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भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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16 जून 2023
Book
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४. जैन तैर्थिको द्वारा हत्या का मिथ्यारोप

१. अन्य सम्प्रदायों के साधुओं को ऐसा लगने लगा था कि श्रमण गौतम के कारण लोग उनका आदर सत्कार कम करने लगे है, इतना ही नहीं यह भी नहीं जानते कि वे है भी या नहीं?

२. “हम देखें कि किसी षड्यन्त्र की मदद से हम जनता में उसका प्रभाव घटा सकते है वा नहीं? शायद सुन्दरी की सहायता से ह ऐसा कर सकें" - तैर्थिक सोचने लगे ।

Bhagwan Buddha Ke Virodhi - Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma - Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

३. वे सुन्दरी के पास गये और बोले - "बहन ! तुम बहुत ही सुन्दर और मनोरम हो । यदि तुम श्रमण गौतम के बारे में कुछ अपवाद फैला दो तो हो सकता है कि लोग उसका विश्वास कर ले और श्रमण गौतम का प्रभाव घट जाय ।

४. प्रतिदिन शाम को हाथों मे फूलों की मालाये तथा नाना प्रकार की सुगंधियाँ लेकर जेतवन की ओर जाने लगी । जेतवन से लौटने वाले लोग पूछते-- “सुन्दरी ! कहाँ जा रही है?” वह उत्तर देती "मैं श्रमण गौतम के पास उसकी गन्धकुटी में रहने जा रही हूँ ।"

५. और तैथिकों के उद्यान में रात बिता कर वह प्रातः काल होने पर उधर से लौटती । यदि कोई उससे पूछता कि तू रात भर कहाँ रही तो वह उत्तर देती – 'श्रमण गौतम के पास ।'

६. कुछ दिनों के बाद तैर्थिकों ने हत्यारों को कुछ ले देकर सुन्दरी की हत्या करवा दी और उसकी लाश को जेत वन के पास की कूड़े की ढेरी पर फिकवा दिया ।

७. तब उन तैर्थिको ने सरकारी कर्मचारियों तक यह सूचना भिजवाई कि सुन्दरी रोज जेतवन आया-जाया करती थी और अब वह दिखाई नहीं देती ।

८. सरकारी अफसरों को साथ लेकर उन्होंने सुन्दरी की लाश को कूडे की ढेरी पर से खोज निकाला ।

९. तब तैर्थिको ने तथागत के श्रावकों पर आरोप लगाया कि अपने शास्ता की लज्जा ढकी रखने के लिये उन्होंने सुन्दरी को मार डाला ।

१०. लेकिन हत्यारे आपस में इस रुपये के बटवारे के बारे में जो उन्हें सुन्दरी की हत्या करने के लिये मिला था, एक शराब की दुकान पर बैठे बैठे लडने लगे ।

११. अफसरों ने तुरन्त उन्हे पकड लिया । उन्होंने अपना अपराध स्वीकार किया और उन तैर्थिको को भी फंसाया जिनकी प्रेरणा से उन्होंने वह अपराध किया था ।

१२. इस प्रकार तैर्थिकों का रहा-सहा प्रभाव भी जाता रहा ।

 

५. जैन तैर्थिको द्वारा अनैतिकता का मिथ्या - रोप

१. सुर्योदय के साथ ही जैसे जुगनु अस्त हो जाते है, वह ही दशा तैर्थिकों की हुई । लोगों ने उनकों भेंट-पूजा भी देनी बन्द कर दी और उनका आदर-सत्कार भी करना बन्द कर दिया ।

२. वह चौरस्तों पर खडे हो होकर चिल्लाने लगे-- “यदि श्रमण गौतम पूर्ण ज्ञानी (बुद्ध) है तो हम भी है । यदि श्रमण गौतम को दान देने पुण्य लाभ होता है तो हमें भी दान देने से पुण्य लाभ होगा । इसलिये हमारी भेंट पूजा करो ।”

३. लोगों ने इसकी ओर ध्यान नहीं दिया । तब उन्होंने छिपकर एक षडयन्त्र रचने की सोची जिससे लोगों की नजर में संघ को गिराया जा सके ।

४. उस समय श्रावस्ती में चिंचा नाम की एक ब्राह्मणी (?) परिव्राजिका रहती थी । उसका रूप-रंग अत्यंत आकर्षक था और उसकी भाव-भंगिमा मनको लुभाने वाली थी ।

५. षडयन्त्रकारियों में एक दुष्ट ने परामर्श दिया कि चिंचा की सहायता से बुद्ध के बारे में अपवाद फैलाना और उसका लाभ-यश घटाना आसान होगा । शेष लोग सहमत हो गये ।

६. एक दिन चिंचा तैर्थिको के उद्यान में आई और अभिवादन कर पास बैठ गई । लेकिन किसी ने उससे बातचीत नहीं की ।

७. इस पर चकित होकर वह बोली :- "मैंने आप का कुछ अपराध किया है? मैंने आप को तीन बार अभिवादन किया है और मुझ से एक शब्द नहीं बोलते ।”

८. तैर्थिक बोले -- “बहन! क्या तू इतना भी नहीं जानती कि श्रमण गौतम की जन-प्रियता हमारे लाभ - सत्कार में बड़ी बाधक हो रही है?" “मैं नहीं जानती । क्या मैं इस विषय में कुछ कर सकती हूँ?"

