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प्राचीन भारत में क्रांति तथा प्रतिक्रांति - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Prachin Bharat Me Kranti Aur Pratikranti dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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01 जून 2023
Book
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     अब कानून के क्षेत्र में समानता विषय लेते हैं। जब वे साक्षी के रूप में प्रस्तुत होते हैं, तब मनु के अनुसार उनसे नीचे लिखी विधि के अनुसार शपथ कराई जाए:

     8.87. न्यायकर्ता शुद्ध होकर प्रातः काल अनेक आहूत द्विजों के साथ जो शुद्ध हों किसी मूर्ति के सामने जो देवत्व और ब्राह्मणों का प्रतीक हो साक्षी अपने मुख उत्तर या पूर्व दिशा की ओर रखेंगे।

     8.88. 'न्यायकर्ता' ब्राह्मण से 'कहो', क्षत्रिय से 'सत्य कहो' वैश्य से 'असत्य कहने पर गौ, बीज और सोना चुराने का पाप लगेगा' और शूद्र से असत्य कहने पर 'तुम्हें उक्त या जो भी मनुष्य कर सकता है वे सभी पाप लगेंगे' कहकर कार्य आरंभ करेगा।

     8.113. 'न्यायकर्ता' ब्राह्मण को उसकी सत्यनिष्ठा की, क्षत्रिय को उसके अश्व या हाथी और उसके शस्त्रास्त्रों की, वैश्य को उसकी गौ, अन्न और सुवर्ण की, यांत्रिक या शूद्र व्यक्ति को उसके अपने सिर और सभी संभव अपराध की, अगर वह असत्य बोले, शपथ दिलाए ।

Hindu Samaj ke Achar Vichar dr Bhimrao Ramji Ambedkar

     मनु ऐसे साक्षियों का भी विवेचन करता है जो झूठी गवाही देते हैं:

     8.122. विद्वानों ने ये दंड निर्धारित किए हैं, जिनका विधान महर्षियों ने झूठी गवाही देने के अपराध के लिए किया है, जिससे अन्याय रोका जा सके और अधर्म का निवारण हो सके।

     8.123. न्यायप्रिय राजा तीनों निम्न वर्गों के व्यक्तियों पर झूठी गवाही देने पर पहले जुर्माना करे और अगर वे बार-बार ऐसा करें, तब अपने राज्य से निष्कासित कर दे, लेकिन ब्राह्मण को वह केवल निष्कासित करे ।

     लेकिन मनु ने वहां एक अपवाद का विधान किया है:

     8.112. रति या विवाह प्रस्ताव के समय स्त्री से गौ द्वारा घास या फल खा लेने पर, यज्ञ के लिए समिधा ले लेने पर, या ब्राह्मण के रक्षणार्थ आश्वासन देने पर यदि झूठी शपथ ली जाए तब वह घोर पातक कर्म होता है।

     कानूनी कार्रवाई के समय संबंधित पक्ष की स्थिति की व्याख्या मनु ने कुछ उदाहरण देकर की है, जो कुछ महत्त्वपूर्ण फौजदारी मामलों से संबंधित है। मानहानि या अपराध लीजिए। मनु कहता है:

     8.267. जो क्षत्रिय किसी ब्राह्मण की मानहानि करेगा, तो उस पर सौ पण, वैश्य पर डेढ़ सौ या दो सौ पण का आर्थिक दंड लगेगा, लेकिन उस प्रकार के अपराध के लिए यांत्रिक या शूद्र को कोड़े लगाए जाएं।

     8.268. कोई ब्राह्मण यदि किसी क्षत्रिय से कटु वचन कहे तब पचास पण, वैश्य से कहे तब पचीस पण और शूद्र व्यक्ति से कहे तब बारह पण लिए जाएं। अपमान करने का अपराध लीजिए मनु कहता है:

