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भगवत् गीता पर निबंध: प्रतिक्रांति की दार्शनिक पुष्टिः कृष्ण और उनकी गीता (भाग 1)- लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Prachin Bharat Me Kranti Aur Pratikranti dr Bhimrao Ramji Ambedkar

Page 49 of 71
01 जून 2023
Book
1,2,3,5,,

9

भगवत् गीता पर निबंध: प्रतिक्रांति की दार्शनिक पुष्टिः कृष्ण और उनकी गीता

     'एसेज आन दि भागवत्‌गीता' ( भागवत्‌गीता पर निबंध) के पहले पृष्ठ पर डॉ. अम्बेडकर ने अपने हस्ताक्षर कर रखे हैं। अगले बयालीस पृष्ठों में विराट पर्व और उद्योग पर्व पर विश्लेषणात्मक टिप्पणियां और इस निबंध की विषय-सूची दी गई है। यह विषय सूची पुस्तकों की योजना के अंतर्गत मुद्रित है। डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर सोर्स मैटिरियल पब्लिकेशन कमेटी को प्राप्त फाइल में 'फिलासोफिक डिफेंस ऑफ काउंटर-रिवोल्यूशन - कृष्ण एंड हिज गीता' (प्रतिक्रांति की दार्शनिक पृष्टिः कृष्ण और उनकी गीता) शीर्षक निबंध की टाइप की हुई दो प्रतियां मिली थीं। इस निबंध का अंतिम वाक्य अपूर्ण मिला है। इस निबंध के टाइप किए गए पृष्ठों की कुल संख्या चालीस है। विराट पर्व और उद्योग पर्व पर टिप्पणियां अगले अध्यायों में सम्मिलित की गई हैं- संपादक

Bhagwat Geeta par nibandh Prati Kranti ki darshnik pushti Krishna aur Unki Geeta


     प्राचीन भारत के साहित्य में भागवत्‌गीता का क्या स्थान है ? क्या यह हिंदू धर्म का उसी प्रकार का एक धर्मग्रंथ है, जिस प्रकार ईसाई धर्म की बाइबिल है। हिंदू इसे अपना धर्मग्रंथ मानते हैं। अगर यह धर्मग्रंथ है, तब यह वस्तुतः क्या शिक्षा देता है? यह किस सिद्धांत का प्रतिपादन करता है? इस विषय पर जो विद्वान कुछ कहने के लिए सक्षम हैं, उन्होंने इस प्रश्न के जो उत्तर दिए हैं, वे एक-दूसरे से इतने भिन्न हैं कि सचमुच आश्चर्य होता है। बोटलिंग्क¹ लिखते हैं:


1. रिर्चड्स गार्बे द्वारा अपने इंट्रोडक्शन टू दि भगवद्गीता में उद्धृत (इंडियन एंटीक्वैरी 1918 परिशिष्टांक)


     “गीता में उच्च और सुंदर भाव तो हैं, लेकिन इसके साथ कुछ दुर्बल पक्ष भी हैं। यह दुर्बल पक्ष हैं, परस्पर विरोधी उक्तियां (टीकाकारों ने जिन्हें क्षम्य समझा है और जिन्हें टीका करते समय छोड़ देने की कोशिश की है), जगह-जगह पुनरावृत्तियां, अतिशयोक्तियों, असंगतियां और नीरस उक्तियां।"

     होपकिन्स¹ भागवत्‌गीता को उसकी महत्वपूर्णता और महत्वहीनता, तर्कपूर्णता और तर्कहीनता के कारण हिंदू साहित्य की एक विलक्षण कृति मानते हैं... आदिम दार्शनिक सिद्धांतों का अटपटा समुच्चय ।

वह अपना मत व्यक्त करते हुए लिखते हैं:

“हालांकि इस दैवी गीत में यत्र-तत्र ऊर्जा और संगीत की भव्यता है, तो भी वर्तमान काव्यकृति के रूप में यह एक अशक्त रचना है। एक ही बात को बार-बार कहा गया है। शब्दावली में और अर्थ में परस्पर विरोध के अनगिनत उदाहरण हैं, जितने कि पुनरावृत्तियों के। ये इतने अधिक हैं कि हर किसी को तब आश्चर्य होता है जब इस कृति के बारे में यह कहा जाता है कि यह अद्भुत गीत है, जो रोमांच पैदा कर देता है । "

     होट्जमैन² कहते हैं:

     “यह (भागवत्‌गीता) सर्वेश्वरवादी कविता का वैष्णव संस्करण है। "

     गाबें³ लिखते हैं:

