प्राचीन भारत में क्रांति तथा प्रतिक्रांति - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Prachin Bharat Me Kranti Aur Pratikranti dr Bhimrao Ramji Ambedkar
अंत में मनु कहता है:
10.130. विपत्ति पड़ने पर जीविकोपार्जन के संबंध में चारों वर्णों के ये कर्तव्य हैं, जिन्हें विस्तार से कहा गया है और अगर ये वर्ण इन कर्तव्यों को सम्यक रीति से पूरा करें तब उन्हें श्रेष्ठ गति प्राप्त होगी।
कुछ के लिए ये विशेषाधिकार केवल सामाजिक नहीं थे, बल्कि वे आर्थिक भी थे
8.35. जो व्यक्ति सच - सच यह कह देगा कि 'यह संपत्ति जो मैंने अपने पास रखी है' मेरी है, तो राजा उससे उस संपत्ति को प्राप्त करने के लिए उस संपत्ति का छठा या बारहवां भाग लेगा।
8.36. लेकिन जो व्यक्ति ऐसा झूठ-मूठ कहे, उस पर उसकी अपनी संपत्ति का अष्टमांश या जिस संपत्ति के बारे में झूठ-मूठ का दावा किया गया है, उसके मूल्य का कुछ भाग, जो न्यायोचित हो, जुर्माना किया जाए।
8.37. जिस किसी विद्वान ब्राह्मण को कहीं छिपाकर रखी गई संपत्ति प्राप्त होती है, वह उस सारी संपत्ति को ग्रहण कर ले क्योंकि वह सबका स्वामी है।
8.38. किंतु जो निधि प्राचीन काल से भूमि में गड़ी राजा या किसी अन्य प्रजाजन द्वारा खोज निकाली जाए तब राजा उस निधि का अद्धांश ब्राह्मणों में वितरित करने के बाद शेष अर्द्धांश अपने कोष में रख ले।
9.323. लेकिन जिस राजा का अंत किसी असाध्य रोग के कारण निकट है, वह अपनी समस्त संग्रहीत संपत्ति और अपना राज्य अपने पुत्र को दे देगा और युद्ध में और युद्ध न हो, तब भोजन का त्याग कर अपनी मृत्यु का वरण करेगा ।
7.127. खरीद और बिक्री की दरों, मार्ग की दूरी भोजन और मिर्च मसाले आदि का व्यय, माल लाने पर व्यय, व्यापार में शुद्ध लाभ का पता लगाकर राजा व्यापारियों से बेचने योग्य वस्तुओं पर कर देने के लिए कहे।
7.128. राजा अपने राज्य में उन करों को निरंतर लगाए जिनसे उसे और व्यापारी को विभिन्न कार्यों के लिए व्यय की उचित प्रतिपूर्ति हो सके ।
7.129. जिस प्रकार जोंक, बछड़ा और मधुमक्खी अपना-अपना खाद्य थोड़ा-थोड़ा ग्रहण करते हैं, उसी प्रकार राजा को प्रजा से वार्षिक कर लेना चाहिए।
7.130. राजा को पशु पर स्वर्ण और चांदी पर उसमें प्रतिवर्ष वृद्धि होने पर, पचासवां भाग, अनाज पर आठवां भाग, छटवां भाग या बारहवां भाग, मिट्टी के अंतर और उसे पैदा करने के लिए आवश्यक श्रम के अनुसार कर लेना चाहिए। 7.131. उसे वृक्षों, मांस, मधु, घी, इत्र, औषधि पदार्थ, द्रवों, पुष्पों, कंद और फल पर प्रतिवर्ष वृद्धि का छठवां भाग भी लेना चाहिए ।
7.132. एकत्रित पत्तियों, साग-भाजी, घास, चमड़े या बेंत से बने बर्तन, मिट्टी के बर्तन और पत्थर की बनी सभी चीजों पर (छठा भाग कर के रूप में वसूल करे)।
7.133. चाहे कोई राजा अपूर्ण इच्छाग्रस्त होकर मर भी क्यों न रहा हो तब भी वह वेदपाठी ब्राह्मण से कर न ले, न ऐसे ब्राह्मण को कष्ट दे जो उसके क्षेत्र में रह रहा हो और जो भूख से ग्रस्त हो ।
7.134. जिस राजा के राज्य में विद्वान ब्राह्मण क्षुधाग्रस्त रहता है, उस राजा के राज्य में शीघ्र ही अकाल पड़ता है।
