प्राचीन भारत में क्रांति तथा प्रतिक्रांति - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Prachin Bharat Me Kranti Aur Pratikranti dr Bhimrao Ramji Ambedkar
बौद्ध-काल में, जो भारत का सबसे अधिक प्रबुद्ध और तर्कसम्मत युग था, ऐसे सिद्धांतों के लिए कोई स्थान नहीं था, जो अविवेक, दुराग्रह, तर्कहीन और अस्थिर धारणाओं पर आश्रित हों। जो लोग अहिंसा पर उसे एक जीवन शैली मानकर विश्वास करने लगे थे। और जो उसे जीवन में नियम के रूप में अपना चुके थे, उनसे इस सिद्धांत को स्वीकार करने की आशा किस प्रकार की जा सकती थी कि हत्या करने पर क्षत्रिय को पाप इसलिए नहीं लग सकता क्योंकि वेदों में ऐसा करना उसका कर्तव्य बताया गया है। जिन लोगों ने सामाजिक एकता के सिद्धांत को स्वीकार कर लिया था तथा जो व्यक्ति के गुणों के आधार पर समाज का पुनर्निमाण कर रहे थे, वे श्रेणीबद्ध करने वाले चातुर्वर्ण्य के सिद्धांत और केवल जन्म के आधार पर व्यक्तियों के वर्गीकरण को क्यों स्वीकार करते, क्योंकि वेदों ने ऐसा कहा है? जिन लोगों ने बुद्ध के सिद्धांत को स्वीकार कर लिया था कि समाज में सभी दुःख तृष्णा के कारण हैं, अथवा जिसे संग्रह की प्रवृत्ति कहा जाता है, वे उस धर्म को क्यों स्वीकार करते जो लोगों को यज्ञादि कर्म (बलि) से लाभ प्राप्ति करने के लिए इसलिए प्रेरित करता है कि ऐसा करना वेद सम्मत है। इसमें कोई संदेह नहीं कि बौद्ध धर्म के तेजी से बढ़ते प्रभाव से जैमिनि के प्रतिक्रांति सिद्धांत डगमगा उठे थे और वे चकनाचूर हो जाते, यदि उन्हें भागवत्गीता का समर्थन न प्राप्त होता, और जो उन्हें भागवत्गीता से मिला भी था । भगवद्गीता द्वारा दिए गए प्रतिक्रांतिवादी सिद्धांतों की दार्शनिक पुष्टि किसी भी प्रकार से अकाट्य नहीं है। भागवत्गीता द्वारा इस बात की दार्शनिक आधार पर पुष्टि करना, कि क्षत्रिय का कर्तव्य हत्या करना है, एक बचकानी बात है। यह कहना कि हत्या करना हत्या नहीं है, क्योंकि जिसकी हत्या की जाती है, वह शरीर की है, और वह आत्मा की नहीं है। यह हत्या कर्म का ऐसा बचाव है, जिसे कभी भी नहीं सुना गया है। यदि कृष्ण को अपने उस मुवक्किल की ओर से अधिवक्ता के रूप में उपस्थित होना पड़ता जिस पर हत्या का मुकदमा चलाया जा रहा है और वे भागवत्गीता में बताए गए सिद्धांत को उस अपराधी के बचाव के लिए प्रस्तुत करते, तो इसमें तनिक भी संदेह नहीं है कि उन्हें पागलखाने में भेज दिया जाता। इसी प्रकार भागवत्गीता में चातुर्वर्ण्य व्यवस्था के सिद्धांत की पुष्टि करना भी बचकाना कार्य है। कृष्ण इस सिद्धांत की पुष्टि सांख्य के गुण सिद्धांत के आधार पर करते हैं। परंतु कृष्ण को अपनी त्रुटि का अनुभव नहीं होता। चातुर्वर्ण्य में चार वर्ण होते हैं, परंतु सांख्य के अनुसार गुणों की संख्या तीन है। चार वर्णों की व्यवस्था को उस दर्शन पर किस प्रकार आधारित किया जा सकता है, जिसमें तीन से अधिक वर्णों को मान्यता ही नहीं दी गई है? भगवद्गीता में प्रतिक्रिया के सिद्धांतों की दार्शनिक आधार पर पुष्टि करने के लिए जो यह सारा प्रयास किया गया है, वह बहुत ही बचकाना है और इसके बारे में एक क्षण भी गंभीर रूप में विचार करने की आवश्यकता नहीं