प्राचीन भारत में क्रांति तथा प्रतिक्रांति - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Prachin Bharat Me Kranti Aur Pratikranti dr Bhimrao Ramji Ambedkar
क्या भागवत्गीता बौद्ध मत के पूर्व की रचना है? यह प्रश्न श्री तेलंग द्वारा उठाया गया था। अब हम दूसरी बात पर आते हैं। शाक्य मुनि के महान सुधारों के संबंध में गीता की स्थिति क्या है? यह प्रश्न विशेषकर बौद्ध सिद्धांतों और गीता के सिद्धांतों में
उल्लेखनीय समानता के सदंर्भ में बहुत ही रोचक है, जिसके बारे में हमने अपने अनुवाद की पाद-टिप्पणियों में ध्यान आकृष्ट किया है। लेकिन इस प्रश्न को हल करने के लिए दुर्भाग्य से अपेक्षित तथ्य नहीं मिलते। यह अवश्य है कि प्रो. विल्सन का विचार है कि गीता¹ में बौद्ध धर्म के सिद्धांतों के चिह्न मिलते हैं लेकिन उनकी यह धारणा बौद्धों और चार्वाकों या भौतिकवादियों के बीच पाए जाने वाले मतभेद पर आश्रित थी।² इस संदर्भ के अलावा हमारे पास कोई दूसरा विश्वसनीय प्रमाण नही है। गीता में बौद्ध धर्म का उल्लेख नहीं है, यह एक 'नकारात्मक तर्क' है और अपर्याप्त है। यह तर्क मेरे विचार से, संतोषजनक भी नहीं है, हालांकि जैसा कि मैंने अन्यत्र कहा है³, 'गीता में जो कुछ कहा गया है उनमें से कुछ बातें बौद्ध धर्म के समनुरूप हैं।' हालांकि गीता में उसके पूर्ववर्ती विचारकों के चिह्न प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में मिलते हैं, लेकिन इस प्रश्न के तथ्यों के बारे में एक दृष्टिकोण ऐसा है, जो मेरे विचार में उस निष्कर्ष की पुष्टि करता है, जिस पर उक्त नकारात्मक तर्क के द्वारा पहुंचा जा सकता है। बुद्ध जिन तथ्यों के कारण ब्राह्मण धर्म का विरोध करते हैं, वह वेदों के वास्तविक अधिकार और वर्णों में अंतर के बारे में सही दृष्टिकोण को लेकर हैं। सैद्धांतिक चिंतन के अनेक क्षेत्रों में बौद्ध धर्म अभी भी पुराने ब्राह्मणवाद का एक रूप है।⁴ यह विभिन्न समनुरूपताओं के आधार पर, जिनकी ओर हमने ध्यान आकृष्ट किया है, स्पष्ट हो जाता है। अब इन दोनों आधारों पर गीता स्वतः उन विचारों के प्रति प्रतिरोध का प्रतिनिधित्व करती है, जो उसके रचना - काल के समय विद्यमान था। बौद्ध धर्म की तरह गीता वेदों को पूर्णतः अस्वीकृत नहीं करती, बल्कि उन्हें एक ओर टिका देती है। गीता वर्ण-व्यवस्था का उन्मूलन नहीं करती। यह वर्ण व्यवस्था को कुछ कम निराधार बताती है। इसलिए इन दोनों अनुमानों में से एक अनुमान इन तथ्यों के आधार पर युक्तियुक्त लगता है। या तो गीता और बौद्ध धर्म, दोनों एक ही और समनुरूप आध्यात्मिक क्रांति की अभिव्यक्ति हैं जिसने उस समय के धर्म के ढांचे को हिला दिया था, इसमें गीता आरंभ की स्थिति या इस क्रांति का आरंभिक रूप थी या बौद्ध धर्म ब्राह्मणवाद पर हावी होने लगा था और गीता उसे पुष्ट करने का एक प्रयास थी, अर्थात् गीता में उन पक्षों पर ध्यान दिया गया जो निर्बल थे, निर्बलतर पक्ष पहले ही त्यागे जा चुके थे। मैं बाद वाली स्थिति को स्वीकार नहीं करता । इसका कारण यह है कि हालांकि गीता का रचनाकार वेदों की सत्ता को चुनौती देता है, तो भी गीता में प्राचीन हिंदू व्यवस्था पर सशक्त प्रहार के प्रति कोई समर्थन के संकेत नहीं मिलते।
