मुख्य मजकुराकडे जा

प्राचीन भारत में क्रांति तथा प्रतिक्रांति - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Prachin Bharat Me Kranti Aur Pratikranti dr Bhimrao Ramji Ambedkar

Page 46 of 71
01 जून 2023
Book
5,7,1,2,3,,

     मनु ने धर्म और धार्मिक संस्कारों और यज्ञकर्म के संबंध में जो व्यवस्थाएं दी हैं, वे उल्लेखनीय हैं:

     3.68. गृहस्थ के यहां वध के पांच स्थान होते हैं या जहां छोटे जीवों की हत्या हो सकती है: चूल्हा, चक्की, झाडू, ओखली, मूसल और जल का घट । उन्हें व्यवहृत करता हुआ वह पाप का भागी होता है।

     3.69. इन क्रमिक स्थानों पर अज्ञानवश किए गए पापों से निवृत्ति के लिए महर्षियों ने पांच महायज्ञ प्रतिदिन करने का विधान गृहस्थों के लिए बताया है।

     3.70. शास्त्रों का अध्यापन और अध्ययन 'ब्रह्मयज्ञ' है, पिंड और जल अर्पित करना 'पितृयज्ञ' है, हवन करना 'देवयज्ञ' है, बलिवैश्वदेव करना 'भूतयज्ञ' है तथा अतिथियों का भोजन आदि से सत्कार करना 'नृयज्ञ' है।

     3.71. यथाशक्ति इन पांच महायज्ञों को नहीं छोड़ने वाला व्यक्ति गृहस्थाश्रम में रहते हुए भी पांचों पापों के दोषों से मुक्त रहता है।

     इसके बाद मनु यह निर्देश देता है कि सभी को संस्कार - लाभ का अधिकार प्राप्त नहीं है और सभी को यज्ञ कर्म करने का समान अधिकार नहीं है।

     वह संस्कार-कर्म और यज्ञ-कर्म के प्रसंग में स्त्रियों और शूद्रों की स्थिति निर्धारित करता है। स्त्रियों के संबंध में मनु कहता है:

     2.66. उपनयन संस्कार को छोड़कर वही संस्कार स्त्रियों के लिए उतनी ही आयु के प्राप्त होने पर उसी क्रम से किए जाने चाहिए जिससे काया शुद्ध हो सके, लेकिन ये संस्कार बिना वेद मंत्र के किए जाएं।

Hindu Samaj ke Achar Vichar dr Bhimrao Ramji Ambedkar

     शूद्रों के संबंध में मनु कहता है:

     10.127. जो शूद्र अपने सारे कर्तव्य करने के इच्छुक हैं और यह जानते हुए कि उन्हें क्या करना चाहिए, अपने गृहस्थ जीवन में अच्छे मनुष्यों की तरह आचरण करते हैं और स्तुति व प्रार्थना के अतिरिक्त और कोई धार्मिक पाठ नहीं करते और पातक कर्म - रहित हैं, वे प्रशंसित होते हैं।

     किसी व्यक्ति को यज्ञोपवीत पहनाना एक अत्यंत महत्वपूर्ण संस्कार है:

     2.36. ब्राह्मण बालक का गर्भ से आठवें वर्ष, क्षत्रिय बालक का गर्भ से ग्यारहवें वर्ष और वैश्य बालक का गर्भ से बारहवें वर्ष पिता अपने शिशु का अपने वर्ण के अनुसार यह (यज्ञोपवीत) संस्कार कराए।

     2.37. वेदाध्ययन और ज्ञानवार्धक्य प्राप्ति आदि तेज के लिए ब्राह्मण बालक का गर्भ से पांचवें वर्ष में पराक्रम में वृद्धि के लिए, क्षत्रिय बालक का गर्भ से आठवें वर्ष में 'यज्ञोपवीत' संस्कार उसके पिता द्वारा कराना चाहिए।

     2.38. गायत्री - सहित यज्ञोपवीत संस्कार में विलंब नहीं करना चाहिए, ब्राह्मण के संबंध में सोलह वर्ष तक, क्षत्रिय के संबंध में बाईस वर्ष तक और वैश्य के संबंध में चौबीस वर्ष तक ( यह संस्कार हो जाना चाहिए ) ।

     2.39. इसके बाद इन तीनों वर्णों के युवक जिनका उचित समय पर यज्ञोपवीत संस्कार नहीं होता है, व्रात्य या जातिच्युत हो जाते हैं, गायत्री भ्रष्ट हो जाते हैं और शिष्ट जनों से निंदित होते हैं।