है। फिर भी इसमें संदेह नहीं है कि भगवद्गीता की सहायता के बिना प्रतिक्रांति अपने सिद्धांतों की निस्सारता के कारण कभी भी समाप्त हो गई होती। भागवत्गीता की यह भूमिका क्रांतिकारियों को चाहे जितनी भी शरारतपूर्ण लगे, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि भागवत्गीता ने प्रतिक्रांति को पुनर्जीवन प्रदान किया और यदि प्रतिक्रांति आज भी जीवित है तो यह उस दार्शनिक पुष्टि के आडंबर के कारण है, जो इसे भगवद्गीता से प्राप्त हुई है - यह सब कुछ वेद-विरुद्ध और यज्ञ - विरुद्ध है। जैसा कि भगवद्गीता के अन्य अंशों से यह बात विदित होगी कि वेदों और शास्त्रों (16.23-24 17.11-13.24 ) के प्राधिकार के विरुद्ध नहीं है। यह यज्ञ ( 3.9-15) की अनिवार्यता के विरुद्ध नहीं है। यह दोनों के महत्व को पुष्ट करती है। इस प्रकार जैमिनि की पूर्व मीमांसा और भागवत्गीता में किसी प्रकार का कोई अंतर नहीं है। यदि कुछ विशेष बात है तो यह कि भगवद्गीता अधिक दृढ़ता से प्रतिक्रांति का समर्थन करती है, जब कि जैमिनि कृत पूर्व-मीमांसा ने इतना समर्थन नहीं किया है। यह विशिष्ट इसलिए है कि यह प्रतिक्रांति को दार्शनिक सिद्धांत देती है। ओर इसलिए उसका आधार स्थाई है, जैसा कि पहले कभी नहीं था और उसके बिना प्रतिक्रांति का अस्तित्व बना रहना भी संभव नहीं था। जैमिनि की पूर्व मीमांसा की तुलना में भागवत्गीता की दार्शनिक पुष्टि अधिक विशिष्ट है, और भागवत्गीता का यह दार्शनिक समर्थन है जो प्रतिक्रांति के केंद्रीय सिद्धांत, अर्थात् चातुर्वर्ण्य को प्रदान करती है। चातुर्वर्ण्य के सिद्धांत की पुष्टि तथा व्यवहार में उसका अनुपालन ही भागवत्गीता की मूल भावना प्रतीत होती है। कृष्ण यह कहकर संतुष्ट नहीं होते कि चातुर्वर्ण्य गुण-कर्म पर आधारित हैं और वह इससे भी आगे बढ़ जाते हैं और दो आदेश देते हैं। पहला आदेश अध्याय 3, श्लोक 26 में दिया गया है। कृष्ण कहते हैं: ज्ञानी व्यक्ति को प्रतिवाद कर अज्ञानी व्यक्ति के मन में संदेह उत्पन्न नहीं करना चाहिए जो कर्मकांड का अनुसरण करता हो, जिसमें निश्चय ही चातुर्वर्ण्य के नियम भी सम्मिलित हैं। अर्थात् हमें लोगों को उत्तेजित नहीं करना चाहिए कि कहीं वे कर्मकांड के सिद्धांत और उसमें शामिल अन्य बातों के विरोध में न उठ खड़े हों। दूसरा आदेश भगवत् गीता के अध्याय 18 श्लोक 41-48 में दिया गया है। इसमें कृष्ण ने कहा है कि प्रत्येक को अपने वर्ण के लिए निर्धारित कर्तव्य करना चाहिए और उन्हें अन्य कोई कर्तव्य नहीं करना चाहिए तथा वह उन लोगों को चेतावनी देते हैं, जो उनकी पूजा करते हैं तथा उनके भक्त हैं कि ये लोग केवल भक्ति करने से ही मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकेंगे, बल्कि इसके लिए उन्हें भक्ति के साथ उन कर्तव्यों को भी करना होगा, जो उनके वर्ण के लिए भी निर्धारित हैं। संक्षेप में, शूद्र चाहे कितना ही महान भक्त क्यों न हो, यदि उसने शूद्र के कर्तव्य का उल्लंघन किया है, अर्थात् उसने उच्च वर्गों के लोगों की सेवा में जीवनयापन नहीं किया है, तो उसे मोक्ष प्राप्त नहीं होगा। मेरी दूसरी स्थापना यह है कि भागवत्गीता का मुख्य आशय जैमिनि को नया समर्थन देना था और इसके कम से कम वे अंश जो जैमिनि के सिद्धांतों की दार्शनिक आधार पर पुष्टि करते हैं, वे जैमिनि की पूर्व-मीमांसा के बाद और जब जैमिनि के सिद्धांत कार्यान्वित हो चुके थे, तब लिखे गए थे। मेरी तीसरी स्थापना यह है कि बौद्ध धर्म के क्रांतिकारी और तार्किक विचारों के प्रहार के फलस्वरूप भगवद्गीता के द्वारा प्रतिक्रांति के सिद्धांतों की दार्शनिक आधार पर पुष्टि की जानी आवश्यक हो गई थी।