1. एसेज ऑन संस्कृत लिटरेचर, खंड 3, पृ. 150
2. इस बारे में इंट्रोडक्टरी एसेज टू अवर गीता इन वर्स, पृ. 11 पर क्रमशः हमारा मत देखें।
3. इंट्रोडक्शन टू गीता इन इंग्लिश वर्स, पृ. 5 क्रमशः
4. मैक्स मूलर के हिब्बर्ट लैक्चर्स, पृ. 137 वेबर्स इंडियन लिटरेचर, पृ. 288-89 राइस डेविड्स का बुद्ध धर्म पर उत्कृष्ट लघु ग्रंथ, पृ. 151 और डेविड की पुस्तक का पृ. 83 भी देखें।
इसके अलावा यह बात भी है कि ऐसा करते समय वह वही करता है, जो उसके पहले किया गया, या जो उसके समकालिक कर रहे थे। ये तथ्य उक्त नकारात्मक तर्क के निष्कर्ष को पुष्ट करते हैं। मेरे विचार में बौद्ध धर्म उच्च आध्यात्मिक विषयों पर वैसी ही अभिव्यक्ति है, जैसी कि हमें उपनिषद और गीता में मिलती है।¹
मैंने इस उद्धरण को पूरा-पूरा इसलिए उद्धृत किया है कि ऐसा ही सभी हिंदू विद्वानों का मत है। उनमें से कोई भी यह स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है कि भागवत्गीता किसी भी रूप में बौद्ध धर्म से प्रभावित है। ये विद्वान इसे अस्वीकार करने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं कि गीता ने बौद्ध धर्म से कुछ ग्रहण किया है। यही दृष्टिकोण प्रो. राधाकृष्णन का और श्री तिलक का भी है। जब कभी भागवत्गीता और बौद्ध धर्म में बहुत अधिक विचारों के साम्य होने की बात उठती है, तब उसे अस्वीकार कर दिया जाता है, और यह तर्क दिया जाता है कि यह उपनिषदों से ग्रहण किया गया है। यह प्रतिक्रांतिकारियों की ठेठ निम्न कोटि की वृत्ति है कि वे बौद्ध धर्म को कोई भी श्रेय नहीं प्रदान करना चाहते।
इस मनोवृत्ति से उन सभी को भारी दुःख पहुंचता है, जिन्होंने भागवत्गीता और बौद्ध सुत्तों का तुलनात्मक अध्ययन किया है, क्योंकि यदि इस कथन में कोई सत्यता है गीता में सांख्य दर्शन भरा हुआ है, तो इस कथन में उससे भी अधिक सत्यता है गीता बौद्ध विचारों से भरी हुई है।² यह समानता केवल विचारों में ही नहीं, बल्कि भाषा में भी है। यह कुछेक उदाहरणों से स्पष्ट हो जाएगा कि यह कहां तक सच है ।
भागवत्गीता में ब्रह्म-निर्वाण³ पर विवेचन किया गया है। कोई व्यक्ति ब्रह्म-निर्वाण तक किन साधनों से होकर पहुंच सकता है, वे भगवद्गीता में इस प्रकार बताए गए हैं: (1) श्रद्धा (अपने में विश्वास), (2) व्यवसाय (दृढ़ निश्चय), (3) स्मृति ( लक्ष्य का स्मरण), (4) समाधि (मन लगाकर चिंतन) और (5) प्रज्ञा ( अंतर्दृष्टि या यथातथ्य ज्ञान ) ।
गीता ने निर्वाण सिद्धांत कहां से लिया ? निश्चय ही यह सिद्धांत उपनिषदों से नहीं लिया गया है, क्योंकि किसी भी उपनिषद में निर्वाण शब्द का उल्लेख नहीं है। यह संपूर्ण विचारधारा बौद्धों की है और यह बौद्ध धर्म से ली गई है। यदि इस संबंध में किसी को संदेह है तो उसे भागवत्गीता के ब्रह्म- निर्वाण की तुलना बौद्ध धर्म की निर्वाण संबंधी अवधारणा से करनी चाहिए, जिसका विवेचन महापरिनिब्बान सुत्त में किया गया। है। हम देखेंगे कि ये दोनों एक हैं जिसे गीता में ब्रह्म-निर्वाण के लिए निर्धारित किया है। क्या यह सत्य नहीं है कि भगवद्गीता ने निर्वाण की अपेक्षा ब्रह्म-निर्वाण की संपूर्ण अवधारणा कहीं से ग्रहण की है और ऐसा यह विचार बौद्ध धर्म से लिए गए इस तथ्य को छिपाने के लिए किया गया है?