7.137. राजा अपने राज्य में रहने वाले लोगों से जो सामान्यतम व्यापार कर अपना जीविकोपार्जन करते हैं, वार्षिक कर के रूप में कुछ ग्रहण करे।
7.138. राजा उन लोगों से हर महीने एक दिन काम करवाए जो छोटे दस्तकार, कारीगर और मजदूर हैं और जो श्रम कर जीविकोपार्जन करते हैं।
8.394. राजा अंधे व्यक्ति से मूर्ख से, अपंग से और सत्तर वर्ष के वृद्ध से और न उनसे जो विद्वान ब्राह्मणों के उपकार में रत हैं, किसी भी प्रकार का कर ले।
10.118. जो राजा युद्ध होने पर या आक्रमण होने पर आपातकाल में अपनी प्रजा से उसकी पैदावार का चतुर्थांश भी लेता है और यथाशक्ति अपनी प्रजा की रक्षा करता है, वह कोई पातक कर्म नहीं करता।
10.119. उसका मुख्य धर्म विजय प्राप्त करना है और उसे युद्ध से विमुख नहीं होना चाहिए, जिससे जहां वह शस्त्रास्त्र से व्यापारियों और किसानों की रक्षा करता है, वहां इस रक्षा पर व्यय की पूर्ति के लिए कानूनी तौर पर कर लगाए ।
10.120 समृद्धि काल में व्यापारियों पर उनके धन का बारहवां भाग और उनके निजी लाभ का पांचवां भाग कर रूप में होता है, विपत्ति में यह उनके धन का आठवां भाग या छठा भाग हो सकता है, जो औसत है। यह महान विपत्ति में चौथा भाग भी हो सकता है, लेकिन उनके धन पर लाभ और अन्य चल संपत्ति पर बीसवां भाग अधिकतम कर है, सेवक वर्ग, कारीगर, बढ़ई आदि जो कोई कर नहीं देते हैं, उन्हें अपने श्रम से सहायता करनी चाहिए।
9.187. मृत व्यक्ति का निकटतम सपिंड जो चाहे पुरुष हो या स्त्री, उसके बाद तीसरी पीढ़ी तक उसका उत्तराधिकारी होता है, सपिंड या उनकी संतान के न होने पर समानोदक (सजातीय) या दूर का संबंधी उत्तराधिकारी होता है, या आचार्य, शिष्य या साथ पढ़ा व्यक्ति मृत व्यक्ति का उत्तराधिकारी होता है।
9.188. इन सबके न होने पर तीनों वेदों में निष्णात ब्राह्मण जो शरीर और मन से शुद्ध हो, जिसके सब राग-द्वेष शांत हों, वे ही मृत व्यक्ति के कानूनी उत्तराधिक जारी होते हैं, उन्हीं को ही पिंडदान करना चाहिए। इस प्रकार मृत व्यक्ति के लिए पिंडदान आदि की क्रिया विफल नहीं हो सकती ।
9.189. ब्राह्मण की संपत्ति द्वारा राजा द्वारा कभी भी नहीं ली जानी चाहिए, यह एक निश्चित नियम है, मर्यादा है। लेकिन अन्य जाति के व्यक्तियों की संपत्ति उनके उत्तराधिकारियों के न रहने पर राजा ले सकता है।
विभिन्न वर्गों को अपने सामाजिक जीवन का किस प्रकार निर्वाह करना चाहिए, इसकी मनु ने कुछ नियमों में व्याख्या की है। ये नियम हिंदुओं के नैतिक सिद्धांत के महत्वपूर्ण अंग हैं।
मनु निर्देश देता है:
10.3. जाति की विशिष्टता से उत्पत्ति स्थान की श्रेष्ठता से अध्ययन एवं व्याख्यान आदि द्वारा नियम के धारण करने से और यज्ञोपवीत संस्कार आदि की श्रेष्ठता से ब्राह्मण ही सब वर्णों का स्वामी है।
9.317. जिस प्रकार शास्त्र विधि से स्थापित अग्नि और सामान्य अग्नि, दोनों ही श्रेष्ठ देवता हैं, उसी प्रकार ब्राह्मण चाहे वह मूर्ख हो या विद्वान, दोनों ही रूपों में श्रेष्ठ देवता है।
9.319. इस प्रकार ब्राह्मण यद्यपि निंदित कर्मों में प्रवृत्त होते हैं, तथापि ब्राह्मण सब प्रकार से पूज्य हैं, क्योंकि वे श्रेष्ठ देवता हैं।
