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प्राचीन भारत में क्रांति तथा प्रतिक्रांति - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Prachin Bharat Me Kranti Aur Pratikranti dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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01 जून 2023
Book
5,7,1,2,3,,

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हिंदू समाज के आचार-विचार

     इकसठ पृष्ठों की टाइप की हुई मूल अंग्रेजी की पांडुलिपि की उपलब्ध दूसरी प्रति में डॉ. अम्बेडकर द्वारा स्वयं जो शुद्धियां और संशोधन किए गए हैं, उन सभी को अंग्रेजी प्रकाशन और प्रस्तुत अध्याय में शामिल कर लिया गया है। ‘मनुस्मृति और दि गोस्पल ऑफ काउंटर रिवोल्यूशन' शीर्षक से बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सोर्स मैटिरियल पब्लिकेशन कमेटी को जो अलग से फाइल मिली, उसमें 'मनुस्मृति' पर विभिन्न शीर्षकों के अंतर्गत कुछ टिप्पणियां लिखी मिली थीं। ये सभी टिप्पणियां 'दि मोरल्स ऑफ दि हाउस' (हिंदू समाज के आचार-विचार) शीर्षक निबंध में शामिल की गई मिली हैं। उन टिप्पणियों को अलग से मुद्रित करना पुनरावृत्ति मात्र लगता है। इसलिए उक्त टिप्पणियों को अलग से मुद्रित नहीं किया गया है - संपादक

I

     हिंदुओं के आचार-विचार और धार्मिक सिद्धांत स्मृतियों द्वारा निर्धारित हैं। ये स्मृतियां हिंदुओं के पवित्र साहित्य का एक अंग है। अगर हम हिंदुओं की नैतिकता और उनके धर्म को समझना चाहते हैं तब हमें स्मृतियों का अध्ययन अवश्य करना चाहिए। स्मृतियों की संख्या कुछ कम नहीं हैं। साधारणतः अनुमान है कि उनकी कुल संख्या 108 है। स्मृतियों की इतनी बड़ी संख्या हमारी समस्या के समाधान में कोई कठिनाई नहीं पैदा कर सकती। इसका कारण यह है कि हालांकि स्मृतियां अनेक हैं, तो भी वे मूलतः एक-दूसरे से भिन्न नहीं हैं। इनमें इतनी ज्यादा समानता है कि कभी-कभी इनको पढ़ना नीरस लगने लगता है। इसका स्रोत एक ही है। यह स्रोत है मनुस्मृति जो 'मानव धर्म शास्त्र' के नाम से भी प्रसिद्ध है। अन्य स्मृतियां मनुस्मृति की सटीक पुनरावृत्ति हैं। इसलिए हिंदुओं के आचार-विचार और धार्मिक संकल्पनाओं के विषय में पर्याप्त अवधारणा के लिए मनुस्मृति का अध्ययन ही यथेष्ट है।

Hindu Samaj ke Achar Vichar dr Bhimrao Ramji Ambedkar

     हम कह सकते हैं कि मनुस्मृति नियमों की एक संहिता है । यह कथन अन्य स्मृतियों के बारे में भी सच है। यह न तो नीतिशास्त्र है और न ही कोई धार्मिक ग्रंथ है। नियमों की किसी भी संहिता को नीतिशास्त्र या किसी धार्मिक ग्रंथ के रूप में ग्रहण करना नीतिशास्त्र, धर्म और नियम इन तीनों को आपस में गड्डमड्ड कर देना है।

     पहली बात तो यह है कि धर्म को कानून से अलग करना आधुनिक युग की देन है। प्राचीन समाज में कानून और धर्म एक होते थे। प्रो. मैक्समूलर¹ का कहना है कि हालांकि-