     “इस कविता की समग्र प्रकृति विन्यास और रचना की दृष्टि से मुख्यतः आस्तिक है। कृष्ण नाम के एक इष्ट देवता मानवीय रूप में उपस्थित हो अपने मत की व्याख्या करते हैं और अपने श्रोता को यह आदेश देते हैं कि वह अपने कर्तव्यों का पालन करने के साथ-साथ सर्वप्रथम उनमें भक्ति रखे और अपने-आपको समर्पित कर दे .... और इस देवता के साथ-साथ जिसे यथासंभव इष्ट रूप में व्यक्त किया गया है और जो सारी कविता में प्रमुख है सर्वोच्च सिद्धांत के रूप में अक्सर निवर्यैक्तिक तटस्थ ब्रह्म की सत्ता भी, जो परम है, स्पष्ट प्रतीत होती है। कृष्ण कभी यह कहते हैं कि मैं ही परमात्मा हूं जिसने समस्त विश्व और प्राणियों की सृष्टि की है और जो सबका नियामक है, कभी वह ब्रह्म और माया ( भ्रम) के वेदांत की व्याख्या करते हैं और कहते हैं कि मानव प्राणी का चरम लक्ष्य इस सांसारिक भ्रम से मुक्ति पाना और ब्रह्म रूप हो जाना है। ये दोनों सिद्धांत ईश्वरवाद और सर्वेश्वरवाद एक-दूसरे में मिला


1. रिलिजन ऑफ इंडिया, पृ. 390-400
2. गावें द्वारा उद्धृत
3. इंट्रोडक्शन टू दि भगवद्गीता


दिए गए हैं, एक-दूसरे का अनुगमन करते हैं, कभी एक-दूसरे से सर्वथा पृथक हो जाते हैं, और कभी ये पूरी तरह अपृथक, और कभी थोड़ा-बहुत पृथक रहते हैं। ऐसा भी नहीं है कि किसी एक को निम्न या बाह्य दिखाया गया हो और दूसरे को उच्च या गुप्त सिद्धांत। यह भी कहीं नहीं बताया गया है कि सत्य के ज्ञान के लिए ईश्वरवाद आरंभिक उपाय है या यह उसका प्रतीक है और वेदांत का सर्वेश्वरवाद स्वतः (चरम ) सत्य है, लेकिन ये दोनों विचारधाराएं लगभग पूरे पाठ में इस प्रकार दिखाई गई हैं कि वस्तुत: इनमें कोई भेद नहीं है, न तो शाब्दिक और न तत्वतः । "

     श्री तेलंग¹ का कहना है:

     "गीता में कई ऐसे स्थल हैं, जिनका एक-दूसरे के साथ मेल बिठाना कठिन है और इनमें संगत बिठाने की कोई कोशिश भी नहीं की गई है। उदाहरणार्थ, अध्याय 7 के श्लोक 16 में कृष्ण अपने भक्तों को चार श्रेणियों में विभाजित करते हैं, इनमें से एक श्रेणी उनकी है जो 'ज्ञानी' हैं, जिनके बारे में कृष्ण कहते हैं कि वह उन्हें 'अपना ही रूप' मानते हैं। इस परम पद पर पहुंचे हुए व्यक्ति के बारे में कुछ कहने के लिए इससे अधिक उपयुक्त शब्दावली शायद ही मिल सकती थी । और अध्याय 6 के श्लोक 46 में हमें यह पढ़ने को मिलता है कि भक्त न केवल तपस्वी से, बल्कि ज्ञानियों से भी श्रेष्ठ है। भाष्यकार इस श्लोक में 'ज्ञानी' शब्द की इस प्रकार व्याख्या कर अपने ज्ञान का प्रदर्शन करते हैं कि ये वे व्यक्ति हैं, जिन्होंने शास्त्रों और उनके सारार्थ में ज्ञान प्राप्त कर लिया है। यह कोई ऐसी टिप्पणी नहीं है, जिस पर विचार करना आवश्यक है। यहां शब्दों को तोड़ा मरोड़ा गया है और इन परिस्थितियों में मैं इसे स्वीकार करने के पक्ष में नहीं हूं। दूसरी ओर अध्याय 4 के श्लोक 39 से यह व्यक्त होता है कि भक्ति की अपेक्षा ज्ञान श्रेष्ठतम है यह एक उच्चतर अवस्था है, जहां भक्ति के द्वारा पहुंचा जा सकता है, भक्ति एक सोपान है। गीता में अध्याय 12 के श्लोक 12 में ध्यान को ज्ञान की तुलना में वरीयता दी गई है। मुझे ऐसा लगता है कि इसकी संगति भी अध्याय 7 के श्लोक 16 के साथ नहीं बैठती। एक और उदाहरण लीजिए। गीता में अध्याय 4 के श्लोक 14 में कहा गया है कि ईश्वर (कृष्ण) किसी के पाप या पुण्य का भागी नहीं है। लेकिन अध्याय 9 के श्लोक 24 'कृष्ण अपने को सभी यज्ञों का 'भोक्ता और प्रभु' बताते हैं। तब यह प्रश्न उठता है कि परमात्मा उसका भोग कैसे कर सकता है, जो उसे प्राप्त ही नहीं होता। अध्याय 9 के श्लोक 29 में पुन: कृष्ण घोषणा करते हैं कि मेरे लिए न कोई प्रिय है और न कोई अप्रिय है। लेकिन अध्याय 12 का अंतिम श्लोक तो इसके ठीक विपरीत है । इस अध्याय में अनेक श्लोक एक साथ मिलते हैं, जिनमें कृष्ण भावपूर्ण रीति से
में