7.35. राजा का सृजन इन सभी वर्णों और आश्रमों की रक्षा के लिए किया गया है जो शुरू से लेकर अंत तक अपने-अपने धर्म का पालन करते हैं।
7.36. मैं क्रमानुसार उन सब कर्तव्यों के बारे में तुमसे कहूंगा जो शास्त्रानुसार राजा के द्वारा अपनी प्रजा की रक्षा के लिए अपने अमात्यों की सहायता से अवश्य किए जाने चाहिएं।
7.37. राजा प्रातःकाल उठकर ऋग्यजुःसाम के ज्ञाता और विद्वान (राजधर्म में) ब्राह्मणों की सेवा करे और उनके कहने के अनुसार कार्य करे।
7.38. वह ब्राह्मणों का हमेशा आदर-सत्कार करे जो आयु और धर्म, दोनों दृष्टियों से वरिष्ठ हैं, जो वेदों के ज्ञाता हैं, जो काया और चित्त से शुद्ध हैं क्योंकि जो वरिष्ठ का आदर करता है, वह राक्षसों द्वारा भी हमेशा पूजित होता है।
9.313. राजा को घोरतम विपत्ति में भी ब्राह्मणों को क्रुद्ध होने के लिए उत्तेजित नहीं करना चाहिए, क्योंकि ब्राह्मण क्रोधित होने पर उस राजा को उसकी सेना, हाथियों, घोड़ा, वाहनों को नष्ट कर सकते हैं।
ऐसे थे राजनीतिक जीवन में विविध संबंध। विभिन्न वर्गों में सामान्य सामाजिक संबंधों के बारे में मनु ने निम्नलिखित नियम निर्धारित किए हैं:
3.68. गृहस्थ के यहां वध के पांच स्थान होते हैं जहां छोटे जीवों की हत्या हो सकती है: चूल्हा, चक्की, झाडू, ओखली, मूसल और जल का घट । उन्हें व्यवहृत करता हुआ वह पाप का भागी होता है।
3.69. इन क्रमिक स्थानों पर अज्ञानवश किए गए पापों से निवृत्ति के लिए महर्षियों ने पांच महायज्ञ प्रतिदिन करने का विधान गृहस्थों के लिए बताया है।
3. 70. शास्त्रों का अध्यापन और अध्ययन 'ब्रह्मयज्ञ' है, पिंड और जल तर्पन करना ‘पितृयज्ञ’। हवन करना ‘देवयज्ञ' है, बलिवैश्वदेव करना 'भूतयज्ञ' है तथा अतिथियों का भोजन आदि से सत्कार करना 'नृयज्ञ' है।
3.71. यथाशक्ति इन पांच महायज्ञों को नहीं छोड़ने वाला व्यक्ति गृहस्थाश्रम में रहते हुए भी (पांचों पापों) के दोषों से मुक्त रहता है।
3.84. ब्राह्मण अपनी गृह अग्नि में सभी देवों के लिए पकाए गए अन्न को विधिपूर्वक निम्नलिखित देवताओं को अर्पित करे ।
यह अन्न जब देवताओं को अर्पित कर दिया जाए, तब उसके बाद की प्रक्रिया के बारे में मनु निर्देश देता है:
3.92. वह कुत्तों, जाति से बहिष्कृतों, चांडालों, पापजन्य रोग से ग्रस्त व्यक्तियों, कौओं, कीड़ा-मकोड़ों का अंश धीरे-धीरे पृथ्वी पर रख दे।
आतिथ्य संबंधी नियमों के बारे में मनु गृहस्थ को निर्देश देता है:
3.102. एक रात ठहरने वाला व्यक्ति अतिथि कहा जाता है, क्योंकि इतने थोड़े समय के लिए रहने से पूरी तिथि, अर्थात् चंद्रमा के दिन के लिए भी नहीं ठहरता ।
3.98. क्योंकि ब्राह्मण के मुख में स्थित अग्नि अर्पित करने से दाता विपत्ति और अन्य भयंकर पाप से मुक्त हो जाता है, ब्राह्मण का मुख ज्ञान और पुण्य से दीप्त रहता है।
3.107. श्रेष्ठ अतिथियों को श्रेष्ठ रूप में, निम्न को निम्न रूप में, समान को समान रूप में आसन, शैया आदि और तदनुसार जब तक वे रहें, तब तक सत्कार और आदर दिया जाए।