     “कानून स्वाभाविक रूप से समाज का आधार और ऐसा सूत्र प्रतीत होता है जो किसी राष्ट्र को आपस में बांधे रखता है। जो लोग और गहराई से विचार करते हैं, उन्हें यह बात जन्दी ही समझ में आ जाती है कि कानून कम से कम प्राचीन कानून को अधिकार, शक्ति और जीवन धर्म से ही प्राप्त होती है... यह विश्वास अनेक राष्ट्रों की प्राचीन परंपराओं में मिलता है कि साधारण मनुष्यों की अपेक्षा विधिकर्ता का देवी - देवताओं से अधिक घनिष्ठ संबंध था । डिबयोडोरस साइकुलस के एक प्रसिद्ध अनुच्छेद के अनुसार मिस्रवासियों का यह विश्वास था कि उनके कानून हर्मिस द्वारा मेनबिस को बताए गए थे, क्रेताउस का विश्वास था कि मिनोस को अपने कानून जेऊस से प्राप्त हुए, लैकेदामोनियन का विश्वास था कि लाइकुर्गुस को अपने कानून अपोलोन से उपलब्ध हुए थे। एरियनों के मतानुसार उनके विधिकर्ता जरथुस्त्र को अपने कानून पवित्र आत्मा से प्राप्त हुए। स्टो के अनुसार जमोलिक्सिस को अपने कानून देवी हेस्तिया से प्राप्त हुए और यहूदियों का मत है कि मोजेस को अपने कानून प्रभु इयास से प्राप्त हुए। "

     सर हेनरी मेन्स² ने यह बात जितना जोर देकर कही, उतना शायद ही किसी और ने कहा हो, कि प्राचीन काल में धर्म दैवी शक्ति के रूप में जीवन के प्रत्येक पक्ष और प्रत्येक सामाजिक संस्था में अंतर्निहित था और उसकी पुष्टि करता था। वह धर्म के विषय में कहते हैं:

     "वह एक अलौकिक सर्वोच्च सत्ता थी, जिसका उद्देश्य उस समय की सभी प्रधान संस्थाओं, राज्य, जाति और परिवार को पवित्र रखना तथा एक-दूसरे के साथ परस्पर जोड़े रखना था । "

     कानून को इस अलौकिक सर्वोच्च सत्ता से छुटकारा पाना बहुत दिनों तक संभव नहीं हो सका, लेकिन बाद में इसका संबंध धर्म से बिल्कुल टूट गया। फिर भी उसमें बहुत से ऐसे चिह्न अभी भी मिलते हैं, जिनसे यह प्रमाणित होता है कि मानव इतिहास के आरंभिक दिनों में इसका धर्म के साथ कितना अधिक संबंध था ।


1. साइंस ऑफ रिलीजन, पृ. 150-51
2. एनसिएंट लॉ, पृ.6


     आधुनिक युग में ही धर्म और नैतिकता के बीच भेद किया जाने लगा है। धर्म और नैतिकता का एक-दूसरे के साथ इतना घनिष्ठ संबंध है कि दोनों को एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। सदाचार और नैतिकता तो व्यवहार का विषय है। प्रो. जैक्स¹ का जोर देकर कहना है कि नैतिकता की समस्या यही नहीं है कि लोग अच्छाई को समझें, बल्कि यह है कि लोग अच्छे रहें। यही नहीं कि जो उचित है, उसे वैज्ञानिक आधार दिया जाए, बल्कि यह है कि जो उचित है, वह किया भी जाए। जो अच्छा है और जो उचित है, उसकी परिभाषा करना ही सदाचार है। प्रो. जैक्स ठीक ही कहते हैं:

     “जब कभी हम सदाचार का अध्ययन उसके व्यवहार पक्ष की अनदेखी कर करते हैं, तब मुझे यही लगता है कि हम जो कुछ अध्ययन कर रहे हैं, वह सदाचार नहीं है। जब तक हम व्यवहार के क्षेत्र में नहीं जा पहुंचते तब तक सदाचार का प्रश्न ही नहीं होता। संसार में सदाचार विषयक किसी भी सिद्धांत को शुरू करने से उसका प्रभाव तब तक कुछ भी नहीं होता, जब तक उसका व्यवहार करने के लिए उसके पीछे कोई प्रबल प्रेरणा नहीं हो। अच्छा जीवन, जैसा कि अरिस्टाटल ने कहा है, एक बड़ा ही कठिन कार्य है। यह तब भी एक कठिन कार्य है, जब हम मौजूदा नियमों के अनुसार ही जीवन यापन करते हों। लेकिन जब अच्छे जीवन के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि मौजूदा मानकों को लांघकर जीवन यापन किया जाए, तब मुक्ति की अदम्य शक्ति के बिना यह कैसे हो सकता है?"