९. “बहन! यदि तू हमारी कुछ भला करना चाहती है, तो अपने प्रयास से श्रमण गौतम के बारे में अपवाद फैला दे जिससे वह जन- प्रिय ना रहे।” 'बहुत अच्छा, इस विषय में आप मुझ पर निर्भर रहे' कह वह वहाँ से चल दी ।

१०. ‘स्त्री चरित्र' दिखाने में चिंचा पारंगत थी । जब लोग जेतवन से बुद्ध के प्रवचन सुनकर लौटने वाले होते, तो रक्तावरणा चिंचा हाथ में फूलों की माला और सुगन्धियाँ लिये जेतवन की ओर जाती दिखाई देती ।

११. यदि कोई प्रश्न करता-- "इस समय कहीं जा रही है?” वह उत्तर देती, "तुम्हे इससे क्या लेना-देना?” जेतवन के समीप तीर्थिकाराम में रात बिताकर वह सुबह के समय शहर की ओर लौटती, जब शहर के लोग बुद्ध के दर्शनार्थ जेतवन की ओर जाते होते ।

१२. यदि कोई उससे पूछता-- "रात कहाँ बिताई?” वह उत्तर देती "तुम्हें इस से क्या लेना-देना? मैंने जेतवन में श्रमण गौतम के साथ (उसकी) गन्धकुटी में रात बिताई ।"किसी किसी के मन में कुछ शंका पैदा हो जाती ।

१३. चार महिने बीतने पर उसने अपने पेट के गिर्द कुछ पुराने चीथडे लपेट कर उसे ऊंचा कर लिया और कहना आरम्भ किया कि श्रमण गौतम से उसे गर्भ ठहर गया है । कोई कोई शायद विश्वास भी कर लेते थे ।

१४. नौवे महिने में उसने अपने पेट पर एक लकडी का टुकड़ा बांध लिया और विषैले कीडो से देह कटाकर हाथ पैर फुला लिये और जिस समय तथा जिस स्थान पर भगवान् बुद्ध भिक्षुओं और गृहस्थों को प्रवचन दे रहे थे वही पहुंच कर कहने लगी: हे महान् उपदेशक! ! बहुत उपदेश तुम लोगों को देते हो । तुम्हारी वाणी बडी मधूर हैं और तुम्हारे होंठ बड़े कोमल है । तुम्हारे संसर्ग से मुझे गर्भ ठहर गया है और मेरा समय नजदीक आ गया है ।

१५. “तुमने मेरी प्रसूति की कोई व्यवस्था नहीं की । उस व्यवस्था के योग्य पथ्य आदि भी मुझे कहीं दिखाई नहीं देता । यदि तुम स्वयं इसकी व्यवस्था नहीं कर सकते, तो अपने शिष्यों में से किसी को चाहे कोशल नरेश को, चाहे अनाथपिण्डिक को, अथवा चाहे विशाखा को-- कहकर इसकी व्यवस्था क्यों नही कराते ?

१६. “लगता है कि तुम किसी कुमारी को अंगीकार करना ही जानते हो, लेकिन उसके परिणाम स्वरुप जो सन्तान जन्म ग्रहण कर ले उसकी पालन- विधि से अपरिचित हो ।” उपस्थित जनता मूक बनी बैठी रही ।

१७. भगवान बुद्ध ने अपना प्रवचन बीच में रोक कर बडी गम्भीरता से उत्तर दिया-- "बहन ! तूने जो कहा है उसके सत्यासत्य का ज्ञान केवल मुझे और तुझे ही है ।"

१८. चिंचा जोर जोर से खांसते हुए बोली- हां हां, ऐसी बात का ज्ञान हम दोनो को ही हो सकता है ।"

१९. उसके खांसने से वह गांठ जिससे उसने वह लकडी पेट पर बांधी हुई थी, ढीली पड़ गई और वह लकड़ी खिसक कर उसके पांव पर आ पडी । चिंचा कहीं की न रही ।

२०. लोगों ने उसे डण्डे और पत्थर मार मार कर वहाँ से भगा दिया ।