भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
तीसरा भाग उनके धम्म के आलोचक
१. सभी के लिये संघ का सदस्य बन सकने की आलोचना
१. किसी भी उपासक गृहस्थ को भिक्षु संघ अपना सदस्य बना सकता था ।
२. कुछ लोग ऐसे थे जो भगवान बुद्ध की आलोचना करते थे कि उन्होंने सभी के लिये संघ का द्वार खोल रखा है ।

३. उनका तर्क था कि इस व्यवस्था में यह दोष है कि कुछ लोग संघ में प्रविष्ट होने के अनन्तर फिर दुबारा गृहस्थ बन जा सकते हैं और उनके इस प्रकार निकल भागने से लोगों को यह कहने का अवसर मिलेगा कि श्रमण गौतम का धम्म निकम्मा होगा, तभी तो लोगों ने इसे त्याग दिया है ।
४. यह आलोचना निराधार थी। जिस उद्देश्य से तथागत ने यह नियम बनाया था, वह उद्देश्य आलोचकों के ध्यान मे आया ही न था ।
५. तथागत का उत्तर था कि उन्होंने सद्धम्म की स्थापना करके अमृत भरे सरोवर का निर्माण किया है ।
६. भगवान बुद्ध की इच्छा थी कि मलिन चित्त वाला कोई भी हो इस सद्धम्म रुपी सरोवर में स्नान करके अपने आपको निर्मल बना सके ।
७. और यदि कोई सद्धम्म रुपी सरोवर तक पहुँच कर भी उसमें स्नान नहीं करता और पूर्ववत् मलिन ही बना रहता है तो इसमें उसी का दोष है, सद्धम्म रुपी सरोवर का नहीं ।
८. “अथवा क्या मैं, “तथागत का कहना था,” ऐसा कर सकता हूँ कि सद्धम्म रुपी सरोवर का निर्माण करने के अनन्तर कहूँ कि जो पहले से ही निर्मल चित्त हैं वे ही इसमें स्नान करने जायें और जो पहले से ही निर्मल नहीं हैं, वे इसमें स्नान करने न जाये ?
९. “तब मेरे इस सद्धम्म का उपयोग ही क्या होगा?”
१०. आलोचक भूल गये कि तथागत अपना धम्म चन्द लोगों तक ही सीमित नहीं रखना चाहते थे । वे चाहते थे कि इसका द्वार सभी के लिये खुला रहे सभी इसका परीक्षण कर सकें ।
२. व्रत ग्रहण करने की आलोचना
१. पंचशील ही पर्याप्त क्यों नहीं है? उन्हें और दूसरें व्रतों को व्रत रुप मे ग्रहण करने की क्या आवश्यकता है?
२. तर्क करने वाले तर्क करते थे कि बिना औषध के रोग का शमन हो सकता है, तो फिर वमन कराने वाली औषधियों, जुलाब देने वाली औषधियों तथा अन्य ऐसी ही औषधियों का क्या प्रयोजन ?
३. इसी प्रकार यदि ग्रहस्थ उपासक पंचशील ग्रहण करके ही इन्द्रियों के भोग भोगता हुआ भी शान्त श्रेष्ठ निर्वाण को प्राप्त कर सकता है तो भिक्षु को उन शीलो तथा दूसरें व्रतो को व्रतरुप में ग्रहण करने की क्या आवश्यकता है ।
४. भगवान बुद्ध ने इन्हे 'व्रतों' का स्वरुप इसलिये दिया है, क्योंकि नैतिकता की दृष्टि से इसका निश्चित मूल्य है ।
५. जो जीवन व्रत- युक्त है उसका नैतिक पथ पर अग्रसर होना निश्चित है । व्रत अपने में ही पतन के विरुद्ध एक बड़ा संरक्षण है ।
६. जो 'व्रत' ग्रहण करते है और उनका स्वतन्त्र रुप से पालन करते हैं, वे उन्नत होते हैं ।
७. ‘व्रतों' का पालन काम-तृष्णा, ईर्ष्या, अहंकार तथा अन्य कुविचारों का बाधक है ।
८. जो 'व्रत' ग्रहण करते है तथा उनका पालन करते है वे निश्चित रुप से सुरक्षित रहते है और उनका मन तथा कर्म निर्मल होता है ।
९. मात्र शील ग्रहण करने से ऐसा नही होता ।
१०. शील ग्रहण करना पतनोन्मुख होने से उतना नहीं बचाता जितना व्रत बचाते है ।
११. 'व्रतों का जीवन ज्यादा कठिन है, मात्र शील ग्रहण करने वाले का नही । मानवता के कल्याण के लिये यह आवश्यक है कि समाज में कुछ ‘व्रती ‘भी रहे । इसीलिये भगवान बुद्ध ने 'शीलों ' तथा 'व्रती 'दोनों की व्यवस्था की है ।