । उस के बारे मे कहा जाता है कि वह सीमा में रहता है, सीमोल्लंघन नहीं करता । इसीलिये ऐसा ब्राह्मण बन्धन- युक्त ब्राह्मण कहलाता है ।

३०. “द्रोण! इस प्रकार ब्राह्मण बन्धन-युक्त होता है ।

३१. “और द्रोण! एक ब्राह्मण बन्धन - भंजक' कैसे होता है ?

३२. “हे ब्राह्मण! एक ब्राह्मण को लो जो समान माता पिता का.... . वह आचार्य की दक्षिण चुकाता है और एक स्त्री ग्रहण करता है, धम्मानुसार वा अधम्मानुसार; एक खरीदी गई वा बेची गई ब्राह्मणी अथवा जो जलाभिषिक्त हुई ।

३३. “वह एक ब्राह्मणी के पास भी जाता है यह किसी क्षत्रिय - कुमारी के पास या किसी नीच जाती वा दासी स्त्री के पास, ' किसी अन्त्यज कुमारी के पास, किसी बंस फोड की लडकी के पास किसी रथकार या किसी आदिवासी की लडकी के पास, वह बच्चे वाली स्त्री के पास जाता है, वह दूध पिलाने वाली के पास जाता है और वह ऋतुनी के पास जाता है तथा जो ऋतुनी नही, है उसके पास भी जाता है, और उसके लिये ब्राह्मणी कामाग्नि को शान्त करने का, क्रीडा करने का, भोग का सन्तानोत्पति का साधन बन जाती है।

३४. “और वह पुरानी ब्राह्मणी- परम्परा के बन्धन में नही रहता, वह उस सीमा को लांघ जाता है । उसके बारे में कहा जाता है : 'वह सीमा में नहीं रहता वह सीमोल्लंघन करता है । इसलिये वह 'बंधन - भंजक ' कहलाता है । ३५. इस प्रकार द्रोण ! एक ब्राह्मण बंधन - भंजक कहलाता है ।

३६. “और द्रोण! एक ब्राह्मण ' अन्त्यज - ब्राह्मण' कैसे होता है?

३७. “हे द्राण! एक ब्राह्मण को लो जो समान माता पिता का... . वह अड़तालीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य पालन करता है, वह (वेद) मन्त्रों का ज्ञाता बनता है, तब अपना विद्याध्ययन समाप्त करने के अनन्तर वह आचार्य दक्षिणा खोजता है : ( वह धम्मानुसार वा अधम्मानुसार जैसे भी अपनी जीविका चलाता है) कृषक बनकर, व्यापारी बनकर, ग्वाला बनकर, धनुषधारी बनकर, राजकर्मचारी बनकर अथवा किसी अन्य शिल्प द्वारा वा भिक्षापात्र की उपेक्षा न कर भिक्षाटन द्वारा ।

३८. “आचार्य-दक्षिणा दे चुकने के अनन्तर वह धम्मानुसार वा अधम्मानुसार एक स्त्री प्राप्त करता है, एक खरीदी या बेची गई, अथवा हाथ पर जल डालकर ली गई । वह एक ब्राह्मणी के पास जाता है अथवा किसी अन्य स्त्री के पास ........ बच्चे वाली स्त्री के पास, दूध पिलाने वाली स्त्री के पास और वह उसके लिये कामाग्नि शान्त करने का साधन बन जाती है .......  अथवा सन्तानोत्पत्ति का । वह यह सभी बातें करता हुआ जीवन व्यतीत करता है ।

३९. “तब ब्राह्मण पूछते है - "यह कैसे है कि एक श्रेष्ठ ब्राह्मण ऐसा जीवन व्यतीत करता है?"

४०. “तब वह उत्तर देता है!”जैसे आग साफ या मैली सभी चीजों को जला डालती है लेकिन उससे अग्नि अशुद्ध नहीं होती, इसी प्रकार भद्रजन! यदि एक ब्राह्मण इस प्रकार की सभी बातें करता हुआ भी जीवन व्यतीत करता है, तो उससे एक ब्राह्मण मलिन नही होता । "

४१. “और यह कहा जाता है: वह ऐसी सभी बातें करता हुआ जीवन व्यतीत करता है, इसीलिये वह अन्त्यज-ब्राह्मण कहलाता है ।

४२. "हे द्रोण! इस प्रकार एक ब्राह्मण अन्त्यज - ब्राह्मण हो जाता है ।

४३. "निश्चय से द्रोण! जो पुराने मन्त्र-निर्माता, मन्त्र-रचयिता, मन्त्र- धर ब्राह्मण हैं जिन्हें अपने मन्त्रों का अक्षरशः शद्वशः ज्ञान है-- उन्हीं का कहना है कि ब्राह्मण पाँच प्रकार के होते है- (१) ब्रह्म- सदृश ब्राह्मण, (२) देवता सदृश ब्राह्मण, (३) बंधन-युक्त ब्राह्मण (४) बंधन- भंजक ब्राह्मण, तथा (५) अन्त्यज-ब्राह्मण ।

४४. “द्रोण! इन पाँच प्रकार के ब्राह्मणों में से तुम्हारी गिनती किन में है?"

४५. “श्रमण गौतम! यदि ऐसा है तो कम से कम हम अन्त्यज- ब्राह्मणो मे नहीं हैं।

४६. "लेकिन श्रमण गौतम! आप का कहना अदभूत है. आप मुझे प्राण रहने तक बुद्ध की शरण में गया हुआ उपासक समझें ।