     जहां एक गायत्री का संबंध है, वह एक मंत्र है। मनु इसके महत्व को स्पष्ट करते हुए कहता है:

     2.76. ब्रह्मा ने तीन वेदों से तीन अक्षरों को निकाला जो परस्पर मिलकर ओ३म बनते हैं, इसके साथ तीन व्याहृतियों 'भूः भुवः स्वः' अर्थात् पृथ्वी, आकाश और स्वर्ग को भी निकाला।

     2.77. परमेष्ठी, ब्रह्मा ने इन तीनों वेदों से निर्वचनीय पाठ की तीन मात्राओं को भी निकाला, जिसका आरंभ 'तत्' से हाता है और जिसे सावित्री या गायत्री कहते हैं।

     2.78. जो ब्राह्मण वेद जान लेगा, और इस अक्षर (ऊं) का प्रातः काल और संध्या काल दोनों समय मन में उच्चारण करेगा और इस पवित्र अक्षर के बाद तीन शब्दों का उच्चारण करेगा, उसे वेदविहित पुण्य की प्राप्ति होगी ।

     2.79. जो ब्राह्मण इन तीन ( 1. प्रणव- ॐ 2. व्याहृति 'भूः भुवः स्वः' और सावित्री - 'तत्') का प्रतिदिन एक सहस्त्र बार पाठ करेगा, वह एक मास में बड़े से बड़े पाप से मुक्त हो जाएगा, जैसे सांप अपनी केंचुल से मुक्त हो जाता है। 2.80. जो ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य इन अलौकिक शब्दों का पाठ और समय पर की जाने वाली क्रियाएं (अग्निहोत्र आदि ) नहीं करेगा, वह पुण्यवानों के बीच निंदित होगा।

     2.81. ऊंकार - पूर्विका (जिनके पहले 'ॐ' कार है, ऐसी) ये तीनों महाव्याहृतियां (भूः, भुवः, स्वः) अव्यय और त्रिपदा सावित्री वेद का मुख अथवा मुख्य भाग हैं।

     2.82. जो व्यक्ति प्रतिदिन तीन वर्ष तक 'ॐ' कार सहित महाव्याहृतियों का जप करता है, वह वायु और ब्रह्मस्वरूप हो जाता है।

     2.83. तीन अक्षर युक्त एकाक्षर (ॐ) ब्रह्म का प्रतीक है, ईश्वर का ध्यान कर श्वास रोकना (प्राणायाम) सर्वश्रेष्ठ तप है, लेकिन गायत्री से श्रेष्ठ कोई मंत्र नहीं, मौन की अपेक्षा सत्य भाषण श्रेष्ठ है।

     2.84. वेदविहित सभी कर्म, यज्ञ और धार्मिक विधियां अपना-अपना फल देकर नष्ट हो जाती हैं, लेकिन जो नष्ट नहीं होता वह ॐ है, इसीलिए इसे अक्षर कहते हैं, क्योंकि यह परब्रह्म, अर्थात् सृजित जीवों के पालक का प्रतीक है।

     2.85. उसके पवित्र नाम का जप विधिविहित यज्ञों से दस गुना श्रेष्ठ है, अगर इसे कोई न सुन सके, तब सौ गुना श्रेष्ठ है और अगर यह कवल मानस रूप हो तब हजार गुना श्रेष्ठ है।

     2.86. चारों घरेलू संस्कारों को जिनमें विधिविहित यज्ञ का विधान है, अगर एक में मिला दिया जाए तब वह गायत्री के जप द्वारा किए गए यज्ञ के सोलहवें भाग के भी बराबर नहीं है।

     यह यज्ञोपवीत संस्कार पुनः जन्म के समान होता है।

     2.147. व्यक्ति को अपना जन्म साधारण हुआ समझना चाहिए, क्योंकि यह जन्म उसके माता-पिता ने परस्पर सुख प्राप्त करने के बाद दिया और उसे यह जन्म माता के गर्भ में प्राप्त हुआ था।

     2.148. लेकिन जो जन्म उसका आचार्य, जो संपूर्ण वेद जानता है, दिव्य माता गायत्री के द्वारा उसे प्राप्त कराता है, वह ही वास्तविक जन्म होता है, यह जन्म अजर और अमर होता है।

