प्राचीन भारत में क्रांति तथा प्रतिक्रांति - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Prachin Bharat Me Kranti Aur Pratikranti dr Bhimrao Ramji Ambedkar
जिस किसी को बुद्ध के सिद्धांतों की थोड़ी बहुत भी जानकारी है, क्या वह यह इंकार कर सकता है कि भागवत्गीता के इन श्लोकों में बौद्ध धर्म के सिद्धांतों की शब्दशः पुनरोक्ति नहीं की गई है?
भगवत् गीता में अध्याय 13 के श्लोक 5, 6, 18, 19 में विभिन्न शीर्षकों के अंतर्गत कर्म की नवीन प्रतीकात्मक व्याख्या की गई है, जैसे (1) यज्ञ (बलि), (2) दान (उपहार), (3) तप (प्रायश्चित), (4) भोजन, और (5) स्वाध्याय (वैदिक अध्ययन ) । प्राचीन विचारों की इस नवीन व्याख्या का स्रोत क्या है? इसकी तुलना उससे की जाए जो मज्झिम निकाय 286, 16 में बुद्ध के द्वारा कहा गया है। क्या कोई इसमें संदेह कर सकता है कि कृष्ण ने अध्याय 17 के श्लोक 5, 6, 18, 19 में बुद्ध के शब्दों को ज्यों का त्यों प्रस्तुत नहीं किया है?
मैंने सैद्धांतिक दृष्टि से जो महत्वपूर्ण उद्धरण चुने हैं, ये उनके कुछेक उदाहरण हैं । जो लोग इस विषय के अध्ययन करने में रुचि रखते हैं, वे गीता और बौद्ध धर्म के बीच समानताओं के उन संदर्भों को देख सकते हैं, जो श्री तेलंग ने भागवत्गीता के अपने संस्करण की पाद-टिप्पणियों में दिए हैं तथा अपनी जिज्ञासा का समाधान कर सकते हैं। परंतु मैंने जो उदाहरण दिए हैं, वह यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि भागवत्गीता में बौद्ध धर्म की विचारधारा का कितना अधिक समावेश है और भगवत् गीता ने बौद्ध धर्म से कितना अधिक ग्रहण किया है। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि भगवद्गीता की रचना सोद्देश्य रूप में बौद्ध धर्म के सुत्तों (सूत्रों) के आधार पर की गई है। इसमें जो कथोपकथन हैं, वह बुद्ध के सुत्त (सूत्र) हैं। बौद्ध धर्म ने महिलाओं और शूद्रों के उद्धार का आश्वासन दिया था। इसी प्रकार कृष्ण ने भी महिलाओं और शूद्रों को उद्धार का आश्वासन दिया है। बौद्ध धर्मावलंबियों का कहना है: 'मैं बुद्ध, धर्म और संघ की शरण में जाता हूं।' ठीक इसी प्रकार कृष्ण कहते हैं: 'सभी धर्मों को त्याग दो और स्वयं को मुझे समर्पित कर दो।' जितनी समानता बौद्ध धर्म और भागवत्गीता में मिलती है, उतनी अन्यत्र कहीं नहीं मिलती।
मैंने यह बताया कि गीता पूर्व-मीमांसा के बाद की और बौद्ध धर्म के भी बाद की रचना है। मैं अपनी स्थापना को समाप्त कर सकता था। परंतु मैं अनुभव करता हूं कि यह संभव नहीं है, क्योंकि मेरी स्थापना के विरुद्ध एक तर्क शेष है, जिसका उत्तर दिया जाना आवश्यक है। यह भी तिलक का तर्क है। यह एक बुद्धिकौशल है। श्री तिलक यह अनुभव करते हैं कि भगवद्गीता और बौद्ध धर्म, दोनों में विचारों और उनकी अभिव्यक्ति में अनेक समानताएं हैं। चूंकि बौद्ध धर्म भागवत्गीता से प्राचीन है, अतः यह स्वाभाविक है कि भागवत्गीता की स्थिति ऋणी की है और बौद्ध धर्म की ऋणदाता की है। यह सीधी सी बात श्री तिलक को रुचिकर नहीं है और उन सभी लोगों को भी नहीं सुहाती जो प्रतिक्रांति को उचित मानते हैं। उन सभी के लिए यह प्रतिष्ठा का प्रश्न है कि प्रतिक्रांति को क्रांति का ऋणी नहीं होना चाहिए। इस कठिनाई को दूर करने के लिए