3.110. ब्राह्मण के घर आए हुए क्षत्रिय, वश्य या शूद्र, परिचित मित्र या बांधव और गुरु ‘अतिथि' नहीं कहे जाते ।
3.111. यदि क्षत्रिय अतिथि धर्म से ब्राह्मण के घर आ जाए तब पूर्वोक्त ब्राह्मण अतिथियों को भोजन कराने के बाद उसे उसकी इच्छा के अनुसार भोजन कराया जाए।
3.112. अतिथि के रूप में वैश्य या शूद्र के आने पर वह उस पर दया प्रदर्शित करता हुआ अपने नौकरों के साथ भोज कराए।
समाज में एक वर्ण की अपेक्षा दूसरे वर्ण की स्थिति कैसी होगी, इस बारे में मनु ने जो नियम बनाए हैं, वे कम रोचक नहीं हैं। वह सामाजिक स्थिति के बारे में एक समीकरण बताता है:
2.135. विद्यार्थी ब्राह्मण को, जो चाहे दस वर्ष का ही क्यों न हो और क्षत्रिय को, जो चाहे एक सौ वर्ष की आयु का हो, पिता और पुत्र के रूप में समझे, इन दोनों में युवा ब्राह्मण को पिता समझकर आदर दे ।
2.136. धन-सम्पत्ति, बंधु, आयु, नैतिक आचार और पांचवे आध्यात्मिक ज्ञान के कारण मनुष्यों को आदर मिलता है, लेकिन इनमें जिसका उल्लेख सबसे अंत में हुआ है, वह सबसे अधिक पूजनीय है।
2.137. तीन उच्च वर्गों में जिस किसी भी व्यक्ति के पास उक्त पांच गुणों में संख्या और मात्रा की दृष्टि से अधिक गुण हों, वह व्यक्ति अधिक पूजनीय है, शूद्र भी यदि वह अपनी आयु के नवें दशक में प्रवेश कर रहा हो ।
2.138. जो व्यक्ति किसी गाड़ी में बैठकर जा रहा हो, जो नब्बे वर्ष से अधिक आयु का हो, जो रोगग्रस्त हो, जो बोझ लेकर जा रहा हो, स्त्री को, जो स्नातक अपने गुरु के पास से आ रहा हो, राजकुमार और वर के लिए रास्ता छोड़ देना चाहिए।
2.139. अगर कोई ऐसा अवसर आए कि बहुत से लोगों से एक साथ मिलना हो तब जो स्नातक हाल में घर वापस लौटा है, वह और राजकुमार, इन दोनों में से राजकुमार की अपेक्षा स्नातक को अधिक आदर देना चाहिए।
सामाजिक स्थिति के नियमों को अधिक स्पष्ट करने के लिए अभिवादन से संबंधित नियम यहां उद्धृत हैं:
2.121. जो युवक स्वभाववश वृद्ध जनों को प्रणाम करता और निरंतर उनकी सेवा करता है, उसे अपनी चार वस्तुओं में वृद्धि प्राप्त होती है आयु, ज्ञान, यश और बल।
2.122. ब्राह्मण वृद्ध जनों को अपना नाम बताते हुए प्रणाम करें।
2.123. जो व्यक्ति संस्कृत भाषा का ज्ञान न होने के कारण अपने नाम का अर्थ नहीं जानते, उनसे विद्वान व्यक्ति यह कहे 'यह मैं हूं' और आपको नमस्कार करता हूं, वह इसी प्रकार स्त्रियों का अभिवादन करे ।
2.124. अभिवादन में अपने नाम के बाद संबोधन सूचक अव्यय 'भोः' का उच्चारण करे, क्योंकि ऋषियों ने 'भोः' शब्द को नामों का पूर्ण उच्चारित स्वरूप कहा है।
2.125. अभिवादन का उत्तर देते हुए ब्राह्मण से 'हे सौम्य ! आयुष्मान हो' कहे तथा उसके नाम के अंतिम अक्षर के पूर्व वाले अकार स्वर का प्लुतोच्चारण करे। 2.126. जो ब्राह्मण अभिवादन के बाद प्रत्याभिवादन करना नहीं जानता, विद्वान ब्राह्मण उसका अभिवादन न करे, क्योंकि जैसा शूद्र है वैसा ही वह भी है।
2.127. किसी विद्वान व्यक्ति को कोई ब्राह्मण मिले तब उससे कुशल, क्षत्रिय मिले तब उसके अनामय, वैश्य मिले तब क्षेम और जब कोई शूद्र मिले तब उसके आरोग्य होने के बारे में पूछे।