अब मैं उन आपत्तियों को लेता हूं, जो मेरी स्थापनाओं की वैधता के संबंध में उठाई जा सकती हैं। मुझसे कहा जा सकता है कि जो मैं यह कहता हूं कि भागवत्गीता का प्रणयन-काल बौद्ध धर्म और जैमिनि की पूर्व-मीमांसा के बाद का है, वह केवल अनुमान है और इस अनुमान के पीछे कोई प्रमाण नहीं है। मैं इस तथ्य से अवगत हूं कि मेरी स्थापना अधिकांश भारतीय विद्वानों के द्वारा स्वीकृत दृष्टिकोण के विपरीत है जिनका आग्रह यह स्वीकार करने में है कि भागवत्गीता की रचना अतिप्राचीन व - काल की है और यह बौद्ध धर्म तथा जैमिनि से पूर्ववर्ती है, न कि इस बात की खोज करने में है कि भागवत्गीता का संदेश क्या है और मानव-जीवन के मार्गदर्शक के रूप में उसका क्या मूल्य है। यह बात विशेषकर श्री तेलंग और श्री तिलक के बारे में खरी उतरती है। परंतु जैसा कि गार्बे¹ ने लिखा है “तेलंग के लिए जैसा कि प्रत्येक हिंदू के संबंध में है जो चाहे कितना ही प्रबुद्ध क्यों न हो, भागवत्गीता को अतिप्राचीन समझना, आस्था की बात है और जहां यह भावना प्रबल हो, वहां आलोचना हो ही नहीं सकती।”
प्रोफेसर गार्बे कहते हैं:
“गीता के प्रणयन काल को निश्चित करने का कार्य प्रत्येक व्यक्ति के द्वारा, जिसने इस समस्या को हल करने का निष्ठापूर्वक प्रयत्न किया है, एक बहुत ही कठिन कार्य कहा गया है और यह कठिनाई ( हर तरह से) तब और भी बढ़ जाती है, जब इस समस्या को दुहरे रूप में प्रस्तुत किया जाता है, अर्थात् मूल गीता के प्रणयन - काल के साथ-साथ उसके संशोधन करने के समय को भी निश्चित करना । मुझे खेद के साथ कहना पड़ता है कि इस मामले में प्रायः हम किसी निश्चित निर्णय पर न पहुंच कर केवल संभावनाओं पर ही पहुंच सकेंगे। "
ये संभावनाएं क्या हैं? मुझे कोई संदेह नहीं कि ये संभावनाएं मेरे शोध प्रबंध के पक्ष में हैं। वास्तव में, मैं जितना विचार कर सकता हूं, उनके विरुद्ध कुछ भी नहीं है। इस प्रश्न की जांच करने में सर्वप्रथम गीता से ही सीधा साक्ष्य प्रस्तुत करता हूं, जिसमें यह बताया गया है कि गीता का प्रणयन जैमिनि की पूर्व - मीमांसा और बौद्ध धर्म के बाद हुआ।
भागवत्गीता का अध्याय 3 श्लोक 9 - 13 का विशेष महत्व है। इस संबंध में यह सत्य है कि भागवत्गीता में जैमिनि नाम का कोई संदर्भ नहीं दिया गया है, न मीमांसा का नाम ही दिया गया है। परंतु क्या इसमें कोई संदेह है कि भगवत्गीता के अध्याय 3, श्लोक 9-18 में उन सिद्धांतों का वर्णन है, जो जैमिनि की पूर्व-मीमांसा में दिए गए हैं? यहां तक कि श्री तिलक² भी, जो भगवद्गीता की प्राचीनता में विश्वास करते हैं, यह स्वीकार करते हैं कि भागवत्गीता, पूर्व-मीमांसा के सिद्धांतों का परीक्षण करती है। इस तर्क को प्रस्तुत करने का एक अन्य तरीका है। जैमिनि