श्री तिलक ने एक नई बात खोज निकाली। उन्होंने हीनयान बौद्ध धर्म और महायान बौद्ध धर्म के बीच अंतर बताया है तथा यह कहा कि महायान बौद्ध धर्म भगवद्गीता के बाद अस्तित्व में आया और यदि बौद्ध धर्म तथा भगवद्गीता के बीच कोई समानताएं हैं तो भागवत्गीता से महायान बौद्ध धर्मावलंबियों के द्वारा विचार ग्रहण किए जाने के कारण हैं। इससे दो प्रश्न उठते हैं। महायान बौद्ध धर्म की उत्पत्ति की क्या तिथि है? भागवत्गीता की रचना की तिथि क्या है? श्री तिलक का तर्क एक बुद्धिकौशल और चतुराई है। परंतु इसमें कोई सार नहीं है। पहले तो यह मौलिक नहीं है। यह विंटरनिट्ज¹ और केर्न² द्वारा सरसरी तौर पर की गई कतिपय टिप्पणियों के आधार पर हैं। ये टिप्पणियां उनकी पाद-टिप्पणियों में मिलती हैं। इनमें कहा गया है कि भागवत्गीता और महायान बौद्ध धर्म में कुछ समानताएं हैं और यह समानताएं भगवतगीता से ग्रहण किए गए विचारों के आधार पर हैं। इन टिप्पणियों की पुष्टि में विंटरनिट्ज, केर्न अथवा श्री तिलक द्वारा किसी विशेष अनुसंधान का साक्ष्य नहीं दिया गया है। यह सभी टिप्पणियां इन अनुमानों के आधार पर हैं कि भगवत् गीता महायान बौद्ध धर्म से पूर्व की रचना है।
इसके बाद मेरे सामने प्रश्न भागवत्गीता के रचना - काल का है और भगवद्गीता की तिथि के प्रश्न पर विचार करना है, और इस प्रश्न पर विशेषकर उस मत के संदर्भ में विचार किया जाना है, जो श्री तिलक ने प्रस्तुत किया है। श्री तिलक का मत है कि गीता, महाभारत का एक भाग है और इन दोनों का रचयिता व्यास नामक एक ही लेखक है, जिसने इन दोनों की रचना की थी। इसलिए गीता का रचना - काल वही होना चाहिए, जो महाभारत का रचना- काल है। श्री तिलक का यह तर्क है कि महाभारत शक संवत् से कम से कम 500 वर्ष पूर्व रचा गया, जिसका आधार यह है कि महाभारत की कथाएं मेगस्थनीज को पता थीं, जो चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में ग्रीक राजदूत के रूप में लगभग 300 वर्ष ईसा पूर्व में भारत आए थे। शक संवत् 78 ईसवी में प्रारंभ हुआ। इस आधार पर यह निष्कर्ष निकलता है कि भागवत्गीता की रचना 422 ईसा पूर्व की गई थी। वर्तमान गीता के रचना - काल के बारे में यही उनका मत है। उनके मतानुसार मूल गीता, महाभारत की अपेक्षा कुछ शताब्दियों पुरानी होनी चाहिए। यदि भागवत्गीता में दी गई परंपरा पर विश्वास किया जाए कि भागवत्गीता में धर्म की शिक्षा प्राचीन काल में नर द्वारा नारायण को दी गई थी, तो ऐसी स्थिति में महाभारत की रचना की तिथि के बारे में श्री तिलक का मत तर्कसंगत नहीं है। पहली बात तो यह है कि यहां यह अनुमान किया गया है कि संपूर्ण भागवत्गीता और संपूर्ण महाभारत की रचना एक ही बार एक ही समय और एक ही व्यक्ति द्वारा की गई। परंपरा और इन दोनों ग्रंथों में प्राप्त अंतः साक्ष्य की दृष्टि से इस अनुमान
1. हिस्ट्री ऑफ इंडियन लिटरेचर (अंग्रेजी अनुवाद), खंड 2, पृ. 229, पाद टिप्पणी
2. मैनुअल ऑफ इंडियन बुद्धिज्म, पृ. 122, पाद टिप्पणी ।
3. गीता रहस्य, खंड 2, पृ. 791-800