     गलत काम करने की मनुष्य की स्वाभाविक वृत्ति पर सिर्फ इस जानकारी का कोई प्रभाव नहीं पड़ता कि मनुष्य को सही काम क्यों करना चाहिए - यह उन कठिनाइयों का समाधान नहीं है जो अच्छे जीवन के रास्ते में आती हैं।

     जब तक कोई प्रेरक शक्ति सदाचार के साथ नहीं रहती, तब तक सदाचार निष्क्रिय रहता है। जो वस्तु सदाचार को प्रेरक शक्ति देती है, वह निस्संदेह धर्म है। यह ऊर्जा है। जो प्रो. जैक्स के शब्दों में-

     " प्रेरणाओं का सृजन करती है। ये प्रेरणाएं इतनी सबल होती हैं कि उनसे अच्छा जीवन व्यतीत करने के मार्ग में आने वाली बड़ी-बड़ी दिक्कतें दूर हो जाती हैं चाहे वे देखने में सरल ही क्यों न हों, और ये इतनी पर्याप्त होती हैं कि जिनसे नैतिक आदर्श में निरंतर सुधार की प्रक्रिया जारी रहती है। "

     प्रेरक बल के रूप में धर्म विभिन्न प्रकार से सदाचार की इच्छा को प्रबल बनाता है। कभी वह निषेध के रूप में होता है जिसके अधीन मृत्यु के बाद पुरस्कार या दंड का विधान होता है, कभी प्रभु के संदेश के बतौर यह सदाचार नियमों का निर्माण करता


1. मोरल्स एंड रिलिजन - हिब्बर्ट जर्नल, खंड 19, पृ. 615-21


है, कभी इन नियमों में पवित्रता का भाव भर देता है कि लोग स्वतः इनका पालन करें। लेकिन ये सब केवल विभिन्न रूप हैं, जिनमें धर्म के द्वारा पैदा की गई प्रेरणा शक्ति व्यवहार में सदाचार की भावना बनाए रखती है। धर्म ऊर्जा है, जो सदाचार के चक्र को घुमाती है।

     अगर नैतिकता और सदाचार कर्तव्य हैं, तब निस्संदेह मनुस्मृति नीतिशास्त्र का ग्रंथ है। जो मनुस्मृति को पढ़ने का कष्ट करेगा, वह यह स्वीकार करेगा कि इस ग्रंथ में अगर कोई विषय प्रधान है, तो वह कर्तव्यों का है। मनु सर्वप्रथम वह व्यक्ति था जिसने उन कर्तव्यों को व्यवस्थित और संहिताबद्ध किया, जिन पर आचरण करने के लिए हिंदू बाध्य थे। वह वर्णाश्रम धर्म और साधारण धर्म में भेद करता है। वर्णाश्रम धर्म विशिष्ट कर्तव्य हैं जिनका संबंध मनुष्य के जीवन में उसकी अवस्था से है। यह अवस्था उसके वर्ण या जाति और उसके आश्रम अथवा जीवन की विशिष्ट स्थिति से निर्धारित होती है। साधारण धर्म वे कर्तव्य हैं जिन्हें आयु, जाति या मत से प्रभावित किसी विशेष समुदाय या सामाजिक वर्ग या जीवन की किसी विशेष अवस्था या आयु का होने के कारण नहीं, वरन मनुष्य होने के नाते करने चाहिए। इस संपूर्ण ग्रंथ में कर्तव्यों के अतिरिक्त किसी और विषय की विवेचना नहीं है।

     इस प्रकार मनुस्मृति कानून का ग्रंथ है, जिसमें धर्म और सदाचार को एक में मिला दिया गया है। चूंकि इसमें मनुष्य के कर्तव्य की विवेचना है, इसलिए यह आचार - शास्त्र का ग्रंथ है। चूंकि इसमें जाति का विवेचन है जो हिंदू धर्म की आत्मा है, इसलिए यह धर्म ग्रंथ है। चूंकि इसमें कर्तव्य न करने पर दंड की व्यवस्था की गई, इसलिए यह कानून है। इसे ध्यान में रखते हुए अगर हम हिंदुओं के आचार-विचार के आदर्शों और उनकी धार्मिक संकल्पनाओं को जानने के लिए मनुस्मृति का सहारा लें, तब कोई गलत बात नहीं होगी।