     8.270. यदि कोई शूद्र किसी द्विज को गाली देता है तब उसकी जीभ काट देनी चाहिए, क्योंकि वह ब्रह्मा के निम्नतम अंग से पैदा हुआ है।

     8.271. यदि वह तिरस्कारपूर्वक उनके नाम और वर्ण का उच्चारण करता है, जैसे वह यह कहे 'देवदत्त तू नीच ब्राह्मण है' तब दश अंगुल लंबी लोहे की छड़ उसके मुख में कील दी जाए।

     8.272. अगर वह अभिमानपूर्वक ब्राह्मणों को उनके कर्तव्य के बारे में निर्देश दे, तब राजा उसके मुख और कानों में गरम तेल डलवाए ।

     गाली देने का अपराध लीजिए। मनु कहता है:

     8.276. यदि ब्राह्मण और क्षत्रिय आपस में एक-दूसरे को गाली दें, तब यह अर्थदंड विद्वान राजा द्वारा निश्चित किया जाए, जो ब्राह्मण पर न्यूनतम और क्षत्रिय पर औसत होगा ।

     8.277. जैसा कि ऊपर कहा गया है जीभ काटने के दंड को छोड़कर ऐसा ही दंड वैश्य और शूद्र के आपस में एक-दूसरे को गाली देने पर दिया जाए. यह दंड का शाश्वत नियम है।

     मारपीट करने के अपराध को लीजिए। मनु कहता है:

     8.279. निम्न कुल में पैदा कोई भी व्यक्ति यदि अपने से श्रेष्ठ वर्ण के व्यक्ति के साथ मारपीट करे और उसे क्षति पहुंचाए, तब उसका अंग कटवा दिया जाए, या क्षति के अनुपात में न्यूनाधिक अंग कटवा दिया जाए, यह मनु का आदेश है।

     8.280. यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के विरुद्ध हाथ या लाठी उठाए, तब उसका हाथ कटवा दिया जाए और अगर कोई व्यक्ति गुस्से में किसी दूसरे व्यक्ति को लात से मारे, तब उसका पैर कटवा दिया जाए।

     मिथ्या दर्प का अपराध लीजिए। मनु के अनुसारः

     8.281. निम्नतम वर्ण का व्यक्ति यदि ढिठाई से उच्चतम व्यक्ति के आसन पर साथ-साथ बैठे, तब राजा उसकी पीठ को तपाए गए लोहे से दगवा कर अपने राज्य से निष्कासित कर दे, या उसके नितंब को कटवा दे।

     8.282. यदि वह गर्व से उस पर थूक दे तब राजा दोनों ओठों को, पेशाब कर दे तब उसके लिंग को और अगर उसकी ओर अपान वायु निकाले तब उसकी गुदा को कटवा दे।

     8.283. यदि वह ब्राह्मण को उसकी शिक्षा से या उसके दोनों पैरों से या उसकी श्मश्रु से या गर्दन से या अंडकोष से पकड़े, तब राजा निस्संकोच उसके दोनों हाथ कटवा दे।

     8.359. यदि शूद्र वर्ण का कोई व्यक्ति ब्राह्मण की स्त्री के साथ व्यभिचार करता है, तब वह प्राणदंड के योग्य होता है, क्योंकि चारों वर्णों की पत्नियों की निश्चय विशेष सुरक्षा की जानी चाहिए ।

     8.366. यदि शूद्र वर्ग का कोई व्यक्ति उच्च वर्ग में जन्म लेने वाली किसी किशोरी के साथ प्रेम करता है, तब उसे शारीरिक दंड दिया जाए, लेकिन जो समान वर्ग वाली किशोरी के साथ प्रेम करे और उस किशोरी का पिता स्वीकार करे, तब वह उसे उचित उपहार आदि देकर उसके साथ विवाह करेगा।

