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भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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16 जून 2023
Book
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४. शील का प्रचार संसार को अन्धकारावृत करने का दोषारोपण

(१)

१. दुःख का कपिल ने जो अर्थ किया था वह था चंचलता, अशान्ति, अस्थिरता ।

२. आरम्भ में यह सब कुछ तात्विक अर्थ ही रखता था ।

३. बाद में इसका अर्थ शरीर और मन का कष्ट हो गया ।

bhagwan buddha aur unka dhamma - Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar in Hindi

४. दोनों अर्थ एक दूसरे से बहुत दूर दूर नहीं थे । दोनों पास पास थे

५. अशान्ति से ही शरीर तथा मन के कष्ट उत्पत्र होते है ।

६. अचिरकाल में ही इसका अर्थ सामाजिक तथा आर्थिक कारणों से शारीरिक और मानसिक कष्ट सहन हो गया ।

७. भगवान् बुद्ध ने 'दुःख 'शब्द को किन अर्थो में प्रयुक्त किया है?

८. भगवान् बुद्ध का एक प्रवचन है, जिस से यह स्पष्ट होता है कि तथागत इस बात से अपरिचित नहीं थे कि दरिद्रता दुःख की जननी है ।

९. अपने उस प्रवचन में तथागत ने कहा:- “भिक्षुओं, संसारी आदमी के लिये क्या दरिद्रता दुःखद वस्तु है?”

१०. “भगवान् ! निश्चित रुप से ।"

११. " और जब आदमी गरीब होता है, उसे गरज रहती है, उसका हाथ तंग रहता है, उसे कर्ज लेने की आवश्यकता आ पडती है, तो क्या वह अवस्था भी दुःखद है?

१२. "भगवान्! निश्चित रुप से ।”

१३. “और जब उसे कर्ज की जरुरत होती है, वह उधार लेता है तो क्या यह भी दुःखद है?"

१४. "भगवान्! निश्चित रुप से ।"

१५. “और जब कर्जा चुकाने का समय आता है, वह कर्जा चुका नहीं सकता और लेने वाले उसी पर जोर डालते हैं तो क्या यह भी दुःखद है?"

१६. "भगवान्! निश्चित रुप से ।"

१७. “और जब ज़ोर डालने पर भी वह नहीं दे पाता, तो वे उसे पीटते हैं, तो क्या यह भी दुःखद है?"

१८. "भगवान्! निश्चित रुप से ।"

१९. " और जब पीटने पर भी नहीं दे पाता तो बांध डालते हैं, तो क्या यह भी दुःखद है?"

२०. "भगवान्! निश्चित रुप से ।”

२१. “इसलिये भिक्षुओं! दरिद्रता, आवश्यकता, कर्जा लेना, जोर डाला जाना, पीटा जाना तथा बांधा जाना- ये सभी संसारिक पुरुष के लिये कष्टप्रद है ।

२२. "संसार में दरिद्रता और ऋण बडे दुःखद है।"

२३. इससे स्पष्ट होता है कि भगवान् बुद्ध की दुःख की कल्पना भौतिक भी है ।


(२) अनित्यता को अन्धकार का कारण बताना

१. इस ‘अन्धकारावृत्त’ के आरोप का दूसरा कारण 'अनित्यता' का यह सिद्धांत बताया जाता है कि जो कुछ भी किन्ही चींजों के मेल से बना है वह सब अनित्य है ।

२. इस सिद्धांत की सच्चाई को सभी स्वीकार करते है ।

३. हर कोई मानता है कि सभी चीजे अनित्य है ।

४. यदि कोई सिद्धांत 'सत्य' है तो उसकी घोषणा होनी हि चाहिये, जैसे स्वयं 'सत्य' की, भले ही वह अरुचिकार ही क्यों न हो ।

५. लेकिन इससे एक निराशावादी परिणाम क्यों निकाला जाय?

६. यदि जीवन ‘थोडे ही दिन के लिये है, तो यह 'थोडे ही दिन के लिये है, इस विषय में किसी को भी दुःखी होने की जरुरत नहीं ।

७. यह तो केवल अपने अपने दृष्टिकोण की बात है ।

८. बर्मियों का दृष्टिकोण सर्वथा भिन्न है ।

९. किसी की मृत्यु का उत्सव बर्मी परिवार में ऐसे ही मनाया जाता है जैसे यह कोई बडी खुश होने की बात हो ।

१०. जिस दिन किसी की मृत्यु होती है, गृहस्थ सभी परिचितों को एक 'भोज देता है, और लोग नाचते गाते मृत - देह को श्मशान भूमि तक ले जाते है । मृत्यु आने ही वाली थी -- इसलिये कोई इसकी परवाह नहीं करता ।

११. यदि ‘अनित्यता' का सिद्धांत निराशाजनक है तो केवल इसलिये है कि 'नित्यता' को जो वास्तव में असत्य हैं सत्य मान लिया गया है ।

१२. इसलिये बुद्ध की देशना पर यह आरोप नही लगाया जा सकता कि यह आदमी को निराश बनाने वाली है ।