     2.169. पहला जन्म असली मां से होता है, दूसरा जन्म यज्ञोपवीत धारण करने पर होता है और तीसरा जन्म यज्ञ-कर्म करने के बाद होता है। वेद के अनुसार ये उस व्यक्ति के जन्म होते हैं, जिसे सामान्यतः द्विज कहा जाता है।

     2.170. इनमें दिव्य जन्म वह होता है जिसमें यज्ञोपवीत धारण किया जाता है, , ऐसे जन्म में गायत्री उसकी मां होती है और आचार्य उसका पिता होता है।

     मनु ने यह संस्कार शूद्रों और स्त्रियों के लिए स्वीकृत नहीं किए हैं।

     2.103. लेकिन जो प्रातः काल इसका खड़े होकर और संध्या समय में बैठकर पाठ नहीं करता है, उसे शूद्र समझ कर प्रत्येक द्विज कर्म से बहिष्कृत कर देना चाहिए |

     मनु शिक्षा और अध्ययन के संबंध में नियमों का उल्लेख करना नहीं भूलता। मनु ने सामूहिक शिक्षा के विषय में कुछ नहीं कहा है। मनु इसकी कोई उपयोगिता नहीं मानता और वह इस संबंध में राजा या शासन के लिए कोई कर्तव्य निश्चित नहीं करता। वह केवल धर्मग्रन्थों, अर्थात् वेदों के अध्ययन के बारे में चिंतित रहा ।

     वेद का अध्ययन आचार्य से और उनकी सहमति से किया जाना चाहिए। कोई भी व्यक्ति वेद का स्वयं अध्ययन नहीं कर सकता। अगर वह ऐसा करता है, तब वह चोरी करने का अपराध करता है।

     2.116. जो अपने आचार्य की सहमति के बिना वेद का ज्ञान प्राप्त करता है, वह शास्त्रों की चोरी करने का अपराध करता है और वह नरक में गिरता है।

      9.18. स्त्रियों का वेद से कोई सरोकार नहीं होता। यह शास्त्र द्वारा निश्चित है। चूंकि इस संबंध में धर्मशास्त्र में कोई साक्ष्य नहीं है और इनके लिए प्रायश्चित का कोई विधान नहीं है, अतः जो स्त्रियां वेदाध्ययन करती हैं, वे पापयुक्त हैं, और असत्य के समान अपवित्र हैं, यह शाश्वत नियम है।

     4.99. वह वेद का पाठ स्वराघात और अक्षरों के स्पष्ट उच्चारण के बिना न करे, वह शूद्र की उपस्थिति में भी वेद पाठ न करे, रात्रि के अंतिम प्रहर में पाठ आरंभ करने पर यदि वह थक जाए तो पुनः सो जाए।

     यह निषेध तीनों उच्च वर्णों के व्रात्यों या जातिच्युत लोगों के लिए भी है। मनु कहता है:

     2.40. ऐसे अपवित्र व्यक्तियों के साथ कोई भी ब्राह्मण वेदाध्ययन में या साहचर्य में कोई संबंध नहीं रखे, चाहे उस पर विपत्ति ही क्यों न आ जाए।
अयोग्य घोषित व्यक्तियों के लिए यज्ञ कर्म करना या उन्हें वेद का अध्ययन कराना मनु द्वारा निषिद्ध था।

     4.205. जो यज्ञ-कर्म वेद पाठ के बिना हुआ हो, जो यज्ञ-कर्म बहुत सारे यज्ञ कराने वाले यज्ञकर्मी के द्वारा किया गया हो, जो यज्ञ कर्म स्त्री या नपुंसक द्वारा कराया गया हो, उनमें ब्राह्मण कभी भी भोजन न करे।

     4.206. जब वे लोग घी की आहुति देते हैं, तब वह सज्जनों की श्री की हानि करता है और देवताओं में अरुचि उत्पन्न करता है, इसलिए ऐसे यज्ञ - कर्म से वह सतर्क हो संपर्क नहीं रखे।

     11.198. जो व्यक्ति जातिच्युत व्यक्तियों के लिए यज्ञ कर्म कराता है या जो अपरिचित का दाहकर्म करता है या जो किसी अबोध की हत्या के निमित्त यज्ञादि करता है या जो अशुद्ध यज्ञ करता है जिसे अहिंसा कहते हैं, वह अपने पाप के प्रायश्चित स्वरूप तीन प्रजापत्य तपस्या करने के बाद शुद्ध होता है।