     8.374. यदि कोई यांत्रिक या शूद्र द्विज की स्त्री के साथ जो अपने घर पर रक्षित हो या अरक्षित हो, तब उसे इस प्रकार दंड दिया जाए। यदि वह अरक्षित थी तब उसका आधा या सारा लिंग कटवा दिया जाए और यदि वह रक्षित थी और द्विज अनुपस्थित था, तब उसकी सारी संपत्ति, यहां तक कि उसका जीवन भी छीन लिया जाए।

     8.375. ब्राह्मण की रक्षित पत्नी के साथ व्यभिचार करने पर वैश्य को एक वर्ष तक जेल में रखने के बाद उसकी संपत्ति जब्त कर ली जाए, ऐसा ही कर्म करने पर क्षत्रिय को एक हजार पण का आर्थिक दंड दिया जाए और उसका सिर गधे के मूत्र से मुंडवा दिया जाए ।

     8.376. यदि कोई वैश्य या क्षत्रिय ब्राह्मण वर्ग की स्त्री के साथ व्यभिचार करे और जिसकी रक्षा करने वाला उसका पति घर पर न हो, तब राजा वैश्य को पांच सौ पण और क्षत्रिय को एक हजार पण का आर्थिक दंड दे ।

     8.377. ये दोनों यदि किसी ऐसी ब्राह्मणी के साथ अपराध करें जो न केवल रक्षित हो, बल्कि सद्गुणों के लिए प्रतिष्ठित हो, तब उन्हें शूद्र वर्ग के व्यक्ति की तरह दंड दिया जाए, या उन्हें सूखे घास या फूंस में जलाया जाए।

     8.382. यदि कोई वैश्य किसी क्षत्रिय की रक्षित स्त्री के साथ, या कोई क्षत्रिय किसी वैश्य की स्त्री के साथ व्यभिचार करे, तब ये दोनों वैसा ही दंड पाने के अधिकारी हैं, जो अरक्षित ब्राह्मणी के प्रसंग में दिया जाता है।

8.383. किंतु यदि काई ब्राह्मण इन दोनों वर्णों की रक्षित स्त्री के साथ व्यभिचार करता है, तब उसको एक सहस्त्र पण का आर्थिक दंड दिया जाना चाहिए, ऐसा ही अपराध शूद्र वर्ग की स्त्री के साथ करने पर क्षत्रिय या वैश्य को भी एक हजार पण का आर्थिक दंड दिया जाना चाहिए ।

     8.384. यदि कोई वैश्य क्षत्रिय वर्ग की किसी स्त्री के साथ व्यभिचार करता है। और वह अरक्षित हो, तब उसको पांच सौ पण और यदि कोई क्षत्रिय इस प्रकार का अपराध करता है, तब पेशाब से उसका सिर मुंडवा दिया जाए या उसको उक्त आर्थिक दंड दिया जाए।

     8.385. यदि कोई ब्राह्मण क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र वर्ग की किसी अरक्षित स्त्री के साथ व्यभिचार करता है, तब वह पांच सौ पण का आर्थिक दंड देगा और यदि वह किसी अन्त्यज जाति की स्त्री के साथ व्यभिचार करता है, तब एक हजार पण का आर्थिक दंड देगा।

     मनु ने विभिन्न अपराधों के लिए जो योजना बनाई, उससे इस विषय पर कुछ रोचक तथ्य प्रकाश में आते हैं:

     8.379. ब्राह्मण वर्ग के व्यभिचार करने वाले व्यक्ति को मृत्यु दंड न देकर अपकीर्तिकर उसका सिर मुंडवाने का विधान है, जबकि अन्य वर्ग के व्यक्ति के लिए मृत्यु दंड तक का विधान है।

     8.380. राजा ब्राह्मण का वध नहीं करेगा, चाहे उसने कितने ही भयंकर अपराध क्यों न किए हों। वह उसे अपने राज्य से उसकी सारी संपदा सहित निष्कासित कर दे और उसके शरीर को कोई क्षति न होने दे।