1. भगवद्गीता ( एस. ई.सी.) इंट्रोडक्शन, पृ. 11


 

कहते दिखाए गए हैं कि ऐसा ऐसा व्यक्ति मुझे प्रिय है। उसी प्रकार उन श्लोकों में, जहां कृष्ण अपने आध्यात्म का सार प्रस्तुत करते हैं, वह अर्जुन से कहते हैं कि तुम मुझे प्रिय हो । कृष्ण यह भी कहते हैं कि उन्हें वह भक्त प्रिय है, जो गीता के रहस्य को परब्रह्म के संदर्भ में उद्घाटित करता है।¹ हम इस उद्धरण का कि कृष्ण को न कोई प्रिय है न अप्रिय, अध्याय 16 के श्लोक 18 और बाद के श्लोकों में कृष्ण की ही उक्तियों के साथ किस प्रकार मेल बिठा सकते हैं? वहां राक्षसी प्रवृत्ति वाले लोगों के लिए जिस भाषा का प्रयोग किया गया है, वह उनके प्रति किसी प्रिय भाव का द्योतक नहीं है, जब कृष्ण कहते हैं, 'मैं ऐसे लोगों को असुर योनि में फेंक देता हूं, जहां से वे कष्टों और निकृष्टतम गति में जा गिरते हैं।' ऐसे व्यक्तियों का वर्णन उन्हें 'न अप्रिय, न प्रिय' कहकर करना शायद ही उचित हो। मुझे ऐसा लगता है कि गीता में ये असंगतियां वास्तविक असंगतियां हैं और ऐसी नहीं हैं कि जिनकी व्याख्या न की जा सके, बल्कि मेरा विचार है कि, और जैसा कि प्रो. मैक्स मूलर कहते हैं, यह ऐसी मनःस्थिति को दिखाती है, जहां व्यक्ति सत्य के बारे में अनुमान मात्र लगा रहा होता है, न कि उस मनःस्थिति को जहां एक पूर्ण और सुगठित दर्शन-सिद्धांत की व्याख्या की जा रही होती है। इस बात का तनिक भी संकेत नहीं है कि लेखक को इन असंगतियों की जानकारी है। जैसा कि विभिन्न उद्धरणों से पता चलता है, और मैं इसी निष्कर्ष पर पहुंचा हूं, किसी प्रसंग- विशेष पर विचार करते समय कुछ अर्द्धसत्यों को इधर और कुछ उधर बिखेर दिया गया है। लेकिन इन विभिन्न अर्द्धसत्यों को, जो स्पष्टत: एक-दूसरे से मेल नहीं खाते, एक जगह सुव्यवस्थित करने का कोई प्रयास नहीं किया गया है। अगर ऐसा किया गया होता, तब ये सारी की सारी असंगतियां विलीन हो गई होतीं। "

     यह विचार उन विचारकों के हैं, जिन्हें आधुनिक कहा जा सकता है। अगर हम पुराने रूढ़िवादी पंडितों के विचारों को पढ़ें, तब हमें भिन्न-भिन्न मत मिलेंगे। एक मत यह है कि भागवत्‌गीता किसी विशेष धार्मिक संप्रदाय का ग्रंथ नहीं है, और इसमें मोक्ष प्राप्ति के तीनों मार्गों का समान रूप से निर्वचन किया गया है। ये मार्ग हैं - ( 1 ) कर्म मार्ग, (2) भक्ति मार्ग, और (3) ज्ञान मार्ग। यह ग्रंथ मोक्ष प्राप्ति के तीनों मार्गों की उपयोगिता का उपदेश देता है। ये पंडितगण अपने इस मत की पुष्टि में कि गीता में प्रत्येक मार्गों की उपयोगिता को स्वीकार किया गया है, यह कहते हैं कि इस ग्रंथ के 18 अध्यायों में से अध्याय 1 से 6 तक ज्ञान मार्ग, अध्याय 7 से 12 तक कर्म मार्ग और अध्याय 12 से 18 तक भक्ति मार्ग का उपदेश मिलता है। इनकी यह धारणा है। कि गीता मोक्ष प्राप्ति के तीनों ही मार्गों को उचित बताती है।


1. अध्याय 7 के श्लोक 17 को भी देखिए, जहां कृष्ण को ज्ञानवान व्यक्ति प्रिय बताया गया है।