ने शुद्ध और सरल कर्म योग का उपदेश दिया है। दूसरी ओर भागवत्गीता ने अनासक्ति कर्म का उपदेश किया है। इस प्रकार गीता एक ऐसे सिद्धांत का उपदेश देती है, जिसे आमूल संशोधित कर दिया गया है। भागवत्गीता कर्म योग में संशोधन ही नहीं करती, अपितु कुछ कठोर शब्दों³ में शुद्ध और सरल कर्म योग के समर्थकों की आलोचना करती है। यदि गीता जैमिनि से पूर्व का ग्रंथ है, तो पाठक जैमिनि से यह आशा करेगा कि वह भागवत्गीता की आलोचना करते और समुचित उत्तर देते, परंतु हमें भगवद्गीता के इस अनासक्ति कर्म योग के संबंध में जैमिनि में कोई संदर्भ नहीं मिलता। ऐसा क्यों है? इसका यही उत्तर है कि यह संशोधन जैमिनि के बाद किया गया और उनसे पहले नहीं किया गया था यह सरलतापूर्वक सिद्ध कर देता है कि भागवत्गीता की रचना जैमिनि की पूर्व-मीमांसा के बाद की गई ।
1. इंट्रोडक्शन (इंडियन एंटीक्वैरी परिशिष्टांक) भूमिका, पृ. 30
2. गीता रहस्य, खंड 2, पृ. 916-922
3. भगवद्गीता, 2, 42-46 और 18.66
हालांकि भागवत्गीता में पूर्व-मीमांसा का कोई उल्लेख नहीं है, लेकिन इसमें बादरायण के ब्रह्म सूत्र¹ का भी नाम से उल्लेख किया गया है। ब्रह्मसूत्र का यह संदर्भ अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे प्रत्यक्षतः यह निष्कर्ष निकलता है कि गीता की रचना ब्रह्म सूत्र के बाद की गई है।
श्री तिलक² यह स्वीकार करते हैं कि ब्रह्म सूत्रों का यह जो उल्लेख किया गया है, उसका आशय स्पष्ट और निश्चित रूप से उसी ग्रंथ से है, जो अब हमें उपलब्ध है। यह उल्लेखनीय है कि श्री तेलंग³ ने इस विषय की सरसरी चर्चा की है और बताया है। कि भागवत्गीता में जिस ब्रह्म सूत्र का उल्लेख किया गया है, वह वर्तमान ग्रंथ से भिन्न है। वह इस इतने महत्वपूर्ण वक्तव्य की पुष्टि के लिए कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं करते, पर वह श्री वेबर⁴ के अनुमान के आधार पर दिए गए वक्तव्य पर विश्वास करते हैं - जो उनके ट्रीटाइज इन इंडियन लिटरेचर नामक ग्रंथ की पाद-टिप्पणी में उल्लिखित है और बिना किसी साक्ष्य - जिसमें यह कहा गया है कि भागवत्गीता में ब्रह्म सूत्र का उल्लेख नाम की अपेक्षा जातिवाचक है। श्री तेलंग के इस मत का कारण कोई विशेष उद्देश्य रहा होगा, ऐसा कहना उचित नहीं है। परंतु यह कहना अनुचित नहीं है कि श्री तेलंग ⁵ ने ब्रह्म सूत्र के इस संदर्भ को जिस रूप में स्वीकार किया है, वह वेबर पर आश्रित हैं, जो इस विंटरनिट्ज के मत को स्वीकार करते हैं कि ब्रह्म सूत्र की रचना 500 ईसवी में हुई थी। अगर वह और गहराई में गए होते, तब उनके अभीष्ट मत का खंडन हो गया होता। भागवत्गीता की प्राचीनता का इस प्रकार इस निष्कर्ष की पुष्टि के लिए हमारे पास प्रचुर आंतरिक साक्ष्य है कि गीता का प्रणयन जैमिनि की पूर्व मीमांसा और बादरायण के ब्रह्म सूत्र के बाद हुआ।
1. भागवत्गीता, 13.4
2. गीता रहस्य 2.749
3. भगवद्गीता, (एस.बी. ई.) इंट्रोडक्शन, पृ. 31
4. हिस्ट्री ऑफ इंडियन लिटरेचर, पृ. 242
5. दूसरी ओर यह भी कहा जा सकता है कि श्री तेलंग ने शीघ्र ही इस संदर्भ को स्वीकार कर लिया क्योंकि उनका यह मत था कि ब्रह्म सूत्र प्राचीन ग्रंथ है। देखिए गीता रहस्य, खंड 2