     यह कहना कि मनुस्मृति एक धर्मग्रंथ है, बहुत कुछ अटपटा लगता है। इसका कारण यह है कि हिंदू धर्म बहुत ही भ्रामक शब्द है। विभिन्न लेखकों ने इसकी परिभाषा विभिन्न प्रकार से की है।
सर डी. इबटसन¹ हिंदू धर्म की परिभाषा इस प्रकार करते हैं:

     "वंशानुगत पुरोहितों का धर्म जो ब्राह्मणों द्वारा संपन्न होता है, जो जाति नामक सामाजिक संस्था से शक्ति ग्रहण करता है और जो भारत में जन्मे धर्म के सभी पक्षों और विविधताओं को अपने में समेटे हुए है, जो विदेशों से आए ईसाई और इस्लाम धर्म और बाद में बौद्ध धर्म की शाखा प्रशाखाओं से भिन्न है, जो शायद सिख धर्म से और जैन धर्म से, हालांकि बहुत संदेह है, भिन्न है । "


1. पंजाब सेन्सस रिपोर्ट (1881), पैरा 214


     सर जे.ए. बेन्स¹ ने हिंदू धर्म की परिभाषा इस प्रकार की है :

     “वह विपुल जनसंख्या जो न सिख है, न जैन, न बौद्ध या न घोर आत्मावादी, जो इस्लाम, प्राचीन पारसी, ईसाई या हिब्रू आदि धर्मों में शामिल नहीं हैं।"

     सर एडबर्ड² गैट के लिए हिंदू धर्म-

     “मत-मतांतरों का एक जटिल जीवाणु कोष है। इसमें एकेश्वरवाद, बहुदेव, सर्वेश्वरवाद, महादेव शिव और विष्णु, दुर्गा और लक्ष्मी तथा मातृकाओं, वृक्षों, शिलाओं और नदियों और छोटे-मोटे ग्राम देवताओं व देवियों के उपासक, वे लोग जो अपने देवी-देवताओं को बलि देकर संतुष्ट करते हैं और वे लोग जो किसी जीव की हिंसा नहीं करते, बल्कि वे लोग भी जो 'काटना' शब्द तक के प्रयोग को वर्जित समझते हैं, वे लोग जिनकी पूजा-विधि में मुख्यतः स्तुति और भजनों का समावेश होता है, और वे लोग जो धर्म के नाम पर गोपनीय रहस्यपूर्ण अनुष्ठान करते हैं, सभी लोग आते हैं।"

     यह हिंदू धर्म की जटिलता का बहुत कुछ पूर्ण विवरण तो है, लेकिन यह अभी भी अपूर्ण है। इस सूची में उन लोगों को भी शामिल किया जाना चाहिए जो गौ की पूजा करते हैं, और वे लोग भी जो उसे खाते हैं, वे लोग भी जो प्राकृतिक शक्तियों की पूजा करते हैं, और वे लोग भी जो केवल एक ईश्वर की उपासना करते हैं और वे लोग भी जो मूर्तियों, दानवों, प्रेतों, पितरों, संतों और शूरवीरों के उपासक हैं।

     ये वे उत्तर हैं, जो तीन जनगणना आयुक्तों ने सीधे सवाल के लिए कि हिंदू धर्म क्या है। बाकी लोगों को इसका उत्तर देना काफी कठिन लगा । जरा देखिए सर ए लाइल इस प्रश्न का उत्तर किस प्रकार देते हैं। उन्होंने कैम्ब्रिज में सन 1891 ईस्वी में आयोजित अपने 'रीड व्याख्यान' में कहा था³:

     'अगर मुझसे हिंदू धर्म की परिभाषा पूछी जाए, तब मेरे पास कोई सटीक उत्तर नहीं होगा। मैं संक्षेप में इसकी ऐसी कोई परिभाषा नहीं दे सकता जो इसके मूल सिद्धांतों और आस्थाओं को व्यक्त करती हो, जैसा कि मैं इतिहास प्रसिद्ध अन्य धर्मों की परिभाषा देते हुए करता । इसका कारण यह है कि 'हिंदू' शब्द केवल धर्म का परिचायक नहीं है। यह देश का भी नाम है और कुछ सीमा तक जाति का भी नाम है। जब हम ईसाई,