का कोई औचित्य नहीं है। अगर हम महाभारत तक अपने विचार-विमर्श को सीमित रखें, तो पता चलेगा कि श्री तिलक द्वारा किया गया अनुमान सुपरिचित भारतीय परंपराओं के नितांत विरुद्ध है। यह परंपरा महाभारत की रचना को तीन चरणों में विभाजित करती है। (1) जय, (2) भारत, और (3) महाभारत और प्रत्येक भाग को अलग-अलग लेखक की कृति बताती है। इस परंपरा के अनुसार व्यास महाभारत के प्रथम संस्करण के लेखक थे, जिसे 'जय' कहा जाता है। द्वितीय संस्करण का नाम भारत है। परंपरा इसे वैशम्पायन का लिखा बताती है। यह परंपरा एक पुष्ट परंपरा थी । इसकी पुष्टि प्रोफेसर होपकिन्स के अनुसंधानों द्वारा होती है, जो महाभारत के अंतः साक्ष्य के परीक्षण पर आधारित है। प्रोफेसर होपकिन्स¹ के अनुसार महाभारत की रचना कई चरणों में हुई। प्रोफेसर होपकिन्स² का कहना है कि प्रथम चरण में यह केवल पांडु महाकाव्य था । इसमें उपदेशात्मक सामग्री नहीं थी और उसमें उन वीरों से संबंधित कथा और आख्यान थे, जिन्होंने महाभारत के युद्ध में भाग लिया था। प्रोफेसर होपकिन्स का कहना है कि यह रचना 400-200 ईसा पूर्व में हुई होगी। दूसरे चरण में इस महाकाव्य की पुनर्रचना हुई और इसमें उपदेश आदि और पुराणों से सामग्री का समावेश किया गया। यह 200 ईसा पूर्व और 200 ईसवी के मध्य हुआ। (1) तीसरे चरण में पहले चरण की कृति को साथ में मिलाकर दूसरे चरण की कृति में बाद के पुराणों को शामिल किया गया, और (2) संवर्द्धित अनुशासन पर्व को शांति पर्व से अलग किया गया है तथा एक अलग पर्व बना दिया गया। यह 200 से 400 ईसवी के बीच हुआ। प्रोफेसर होपकिन्स इन तीनों चरणों के अतिरिक्त एक और चरण, अर्थात् यदा-कदा हुए विस्तार की अंतिमावस्था बताते हैं। यह 400 ईसवी के बाद में हुआ। इस निष्कर्ष पर पहुंचने के पहले प्रो. होपकिन्स ने उन सभी तर्कों का अनुमान और उन पर विवेचन कर लिया था, जो श्री तिलक ने दिए हैं, जैसे पाणिनि³ की कृति और गृह्य सूत्रों⁴ में महाभारत का उल्लेख। श्री तिलक ने जो नए साक्ष्य दिए हैं और जिन पर प्रो. होपकिन्स ने विचार ही नहीं किया था, वे दो हैं। इस तरह का पहला साक्ष्य वह है, जिसमें कुछ विवरण दिए गए हैं। इनके बारे में यह बताया जाता है कि ये मेगस्थनीज⁵ के हैं, जो चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में ग्रीक राजदूत बनकर आया था। दूसरे साक्ष्य खगोलीय हैं⁶ जो आदि पर्व में मिलते हैं। इनमें उत्तरायण का उल्लेख है जो श्रवण नक्षत्र से प्रारंभ होता है। श्री तिलक ने जो तथ्य मेगस्थनीज के विवरण के आधार पर दिए हैं, उन्हें अस्वीकार नहीं किया जा सकता और उनसे यह सिद्ध हो सकता है कि मेगस्थनीज के समय में, अर्थात् 300 ईसा पूर्व शौरसैनी समाज में कृष्ण भक्ति संप्रदाय था, परंतु इससे यह कैसे सिद्ध हो सकता है कि महाभारत की रचना हो चुकी थी। यह नहीं हो सकता। इससे यह सिद्ध नहीं हो सकता कि मेगस्थनीज ने जिन आख्यानों-कथाओं का उल्लेख किया है, वे महाभारत से ली गई हैं। इससे यह तो सिद्ध नहीं होता कि ये आख्यान और कथाएं और कहानियां जनसमूह में व्याप्त नहीं थीं और महाभारत के लेखक तथा ग्रीक राजदूत, दोनों ने ही इस अपार सामग्री का चयन नहीं किया था।
1. दि ग्रेट इपिक ऑफ इंडिया, पृ. 398
2. वही, पृ. 398
3. वही, पृ. 395