     11.127. क्षत्रिय वर्ग के पुण्यशील व्यक्ति की सोद्देश्य हत्या करने का पाप उस पाप का चौथाई है, जो ब्राह्मण की हत्या करने पर होता है। वैश्य की हत्या करने पर केवल आठवां और शूद्र की हत्या करने पर जो अहर्निश अपने कर्तव्य का निर्वाह करता है, यह पाप सोलहवां अंश होता है।

     11.128. लेकिन यदि कोई ब्राह्मण किसी क्षत्रिय की बिना किसी दुर्भावना के हत्या करता है, तब अपने समस्त धार्मिक कृत्यों को करने के बाद ब्राह्मणों को एक सांड सहित एक सहस्त्र गाएं दे ।

     11.129. या वह ब्राह्मण की हत्या करने पर की जाने वाली तपस्या को तीन वर्ष तक इंद्रियों और क्रियाओं को संयमित करते हुए करे, अपनी जटाओं को बढ़ने दे, नगर से दूर रहे, किसी पेड़ के नीचे अपना निवास बनाए ।

     11.130. यदि वह बिना किसी दुर्भावना के ऐसे वैश्य की हत्या करता है जिसका आचरण शुद्ध है, तब वह यही प्रायश्चित एक वर्ष तक करे या ब्राह्मणों को एक सौ गाय और एक सांड दे ।

     11.131. यदि किसी शूद्र की बिना किसी उद्देश्य हत्या करता है, तब वह यही प्रायश्चित करे या वह ब्राह्मणों को दस सफेद गाएं और एक सांड दे।

     8.381. इस पृथ्वी पर ब्राह्मण वध के समान दूसरा कोई बड़ा पाप नहीं है। अतः राजा ब्राह्मण के वध का विचार मन में भी न लाए ।

     8.126. राजा एक जैसे अपराधों की बारंबारता, उनके स्थान और समय अपराधी के दंड का भुगतान करने या दंड को भोग सकने के सामर्थ्य और स्वयं अपराध पर विचार करने और निश्चय करने के बाद केवल उनको दंड दे, जो इसके भागी हैं।

     8.124. ब्रह्मा के पुत्र मनु ने दंड के दस स्थानों को निर्दिष्ट किया है जो तीन निम्न वर्ग के व्यक्तियों के लिए उचित हैं, लेकिन इनमें से प्रत्येक में ब्राह्मण राज्य से निष्कासित कर दिया जाए।

     8.125. उपस्थ (मूत्रमार्ग), पेट, जीभ, हाथ और पांचवां दोनों पैर, आंख, नाक, दोनों कान, संपत्ति और मृत्यु दंड के मामले में संपूर्ण शरीर ।

     धार्मिक संस्कारों और यज्ञ कर्म के संबंध में अधिकारों और कर्तव्यों के विषय पर मनु के विचार उल्लेखनीय हैं:

     2.28. यह शरीर वेदाध्ययन से धर्म का आचरण करने से यज्ञ करने से त्रैविद्य नामक संस्कार से, देवताओं और पितरों का तर्पण करने से पुत्रोत्पादन करने से, पांच महायज्ञों से, पवित्र कर्म करने से ब्रह्म प्राप्ति के योग्य बनाया जाता है।

     3.69. क्रमानुसार उक्त स्थानों पर अज्ञानवश पाप करने के कारण प्रायश्चित करने के लिए महर्षियों ने प्रतिदिन पांच महायज्ञ करने का गृहस्थाश्रमियों के लिए विधान किया है।

     3.70. वेद का अध्ययन और अध्यापन 'ब्रह्मयज्ञ' है, पिंडदान और जल का तर्पण करना ‘पितृयज्ञ' है, हवन का 'देवयज्ञ' है, जीवों को चावल या अन्य अन्न देना 'भूतयज्ञ' है तथा अतिथियों का आदर करना 'नृयज्ञ' है।