1. सेन्सस ऑफ इंडिया रिपोर्ट ( 1881 ) पृ. 158
2. वही ( 1881), पृ. 158
3. एशियाटिक स्टडीज, खंड 2, पृ. 287-88


या बौद्ध कहते हैं तब व्यापक अर्थ में हमारा आशय किसी विशेष धार्मिक संप्रदाय से होता है, हम जाति या स्थान का भेद नहीं करते। जब हम किसी रूसी या किसी फारसी की चर्चा करते हैं, तब हम देश या कुल का संकेत करते हैं और वहां धर्म या मत का अंतर हमारा अभिप्रेत नहीं होता। लेकिन जब कोई व्यक्ति मुझसे कहता है कि मैं हिंदू हूं, तब मैं जान जाता हूं कि वह तीनों बातों का एक साथ उल्लेख कर रहा है - धर्म, कुल और देश का । "

     हिंदू धर्म के धार्मिक स्वरूप के बारे में सर अल्फ्रेड लायल कहते हैं:

     “हिंदू धर्म बेतुके अंधविश्वासों, आचार-विचारों, उपासना पद्धतियों, आस्थाओं, रूढ़ियों और पौराणिक कथाओं की पेचीदा गुंजलक है, जिन्हें धर्म-ग्रंथों और ब्राह्मणों के निर्देशों ने मान्यता दे रखी है और जिनका प्रचार ब्राह्मणों के उपदेशों द्वारा होता है । "

     “जिसे हिंदू अथवा हिंदू समुदाय के अधिकांश लोग अमल में लाते हैं वही हिंदू धर्म है।"

     अंत में, मैं एक हिंदू श्री जी. पी.  सेन द्वारा दी गई परिभाषा को उद्धृत करता हूं जो न सिर्फ हिंदू हैं, बल्कि हिंदू धर्म के अध्येता भी हैं। श्री सेन इंट्रोडक्शन टु दि स्टडी ऑफ हिंदूइज्म नामक अपनी पुस्तक में लिखते हैं:

     क्या हिंदू धर्म में कोई ऐसा सिद्धांत नहीं है, जिसका सभी हिंदू अपने-अपने विभिन्न मतभेदों के बावजूद, पालन करना स्वेच्छया अपना कर्तव्य समझते हों? मुझे लगता है कि ऐसा सिद्धांत है और यह सिद्धांत जाति का सिद्धांत है। इस बारे में मतभेद हा सकता है कि हिंदू धर्म में कौन-कौन से मूल तत्व हैं। लेकिन इस बात में कोई मतभेद नहीं हो सकता कि हिंदू धर्म का एक मुख्य और अभिन्न अंग है जाति । प्रत्येक हिंदू - वह चाहे सिर्फ कानूनी हिंदू ही क्यों न हो, जाति में विश्वास करता है और इसी प्रकार प्रत्येक हिंदू की जो कानूनी हिंदू होने पर गर्व करता है, एक जाति होती है। हिंदू उसी प्रकार जाति में पैदा होता है, जिस प्रकार वह हिंदू धर्म में पैदा होता है। सच तो यह है कि कोई भी व्यक्ति हिंदू धर्म में तब तक पैदा नहीं समझा जा सकता जब तक वह किसी जाति में पैदा न हुआ हो। जाति और हिंदू धर्म एक-दूसरे से अलग नहीं किए जा सकते। प्रो. मैक्समूलर¹ का कहना है:

     “आधुनिक हिंदू धर्म-जाति पर स्थित है, जैसे वह किसी चट्टान पर हो, जिसे कोई भी तर्क हिला नहीं सकता। "

     इसका तात्पर्य यह हुआ कि चूंकि मनु ने जाति का सिद्धांत निर्धारित किया है और चूंकि हिंदू धर्म के मूल में जाति का सिद्धांत स्थित है, अतः मनुस्मृति को धर्म ग्रंथ के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए।


1. साइंस ऑफ रिलिजन, पृ. 28