4. वही, पृ. 390
5. गीता रहस्य, पृ. 79
6. वही, पृ. 789
श्री तिलक का खगोलीय साक्ष्य काफी ठोस हो सकता है। उनका यह कथन सच है¹ कि अनुगीता में यह कहा गया है कि विश्वामित्र ने श्रवण (मा.भा. अश्व. 44.2. और आदि. 71.34 ) से नक्षत्र की गणना प्रारंभ की थी। समीक्षकों द्वारा इस तथ्य की व्याख्या की गई है और उन्होंने यह बताया कि उस समय उत्तरायण का प्रारंभ श्रवण नक्षत्र से हुआ था और इसमें मतभेद करना उचित नहीं है। वेदांग ज्योतिष के अनुसार उत्तरायण धनिष्ठा नक्षत्र में सूर्य के आने पर प्रारंभ होता है । खगोलीय गणना के अनुसार धनिष्ठा नक्षत्र में सूर्य के आने पर उत्तरायण के आरंभ होने का समय शक संवत् शुरू होने के लगभग 1500 वर्ष पूर्व का होना चाहिए। लेकिन खगोलीय गणना के अनुसार उत्तरायण का एक नक्षत्र पूर्व प्रारंभ होने के लिए एक हजार वर्ष का समय लगाता है। इस गणना के अनुसार उत्तरायण श्रवण नक्षत्र में सूर्य के आने पर प्रारंभ होना चाहिए। यह शक संवत् से पूर्व लगभग 500 वर्ष का समय होता है। यह निष्कर्ष तब उचित था, यदि यह सत्य होता कि संपूर्ण महाभारत एक ग्रंथ के रूप में एक ही समय और एक ही व्यक्ति द्वारा रचा गया था। यह भी बताया गया है कि इस अनुमान के लिए कोई प्रमाण नहीं है। अतः श्री तिलक के खगोलीय साक्ष्य के आधार पर महाभारत की रचना - तिथि निर्धारित नहीं की जा सकती। यह साक्ष्य महाभारत के उस भाग की भी रचना - तिथि के निर्धारण में प्रयोग किया जा सकता है, जो इसके द्वारा प्रभावित है। इस प्रसंग में महाभारत का आदि पर्व उल्लेखनीय है । इन्हीं कारणों से महाभारत की रचना की तिथि के संबंध में श्री तिलक का सिद्धांत सटीक नहीं बैठता । वास्तव में महाभारत जैसी कृति के लिए कोई भी एक तिथि के निर्धारण करने का प्रयत्न व्यर्थ ही समझा जाना चाहिए, जो धारावाहिक कथा के रूप में अंतराल देकर दीर्घ काल तक लिखा जाता रहा था। हम यही कह सकते हैं कि महाभारत की रचना 400 ईसा पूर्व से लेकर 400 ईसवी तक की गई। इस निष्कर्ष से वह प्रयोजन पूरा नहीं होता, जो श्री तिलक का अभीष्ट है। कुछ विद्वानों को यह अवधि भी बहुत कम लगती है। कहा जाता है² कि वन पर्व के 190वें अध्याय में उल्लिखित एडूकों की व्याख्या गलत की गई है और उसका अर्थ बौद्ध स्तूप लगाया गया, जबकि इसका आशय ईदगाहों से है, जिनका निर्माण मुसलमान आक्रमणकारियों ने मुस्लिम धर्म में परिवर्तित किए गए लोगों के लिए किया था। यदि यह व्याख्या सही है तो इससे यह सिद्ध होगा कि महाभारत के कुछ भाग मोहम्मद गौरी के आक्रमणों के समय अथवा उसके बाद लिखे गए थे।
1. गीता रहस्य, 2, पृ. 789
2. धर्मानंद कोसांबी, हिंदी संस्कृति आणि अहिंसा (मराठी), पृ. 156
अब मैं भागवत्गीता की रचना तिथि के बारे में श्री तिलक की स्थापनाओं को लेता हूं। वास्तव में उनकी स्थापना में दो तर्क अंतर्निहित हैं। प्रथम, गीता महाभारत का एक भाग है। इन दोनों का रचना - काल एक ही है और वे दोनों ग्रंथ एक ही व्यक्ति के द्वारा रचे गए हैं। उनका दूसरा तर्क यह है कि जो भागवत्गीता आज उपलब्ध है, वह वैसी ही मिलती है, जैसी कि शुरू में लिखी गई थी। मैं इन दोनों तर्कों को अलग-अलग लेता हूं जिससे कोई भ्रांति न हो ।