1. तुलना कीजिए वेबर की हिस्ट्री ऑफ इंडियन लिटरेचर, पृ. 285 श्री डेविड की पुस्तक बुद्धिज्म में पृ. 94 पर हमें प्रामाणिक बौद्ध कृति से संदर्भ मिलता है, जिसमें आत्मा का वर्णन मिलता है। इसकी तुलना गीता में दिए गए तद्विषयक सिद्धांत से कीजिए। हम देखते हैं कि दोनों इंद्रियों आदि के साथ आत्मा के तादात्म्य को अस्वीकृत करते हैं। गीता आत्मा को इनसे भिन्न स्वीकार करती है। बौद्ध धर्म इसे भी अस्वीकृत करता है और इंद्रियों के अतिरिक्त किसी सत्ता को नहीं मानता।
2. इस विषय पर कश्मीर के मुख्य न्यायाधीश श्री एस. डी. बुद्धिराजा, एम. ए. एल. एल. बी. की भगवद्गीता की तुलना कीजिए। लेखक ने गीता और बौद्ध धर्म में पाठ्यमूलक समानता की ओर ध्यान आकृष्ट करने की बार-बार कोशिश की है।
3. मैक्स मूलर, महापरिनिब्बान सुत्त, पृ. 63
एक अन्य उदाहरण लीजिए । अध्याय 7 के श्लोक 13-20 में इस बात का विवेचन किया गया है कि कृष्ण को कौन प्रिय है, वह व्यक्ति जो ज्ञानी है, वह व्यक्ति जो कर्म करता है अथवा वह व्यक्ति जो भक्त है। कृष्ण कहते हैं कि उनको भक्त प्रिय है, परंतु वह यह भी कहते हैं कि उसमें भक्ति के शुद्ध गुण होने चाहिएं। सच्चे भक्त के क्या गुण होते हैं? कृष्ण के अनुसार, सच्चा भक्त वही है जो (1) मैत्री (निश्छल सहानुभूति), (2) करुणा (दया), (3) मुदित ( सहानुभूतिपूर्ण आनंद), और (4) उपेक्षा (अंतबंधता) का आचरण करता है। भागवत्गीता में सच्चे भक्त के ये लक्षण कहां से लिए गए हैं? यहां भी इसका स्रोत बौद्ध धर्म ही है। यदि कोई व्यक्ति प्रमाण चाहता है तो वह महापदान सुत्त¹ और तेविज्जा सुत्त² से इसकी तुलना करें, जहां बुद्ध उन 'भावनाओं' (मानसिक प्रवृत्तियों) का उपदेश देते हैं, जो हृदय को संयमित करने के इच्छुक व्यक्ति के लिए आवश्यक हैं। इस तुलना से यह सिद्ध हो जाएगा कि यह संपूर्ण विचारधारा बौद्ध धर्म से ली गई है और यह शब्दशः अंगीकार की गई है।
तीसरा उदाहरण लीजिए । अध्याय 13 में भागवत्गीता में क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विषय का विवेचन किया गया है। भागवत्गीता के श्लोक 7-11 में कृष्ण ने यह बताया है कि ज्ञान क्या है और अज्ञान क्या है, जो इस प्रकार है-
"दंभरहितता ( दीनता), निरहंकार, अहिंसा अथवा अहानिकारक, क्षमा, आर्जव ( स्पष्टता), गुरु भक्ति, शुचिता दृढ़ता, आत्म-संयम, इंद्रिय संबंध विषयों में अनिच्छा, अहं का प्रभाव, जन्म, मृत्यु, जरा और व्याधि से संबंधित दुःख और पाप पर विचार, ममत्व का अभाव, पुत्र, पत्नी, घर, शरीर तथा अन्य से अनासक्ति प्रिय और अप्रिय दोनों स्थितियों में समभाव, मुझमें एकाग्र चिंतन सहित अनन्य भक्ति, पृथक स्थान का सेवन (एकांत में मनन, ध्यान), सांसारिक मनुष्यों की समाज के प्रति विरक्ति, आत्म से संबंधित ज्ञान का निरंतर मनन, तत्व (सांख्य दर्शन) के सही आशय का बोध या अनुभव, यह सब ज्ञान कहलाता है, इससे विपरीत जो कुछ भी है, वह अज्ञान है। "
1. देखिए, महापदान सुत्त
2. देखिए, तेविज्जा सुत्त