     3.71. यथाशक्ति इन पांच महायज्ञों को नहीं छोड़ने वाला व्यक्ति निरंतर गृहस्थाश्रम में रहते हुए भी पंच सूना (पांच पाप) के दोषों से मुक्त रहता है।

     ये सब मनु के आदेश हैं। नियम कभी भी पूर्ण नहीं होते कि सभी बातें आ जाएं। इनमें कुछ न कुछ शंका अवश्य बनी रहती है। मनु इस कमी को जानता था और उसने आपातस्थिति के आने के लिए व्यवस्था की है:

     12.108. जब कभी कोई विशेष स्थिति उत्पन्न हो जाए जो किसी नियम के अधीन नियंत्रित न होती हो, तब कौन-सा नियम व्यवहृत किया जाए, ऐसी समस्या के होने पर उत्तर यह है, 'जिस नियम का ब्राह्मण भली-भांति प्रतिपादन करे, वही नियम अकाट्य नियम समझा जाएगा।'

     12.109. वे ब्राह्मण पूर्ण प्रशिक्षित हैं, जिन्होंने शास्त्रों को वेद और उनकी शाखाओं अर्थात् वेदांग, मीसांसा, न्याय, धर्म-शास्त्रों, पुराणों का अध्ययन किया है और इनमें से वे दृष्टांत निर्दिष्ट कर सकते हैं, जो नियमानुसार हों।

     12.113. यदि अधिक ब्राह्मण एकत्र न किए जा सकें, तब एक ही ब्राह्मण का निर्णय जो वेद के सिद्धांतों का पूर्ण ज्ञाता है, सर्वोच्च सत्ता का नियम माना जाना चाहिए, उसे नहीं जो ऐसे अनेक व्यक्तियों द्वारा व्यक्त किया गया हो, जिन्हें शास्त्रों का ज्ञान नहीं है।

     मनु के नियम शाश्वत हैं। इसलिए यह प्रश्न ही नहीं उठता कि इनमें किसी प्रकार के परिवर्तन किए जाएं। मनु के समक्ष तो केवल यह प्रश्न विचारणीय था कि इस व्यवस्था को किस प्रकार कार्यान्वित किया जाए।

     8.410. राजा वैश्य वर्ण के प्रत्येक व्यक्ति को व्यापार करने, या ऋण देने, या कृषि और पशुपालन का कार्य करने और शूद्र वर्ण को द्विजों की सेवा में रहने के लिए आदेश दे।

     8.418. राजा वैश्यों और शूद्रों को अपना-अपना कार्य करने के लिए बाध्य करने के बारे में सावधान रहे, क्योंकि जब ये लोग अपने कर्तव्य से विचलित हो जाते हैं, तब वे इस संसार को अव्यवस्थित कर देते हैं।

     अगर कोई राजा अपना यह कर्तव्य नहीं पूरा करता है, तब वह अपराध है और नियम में दंडनीय है।

     8.335. पिता, आचार्य, मित्र, मां, पत्नी, पुत्र, परिवार का पुरोहित, इनमें से कोई भी अगर अपने कर्तव्य में दृढ़ नहीं है, राजा के लिए अदंडनीय नहीं है।

     8.336. जहां निम्न जाति का कोई व्यक्ति एक पण से दंडनीय है, उसी अपराध के लिए राजा एक सहस्त्र पण से दंडनीय है और वह यह जुर्माना ब्राह्मणों को दे या नदी में फेंक दे, यह शास्त्र का नियम है।

     यदि कोई राजा इस व्यवस्था को नहीं मानता और कार्यान्वित नहीं करता, तब शासन करने का उसका अधिकार छीन लिया जा सकता है। मनु ऐसे राजा के विरुद्ध विद्रोह करने की अनुमति देता है।

     8.348. जब ब्राह्मणों के धर्मचरण में बलात व्यवधान होता हो, तब द्विज शस्त्रास्त्र ग्रहण कर सकते हैं, और तब भी जब द्विज वर्ग पर कोई भयंकर विपत्ति आ जाए।